Varṇa-dharma and Rājadharma: Yudhiṣṭhira’s Inquiry and Bhīṣma’s Normative Outline (वर्णधर्म-राजधर्म-प्रश्नोत्तरम्)
अरिमध्यस्थमित्राणां सम्यक् चोक्त प्रपडचनम् | अवरमर्द: प्रतीघातस्तथैव च बलीयसाम्,सात अड़ोंसे युक्त राज्यके हास, वृद्धि और समान भावसे स्थिति, दूतके सामर्थ्यसे होनेवाली अपनी और अपने राष्ट्रकी वृद्धि, शत्रु, मित्र और मध्यस्थोंका विस्तारपूर्वक सम्यक् विवेचन, बलवान शत्रुओंको कुचल डालने तथा उनसे टक्कर लेनेकी विधि आदिका उक्त ग्रन्थमें वर्णन किया गया है
arimadhyasthamitrāṇāṁ samyak cokta-prapañcanam | avaramardaḥ pratīghātas tathaiva ca balīyasām ||
ভীষ্ম বললেন—“সেই গ্রন্থে শত্রু, মধ্যস্থ ও মিত্র—এদের বিষয়ে যথাক্রমে বিস্তৃত ও যথাযথ বিচার বর্ণিত আছে; এবং প্রতিপক্ষকে দমন করা ও প্রতিঘাতের মোকাবিলা করার উপায়ও—যদিও শত্রু অধিক বলবান হয়।”
भीष्म उवाच