अध्याय ३३१: नारायणकथा-प्रशंसा तथा नारदस्य श्वेतद्वीप-निवृत्ति एवं बदरी-आगमनम् | Chapter 331: Praise of the Nārāyaṇa Narrative; Nārada’s Return from Śvetadvīpa and Arrival at Badarī
इसलिये मानसिक दु:खको बुद्धिके द्वारा विचारसे और शारीरिक कष्टको औषध- सेवनद्वारा नष्ट करना चाहिये। शास्त्रज्ञानके प्रभावसे ही ऐसा होना सम्भव है। दुःख पड़नेपर बालकोंकी तरह रोना उचित नहीं है ।। अनित्यं यौवन रूप॑ं जीवितं द्रव्यसंचय: । आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डित:,रूप, यौवन, जीवन, धन-संग्रह, आरोग्य तथा प्रियजनोंका सहवास--ये सब अनित्य हैं। विद्वान् पुरुषको इनमें आसक्त नहीं होना चाहिये
anityaṁ yauvana-rūpaṁ jīvitaṁ dravya-saṁcayaḥ | ārogyaṁ priya-saṁvāso gṛdhyet tatra na paṇḍitaḥ ||
নারদ বললেন—যৌবন ও রূপ অনিত্য; জীবন, ধনসঞ্চয়, আরোগ্য এবং প্রিয়জনের সান্নিধ্যও ক্ষণস্থায়ী। অতএব পণ্ডিত ব্যক্তি এগুলিতে আসক্ত হন না। দুঃখ উপস্থিত হলে বিচার-বিবেচনায় মানসিক যন্ত্রণা প্রশমিত করা উচিত এবং যথোচিত ঔষধ-সেবনে শারীরিক কষ্ট নিবারণ করা উচিত; শাস্ত্রজ্ঞানের প্রভাবেই এমন স্থৈর্য সম্ভব। বিপদে শিশুর মতো কাঁদা শোভন নয়।
नारद उवाच