मनुरुवाच — इन्द्रिय-मनः-ज्ञान-क्रमः
Manu on the hierarchy of senses, mind, and knowledge
जप्यस्य च विधिं कृत्स्नं वक्तुमहसि मेडनघ । जापका इति किज्चैतत् सांख्ययोगक्रियाविधि:,अनघ! आप मुझे जपकी सम्पूर्ण विधि भी बताइये। “जापक” इस पदसे क्या तात्पर्य है? क्या यह सांख्ययोग, ध्यानयोग अथवा क्रियायोगका अनुष्ठान है? अवमानेन कुरुते न प्रीयति न हृष्यति । ईदृशो जापको याति निरयं नात्र संशय: जो अवहेलनापूर्वक जप करता है, उसके प्रति प्रेम या प्रसन्नता नहीं प्रकट करता है, ऐसा जापक भी नि:संदेह नरकमें ही पड़ता है
yudhiṣṭhira uvāca | japyasya ca vidhiṁ kṛtsnaṁ vaktum arhasi medānagha | jāpaka iti kiṁ caitat sāṅkhyayogakriyāvidhiḥ, anagha! | avamānena kurute na prīyati na hṛṣyati | īdṛśo jāpako yāti nirayaṁ nātra saṁśayaḥ ||
যুধিষ্ঠির বললেন— হে অনঘ! আপনি আমাকে জপের সম্পূর্ণ বিধিও বলুন। ‘জপক’ শব্দের প্রকৃত অর্থ কী? এটি কি সাংখ্য, ধ্যানযোগ, না কি ক্রিয়াযোগের কোনো বিধান? যে অবজ্ঞাভরে জপ করে—যার মধ্যে না স্নেহ আছে, না আনন্দ—এমন জপক নিঃসন্দেহে নরকে যায়।
युधिछिर उवाच