Adhyaya 81
Sabha ParvaAdhyaya 8143 Verses

Adhyaya 81

Chapter Arc: राजसभा के अपमान और अनर्थ की छाया में धृतराष्ट्र अकेले बैठे हैं—लंबी साँसें, उद्विग्न मन, और भीतर-भीतर उठती आशंका; तभी संजय उनके मौन को तोड़ते हैं। → संजय धृतराष्ट्र के शोक का कारण उलटकर दिखाते हैं: ‘राज्य और वैभव पाकर भी आप क्यों पछताते हैं?’ फिर वे स्पष्ट कहते हैं कि यह वैर धृतराष्ट्र का ‘स्वकृत’ है—दुर्योधन की हठ, प्रातिकामी द्वारा द्रौपदी का अपमान, और भीष्म-द्रोण-विदुर की बार-बार की गई रोक के बावजूद राजकीय संरक्षण। → संजय का कठोर निष्कर्ष—यह वैर ऐसा विनाश लाएगा जो ‘लोक’ तक को सानुबन्ध (परिवार-वंश सहित) डुबो देगा; और ‘काल’ का रहस्य यह है कि वह स्वयं तलवार नहीं चलाता, बल्कि मनुष्य की बुद्धि को विपरीतार्थ-दर्शन में फँसाकर उसे अपने ही कर्मों से कटवा देता है। → धृतराष्ट्र के शोक को संजय ‘पश्चात्ताप’ की दिशा में मोड़ते हैं: दोष बाह्य नहीं, भीतर है—राजा की दुर्बलता, पुत्रमोह, और अधर्म को रोकने में असफलता। अध्याय एक चेतावनी-स्वर में ठहरता है, मानो अभी भी सुधार का एक क्षीण अवसर शेष हो। → क्या धृतराष्ट्र पुत्रमोह से ऊपर उठकर दुर्योधन को रोकेँगे, या ‘काल’ के विपरीतार्थ-दर्शन में फँसकर विनाश को आमंत्रित करेंगे?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं) नफमशा< (0) आज अन+- एकाशीतितमो<ध्याय: धृतराष्ट्रकी चिन्ता और उनका संजयके साथ वार्तालाप वैशम्पायन उवाच वन॑ गतेषु पार्थेषु निर्जितिषु दुरोदरे । धृतराष्ट्र महाराज तदा चिन्ता समाविशत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जब पाण्डव जूएमें हारकर वनमें चले गये, तब राजा धृतराष्ट्रको बड़ी चिन्ता हुई

বৈশম্পায়ন বললেন—পার্থপুত্র পাণ্ডবেরা দুরোদের সর্বনাশা খেলায় পরাজিত হয়ে যখন বনে গমন করল, তখন মহারাজ ধৃতরাষ্ট্র গভীর উদ্বেগে আচ্ছন্ন হলেন।

Verse 2

त॑ चिन्तयानमासीन धृतराष्ट्र जनेश्वरम्‌ । निःश्वसन्तमनेकाग्रमिति होवाच संजय:,महाराज धुृतराष्ट्रको लंबी साँस खींचते और उद्विग्नचित्त होकर चिन्तामें डूबे हुए देख संजयने इस प्रकार कहा

মানুষলোকের অধিপতি ধৃতরাষ্ট্রকে আসনে বসে চিন্তায় নিমগ্ন, দীর্ঘশ্বাস ফেলতে ফেলতে মন স্থির করতে অক্ষম দেখে সঞ্জয় এই কথা বলল।

Verse 3

संजय उवाच अवाप्य वसुसम्पूर्णा वसुधां वसुधाधिप । प्रत्राज्य पाण्डवान्‌ राज्याद राजन्‌ किमनुशोचसि,संजय बोले--पृथ्वीनाथ! यह धन-रत्नोंसे सम्पन्न वसुधाका राज्य पाकर और पाण्डवोंको अपने देशसे निकालकर अब आप क्‍यों शोकमग्न हो रहे हैं?

সঞ্জয় বলল—হে পৃথিবীপতি! ধনরত্নে পরিপূর্ণ এই ভূমি ও রাজ্য লাভ করে, আর পাণ্ডবদের রাজ্য থেকে বিতাড়িত করে, হে রাজন, এখন আপনি কেন শোক করছেন?

Verse 4

धृतराष्ट्र रवाच अशोच्यत्वं कुतस्तेषां येषां वैरं भविष्यति । पाण्डवैर्युद्धशौण्डैर्हि बलवद्धिर्महारथै:,धृतराष्ट्रने कहा--जिन लोगोंका युद्धकुशल बलवान्‌ महारथी पाण्डवोंसे वैर होगा, वे शोकमग्न हुए बिना कैसे रह सकते हैं?

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যাদের ভাগ্যে যুদ্ধনিপুণ, বলবান মহারথী পাণ্ডবদের সঙ্গে বৈর ঘটবে, তারা কীভাবে শোকমুক্ত থাকতে পারে?

Verse 5

संजय उवाच तवेदं स्वकृतं राजन्‌ महद्‌ वैरमुपस्थितम्‌ । विनाशो येन लोकस्य सानुबन्धो भविष्यति,संजय बोले--राजन्‌! यह आपकी अपनी ही की हुई करतूत है, जिससे यह महान्‌ वैर उपस्थित हुआ है और इसीके कारण सम्पूर्ण जगत्‌का सगे-सम्बन्धियों-लहित विनाश हो जायगा

সঞ্জয় বলল—হে রাজন! এই মহাবৈর তোমারই স্বকৃত কর্মে উপস্থিত হয়েছে; এরই ফলে লোকসমাজের, সকল সম্পর্ক-পরিজনসহ, বিনাশ ঘটবে।

Verse 6

वार्यमाणो हि भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च । पाण्डवानां प्रियां भारया द्रौपदी धर्मचारिणीम्‌,भीष्म, द्रोण और विदुरने बार-बार मना किया तो भी आपके मूढ़ और निर्लज्ज पुत्र दुर्योधनने सूतपुत्र प्रातिकामी-को यह आदेश देकर भेजा कि तुम पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी धर्मचारिणी द्रौपदीको सभामें ले आओ

সঞ্জয় বললেন—ভীষ্ম, দ্রোণ ও বিদুর বারবার নিষেধ করলেও তোমার মূঢ় ও নির্লজ্জ পুত্র দুর্যোধন সূতপুত্র প্রাতিকামীকে এই আদেশ দিয়ে পাঠাল—“পাণ্ডবদের প্রিয় পত্নী, ধর্মনিষ্ঠা দ্রৌপদীকে সভায় নিয়ে এসো।”

Verse 7

प्राहिणोदानयेहेति पुत्रो दुर्योधनस्तव । सूतपुत्र॑ सुमन्दात्मा निर्लज्ज: प्रातिकामिनम्‌,भीष्म, द्रोण और विदुरने बार-बार मना किया तो भी आपके मूढ़ और निर्लज्ज पुत्र दुर्योधनने सूतपुत्र प्रातिकामी-को यह आदेश देकर भेजा कि तुम पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी धर्मचारिणी द्रौपदीको सभामें ले आओ

সঞ্জয় বললেন—তোমার পুত্র দুর্যোধন, যে কুটবুদ্ধি ও নির্লজ্জ, সে সূতপুত্র প্রাতিকামীকে পাঠিয়ে বলল—“ওকে এখানে নিয়ে এসো।”

Verse 8

यस्मै देवा: प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम्‌ | बुद्धि तस्यापकर्षन्ति सोडवाचीनानि पश्यति,देवतालोग जिस पुरुषको पराजय देना चाहते हैं, उसकी बुद्धि ही पहले हर लेते हैं, इससे वह सब कुछ उलटा ही देखने लगता है। विनाशकाल उपस्थित होनेपर जब बुद्धि मलिन हो जाती है, उस समय अन्याय ही न्यायके समान जान पड़ता है और वह हृदयसे किसी प्रकार नहीं निकलता

সঞ্জয় বললেন—যাকে দেবতারা পরাভব দিতে চান, তার বুদ্ধি আগে কেড়ে নেন; তখন সে সবকিছুই উল্টোভাবে দেখতে শুরু করে।

Verse 9

बुद्धी कलुषभूतायां विनाशे समुपस्थिते । अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति,देवतालोग जिस पुरुषको पराजय देना चाहते हैं, उसकी बुद्धि ही पहले हर लेते हैं, इससे वह सब कुछ उलटा ही देखने लगता है। विनाशकाल उपस्थित होनेपर जब बुद्धि मलिन हो जाती है, उस समय अन्याय ही न्यायके समान जान पड़ता है और वह हृदयसे किसी प्रकार नहीं निकलता

সঞ্জয় বললেন—বিনাশ যখন নিকটে আসে আর বুদ্ধি কলুষিত হয়, তখন অন্যায়ও ন্যায়ের মতো মনে হয়; আর সেই মোহ হৃদয় থেকে সরে না।

Verse 10

अनर्थाश्षार्थरूपेण अर्थाश्षानर्थरूपिण: । उत्तिष्ठन्ति विनाशाय नूनं तच्चास्य रोचते,उस समय उस पुरुषके विनाशके लिये अनर्थ ही अर्थरूपसे और अर्थ भी अनर्थरूपसे उसके सामने उपस्थित होते हैं और निश्चय ही अर्थरूपमें आया हुआ अनर्थ ही उसे अच्छा लगता है

সঞ্জয় বললেন—তখন বিনাশের পথে অনর্থই অর্থের রূপ ধরে সামনে আসে, আর প্রকৃত অর্থ অনর্থের মতো দেখায়; আর অর্থের মুখোশধারী সেই অনর্থই নিশ্চিতভাবে তাকে প্রিয় লাগে।

Verse 11

न कालो दण्डमुद्यम्य शिर: कृन्तति कस्यचित्‌ | कालस्य बलमेतावद्‌ विपरीतार्थदर्शनम्‌,काल डंडा या तलवार लेकर किसीका सिर नहीं काटता। कालका बल इतना ही है कि वह प्रत्येक वस्तुके विषयमें मनुष्यकी विपरीत बुद्धि कर देता है

কাল দণ্ড বা তলোয়ার তুলে কারও মস্তক ছেদন করে না। কালের শক্তি এইটুকুই—সে মানুষের বুদ্ধিকে উল্টে দেয়; হিতকে অহিত ও অহিতকে হিত বলে দেখিয়ে তাকে নিজেরই সর্বনাশের পথে ঠেলে দেয়।

Verse 12

आसादितमिदं घोरं तुमुलं लोमहर्षणम्‌ । पाञज्चालीमपकर्षद्धि: सभामध्ये तपस्विनीम्‌,पांचालराजकुमारी द्रौपदी तपस्विनी है। उसका जन्म किसी मानवी स्त्रीके गर्भसे नहीं हुआ है, वह अग्निके कुलमें उत्पन्न हुई और अनुपम सुन्दरी है। वह सब धर्मोको जाननेवाली तथा यशस्विनी है। उसे भरी सभामें खींचकर लानेवाले दुष्टोंने भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाले घमासान युद्धकी सम्भावना उत्पन्न कर दी है। अधर्मपूर्वक जूआ खेलनेवाले दुर्योधनके सिवा कौन है, जो द्रौपदीको सभामें बुला सके। सुन्दर शरीरवाली पांचालराजकुमारी स्त्रीधर्मसे युक्त (रजस्वला) थी। उसका वस्त्र रक्तसे सना हुआ था। वह एक ही साड़ी पहने हुए थी। उसने सभामें आकर पाण्डवोंको देखा। उन पाण्डवोंके धन, राज्य, वस्त्र और लक्ष्मी सबका अपहरण हो चुका था। वे सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंसे वंचित हो दासभावको प्राप्त हो गये थे। धर्मके बन्धनमें बँधे रहनेके कारण वे पराक्रम दिखानेमें भी असमर्थ-से हो रहे थे

সঞ্জয় বললেন—এ এক ভয়ংকর, তুমুল, রোমহর্ষক সংকট এসে পড়েছে, যখন তপস্বিনী পাঞ্চালীকে সভামধ্যেই টেনে আনা হল। এই অধর্মাচরণ এমন ভয়াবহ সংঘর্ষের ভূমি রচনা করেছে যে যুদ্ধ যেন অনিবার্য হয়ে উঠল।

Verse 13

अयोनिजां रूपवतीं कुले जातां विभावसो: । को नुतां सर्वधर्मज्ञां परिभूय यशस्विनीम्‌,पांचालराजकुमारी द्रौपदी तपस्विनी है। उसका जन्म किसी मानवी स्त्रीके गर्भसे नहीं हुआ है, वह अग्निके कुलमें उत्पन्न हुई और अनुपम सुन्दरी है। वह सब धर्मोको जाननेवाली तथा यशस्विनी है। उसे भरी सभामें खींचकर लानेवाले दुष्टोंने भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाले घमासान युद्धकी सम्भावना उत्पन्न कर दी है। अधर्मपूर्वक जूआ खेलनेवाले दुर्योधनके सिवा कौन है, जो द्रौपदीको सभामें बुला सके। सुन्दर शरीरवाली पांचालराजकुमारी स्त्रीधर्मसे युक्त (रजस्वला) थी। उसका वस्त्र रक्तसे सना हुआ था। वह एक ही साड़ी पहने हुए थी। उसने सभामें आकर पाण्डवोंको देखा। उन पाण्डवोंके धन, राज्य, वस्त्र और लक्ष्मी सबका अपहरण हो चुका था। वे सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंसे वंचित हो दासभावको प्राप्त हो गये थे। धर्मके बन्धनमें बँधे रहनेके कारण वे पराक्रम दिखानेमें भी असमर्थ-से हो रहे थे

সঞ্জয় বললেন—তিনি অযোনিজা, রূপবতী, বিভাবসু (অগ্নি)-বংশে জাত। যিনি সর্বধর্মজ্ঞা সেই যশস্বিনীকে অপমান করেছে, সে-ই বা কী করে তাকে সভায় আহ্বান করার দুঃসাহস দেখায়? এই অধর্মই ভয়ংকর, রোমহর্ষক যুদ্ধের বীজ বপন করেছে।

Verse 14

पर्यानयेत्‌ सभामध्ये विना दुर्द्यूतदेविनम्‌ । स्त्रीधर्मिणी वरारोहा शोणितेन परिप्लुता,पांचालराजकुमारी द्रौपदी तपस्विनी है। उसका जन्म किसी मानवी स्त्रीके गर्भसे नहीं हुआ है, वह अग्निके कुलमें उत्पन्न हुई और अनुपम सुन्दरी है। वह सब धर्मोको जाननेवाली तथा यशस्विनी है। उसे भरी सभामें खींचकर लानेवाले दुष्टोंने भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाले घमासान युद्धकी सम्भावना उत्पन्न कर दी है। अधर्मपूर्वक जूआ खेलनेवाले दुर्योधनके सिवा कौन है, जो द्रौपदीको सभामें बुला सके। सुन्दर शरीरवाली पांचालराजकुमारी स्त्रीधर्मसे युक्त (रजस्वला) थी। उसका वस्त्र रक्तसे सना हुआ था। वह एक ही साड़ी पहने हुए थी। उसने सभामें आकर पाण्डवोंको देखा। उन पाण्डवोंके धन, राज्य, वस्त्र और लक्ष्मी सबका अपहरण हो चुका था। वे सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंसे वंचित हो दासभावको प्राप्त हो गये थे। धर्मके बन्धनमें बँधे रहनेके कारण वे पराक्रम दिखानेमें भी असमर्थ-से हो रहे थे

সঞ্জয় বললেন—অধর্মজুয়ায় আসক্ত সেই দুষ্ট দুর্যোধন ছাড়া আর কে পাঞ্চালরাজকুমারী দ্রৌপদীকে সভামধ্যেই আনার আদেশ দিতে পারত? তিনি স্ত্রীধর্মে স্থিতা, মহীয়সী রূপবতী; সেই সময় ঋতুমতী থাকায় তাঁর বস্ত্র রক্তে রঞ্জিত ছিল—তবু নির্মমভাবে তাঁকে রাজসভায় টেনে আনা হল, আর তাতেই ভয়ংকর, রোমহর্ষক যুদ্ধের বীজ পড়ল।

Verse 15

एकवस्त्राथ पाज्चाली पाण्डवानभ्यवैक्षत । हतस्वान्‌ द्वतराज्यांश्व॒ हृतवस्त्रान्‌ हृतश्रिय:,पांचालराजकुमारी द्रौपदी तपस्विनी है। उसका जन्म किसी मानवी स्त्रीके गर्भसे नहीं हुआ है, वह अग्निके कुलमें उत्पन्न हुई और अनुपम सुन्दरी है। वह सब धर्मोको जाननेवाली तथा यशस्विनी है। उसे भरी सभामें खींचकर लानेवाले दुष्टोंने भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाले घमासान युद्धकी सम्भावना उत्पन्न कर दी है। अधर्मपूर्वक जूआ खेलनेवाले दुर्योधनके सिवा कौन है, जो द्रौपदीको सभामें बुला सके। सुन्दर शरीरवाली पांचालराजकुमारी स्त्रीधर्मसे युक्त (रजस्वला) थी। उसका वस्त्र रक्तसे सना हुआ था। वह एक ही साड़ी पहने हुए थी। उसने सभामें आकर पाण्डवोंको देखा। उन पाण्डवोंके धन, राज्य, वस्त्र और लक्ष्मी सबका अपहरण हो चुका था। वे सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंसे वंचित हो दासभावको प्राप्त हो गये थे। धर्मके बन्धनमें बँधे रहनेके कारण वे पराक्रम दिखानेमें भी असमर्थ-से हो रहे थे

সঞ্জয় বললেন—তখন একখানি মাত্র বস্ত্র পরিহিতা পাঞ্চালী পাণ্ডবদের দিকে তাকালেন। তিনি ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের উল্লসিত দেখলেন, আর পাণ্ডবদের দেখলেন—যাদের রাজ্য, ধন, বস্ত্র ও শ্রী সবই হরণ হয়েছে—দাসত্বে নত, ধর্মের বন্ধনে আবদ্ধ, যেন বীর্য প্রকাশে অক্ষম।

Verse 16

विहीनान्‌ सर्वकामेभ्यो दासभावमुपागतान्‌ | धर्मपाशपरिक्षिप्तानशक्तानिव विक्रमे,पांचालराजकुमारी द्रौपदी तपस्विनी है। उसका जन्म किसी मानवी स्त्रीके गर्भसे नहीं हुआ है, वह अग्निके कुलमें उत्पन्न हुई और अनुपम सुन्दरी है। वह सब धर्मोको जाननेवाली तथा यशस्विनी है। उसे भरी सभामें खींचकर लानेवाले दुष्टोंने भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाले घमासान युद्धकी सम्भावना उत्पन्न कर दी है। अधर्मपूर्वक जूआ खेलनेवाले दुर्योधनके सिवा कौन है, जो द्रौपदीको सभामें बुला सके। सुन्दर शरीरवाली पांचालराजकुमारी स्त्रीधर्मसे युक्त (रजस्वला) थी। उसका वस्त्र रक्तसे सना हुआ था। वह एक ही साड़ी पहने हुए थी। उसने सभामें आकर पाण्डवोंको देखा। उन पाण्डवोंके धन, राज्य, वस्त्र और लक्ष्मी सबका अपहरण हो चुका था। वे सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंसे वंचित हो दासभावको प्राप्त हो गये थे। धर्मके बन्धनमें बँधे रहनेके कारण वे पराक्रम दिखानेमें भी असमर्थ-से हो रहे थे

সঞ্জয় বললেন—সমস্ত কাম্য ভোগ থেকে বঞ্চিত হয়ে তারা দাসত্বে পতিত হয়েছিল; ধর্মের পাশে আবদ্ধ থাকায় তারা যেন বীর্য প্রদর্শনে অক্ষম বলেই প্রতীয়মান হচ্ছিল।

Verse 17

क्रुद्धां चानर्हतीं कृष्णां दु:खितां कुरुसंसदि । दुर्योधनश्व कर्णश्रव कटुकान्यभ्यभाषताम्‌

সঞ্জয় বললেন—কুরুসভায় দুঃখিত ও ক্রুদ্ধ, অথচ এমন অপমানের অযোগ্য কৃষ্ণা (দ্রৌপদী) দাঁড়িয়ে ছিলেন; সেখানে দুর্যোধন ও কর্ণ তাঁকে তীক্ষ্ণ, কটু বাক্যে বিদ্ধ করল।

Verse 18

धृतराष्ट उवाच तस्या: कृपणचक्षुर्भ्या प्रदह्नेतापि मेदिनी,धृतराष्ट्रने कहा--संजय! द्रौपदीके उन दीनतापूर्ण नेत्रोंद्वारा यह सारी पृथ्वी दग्ध हो सकती थी

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে সঞ্জয়, তার সেই করুণ, শোকাকুল দৃষ্টিতেই তো সমগ্র পৃথিবী পর্যন্ত দগ্ধ হয়ে যেতে পারত।

Verse 19

अपि शेषं भवेदद्य पुत्राणां मम॒ संजय । भरतानां स्त्रिय: सर्वा गान्धार्या सह संगता:,संजय! उसके अभिशापसे मेरे सभी पुत्रोंका आज ही संहार हो जाता, परंतु उसने सब कुछ चुपचाप सह लिया। जिस समय रूप और यौवनसे सुशोभित होनेवाली पाण्डवोंकी धर्मपरायणा धर्मपत्नी कृष्णा सभामें लायी गयी, उस समय वहाँ उसे देखकर भरतवंशकी सभी स्त्रियाँ गान्धारीके साथ मिलकर बड़े भयानक स्वरसे विलाप एवं चीत्कार करने लगीं

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে সঞ্জয়, আজ কি আমার পুত্রদের কারও অবশিষ্ট থাকত? ভরতবংশের সকল নারী গান্ধারীর সঙ্গে একত্র হয়ে ভয়ংকর স্বরে বিলাপ করতে লাগল।

Verse 20

प्राक्रोशन्‌ भैरवं तत्र दृष्टवा कृष्णां सभागताम्‌ । धर्मिष्ठां धर्मपत्नीं च रूपयौवनशालिनीम्‌,संजय! उसके अभिशापसे मेरे सभी पुत्रोंका आज ही संहार हो जाता, परंतु उसने सब कुछ चुपचाप सह लिया। जिस समय रूप और यौवनसे सुशोभित होनेवाली पाण्डवोंकी धर्मपरायणा धर्मपत्नी कृष्णा सभामें लायी गयी, उस समय वहाँ उसे देखकर भरतवंशकी सभी स्त्रियाँ गान्धारीके साथ मिलकर बड़े भयानक स्वरसे विलाप एवं चीत्कार करने लगीं

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে সঞ্জয়, সেখানে ধর্মনিষ্ঠা, ধর্মপত্নী, রূপ-যৌবনে দীপ্ত কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)কে সভায় আনা দেখে ভরতবংশের সকল নারী গান্ধারীর সঙ্গে ভয়ংকর স্বরে চিৎকার করে উঠল।

Verse 21

प्रजाभि: सह संगम्य हानुशोचन्ति नित्यश: । अन्निहोत्राणि सायाह्ले न चाहूयन्त सर्वश:

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“প্রজাদের সঙ্গে একত্র হয়ে তারা নিরন্তর শোক করে। আর সন্ধ্যাকালে সর্বত্র অগ্নিহোত্রের আহ্বান ও বিধিপূর্বক পালন হচ্ছে না।”

Verse 22

आसीज्निष्ठानको घोरो निर्घातश्न महानभूत्‌,उस समय प्रलयकालीन मेघोंकी भयानक गर्जनाके समान भारी आवाजके साथ बड़े जोरकी आँधी चलने लगी। वज्रपातका-सा अत्यन्त कर्कश शब्द होने लगा। आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं तथा राहुने बिना पर्वके ही सूर्यको ग्रस लिया और प्रजाके लिये अत्यन्त घोर भय उपस्थित कर दिया

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“ভয়ংকর এক মহা-নির্ঘাতের মতো প্রচণ্ড কোলাহল উঠল—যেন প্রলয়কালের মেঘগর্জন। তীব্র ঝড় বইতে লাগল, আর বজ্রাঘাতের মতো কর্কশ ধ্বনি প্রতিধ্বনিত হলো। আকাশ থেকে উল্কা ঝরতে লাগল, এবং ঋতুবহির্ভূতভাবে রাহু সূর্যকে গ্রাস করল—ফলে প্রজাদের মধ্যে চরম আতঙ্ক ছড়িয়ে পড়ল। এই অশুভ লক্ষণগুলি জানায়, অধর্ম ঘনীভূত হয়ে বিপর্যয়ে পরিণত হতে চলেছে।”

Verse 23

दिव उल्काश्चापतन्त राहुश्चार्कमुपाग्रसत्‌ । अपर्वणि महाघोरंं प्रजानां जनयन्‌ भयम्‌,उस समय प्रलयकालीन मेघोंकी भयानक गर्जनाके समान भारी आवाजके साथ बड़े जोरकी आँधी चलने लगी। वज्रपातका-सा अत्यन्त कर्कश शब्द होने लगा। आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं तथा राहुने बिना पर्वके ही सूर्यको ग्रस लिया और प्रजाके लिये अत्यन्त घोर भय उपस्थित कर दिया

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“আকাশ থেকে উল্কা ঝরতে লাগল, আর ঋতুবহির্ভূতভাবে রাহু সূর্যকে গ্রাস করল—ফলে প্রজাদের মধ্যে ভয়াবহ আতঙ্ক জন্মাল।” কাহিনিতে এই অস্বাভাবিক লক্ষণগুলি ধর্মচ্যুতির সতর্কবার্তা; শাসক ও সভা যখন ধর্ম ত্যাগ করে, তখন প্রকৃতিও যেন আসন্ন বিপর্যয়ের সংকেত দেয়।

Verse 24

तथैव रथशालासु प्रादुरासीद्भधुताशन: । ध्वजाश्वापि व्यशीर्यन्त भरतानामभूतये,इसी प्रकार हमारी रथशालाओंमें आग लग गयी और रथोंकी ध्वजाएँ जलकर खाक हो गयीं, जो भरत-वंशियोंके लिये अमंगलकी सूवना देनेवाली थीं

“তদ্রূপ আমাদের রথশালাগুলিতে হঠাৎই প্রচণ্ড অগ্নি জ্বলে উঠল। ধ্বজা ও অশ্বরাও ধ্বংস হলো—এ ছিল ভরতবংশের জন্য অমঙ্গলের অশুভ লক্ষণ।”

Verse 25

दुर्योधनस्याग्निहोत्रे प्राक्रोशन्‌ भैरवं शिवा: । तास्तदा प्रत्यभाषन्त रासभा: सर्वतो दिश:,दुर्योधनके अग्निहोत्रगृहमें गीदड़ियाँ आकर भयंकर स्वरसे हुँआ-हुँआ करने लगीं। उनकी आवाज सुनते ही चारों दिशाओंमें गधे रेंकने लगे

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“দুর্যোধনের অগ্নিহোত্র-গৃহে শেয়ালিনীরা ভয়ংকর স্বরে চিৎকার করতে লাগল। তাদের ডাক শোনা মাত্রই চার দিক থেকে গাধারাও জবাবে ডেকে উঠল।” এ দৃশ্য অশুভ লক্ষণ—যজ্ঞস্থল পর্যন্ত বিঘ্নিত হওয়া জানায়, অধর্মজাত বিপর্যয় সন্নিকট।

Verse 26

प्रातिष्ठत ततो भीष्मो द्रोणेन सह संजय । कृपश्च सोमदत्तश्न बाह्लीकश्न महामना:,संजय! यह सब देखकर द्रोणके साथ भीष्म, कृपाचार्य, सोमदत्त और महामना बाह्नीक वहाँसे उठकर चले गये। तब मैंने विदुरकी प्रेरणासे वहाँ यह बात कही---'मैं कृष्णाको मनोवांछित वर दूँगा। वह जो कुछ चाहे, माँग सकती है”

তখন, সঞ্জয়, দ্রোণের সঙ্গে ভীষ্ম উঠে প্রস্থান করলেন; কৃপ, সোমদত্ত এবং মহামনা বাহ্লীকও সেখান থেকে চলে গেলেন।

Verse 27

ततो&5हमन्र॒वं तत्र विदुरेण प्रचोदित: । वरं ददानि कृष्णायै काड्क्षितं यद्‌ यदिच्छति,संजय! यह सब देखकर द्रोणके साथ भीष्म, कृपाचार्य, सोमदत्त और महामना बाह्नीक वहाँसे उठकर चले गये। तब मैंने विदुरकी प्रेरणासे वहाँ यह बात कही---'मैं कृष्णाको मनोवांछित वर दूँगा। वह जो कुछ चाहे, माँग सकती है”

তখন, সঞ্জয়, বিদুরের প্রেরণায় আমি সেখানে বললাম—‘কৃষ্ণাকে আমি তার মনঃকামিত বর দেব; সে যা-যা চায়, তাই চাইতে পারে।’

Verse 28

अवृणोत््‌ तत्र पाज्चाली पाण्डवानामदासताम्‌ | सरथान्‌ सभनुष्कांश्चाप्पनुज्ञासिषमप्यहम्‌,तब वहाँ पांचालीने यह वर माँगा कि पाण्डवलोग दासभावसे मुक्त हो जाय॑ँ। मैंने भी रथ और धनुष आदिके सहित पाण्डवोंको उनकी समस्त सम्पत्तिके साथ इन्द्रप्रस्थ लौट जानेकी आज्ञा दे दी थी

সেখানে পাঞ্চালী এই বর বেছে নিল যে পাণ্ডবরা দাসত্ব থেকে মুক্ত হোক; আর আমিও পাণ্ডবদের রথ ও ধনুকসহ (অস্ত্রশস্ত্রসহ) তাদের সম্পত্তি নিয়ে ইন্দ্রপ্রস্থে ফিরে যাওয়ার অনুমতি দিলাম।

Verse 29

अथाब्रवीन्महाप्राज्ञो विदुर: सर्वधर्मवित्‌ । एतदन्तास्तु भरता यद्‌ व: कृष्णा सभां गता,तदनन्तर सब धर्मोके ज्ञाता परम बुद्धिमान्‌ विदुरने कहा--“भरतवंशियो! यह कृष्णा जो तुम्हारी सभामें लायी गयी, यही तुम्हारे विनाशका कारण होगा। यह जो पांचालराजकी पुत्री है, वह परम उत्तम लक्ष्मी ही है। देवताओंकी आज्ञासे ही पांचाली इन पाण्डवोंकी सेवा करती है

তখন সর্বধর্মজ্ঞ মহাপ্রাজ্ঞ বিদুর বললেন—“হে ভারতবংশীয়গণ! তোমাদের পরিণাম এটাই হবে—যে কৃষ্ণাকে তোমাদের সভায় আনা হয়েছে।”

Verse 30

यैषा पाञउ्चालराजस्य सुता सा श्रीरनुत्तमा । पाज्चाली पाण्डवानेतान्‌ दैवसृष्टोपसर्पति,तदनन्तर सब धर्मोके ज्ञाता परम बुद्धिमान्‌ विदुरने कहा--“भरतवंशियो! यह कृष्णा जो तुम्हारी सभामें लायी गयी, यही तुम्हारे विनाशका कारण होगा। यह जो पांचालराजकी पुत्री है, वह परम उत्तम लक्ष्मी ही है। देवताओंकी आज्ञासे ही पांचाली इन पाण्डवोंकी सेवा करती है

এই যে পাঞ্চালরাজের কন্যা—সে-ই অনুত্তম শ্রী; দেববিধানে পাঞ্চালী এই পাণ্ডবদের নিকট এসে তাদের সঙ্গে যুক্ত হয়েছে।

Verse 31

तस्या: पार्था: परिकलेशं न क्षंस्यन्ते हामर्षणा: | वृष्णयो वा महेष्वासा: पाज्चाला वा महारथा:,“कुन्तीके पुत्र अमर्षमें भरे हुए हैं। द्रौपदीको जो यहाँ इस प्रकार क्लेश दिया गया है, इसे वे कदापि सहन नहीं करेंगे। सत्यप्रतिज्ञ भगवान्‌ श्रीकृष्णसे सुरक्षित महान्‌ धनुर्धर वृष्णिवंशी अथवा महारथी पांचाल वीर भी इसे नहीं सहेंगे। अर्जुन पांचाल वीरोंसे घिरे हुए अवश्य आयेंगे

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—কুন্তীপুত্রেরা ক্রোধে দগ্ধ; দ্রৌপদীর উপর এখানে যে অপমান-যন্ত্রণা করা হয়েছে, তা তারা কখনও সহ্য করবে না। না মহাধনুর্ধর বৃষ্ণিরা, না মহারথী পাঞ্চালরাও এ অপমান সহ্য করবে।

Verse 32

तेन सत्याभिसंधेन वासुदेवेन रक्षिता: । आगमिष्यति बीभत्सु: पाज्चालै: परिवारित:,“कुन्तीके पुत्र अमर्षमें भरे हुए हैं। द्रौपदीको जो यहाँ इस प्रकार क्लेश दिया गया है, इसे वे कदापि सहन नहीं करेंगे। सत्यप्रतिज्ञ भगवान्‌ श्रीकृष्णसे सुरक्षित महान्‌ धनुर्धर वृष्णिवंशी अथवा महारथी पांचाल वीर भी इसे नहीं सहेंगे। अर्जुन पांचाल वीरोंसे घिरे हुए अवश्य आयेंगे

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সত্যসংকল্পী বাসুদেবের রক্ষায় তারা নিরাপদ। আর বিবৎসু (অর্জুন) পাঞ্চালদের পরিবেষ্টিত হয়ে নিশ্চয়ই ফিরে আসবে।

Verse 33

तेषां मध्ये महेष्वासो भीमसेनो महाबल: । आगमिष्यति धुन्वानो गदां दण्डमिवान्तक:,“उनके बीचमें महाधनुर्धर महाबली भीमसेन होंगे, जो दण्डपाणि यमराजकी भाँति गदा घुमाते हुए युद्धके लिये आयेंगे

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—তাদের মধ্যে মহাবলী মহেষ্বাস ভীমসেন থাকবে; অন্তক যমের দণ্ডের মতো গদা ঘুরিয়ে সে যুদ্ধক্ষেত্রে আসবে।

Verse 34

ततो गाण्डीवनिर्ोषि श्रुत्वा पार्थस्य धीमत: । गदावेगं च भीमस्य नाल॑ सोदढुं नराधिपा:,“उस समय परम बुद्धिमान्‌ अर्जुनके गाण्डीव धनुषकी टंकार सुनकर और भीमसेनकी गदाका महान्‌ वेग देखकर कोई भी राजा उनका सामना करनेमें समर्थ न हो सकेंगे

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—তখন ধীমান পার্থের গাণ্ডীবের গর্জন শুনে এবং ভীমের গদার প্রচণ্ড বেগ দেখে, কোনো রাজাই তা সহ্য করে তাদের সম্মুখে দাঁড়াতে পারবে না।

Verse 35

तत्र मे रोचते नित्यं॑ पार्थ: साम न विग्रह: । कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवान्‌ बलवत्तरान्‌,“अतः मुझे तो पाण्डवोंके साथ सदा शान्ति बनाये रखनेकी ही नीति अच्छी लगती है। उनके साथ युद्ध करना मुझे पसंद नहीं है। मैं पाण्डवोंको सदा ही कौरवोंसे अधिक बलवान्‌ मानता हूँ

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—অতএব আমার কাছে সর্বদা পাণ্ডবদের সঙ্গে সাম (শান্তি-নীতি)ই প্রিয়, বিগ্রহ (যুদ্ধ) নয়। কারণ আমি পাণ্ডবদের কৌরবদের চেয়ে সর্বদা অধিক বলবান মনে করি।

Verse 36

तथा हि बलवान्‌ राजा जरासंधो महाद्युति: । बाहुप्रहरणेनैव भीमेन निहतो युधि

নিশ্চয়ই মহাতেজস্বী বলবান রাজা জরাসন্ধ যুদ্ধে ভীমের বাহুবলের আঘাতেই নিহত হয়েছিলেন।

Verse 37

“क्योंकि महान्‌ तेजस्वी और बलवान्‌ राजा जरासंधको भीमसेनने बाहुरूपी शस्त्रसे ही युद्धमें मार गिराया था ।। तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ । उभयो: पक्षयोर्युक्ते क्रियतामविशड्कया,“भरतवंशशिरोमणे। अत: पाण्डवोंके साथ आपको शान्ति ही बनाये रखनी चाहिये। दोनों पक्षोंके लिये यही उचित है। आप नि:शंक होकर यही उपाय करें

কারণ মহাতেজস্বী ও বলবান রাজা জরাসন্ধকেও ভীমসেন যুদ্ধে বাহুকেই অস্ত্র করে নিপাত করেছিলেন। অতএব, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, পাণ্ডবদের সঙ্গে তোমার পথ হোক শান্তির। উভয় পক্ষের জন্য এটাই যথোচিত নীতি। হে ভরতবংশের শিরোমণি, নিঃসংশয়ে এই উপায় গ্রহণ করো।

Verse 38

एवं कृते महाराज पर श्रेयस्त्वमाप्स्यसि । एवं गावल्गणे क्षत्ता धर्मार्थसहितं वच:,“महाराज! ऐसा करनेपर आप परम कल्याणके भागी होंगे।” संजय! इस प्रकार विदुरने मुझसे धर्म और अर्थयुक्त बातें कही थीं; किंतु पुत्रका हित चाहनेवाला होकर भी मैंने उनकी बात नहीं मानी

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“হে রাজন, এভাবে করলে তুমি পরম কল্যাণ লাভ করবে।” সঞ্জয়, এইরূপে গাবল্গণের পুত্র কক্ষ্য বিদুর আমাকে ধর্ম ও অর্থসম্মত বাক্য বলেছিলেন; তবু পুত্রহিতকামী হয়েও আমি তাঁর উপদেশ গ্রহণ করিনি।

Verse 39

उक्तवान्‌ न गृहीतं वै मया पुत्रहितैषिणा,“महाराज! ऐसा करनेपर आप परम कल्याणके भागी होंगे।” संजय! इस प्रकार विदुरने मुझसे धर्म और अर्थयुक्त बातें कही थीं; किंतु पुत्रका हित चाहनेवाला होकर भी मैंने उनकी बात नहीं मानी

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যা বলা হয়েছিল, আমি তা গ্রহণ করিনি, যদিও আমি পুত্রহিতকামী ছিলাম। “হে রাজন, এভাবে করলে তুমি পরম কল্যাণের ভাগী হবে।” সঞ্জয়, এইরূপে বিদুর আমাকে ধর্ম ও অর্থসম্মত বাক্য বলেছিলেন; তবু পুত্রের মঙ্গল কামনা করেও আমি তাঁর কথা মানিনি।

Verse 80

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापवके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें विदुर धृतराष्टर और द्रोणके वचनविषयक जअस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত অনুদ্যূতপর্বে বিদুর, ধৃতরাষ্ট্র ও দ্রোণের বাক্যবিষয়ক একাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 81

इति श्रीमहाभारते शतसाहसरूयां संहितायां वैयासिक्यां सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि धृतराष्ट्रसंजयसंवादे एकाशीतितमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের শতসহস্রী বৈয়াসিকী সংহিতার সভাপর্বের অনুদ্যূতপর্বে ধৃতরাষ্ট্র–সঞ্জয় সংলাপের অন্তর্গত একাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 173

उनकी यह दशा देखकर कृष्णा क्रोध और दु:खमें डूब गयी। वह तिरस्कारके योग्य कदापि न थी, तो भी कौरवोंकी सभामें दुर्योधन और कर्णने उसे कटु वचन सुनाये ।। इति सर्वमिदं राजन्नाकुलं प्रतिभाति मे । राजन! ये सारी बातें मुझे महान्‌ दुःखको निमन्त्रण देनेवाली जान पड़ती हैं

তাঁকে সেই অবস্থায় দেখে কৃষ্ণা (দ্রৌপদী) ক্রোধ ও শোকে নিমগ্ন হলেন। তিনি কখনও তিরস্কারের যোগ্য ছিলেন না; তবু কৌরবসভায় দুর্যোধন ও কর্ণ তাঁকে তিক্ত বাক্যে বিদ্ধ করল। সঞ্জয় বললেন—“রাজন, এ সবই আমার কাছে বিশৃঙ্খল ও অমঙ্গলের লক্ষণ বলে প্রতীয়মান; যেন মহাদুঃখের আহ্বান।”

Verse 213

ब्राह्मणा: कुपिताश्चासन्‌ द्रौपद्या: परिकर्षणे । ये सारी स्त्रियाँ प्रजावर्गकी स्त्रियोंके साथ मिलकर रात-दिन सदा इसीके लिये शोक करती रहती हैं। उस दिन द्रौपदीका वस्त्र खींचे जानेके कारण सब ब्राह्मण कुपित हो उठे थे, अतः सायंकाल हमारे घरोंमें उन्होंने अग्निहोत्रतक नहीं किया

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“দ্রৌপদীকে টেনে হিঁচড়ে আনা ও তাঁর বস্ত্র টানাটানির সময় ব্রাহ্মণেরা ক্রুদ্ধ হয়ে উঠেছিলেন। নগরের নারীরা ও প্রজাদের নারীরা একত্রে দিনরাত তাঁর জন্য শোক করে। সেই অপমানে ক্ষুব্ধ হয়ে ব্রাহ্মণেরা সন্ধ্যাবেলায় আমাদের গৃহে অগ্নিহোত্রও করেননি।”