Adhyaya 76
Sabha ParvaAdhyaya 7625 Verses

Adhyaya 76

Chapter Arc: द्यूत-सभा की धूल अभी बैठी भी नहीं कि धृतराष्ट्र का संदेश फिर आता है—“आओ, पाण्डव! फिर पासा खेलो,” और युधिष्ठिर के सामने वही द्वार पुनः खुलता है, जिसके भीतर विनाश पहले ही दिख चुका है। → युधिष्ठिर विधाता-नियोग का तर्क रखकर कहता है कि शुभ-अशुभ फल प्राणियों को प्राप्त होते हैं और उनसे निवृत्ति नहीं—अतः ‘देवितव्यं’ है; वह शकुनि की माया जानते हुए भी भाइयों सहित लौट पड़ता है। सभा में भीष्म, द्रोण, विदुर, कृप, संजय, युयुत्सु, गान्धारी और कुन्ती जैसे वरिष्ठ उसे रोकते हैं; पर लोक-प्रवाद, राज-आज्ञा और ‘धर्म-संयोग’ का दबाव उसे पुनः द्यूत की ओर धकेलता है। → वनवास की शर्त पर ‘एक ही उछाल’ का निर्णायक दाँव—युधिष्ठिर ग्लह स्वीकार करता है, शकुनि पासा फेंकता है और तत्काल घोषणा करता है: “जितम्”—पाण्डवों पर वनवास का निर्णय गिर पड़ता है। → युधिष्ठिर पराजय स्वीकार कर लेता है; सभा के भीतर रोकने वालों की वाणी निष्फल रह जाती है और द्यूत का परिणाम अब विधिवत् राजकीय आदेश का रूप ले लेता है—पाण्डवों के लिए निर्वासन का मार्ग निश्चित होता है। → वनवास की अवधि और उसके बाद की शर्तें (अज्ञातवास/पुनरागमन) पाण्डवों के भविष्य को किस प्रकार बाँधेंगी—यह प्रश्न अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७५ ॥। ऑपनआ प्रात बछ। आर: 2 षट्सप्ततितमो< ध्याय: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुनः जूआ खेलना और हारना वैशम्पायन उवाच ततो व्यध्वगतं पार्थ प्रातिकामी युधिष्ठिरम्‌ । उवाच वचनाद्‌ राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! धर्मराज युधिष्ठछिर इन्द्रप्रस्थके मार्गमें बहुत दूरतक चले गये थे। उस समय बुद्धिमान्‌ राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे प्रातिकामी उनके पास गया और इस प्रकार बोला--

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন পৃথাপুত্র যুধিষ্ঠির পথ ধরে অনেক দূর এগিয়ে গিয়েছিলেন। সেই সময় বুদ্ধিমান রাজা ধৃতরাষ্ট্রের আদেশে প্রাতিকামী তাঁর কাছে এসে বার্তা বলল।

Verse 2

ऐ उपास्तीर्णा सभा राजन्नक्षानुप्त्वा युधिष्ठिर । एहि पाण्डव दीव्येति पिता त्वाहेति भारत,“भरतकुलभूषण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! आपके पिता राजा धृतराष्ट्रने यह आदेश दिया है कि तुम लौट आओ। हमारी सभा फिर सदस्योंसे भर गयी है और तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। तुम पासे फेंककर जूआ खेलो'

হে রাজন! সভা আবার পরিপূর্ণ হয়েছে। হে যুধিষ্ঠির, পাশা গ্রহণ করে এসো—হে পাণ্ডব—এবং খেলো। হে ভারত, তোমার পিতা এই আদেশই দিয়েছেন।

Verse 3

युधिष्ठिर उदाच धातुर्नियोगाद्‌ भूतानि प्राप्रुवन्ति शुभाशुभम्‌ । न निवृत्तिस्तयोरस्ति देवितव्यं पुनर्यदि,युधिष्ठिरने कहा--समस्त प्राणी विधाताकी प्रेरणासे शुभ और अशुभ फल प्राप्त करते हैं। उन्हें कोई टाल नहीं सकता। जान पड़ता है, मुझे फिर जूआ खेलना पड़ेगा

যুধিষ্ঠির বললেন—বিধাতার নিয়োগে প্রাণীরা শুভ ও অশুভ ফল লাভ করে; তা থেকে কারও নিবৃত্তি নেই। অতএব যদি তাই হয়, তবে আমাকে আবার পাশা খেলতেই হবে।

Verse 4

अक्षयूते समाद्दानं नियोगात्‌ स्थविरस्थ च । जानन्नपि क्षयकरं नातिक्रमितुमुत्सहे,वृद्ध राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे जूएके लिये यह बुलावा हमारे कुलके विनाशका कारण है, यह जानते हुए भी मैं उनकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकता

বৈশম্পায়ন বললেন—বৃদ্ধ রাজা ধৃতরাষ্ট্রের আদেশে আমি অক্ষক্রীড়ার এই আহ্বান গ্রহণ করেছি। যদিও জানি, এতে সর্বনাশ আসবে, তবু তাঁর আজ্ঞা অতিক্রম করার সাহস আমার নেই।

Verse 5

वैशम्पायन उवाच असम्भवे हेममयस्य जन्तो- स्तथापि रामो लुलुभे मृगाय । प्रायः समासन्नपरा भवाणां धियो विपर्यस्ततरा भवन्ति,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! किसी जानवरका शरीर सुवर्णका हो, यह सम्भव नहीं; तथापि श्रीराम स्वर्णमय प्रतीत होनेवाले मृगके लिये लुभा गये। जिनका पतन या पराभव निकट होता है, उनकी बुद्धि प्राय: अत्यन्त विपरीत हो जाती है

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! কোনো জীবের দেহ স্বর্ণময় হওয়া অসম্ভব; তবু স্বর্ণাভ মৃগ দেখে রামও মোহিত হয়েছিলেন। যাদের পতন সন্নিকট, তাদের বুদ্ধি প্রায়ই আরও উল্টো পথে ধাবিত হয়।

Verse 6

इति ब्रुवन्‌ निववृते भ्रातृभि: सह पाण्डव: । जानंश्व शकुनेर्मायां पार्थो द्यूतमियात्‌ पुन:,ऐसा कहते हुए पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर भाइयोंके साथ पुनः लौट पड़े। वे शकुनिकी मायाको जानते थे, तो भी जूआ खेलनेके लिये चले आये

এ কথা বলে পাণ্ডব যুধিষ্ঠির ভ্রাতৃগণের সঙ্গে ফিরে চললেন। শকুনির মায়া জেনেও পাণ্ডুপুত্র আবার পাশাখেলায় উপস্থিত হলেন।

Verse 7

विविशुस्ते सभां तां तु पुनरेव महारथा: । व्यथयन्ति सम चेतांसि सुहृदां भरतर्षभा:,महारथी भरतश्रेष्ठ पाण्डव पुनः उस सभामें प्रविष्ट हुए। उन्हें देखकर सुहृदोंके मनमें बड़ी पीड़ा होने लगी। प्रारब्धके वशीभूत हुए कुन्तीकुमार सम्पूर्ण लोकोंके विनाशके लिये पुनः द्यूतक्रीड़ा आरम्भ करनेके उद्देश्यसे चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गये

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেই মহারথী পাণ্ডবেরা আবার সভাগৃহে প্রবেশ করলেন। তাঁদের প্রত্যাবর্তন দেখে সুহৃদদের হৃদয় গভীর বেদনায় কেঁপে উঠল।

Verse 8

यथोपजोषमासीना: पुनर्द्यूतप्रवृत्तये सर्वलोकविनाशाय दैवेनोपनिपीडिता:,महारथी भरतश्रेष्ठ पाण्डव पुनः उस सभामें प्रविष्ट हुए। उन्हें देखकर सुहृदोंके मनमें बड़ी पीड़ा होने लगी। प्रारब्धके वशीभूत हुए कुन्तीकुमार सम्पूर्ण लोकोंके विनाशके लिये पुनः द्यूतक्रीड़ा आरम्भ करनेके उद्देश्यसे चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गये

দৈবের চাপে পিষ্ট হয়ে পাণ্ডবেরা নীরবে যথাস্থানে বসে পড়লেন এবং আবার পাশাখেলা শুরু করতে উদ্যত হলেন—যেন সর্বলোকের বিনাশের পথেই অগ্রসর হলেন।

Verse 9

शकुनिरुवाच अमुज्चत्‌ स्थविरो यद्‌ वो धनं पूजितमेव तत्‌ । महाधन ग्लहं त्वेक॑ शूणु भो भरतर्षभ

শকুনি বলল—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! আমাদের বৃদ্ধ মহারাজ যে ধন তোমাদের ফিরিয়ে দিয়েছেন, সেটিই তোমরা পূর্বে যথাযোগ্য সম্মান করে গ্রহণ করেছিলে। এখন, হে ভরতকুলশ্রেষ্ঠ, মহাধনের একটিমাত্র পণ শোনো।

Verse 10

शकुनिने कहा--राजन्‌! भरतश्रेष्ठ! हमारे बूढ़े महाराजने आपको जो सारा धन लौटा दिया है, वह बहुत अच्छा किया है। अब जूएके लिये एक ही दाँव रखा जायगा उसे सुनिये -- ९ || वयं वा द्वादशाब्दानि युष्माभिर्यूतनिर्जिता: । प्रविशेम महारण्यं रौरवाजिनवासस:,“यदि आपने हमलोगोंको जूएमें हरा दिया तो हम मृगचर्म धारण करके महान्‌ वनमें प्रवेश करेंगे

শকুনি বলল—হে রাজন, ভরতশ্রেষ্ঠ! আমাদের বৃদ্ধ মহারাজ যে সমস্ত ধন তোমাদের ফিরিয়ে দিয়েছেন, তা সত্যিই উত্তম। এখন পাশাখেলার জন্য একটিমাত্র চূড়ান্ত পণ স্থির করা হচ্ছে—শোনো। যদি তোমরা খেলায় আমাদের পরাজিত করো, তবে আমরা বারো বছর রৌরব মৃগচর্ম পরিধান করে মহাবনে প্রবেশ করব।

Verse 11

त्रयोदशं च सजने अज्ञाता: परिवत्सरम्‌ | ज्ञाताश्न पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश,“और बारह वर्ष वहाँ रहेंगे एवं तेरहवाँ वर्ष हम जनसमूहमें लोगोंसे अज्ञात रहकर पूरा करेंगे और यदि हम तेरहवें वर्षमें लोगोंकी जानकारीमें आ जायाँ तो फिर दुबारा बारह वर्ष वनमें रहेंगे

আর ত্রয়োদশ বছর আমরা লোকসমাজের মধ্যে অজ্ঞাত থেকে সম্পূর্ণ করব। কিন্তু যদি সেই ত্রয়োদশ বছরে আমরা পরিচিত হয়ে পড়ি, তবে আবারও বারো বছর বনবাস করতে হবে।

Verse 12

अस्माभिनििर्जिता यूय॑ं वने द्वादश वत्सरान्‌ | वसध्वं कृष्णया सार्धमजिनै: प्रतिवासिता:,“यदि हम जीत गये तो आपलोग द्रौपदीके साथ बारह वर्षोतक मृगचर्म धारण करते हुए वनमें रहें

যদি তোমরা আমাদের কাছে পরাজিত হও, তবে তোমরা কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-সহ বারো বছর বনেই বাস করবে—নির্বাসিত হয়ে, মৃগচর্ম পরিধান করে।

Verse 13

त्रयोदशं च सजने अज्ञाता: परिवत्सरम्‌ | ज्ञाताश्न पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश,“आपको भी तेरहवाँ वर्ष जनसमूहमें लोगोंसे अज्ञात रहकर व्यतीत करना पड़ेगा और यदि ज्ञात हो गये तो फिर दुबारा बारह वर्ष वनमें रहना होगा

আর তোমাদেরও ত্রয়োদশ বছর লোকসমাজের মধ্যে অজ্ঞাত থেকে কাটাতে হবে। যদি সেই বছরে তোমরা পরিচিত হয়ে পড়ো, তবে আবারও বারো বছর বনবাস করতে হবে।

Verse 14

त्रयोदशे च निर्वत्ते पुनरेव यथोचितम्‌ । स्वराज्यं प्रतिपत्तव्यमितरैरथवेतरै:,“तेरहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर हम या आप फिर वनसे आकर यथोचित रीतिसे अपना- अपना राज्य प्राप्त कर सकते हैं"

ত্রয়োদশ বর্ষ পূর্ণ হলে, বন থেকে প্রত্যাবর্তন করে, আমরা বা তোমরা—যথোচিত ও বিধিসম্মতভাবে—নিজ নিজ স্বরাজ্য পুনরায় লাভ করব।

Verse 15

अनेन व्यवसायेन सहास्माभिरययुधिष्ठिर । अक्षानुप्त्वा पुनर्यूतमेहि दीव्यस्व भारत,भरतवंशी युधिष्ठटिर! इसी निश्चयके साथ आप आइये और पुनः पासा फेंककर हमलोगोंके साथ जूआ खेलिये

হে যুধিষ্ঠির! এই স্থির সংকল্প নিয়ে আমাদের সঙ্গে আবার এসো; পাশা নিক্ষেপ করে পুনরায় জুয়ার আসরে প্রবেশ করো এবং খেলো, হে ভারত।

Verse 16

अथ सभ्या: सभामध्ये समुच्छितकरास्तदा । ऊचुरुद्धिग्नमनस: संवेगात्‌ सर्व एव हि

তখন রাজসভামধ্যেই সভাসদগণ হাত উঁচিয়ে, উৎকণ্ঠিত চিত্তে, আকস্মিক উদ্বেগে—সকলেই—বলে উঠল।

Verse 17

यह सुनकर सब सभासदोंने सभामें अपने हाथ ऊपर उठाकर अत्यन्त उद्विग्नचित्त हो बड़ी घबराहटके साथ कहा ।। सभ्या ऊचु: अहो धिग बान्धवा नैनं बोधयन्ति महद्‌ भयम्‌ । बुद्धया बुध्येन्न वा बुध्येदयं वै भरतर्षभ:,सभासद्‌ बोले--अहो धिक्‍्कार है! ये भाई-बन्धु भी युधिष्ठिरको उनके ऊपर आनेवाले महान्‌ भयकी बात नहीं समझाते। पता नहीं, ये भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपनी बुद्धिके द्वारा इस भयको समझें या न समझें

সভাসদরা বলল—“হায় ধিক্! আত্মীয়স্বজনও যুধিষ্ঠিরকে আসন্ন মহাভয়ের কথা বোঝায় না। এই ভরতশ্রেষ্ঠ নিজের বুদ্ধিতে সে বিপদ বুঝবে কি না—তা অনিশ্চিত।”

Verse 18

वैशम्पायन उवाच जनप्रवादान्‌ सुबहूज्छूण्वन्नपि नराधिप: । दिया च धर्मसंयोगात्‌ पार्थों द्यूतमियात्‌ पुन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! लोगोंकी तरह-तरहकी बातें सुनते हुए भी राजा युधिष्ठिर लज्जाके कारण तथा धृतराष्ट्रके आज्ञापालनरूप धर्मकी दृष्टिसे पुनः: जूआ खेलनेके लिये उद्यत हो गये

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! নানাবিধ জনরব ও আলোচনা শুনেও রাজা পার্থ (যুধিষ্ঠির) লজ্জাবশত এবং ধৃতরাষ্ট্রের আদেশ মান্য করাই ধর্ম—এই বোধে আবদ্ধ হয়ে—পুনরায় দ্যূতক্রীড়ায় যেতে উদ্যত হলেন।

Verse 19

जानन्नपि महाबुद्धि: पुनर्दयतमवर्तयत्‌ । अप्यासन्नो विनाश: स्यात्‌ कुरूणामिति चिन्तयन्‌,परम बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिर जूएका परिणाम जानते थे, तो भी यह सोचकर कि सम्भवतः कुरुकुलका विनाश बहुत निकट है, वे द्यूतक्रीड़ामें प्रवृत्त हो गये

বৈশম্পায়ন বললেন—মহাবুদ্ধিমান যুধিষ্ঠির পরিণাম জেনেও আবার পাশাখেলায় প্রবৃত্ত হলেন, মনে মনে ভাবলেন—‘কুরুদের বিনাশ বোধহয় একেবারে সন্নিকটেই এসে গেছে।’

Verse 20

युधिछिर उवाच कथं वै मद्विधो राजा स्वधर्ममनुपालयन्‌ | आहूतो विनिवर्तेत दीव्यामि शकुने त्वया,युधिष्ठिर बोले--शकुने! स्वधर्मपालनमें संलग्न रहनेवाला मेरे-जैसा राजा जूएके लिये बुलाये जानेपर कैसे पीछे हट सकता था, अतः मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

যুধিষ্ঠির বললেন—শকুনি! স্বধর্ম পালন করতে উদ্যত আমার মতো রাজা, বিধিপূর্বক আহ্বান পেলে কীভাবে ফিরে দাঁড়াতে পারে? অতএব আমি তোমার সঙ্গে খেলব।

Verse 21

शकुनिने कहा--राजन्‌! हमलोगोंके पास बैल, घोड़े और बहुत-सी दुधारू गौएँ हैं। भेड़ और बकरियोंकी तो गिनती ही नहीं है। हाथी, खजाना, दास-दासी तथा सुवर्ण सब कुछ हैं

শকুনি বলল—রাজন! আমাদের কাছে বহু বলদ ও ঘোড়া আছে, অসংখ্য দুধারু গাভী আছে; ভেড়া-ছাগল তো গণনার অতীত। হাতি, কোষাগার, স্বর্ণ, দাস-দাসী—সবই আমাদের অধীনে।

Verse 22

एष नो ग्लह एवैको वनवासाय पाण्डवा: । यूयं वयं वा विजिता वसेम वनमाश्रिता:,फिर भी (इन्हें छोड़कर) एकमात्र वनवासका निश्चय ही हमारा दाँव है। पाण्डवो! आपलोग या हम, जो भी हारेंगे, उन्हें वनमें जाकर रहना होगा

বৈশম্পায়ন বললেন—হে পাণ্ডবগণ! আমাদের পণের একটিই কথা—বনবাস। তোমরা বা আমরা, যে পক্ষই পরাজিত হবে, তাকে বনে আশ্রয় নিয়ে বাস করতে হবে।

Verse 23

(वैशग्पायन उवाच एवं देवबलाविष्टो धर्मराजो युधिष्ठिर: । भीष्मद्रोणैर्वार्यमाणो विदुरेण च धीमता ।। युयुत्सुना कृपेणाथ सञठ्जयेन च भारत । गान्धार्या पृथया चैव भीमार्जुनयमैस्तथा ।। विकर्णेन च वीरेण द्रौपद्या द्रौणिना तथा । सोमदत्तेन च तथा बाह्लीकेन च धीमता ।। वार्यमाणोडपि सततं न च राजा नियच्छति ।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उस समय धर्मराज युधिष्ठिर प्रारब्धके वशीभूत हो गये थे। महाराज! उन्हें भीष्म, द्रोण और बुद्धिमान्‌ विदुरजी दुबारा जूआ खेलनेसे रोक रहे थे। युयुत्सु, कृपाचार्य तथा संजय भी मना कर रहे थे। गान्धारी, कुन्ती, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, वीर विकर्ण, द्रौपदी, अश्वत्थामा, सोमदत्त तथा बुद्धिमान्‌ बाह्नीक भी बारंबार रोक रहे थे तो भी राजा युधिष्ठिर भावीके वश होनेके कारण जूएसे नहीं हटे। शकुनिरुवाच गवाश्चव॑ं बहुधेनूकमपर्यन्तमजाविकम्‌ । गजा: कोशो हिरण्यं च दासीदासाक्ष सर्वश:,त्रयोदशं च वै वर्षमज्ञाता: सजने तथा । अनेन व्यवसायेन दीव्याम पुरुषर्षभा: केवल तेरहवें वर्ष हमें किसी जनसमूहमें अज्ञात-भावसे रहना होगा। नरश्रेष्ठरण! हम इसी निश्चयके साथ जूआ खेलें

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! সেই সময় ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ভাগ্যের প্রবল টানে আচ্ছন্ন হয়েছিলেন। ভীষ্ম, দ্রোণ ও প্রজ্ঞাবান বিদুর তাঁকে বারবার নিবৃত্ত করতে চাইলেন; যুযুৎসু, কৃপ ও সঞ্জয়ও নিষেধ করলেন। গান্ধারী, পৃথা (কুন্তী), ভীম, অর্জুন, নকুল-সহদেব; বীর বিকর্ণ, দ্রৌপদী, দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা, সোমদত্ত ও প্রজ্ঞাবান বাহ্লীক—সকলেই পুনঃপুন সতর্ক করলেন; তবু রাজা ভবিতব্যের বশে পাশা থেকে সরে এলেন না। তখন শকুনি বলল—গাভী ও অশ্ব, বহু দুধারু গাভী, অগণিত ভেড়া-ছাগল; হাতি, কোষাগার, স্বর্ণ, দাস-দাসী—সবই; আর ত্রয়োদশ বছরে আমাদের জনসমাজে অজ্ঞাতভাবে থাকতে হবে—হে নরশ্রেষ্ঠগণ! এই সংকল্প নিয়েই খেলি।

Verse 24

समुत्क्षेपण चैकेन वनवासाय भारत | प्रतिजग्राह त॑ पार्थो ग्लहं जग्राह सौबल: । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,भारत! वनवासकी शर्त रखकर केवल एक ही बार पासा फेंकनेसे जूएका खेल पूरा हो जायगा। युधिष्ठिरने उसकी बात स्वीकार कर ली। तत्पश्चात्‌ सुबलपुत्र शकुनिने पासा हाथमें उठाया और उसे फेंककर युधिष्ठिस्से कहा--मैरी जीत हो गयी

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! শকুনি বলল—বনবাসের শর্তে একবার মাত্র পাশা নিক্ষেপ করলেই সমগ্র দ্যূত শেষ হবে। পার্থ যুধিষ্ঠির সেই পণ গ্রহণ করলেন। তারপর সৌবল শকুনি পাশা হাতে নিয়ে নিক্ষেপ করে যুধিষ্ঠিরকে বলল—“আমি জিতেছি।”

Verse 76

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि पुनर्युधिष्ठटिरपरा भवे षट्सप्ततितमो<्ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অনুদ্যূতপর্বে যুধিষ্ঠিরের পুনরায় পরাজয়ের বর্ণনাসহ ছিয়াত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।