Adhyaya 75
Sabha ParvaAdhyaya 7513 Verses

Adhyaya 75

Chapter Arc: द्यूत-अपमान के बाद सभा में धृतराष्ट्र के भीतर अपराध-बोध और पुत्र-स्नेह का द्वंद्व उभरता है; विदुर की पुरानी चेतावनी—दुर्योधन ‘कुलपांसन’ है—फिर से स्मरण कराई जाती है। → विदुर जन्म-क्षण के अपशकुन (गोमायु-ध्वनि) और दुर्योधन के स्वभाव को कुल-विनाश का कारण बताकर धृतराष्ट्र को कठोर निर्णय लेने को उकसाते हैं; धृतराष्ट्र स्वीकारते हैं कि वे भीतर उठती ‘कुलान्त’ की कामना/प्रवृत्ति को रोक नहीं पा रहे। → धृतराष्ट्र गान्धारी से कहते हैं कि वे इस विनाश-प्रवृत्ति को निवार नहीं कर सकते; गान्धारी के वाक्य/प्रभाव के बीच धृतराष्ट्र का निर्णय निर्णायक मोड़ लेता है। → धृतराष्ट्र आदेश देते हैं—पाण्डवों को लौटाया जाए; और ‘मामक’ पाण्डवों के साथ पुनः द्यूत करें—यानी क्षमा/प्रत्यावर्तन के साथ ही फिर उसी विनाशकारी खेल की पुनरावृत्ति। → पाण्डवों की वापसी के साथ ही ‘पुनर्द्यूत’ की घोषणा—अगला द्यूत किसे किस गर्त में गिराएगा?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्टिरप्रत्यानयनविषयक चौद्त्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७४ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६७३ श्लोक मिलाकर कुल ९४ ३ “लोक हैं।] न२््स्स्््ताि्य्सि (9) ४: पञ्चसप्ततितमोब ध्याय: गान्धारीकी धृतराष्ट्रको चेतावनी और धृतराष्ट्रका अस्वीकार करना वैशम्पायन उवाच अथाब्रवीन्महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम्‌ | पुत्रहार्दाद्‌ धर्मयुक्ता गान्धारी शोककर्षिता,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! उस समय भावी अनिष्टकी आशंकासे धर्मपरायणा गान्धारी पुत्र-स्नेहहश शोकसे कातर हो उठी और राजा धुृतराष्ट्रसे इस प्रकार बोली--

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন ধর্মনিষ্ঠা গান্ধারী, পুত্রস্নেহজাত শোকে কাতর হয়ে, জনেশ্বর মহারাজ ধৃতরাষ্ট্রকে এইভাবে বললেন।

Verse 2

जाते दुर्योधने क्षत्ता महामतिरभाषत । नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसन:,“आर्यपुत्र! दुर्योधनके जन्म लेनेपर परम बुद्धिमान्‌ विदुरजीने कहा था--यह बालक अपने कुलका नाश करनेवाला होगा; अतः इसे त्याग देना चाहिये

দুর্যোধনের জন্ম হতেই মহামতি ক্ষত্তা বিদুর বললেন—“একে পরলোকে প্রেরণ করাই উচিত; এ কুলকলঙ্ক। অতএব একে ত্যাগ করো।”

Verse 3

व्यनदज्जातमात्रो हि गोमायुरिव भारत । अन्तो नूनं कुलस्यास्य कुरवस्तन्निबोधत,“भारत! इसने जन्म लेते ही गीदड़की भाँति 'हुँआ-हुँआ” का शब्द किया था; अत: यह अवश्य ही इस कुलका अन्त करनेवाला होगा। कौरवो! आपलोग भी इस बातको अच्छी तरह समझ लें

হে ভারত! জন্মমাত্রই সে শেয়ালের মতো হুক্কাহুক্কা করে চিৎকার করেছিল; নিশ্চয়ই এ-ই কুলের অন্ত ঘটাবে। হে কুরুগণ, এ কথা ভালো করে জেনে রেখো।

Verse 4

मा निमज्जी: स्वदोषेण महाप्सु त्वं हि भारत | मा बालानामशिष्टानामभिमंस्था मतिं प्रभो,'भरतकुलतिलक! आप अपने ही दोषसे इस कुलको विपत्तिके महासागरमें न डुबाइये। प्रभो! इन उद्दण्ड बालकोंकी हाँ-में-हाँ न मिलाइये

হে ভারত! নিজের দোষে এই কুলকে বিপদের মহাসমুদ্রে ডুবিয়ে দিও না। হে প্রভু! উদ্ধত, অশিষ্ট বালকদের সম্মতিতে তোমার বুদ্ধিকে টলিয়ে দিও না।

Verse 5

मा कुलस्य क्षये घोरे कारणं त्वं भविष्यसि । बद्धं सेतुं को नु भिन्द्याद्‌ धमेच्छान्तं च पावकम्‌,“इस कुलके भयंकर विनाशमें स्वयं ही कारण न बनिये। भरतश्रेष्ठ! बँधे हुए पुलको कौन तोड़ेगा? बुझी हुई वैरकी आगको फिर कौन भड़कायेगा? कुन्तीके शान्तिपरायण पुत्रोंकी फिर कुपित करनेका साहस कौन करेगा? अजमीढकुलके रत्न! आप सब कुछ जानते और याद रखते हैं, तो भी मैं पुन आपको स्मरण दिलाती रहूँगी

এই কুলের ভয়ংকর ক্ষয়ের কারণ তুমি নিজে হয়ো না। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! বাঁধা সেতু কে ভাঙে? আর নিভে যাওয়া আগুন কে আবার জ্বালায়?

Verse 6

शमे स्थितान्‌ को नु पार्थान्‌ कोपयेद्‌ भरतर्षभ | स्मरन्तं त्वामाजमीढ स्मारयिष्याम्यहं पुन:,“इस कुलके भयंकर विनाशमें स्वयं ही कारण न बनिये। भरतश्रेष्ठ! बँधे हुए पुलको कौन तोड़ेगा? बुझी हुई वैरकी आगको फिर कौन भड़कायेगा? कुन्तीके शान्तिपरायण पुत्रोंकी फिर कुपित करनेका साहस कौन करेगा? अजमीढकुलके रत्न! आप सब कुछ जानते और याद रखते हैं, तो भी मैं पुन आपको स्मरण दिलाती रहूँगी

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সংযমে প্রতিষ্ঠিত পার্থদের কে ক্রুদ্ধ করবে? হে আজমীঢ়বংশীয়! তুমি সবই স্মরণ কর; তবু আমি তোমাকে আবার স্মরণ করিয়ে দেব।

Verse 7

शास्त्र न शास्ति दुर्बुद्धिं श्रेयसे चेतराय च | न वै वृद्धो बालमतिर्भवेद्‌ राजन्‌ कथंचन,“राजन! जिसकी बुद्धि खोटी है, उसे शास्त्र भी भला-बुरा कुछ नहीं सिखा सकता। मन्दबुद्धि बालक वृद्धों-जैसा विवेकशील किसी प्रकार नहीं हो सकता

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, যার বুদ্ধি বিকৃত, তাকে শাস্ত্র না কল্যাণের পথে চালাতে পারে, না অকল্যাণ থেকে নিবৃত্ত করতে পারে। শিশুসুলভ বুদ্ধি কোনোভাবেই প্রাজ্ঞ বৃদ্ধদের মতো বিবেকী হতে পারে না।

Verse 8

त्वन्नेत्रा: सन्तु ते पुत्रा मा त्वां दीर्णा: प्रहासिषु: । तस्मादयं मद्गचनात्‌ त्यज्यतां कुलपांसन:,“आपके पुत्र आपके ही नियमन्त्रणमें रहें, ऐसी चेष्टा कीजिये। ऐसा न हो कि वे सभी मर्यादाका त्याग करके प्राणोंसे हाथ धो बैठें और आपको इस बुढ़ापेमें छोड़कर चल बसें। इसलिये आप मेरी बात मानकर इस कुलांगार दुर्योधनको त्याग दें

বৈশম্পায়ন বললেন—তোমার পুত্ররা যেন তোমারই নিয়ন্ত্রণ ও পথনির্দেশে থাকে; এমন যেন না হয় যে তারা সব শিষ্টাচারের সীমা ছিঁড়ে সর্বনাশ ডেকে আনে এবং বার্ধক্যে তোমাকে একা ফেলে যায়। অতএব আমার উপদেশ গ্রহণ করে বংশের কলঙ্ক দুর্যোধনকে ত্যাগ করো।

Verse 9

तथा ते न कृतं राजन पुत्रस्नेहान्नराधिप । तस्य प्राप्तं फलं विद्धि कुलान्तकरणाय यत्‌,“महाराज! आपको जो करना चाहिये था, वह आपने पुत्रस्नेहवश नहीं किया। अतः समझ लीजिये, उसीका यह फल प्राप्त हुआ है, जो समूचे कुलके विनाशका कारण होने जा रहा है

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, হে নরাধিপ, পুত্রস্নেহে তুমি যা করা উচিত ছিল তা করনি। জেনে রাখো, আজ যে ফল তোমার ভাগ্যে এসেছে, তা সেই অবহেলারই পরিণাম—এবং তা সমগ্র বংশের বিনাশের দিকে ধাবিত।

Verse 10

शमेन धर्मेण नयेन युक्ता या ते बुद्धि: सास्तु ते मा प्रमादी: । प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्री- मृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान्‌,'शान्ति, धर्म तथा उत्तम नीतिसे युक्त जो आपकी बुद्धि थी, वह बनी रहे। आप प्रमाद मत कीजिये। क्रूरतापूर्ण कर्मोंसे प्राप्त की हुई लक्ष्मी विनाशशील होती है और कोमलतापूर्ण बर्तावसे बढ़ी हुई धन-सम्पत्ति पुत्र-पौत्रोंतक चली जाती है'

বৈশম্পায়ন বললেন—সংযম, ধর্ম ও সুনীতিতে প্রতিষ্ঠিত তোমার বুদ্ধি অটল থাকুক; তুমি অবহেলায় পতিত হয়ো না। নিষ্ঠুর কর্মে অর্জিত শ্রী দ্রুত ধ্বংসপ্রাপ্ত হয়; কিন্তু মৃদু অথচ দৃঢ় আচরণে লালিত সম্পদ পুত্র-পৌত্র পর্যন্ত স্থায়ী হয়।

Verse 11

अथाब्रवीन्महाराजो गान्धारीं धर्मदर्शिनीम्‌ । अन्त: काम॑ कुलस्यास्तु न शक्‍नोमि निवारितुम्‌,तब महाराज धूृतराष्ट्रने धर्मपर दृष्टि रखनेवाली गान्धारीसे कहा--“देवि! इस कुलका अन्त भले ही हो जाय, परंतु मैं दुर्योधनको रोक नहीं सकता

তখন মহারাজ ধৃতরাষ্ট্র ধর্মদর্শিনী গান্ধারীকে বললেন—“দেবি, এই বংশের শেষ যদি হয়ও হোক; আমি দুর্যোধনকে নিবৃত্ত করতে পারি না।”

Verse 12

यथेच्छन्ति तथैवास्तु प्रत्यागच्छन्तु पाण्डवा: । पुनर्द्यूतं च कुर्वन्तु मामका: पाण्डवै: सह,“ये सब जैसा चाहते हैं, वैसा ही हो। पाण्डव लौट आयें और मेरे पुत्र उनके साथ फिर जूआ खेलें”

তারা যেমন চায়, তেমনই হোক। পাণ্ডবরা ফিরে আসুক, আর আমার পুত্ররা পাণ্ডবদের সঙ্গে আবার পাশা খেলুক।

Verse 75

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि गान्धारीवाक्ये पञ्चसप्ततितमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত অনুদ্যূতপর্বে গান্ধারীর বাক্য-প্রসঙ্গে পঁচাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।