Adhyaya 69
Sabha ParvaAdhyaya 6923 Verses

Adhyaya 69

सभा-पर्यवसान-प्रस्थानवचनम् | Counsel at the Point of Departure

Upa-parva: Prasthāna–Āśvāsana (Departure and Counsel) Episode

Yudhiṣṭhira addresses and takes leave of leading Kuru authorities and sabhā members—Bhīṣma, Somadatta, Bāhlika, Droṇa, Kṛpa, Aśvatthāman, Vidura, Dhṛtarāṣṭra, the Dhārtarāṣṭras, Sañjaya, Yuyutsu, and others—stating his intention to depart and return to see them again. Vaiśaṃpāyana notes the assembly’s silence, attributed to modesty and moral discomfort, while their inward thought wishes him well. Vidura then offers practical and ethical counsel: Pṛthā (Kuntī), described as noble, delicate, and accustomed to comfort, should not go to the forest; she will be honored and protected in Vidura’s home. Vidura further reframes defeat without adharma as non-ruinous, enumerates the Pāṇḍavas’ complementary competencies (Yudhiṣṭhira’s dharma-knowledge, Arjuna’s martial expertise, Bhīma’s force, Nakula’s resource stewardship, Sahadeva’s restraint and management), and praises Draupadī and Dhaumya as ethically skilled supports. He strengthens Yudhiṣṭhira’s resolve by recalling prior instruction by revered sages and by articulating a schematic of virtues aligned with cosmic domains (self-giving, gentleness, restraint, forbearance, and strength). The chapter closes with auspicious benedictions and Yudhiṣṭhira’s respectful departure after saluting Bhīṣma and Droṇa.

Chapter Arc: द्यूतसभा के अपमान-तूफ़ान के बीच द्रौपदी का विलाप और प्रश्न सभा के हृदय में कील की तरह धँसता है—“मैं दासी हूँ या स्वामिनी?” → द्रौपदी अपने पूर्व-जीवन की मर्यादा (जिसे सूर्य-वायु भी न देख पाते) और आज की सार्वजनिक घसीट-अपमान की विडम्बना रखती है; वह कुरुसभा के महात्माओं को प्रणाम कर के भी उन्हें उनके कर्तव्य की याद दिलाती है। सभा में मौन, भय, लोभ और राजधर्म का संघर्ष बढ़ता है—कौन बोले, किसके विरुद्ध बोले? → भीष्म का ‘धर्म-संकट’ वचन: वह द्रौपदी के प्रश्न का निर्णायक उत्तर देने में असमर्थता प्रकट करता है—स्त्री की स्थिति, युधिष्ठिर के पहले स्वयं हारने/फिर द्रौपदी को दाँव पर लगाने की वैधता, और जुए की अधर्म-प्रकृति—इन सबके बीच धर्म का निर्णय ‘सूक्ष्म’ होकर फिसल जाता है। → भीष्म का कथन सभा को एक कठोर दर्पण दिखाता है: जब बल/सत्ता धर्म को दबा देती है, तब ‘धर्म-वेला’ में भी धर्म आहत हो जाता है। यह उत्तर समाधान कम, चेतावनी अधिक बनता है—सभा की नैतिक पराजय स्पष्ट होती है। → भीष्म के असमर्थ-परंतु-भयावह संकेत के बाद प्रश्न हवा में लटकता है: क्या कोई वरिष्ठ (द्रोण, कृप, विदुर) निर्णायक रूप से अधर्म रोकेंगे, या अपमान की धारा और उग्र होगी?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ ३ श्लोक मिलाकर कुल ९४३ “लोक हैं) न२्च्स्स्त््साि्स्सि ह्य ४: एकोनसप्ततितमो<ध्याय: द्रौोपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन द्रौपहुवाच पुरस्तात्‌ करणीयं मे न कृतं कार्यमुत्तरम्‌ । विह्वलास्मि कृतानेन कर्षता बलिना बलातू,द्रौपदी बोली--हाय! मेरा जो कार्य सबसे पहले करनेका था, वह अभीतक नहीं हुआ। मुझे अब वह कार्य कर लेना चाहिये। इस बलवान दुरात्मा दुःशासनने मुझे बलपूर्वक घसीटकर व्याकुल कर दिया है

দ্রৌপদী বলল—হায়! যা আমার প্রথমে করা উচিত ছিল, তা এখনও করা হয়নি; এখন যা বাকি আছে, তাই করতে হবে। আমি বিহ্বল, কারণ এই বলবান দুষ্টাত্মা দুঃশাসন আমাকে বলপূর্বক টেনে এনেছে।

Verse 2

अभिवादं करोम्येषां कुरूणां कुरुसंसदि । न मे स्थादपराधो<यं यदिदं न कृतं मया,कौरवोंकी सभामें मैं समस्त कुरुवंशी महात्माओंको प्रणाम करती हूँ। मैंने घबराहटके कारण पहले प्रणाम नहीं किया; अतः यह मेरा अपराध न माना जाय

কুরুদের সভায় আমি এই সকল কুরুবংশীয়কে প্রণাম জানাই। ভয়ে-ব্যাকুলতায় আগে প্রণাম করতে পারিনি—এটি যেন আমার অপরাধ বলে গণ্য না হয়।

Verse 3

वैशम्पायन उवाच सा तेन च समाधूता दुःखेन च तपस्विनी । पतिता विललापेदं सभायामतथोचिता,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुशासनके बार-बार खींचनेसे तपस्विनी द्रौपदी पृथ्वीपर गिर पड़ी और उस सभामें अत्यन्त दु:खित हो विलाप करने लगी। वह जिस दुरवस्थामें पड़ी थी, उसके योग्य कदापि न थी

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! তার দ্বারা বারবার টেনে হিঁচড়ে আনা হলে তপস্বিনী দ্ৰৌপদী দুঃখে অভিভূত হয়ে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল। রাজসভায়—যে অবস্থা তার পক্ষে সম্পূর্ণ অনুচিত—সেই অবস্থাতেই সে করুণ বিলাপ করতে লাগল।

Verse 4

द्रौपहयुवाच स्वयंवरे यास्मि नृपैर्दृष्टा रड़े समागतै: । न दृष्टपूर्वा चान्यत्र साहमद्य सभां गता,द्रौपदीने कहा--हा! मैं स्वयंवरके समय सभामें आयी थी और उस समय रंगभूमिमें पधारे हुए राजाओंने मुझे देखा था। उसके सिवा, अन्य अवसरोंपर कहीं भी आजसे पहले किसीने मुझे नहीं देखा। वही मैं आज सभामें बलपूर्वक लायी गयी हूँ

দ্রৌপদী বলল—স্বয়ংবরের সময় মণ্ডপে সমবেত রাজারা আমাকে দেখেছিল। সেই একবার ছাড়া, আজকের আগে অন্য কোথাও কেউ আমাকে দেখেনি; অথচ আজ আমাকে সভায় আনা হয়েছে।

Verse 5

यां न वायुर्न चादित्यो दृष्टवन्तौ पुरा गृहे । साहमद्य सभामध्ये दृश्यास्मि जनसंसदि

বৈশম্পায়ন বললেন—যাকে পূর্বে গৃহের অন্তঃপুরে বায়ু ও সূর্যও দেখেনি, সেই আমি আজ পুরুষসমাজে, রাজসভামধ্যেই সকলের দৃষ্টিগোচর হচ্ছি।

Verse 6

पहले राजभवनमें रहते हुए जिसे वायु तथा सूर्य भी नहीं देख पाते थे, वही मैं आज इस सभाके भीतर महान्‌ जनसमुदायमें आकर सबके नेत्रोंकी लक्ष्य बन गयी हूँ ।। यां न मृष्यन्ति वातेन स्पृश्यमानां गृहे पुरा । स्पृश्यमानां सहन्तेड्द्य पाण्डवास्तां दुरात्मना,पहले अपने महलमें रहते समय जिसका वायुद्वारा स्पर्श भी पाण्डवोंको सहन नहीं होता था, उसी मुझ द्रौपदीका यह दुरात्मा दुःशासन भरी सभामें स्पर्श कर रहा है, तो भी आज ये पाण्डुकुमार सह रहे हैं

যে নারীকে পূর্বে রাজপ্রাসাদে থাকাকালে পাণ্ডবেরা বায়ুর স্পর্শও সহ্য করতে পারত না, আজ সেই নারীকে এই সভাতেই এক দুষ্টচিত্ত ব্যক্তি স্পর্শ করছে—তবু পাণ্ডুপুত্রেরা তা সহ্য করছে। এই দৃশ্য রাজধর্ম ও রক্ষাকর্তব্যের পতন প্রকাশ করে: জ্যেষ্ঠ ও রাজাদের সামনে প্রকাশ্য লাঞ্ছনা ঘটছে, আর যাদের রক্ষা করা উচিত তারা বাধ্য হয়ে নীরব।

Verse 7

मृष्यन्ति कुरवश्लेमे मनन्‍्ये कालस्य पर्ययम्‌ । स्‍्नुषां दुहितरं चैव क्लिश्यमानामनर्हतीम्‌,मैं कुरुकुलकी पुत्रवधू एवं पुत्रीतुल्य हूँ। सताये जानेके योग्य नहीं हूँ, फिर भी मुझे यह दारुण क्लेश दिया जा रहा है और ये समस्त कुरुवंशी इसे सहन करते हैं। मैं समझती हूँ, बड़ा विपरीत समय आ गया है

বৈশম্পায়ন বললেন—কুরুগণ নীরবে সহ্য করছে; আমি মনে করি, এ কালচক্রের নির্মম উলটপালট। কারণ যে পুত্রবধূ—পুত্রীরই সমান—যে এমন কষ্টের যোগ্য নয়, তাকেই পীড়িত করা হচ্ছে, আর সমগ্র কুরুবংশ তা সহ্য করছে।

Verse 8

कि नवतः कृपणं भूयो यदहं स्त्री सती शुभा । सभामध्यं विगाहेउद्य क्व नु धर्मो महीक्षिताम्‌,इससे बढ़कर दयनीय दशा और क्‍या हो सकती है कि मुझ-जैसी शुभकर्मपरायणा सती-साध्वी स्त्री भरी सभामें विवश करके लायी गयी है। आज राजाओंका धर्म कहाँ चला गया?

এর চেয়ে করুণ আর কী হতে পারে—আমি, শুভলক্ষণী পতিব্রতা নারী, আজ জোর করে সভামাঝে আনা হয়েছি! আজ রাজাদের ধর্ম কোথায় গেল?

Verse 9

धर्म्या स्त्रियं सभां पूर्वे न नयन्तीति न: श्रुतम्‌ । स नष्ट: कौरवेयेषु पूर्वो धर्म: सनातन:,मैंने सुना है, पहले लोग धर्मपरायणा स्त्रीको कभी सभामें नहीं लाते थे, किंतु इन कौरवोंके समाजमें वह प्राचीन सनातनधर्म नष्ट हो गया है

বৈশম্পায়ন বললেন—আমরা শুনেছি, প্রাচীন কালে ধর্মপরায়ণা নারীকে সভায় আনা হতো না। কিন্তু কৌরবদের মধ্যে সেই প্রাচীন, সনাতন ধর্ম নষ্ট হয়ে গেছে।

Verse 10

कथं हि भार्या पाण्डूनां पार्षतस्य स्वसा सती । वासुदेवस्य च सखी पार्थिवानां सभामियाम्‌,अन्यथा मैं पाण्डवोंकी पत्नी, धृष्टद्युम्नकी सुशीला बहन और भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सखी होकर राजाओंकी इस सभामें कैसे लायी जा सकती थी?

পাণ্ডবদের পত্নী, পার্ষত (ধৃষ্টদ্যুম্ন)-এর সৎগুণবতী ভগিনী এবং বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণের সখী হয়েও, রাজাদের এই সভায় আমাকে এভাবে কী করে আনা যেতে পারে?

Verse 11

तामिमां धर्मराजस्य भारया सदृशवर्णजाम्‌ | ब्रूत दासीमदासीं वा तत्‌ करिष्यामि कौरवा:,कौरवो! मैं धर्मराज युधिष्ठिरकी धर्मपत्नी तथा उनके समान वर्णकी कन्या हूँ। आपलोग बतावें, मैं दासी हूँ या अदासी? आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूँगी

হে কৌরবগণ! আমি ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের ধর্মপত্নী এবং তাঁরই সমবর্ণে জন্মেছি। বলুন—আমি দাসী, না দাসী নই? আপনারা যা বলবেন, তাই করব।

Verse 12

अयं मां सुद॒ढं क्षुद्र: कौरवाणां यशोहर: । क्लिश्राति नाहं तत्‌ सोढुं चिरं शक्ष्यामि कौरवा:,कुरुवंशी क्षत्रियो! यह कुरुकुलकी कीर्तिमें कलंक लगानेवाला नीच दुःशासन मुझे बहुत कष्ट दे रहा है। मैं इस क्लेशको देरतक नहीं सह सकूँगी

হে কৌরবগণ! এই নীচ ব্যক্তি, যে কৌরবদের যশ হরণ করে, দুঃশাসন আমাকে নির্মমভাবে কষ্ট দিচ্ছে। আমি এই যন্ত্রণা আর বেশি দিন সহ্য করতে পারব না।

Verse 13

जितां वाप्यजितां वापि मन्यध्वं मां यथा नृपा: । तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत्‌ करिष्यामि कौरवा:,कुरुवंशियो! आप क्‍या मानते हैं? मैं जीती गयी हूँ या नहीं। मैं आपके मुँहसे इसका ठीक-ठीक उत्तर सुनना चाहती हूँ। फिर उसीके अनुसार कार्य करूँगी

হে কুরুবংশীয় রাজাগণ! আপনারা কী মনে করেন—আমি জিত হয়েছি, না জিত হইনি? আমি আপনাদের মুখ থেকেই এর নিশ্চিত উত্তর শুনতে চাই; তারপর সেই অনুযায়ী কাজ করব।

Verse 14

भीष्म उवाच उक्तवानस्मि कल्याणि धर्मस्य परमा गति: । लोके न शक्‍्यते ज्ञातुमपि विज्ञैर्महात्मभि:,भीष्मजीने कहा--कल्याणि! मैं पहले ही कह चुका हूँ कि धर्मकी गति बड़ी सूक्ष्म है। लोकमें विज्ञ महात्मा भी उसे ठीक-ठीक नहीं जान सकते

ভীষ্ম বললেন—কল্যাণী! আমি আগেই বলেছি, ধর্মের গতি অত্যন্ত সূক্ষ্ম। এই জগতে তা যথার্থভাবে জানা যায় না; জ্ঞানী মহাত্মারাও তা সম্পূর্ণ বুঝতে পারেন না।

Verse 16

संसारमें बलवान्‌ मनुष्य जिसको धर्म समझता है, धर्मविचारके समय लोग उसीको धर्म मान लेते हैं और बलहीन पुरुष जो धर्म बतलाता है, वह बलवान पुरुषके बताये धर्मसे दब जाता है (अत: इस समय कर्ण और दुर्योधनका बताया हुआ धर्म ही सर्वोपरि हो रहा है।) ।। नविवेक्तुं च ते प्रश्रमिमं शकनोमि निश्चयात्‌ । सूक्ष्मत्वाद्‌ गहनत्वाच्च कार्यस्यास्य च गौरवात्‌

ভীষ্ম বললেন—নিশ্চিতভাবে তোমার এই প্রশ্নের মীমাংসা আমি করতে পারি না। বিষয়টি সূক্ষ্ম, গভীরভাবে জটিল, এবং এর পরিণাম অত্যন্ত গুরুতর।

Verse 17

मैं तो धर्मका स्वरूप सूक्ष्म और गहन होनेके कारण तथा इस धर्मनिर्णयके कार्यके अत्यन्त गुरुतर होनेसे तुम्हारे इस प्रश्नका निश्चितरूपसे यथार्थ विवेचन नहीं कर सकता ।। नूनमन्त: कुलस्यायं भविता नचिरादिव । तथा हि कुरव: सर्वे लोभमोहपरायणा:,अवश्य ही बहुत शीघ्र इस कुलका नाश होनेवाला है; क्योंकि समस्त कौरव लोभ और मोहके वशीभूत हो गये हैं

ভীষ্ম বললেন—ধর্মের প্রকৃত স্বরূপ সূক্ষ্ম ও গভীর; আর এই ধর্ম-নির্ণয়ের কাজ অত্যন্ত গুরুতর। তাই তোমার প্রশ্নের নিশ্চিত ও সম্পূর্ণ যথার্থ বিশ্লেষণ আমি করতে পারি না। তবে নিশ্চিতই মনে হয়, অচিরেই এই বংশের অবসান আসবে—কারণ সমস্ত কৌরব লোভ ও মোহের অধীন হয়ে পড়েছে।

Verse 18

कुलेषु जाता: कल्याणि व्यसनैराहता भृशम्‌ | धर्म्यान्मार्गान्नि च्यवन्ते येषां नस्त्वं वधू: स्थिता,कल्याणि! तुम जिनकी पत्नी हो, वे पाण्डव हमारे उत्तम कुलमें उत्पन्न हैं और भारी- से-भारी संकटमें पड़कर भी धर्मके मार्गसे विचलित नहीं होते हैं

ভীষ্ম বললেন—কল্যাণী! যাদের গৃহে তুমি পুত্রবধূ হয়ে অবস্থান করো, সেই পাণ্ডবরা আমাদের উৎকৃষ্ট বংশে জন্মেছেন; এবং কঠিন বিপদে আঘাতপ্রাপ্ত হয়েও তারা ধর্মের পথ থেকে বিচ্যুত হয় না।

Verse 19

उपपन्नं च पाज्चालि तवेदं वृत्तमीदृशम्‌ । यत्‌ कृच्छूमपि सम्प्राप्ता धर्ममेवान्ववेक्षसे,पांचालराजकुमारी! तुम्हारा यह आचार-व्यवहार तुम्हारे योग्य ही है; क्योंकि भारी संकटमें पड़कर भी तुम धर्मकी ओर ही देख रही हो

ভীষ্ম বললেন—হে পাঞ্চালী! তোমার এই আচরণ তোমারই উপযুক্ত; কারণ কঠিন দুর্দশায় পতিত হয়েও তুমি ধর্মের দিকেই দৃষ্টি স্থির রাখো।

Verse 20

एते द्रोणादयश्नैव वृद्धा धर्मविदो जना: । शून्यै: शरीरैस्तिष्ठन्ति गतासव इवानता:,ये द्रोणाचार्य आदि वृद्ध एवं धर्मज्ञ पुरुष भी सिर लटकाये शून्य शरीरसे इस प्रकार बैठे हैं; मानो निष्प्राण हो गये हों। मेरी राय यह है कि इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये धर्मराज युधिष्ठिर ही सबसे प्रामाणिक व्यक्ति हैं। तुम जीती गयी हो या नहीं? यह बात स्वयं इन्हें बतलानी चाहिये

ভীষ্ম বললেন—দ্রোণ প্রভৃতি এই বৃদ্ধ ধর্মজ্ঞগণ মাথা নত করে, শূন্য দেহ নিয়ে এমনভাবে বসে আছেন যেন প্রাণবায়ু চলে গেছে। আমার মতে, এই প্রশ্নের সিদ্ধান্তে সর্বাধিক প্রামাণ্য ব্যক্তি ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরই। তুমি জিত হয়েছ কি না—এ কথা তিনিই ঘোষণা করুন।

Verse 21

युधिष्ठिरस्तु प्रश्नेडस्मिन्‌ प्रमाणमिति मे मतिः । अजितां वा जितां वेति स्वयं व्याहर्तुमहति,ये द्रोणाचार्य आदि वृद्ध एवं धर्मज्ञ पुरुष भी सिर लटकाये शून्य शरीरसे इस प्रकार बैठे हैं; मानो निष्प्राण हो गये हों। मेरी राय यह है कि इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये धर्मराज युधिष्ठिर ही सबसे प्रामाणिक व्यक्ति हैं। तुम जीती गयी हो या नहीं? यह बात स्वयं इन्हें बतलानी चाहिये

ভীষ্ম বললেন—এই বিবাদে আমার মতে যুধিষ্ঠিরই চূড়ান্ত প্রমাণ। তিনি নিজেই বলার যোগ্য—তিনি জিতেছেন কি না, অর্থাৎ তিনি জিত হয়ে গেছেন কি না।

Verse 68

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापरववके अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें द्रौपदीको भरी सभागें खींचना' इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দ্যূতপর্বে ‘ভরা রাজসভায় দ্রৌপদীকে টেনে আনা’ বিষয়ক আটষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল। উপসংহারে বোঝানো হয়েছে—প্রকাশ্য অপমান ও বলপ্রয়োগ ধর্মভঙ্গের গুরুতর অপরাধ; এটাই পরবর্তীতে নৈতিক-রাজনৈতিক পতন ও যুদ্ধের অশনি সংকেত।

Verse 69

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि भीष्मवाक्ये एकोनसप्ततितमो<थध्याय: ।। ६९ || इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापरववके अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें भीष्मवाक्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দ্যূতপর্বে ভীষ্মবাক্য-বিষয়ক ঊনসত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 215

बलवांश्व यथा धर्म लोके पश्यति पूरुष: । स धर्मों धर्मवेलायां भवत्यभिहत: पर:

ভীষ্ম বললেন—এই জগতে শক্তিমান পুরুষ যেমন করে ‘ধর্ম’কে দেখে, ধর্মের বিচারক্ষণ এলে সেই ধর্মই অন্যদের দ্বারা আঘাতপ্রাপ্ত হয়ে পরাভূত হয়।

Frequently Asked Questions

The tension lies in responding to an adverse court outcome with procedural dignity and moral steadiness—preserving duty, relationships, and dependents’ welfare without escalating disorder within the sabhā framework.

Vidura teaches that a loss incurred without adharma need not destabilize the virtuous; one should protect the vulnerable (notably Kuntī), maintain composure, and rely on disciplined, complementary capacities within the group.

No formal phalaśruti is stated; the closest meta-layer is the benedictory framing (svasti/agada) and the narrator’s note on the assembly’s inward well-wishing, which positions the counsel as ethically authoritative within the epic’s didactic texture.