Adhyaya 63
Sabha ParvaAdhyaya 6311 Verses

Adhyaya 63

Sabhā-parva Adhyāya 63 — Draupadī’s Contested Status, Vidura’s Warning, and Dhṛtarāṣṭra’s Boons

Upa-parva: Dyūta–Anuśaya (Dice-Game Aftermath in the Assembly)

In the Kuru assembly, Karṇa articulates a harsh doctrine of dependency, asserting that three are “without wealth/independent standing”—a slave, a student, and a woman lacking autonomy—and uses this to rhetorically degrade Draupadī and demand her compliance with the victors. Bhīma reacts with controlled fury, constrained by loyalty to Yudhiṣṭhira and the binding logic of the wager, yet issues a future-oriented vow of retribution tied to Duryodhana’s provocation. Duryodhana escalates by challenging Yudhiṣṭhira to answer whether he retained authority at the time Draupadī was staked, while Arjuna frames the dispute as a question of who holds lordship after defeat. Omens arise in Dhṛtarāṣṭra’s house, interpreted as grave portents; Vidura warns that the assembly is courting disaster through unethical counsel. Dhṛtarāṣṭra rebukes Duryodhana for impropriety toward a dharmapatnī and offers Draupadī boons. Draupadī requests first that Yudhiṣṭhira be freed from servitude, then that the remaining Pāṇḍavas be restored with arms and chariots. When offered a third boon, she refuses, arguing that greed destroys dharma and that measured acceptance aligns with social propriety and ethical restraint.

Chapter Arc: सभामण्डप में द्यूत का प्रस्ताव उठते ही विदुर का अंतःकरण काँप उठता है; वे जानते हैं कि यह खेल नहीं, कुल-कलह की जड़ है। → विदुर धृतराष्ट्र को वंश-परम्परा और राज्य-हित की दुहाई देकर चेताते हैं कि दुर्योधन मद में राष्ट्र-क्षेम को स्वयं नष्ट कर रहा है—जैसे उन्मत्त बैल अपने ही सींग तोड़ डालता है। वे शकुनि की ‘पर्वतीय’ कुटिलता और द्यूत-कौशल को रेखांकित कर बताते हैं कि यह समर-भूमि नहीं, छल का समुद्र है जिसमें बाल-बुद्धि डूब जाती है। → विदुर का निर्णायक उद्घोष—‘द्यूत कलह का मूल है’—और भविष्य-दर्शन: यदि युधिष्ठिर क्रोध/मद में संयम खो देंगे तो भीम, अर्जुन और यमजों सहित पाण्डव-समूह के लिए उस ‘तुमुल’ घड़ी में कोई द्वीप/आश्रय न रहेगा; दुर्योधन के दाँव से विनाश का सम्प्रहार उठेगा। → वे धृतराष्ट्र से आग्रह करते हैं कि धन-लालसा और दुर्योधन-प्रियता से ऊपर उठकर द्यूत को रोका जाए; शकुनि को उसके स्थान (गान्धार/पर्वतीय) लौटाया जाए और पाण्डवों से वैर-वृद्धि न की जाए। → धृतराष्ट्र क्या विदुर-वाक्य मानकर द्यूत रोकेंगे, या पुत्र-मोह के वशीभूत होकर विनाश का द्वार खोल देंगे?

Shlokas

Verse 1

/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ *लोक मिलाकर कुल १७३ श्लोक हैं) त्रिषष्टितमो< ध्याय: विदुरजीके द्वारा जूएका घोर विरोध विदुर उवाच द्यूतं मूलं कलहस्याभ्युपैति मिथो भेदं महते दारुणाय । यदास्थितो<यं धृतराष्ट्रस्य पुत्रो दुर्योधन: सृजते वैरमुग्रम्‌,विदुरजी बोले--महाराज! जूआ खेलना झगड़ेकी जड़ है। इससे आपसमें फूट पैदा होती है, जो बड़े भयंकर संकटकी सृष्टि करती है। यह धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन उसीका आश्रय लेकर इस समय भयानक वैरकी सृष्टि कर रहा है

বিদুর বললেন—মহারাজ! জুয়া কলহের মূল। এটি পরস্পরের মধ্যে বিভেদ ঘটায় এবং সেখান থেকে ভয়ংকর বিপর্যয় জন্ম নেয়। এই জুয়ার আশ্রয় নিয়েই ধৃতরাষ্ট্রের পুত্র দুর্যোধন এখন তীব্র বৈরিতা উসকে দিচ্ছে।

Verse 2

प्रातीपेया: शान्तनवा भैमसेना: सबाह्विका: । दुर्योधनापराधेन कृच्छू प्राप्स्यन्ति सर्वश:,दुर्योधनके अपराधसे प्रतीप, शन्तनु, भीमसेन- तथा बाह्नलीकके वंशज सब प्रकारसे घोर संकटमें पड़ जायँगे

দুর্যোধনের অপরাধের ফলে প্রতীপ, শান্তনু, ভীমসেন এবং বাহ্লীক—এই বংশগুলির বংশধরেরা সর্বতোভাবে কঠোর দুর্দশায় পতিত হবে।

Verse 3

दुर्योधनो मदेनैष क्षेमं राष्ट्रादपोहति । विषाणं गौरिव मदात्‌ स्वयमारुजते55त्मन:,जैसे मतवाला बैल मदोन्मत्त होकर स्वयं ही अपने सींगोंको तोड़ लेता है, उसी प्रकार यह दुर्योधन मदान्धताके कारण स्वयं अपने राज्यसे मंगलका बहिष्कार कर रहा है

যেমন মত্ত ষাঁড় উন্মত্ততায় নিজেই নিজের শিং ভেঙে ফেলে, তেমনি অহংকারের নেশায় অন্ধ এই দুর্যোধন নিজের রাজ্য থেকে কল্যাণ ও নিরাপত্তাকে নিজেই দূরে ঠেলে দিচ্ছে।

Verse 4

यक्षित्तमन्वेति परस्य राजन्‌ वीर: कवि: स्वामवमन्य दृष्टिम्‌ । नावं समुद्रे इव बालनेत्रा- मारुह्य घोरे व्यसने निमज्जेत्‌,राजन्‌! जो वीर और दिद्वान्‌ मनुष्य अपनी दृष्टिकी अवहेलना करके दूसरेके चित्तके अनुसार चलता है, वह समुद्रमें मूर्ख नाविकद्वारा चलायी जाती हुई नावपर बैठे हुए मनुष्यके समान भयंकर विपत्तिमें पड़ जाता है

হে রাজন! যে বীর—যদিও জ্ঞানী ও বিচক্ষণ—নিজের বিচারবুদ্ধিকে তুচ্ছ করে অন্যের মনের অনুসরণ করে, সে সমুদ্রে অজ্ঞ নাবিকের চালানো নৌকায় উঠে বসা মানুষের মতো ভয়ংকর বিপদে ডুবে যায়।

Verse 5

दुर्योधनो ग्लहते पाण्डवेन प्रियायसे त्वं जयतीति तच्च । अतिनर्मा जायते सम्प्रहारो यतो विनाश: समुपैति पुंसाम्‌,दुर्योधन पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके साथ दाँव लगाकर जूआ खेल रहा है, साथ ही वह जीत भी रहा है; यह सोचकर तुम बहुत प्रसन्न हो रहे हो; किंतु आजका यह अतिशय विनोद शीघ्र ही भयंकर युद्धके रूपमें परिणत होनेवाला है, जिससे (अगणित) मनुष्योंका संहार होगा

বিদুর বললেন—দুর্যোধন পাণ্ডবের সঙ্গে পাশা খেলছে, আর তুমি ‘সে জিতছে’ ভেবে আনন্দিত হচ্ছ। কিন্তু এই অতিরিক্ত ক্রীড়া-রস শীঘ্রই ভয়ংকর সশস্ত্র সংঘর্ষে পরিণত হবে; সেখান থেকেই অগণিত মানুষের বিনাশ ও সংহার ঘটবে।

Verse 6

आकर्षस्तेडवाक्फल: सुप्रणीतो हृदि प्रौढो मन्त्रपद: समाधि: । युधिष्ठिरिण कलहस्तवाय- मचिन्तितो5नभिमत: स्वबन्धुना,जूआ अधःपतन करनेवाला है; परंतु शकुनिने इसे उत्तम मानकर यहाँ उपस्थित किया है। यह जूएका निश्चय आपलोगोंके हृदयमें गुप्त मन्त्रणाके पश्चात्‌ स्थिर हुआ है। परंतु यह जूएका खेल आपके अपने ही बन्धु युधिष्ठिके साथ आपके विचार और इच्छाके विरुद्ध कलहके रूपमें परिणत हो जायगा

বিদুর বললেন—তোমাদের এই পরিকল্পনা হৃদয়ে সুদৃঢ়ভাবে গাঁথা, পরামর্শে ভারী, আর প্রলোভনময় বাক্যে চালিত; এর ফল অবশ্যই প্রকাশ পাবে। কিন্তু শকুনি যাকে ‘উৎকৃষ্ট’ বলে এখানে এনেছে, সেই পাশাখেলা আসলে পতনের কারণ। গোপন পরামর্শের পর তোমাদের মধ্যে তা স্থির হয়েছে; কিন্তু তা তোমাদেরই স্বজন যুধিষ্ঠিরের সঙ্গে, তোমাদের ইচ্ছা ও মঙ্গলের বিরুদ্ধে, কলহে পরিণত হবে।

Verse 7

प्रातीपेया: शान्तनवा: शृणुध्व॑ काव्यां वाचं संसदि कौरवाणाम्‌ । वैश्वानरं प्रज्वलितं सुघोरं मा यास्यध्वं मन्दमनुप्रपन्ना:,प्रतीप और शन्तनुके वंशजो! कौरवोंकी सभामें मेरी कही हुई बात ध्यानसे सुनो। यह विद्वानोंको भी मान्य है। तुमलोग इस मूर्ख दुर्योधनके पीछे चलकर वैरकी धधकती हुई भयानक आगमें न कूदो

বিদুর বললেন—প্রতীপ ও শান্তনুর বংশধরগণ, কৌরবসভায় আমার সুপরিকল্পিত বাক্য মনোযোগ দিয়ে শোনো। সেই মন্দবুদ্ধি দুর্যোধনের পিছু নিয়ে বৈরাগ্নির প্রজ্বলিত, ভয়ংকর বৈশ্বানর-অগ্নিতে ঝাঁপ দিও না।

Verse 8

यदा मन्युं पाण्डवोडजातशगत्रु- न संयच्छेदक्षमदाभिभूत: । वृकोदर: सव्यसाची यमौ च कोजत्र द्वीप: स्यात्‌ तुमुले वस्तदानीम्‌,जूएके मदमें भूले हुए अजातशत्रु युधिष्ठिर जब अपना क्रोध न रोक सकेंगे तथा भीमसेन, अर्जुन एवं नकुल-सहदेव भी जब क्रुद्ध हो उठेंगे, उस समय घमासान युद्ध छिड़ जानेपर विपत्तिके महासागरमें डूबते हुए तुमलोगोंका कौन आश्रयदाता होगा?

বিদুর বললেন—যখন পাশার মদে আচ্ছন্ন অজাতশত্রু যুধিষ্ঠির আর ক্রোধ সংযত করতে পারবেন না, আর ভীম, অর্জুন ও যমজ নকুল-সহদেবও রোষে জ্বলে উঠবেন—তখন ভয়ংকর যুদ্ধ শুরু হলে বিপদের মহাসাগরে ডুবে যেতে থাকা তোমাদের জন্য কে হবে আশ্রয়ের দ্বীপ?

Verse 9

महाराज प्रभवस्त्वं धनानां पुरा द्यूतान्मनसा यावदिच्छे: । बहुवित्तान्‌ पाण्डवां श्वेज्जयस्त्वं कि ते तत्‌ स्याद्‌ वसु विन्देह पार्थान्‌,महाराज! आप जूएसे पहले भी मनसे जितना धन चाहते, उतना धन पा सकते थे; यदि अत्यन्त धनवान्‌ पाण्डवोंको आपने जूएके द्वारा जीत ही लिया तो इससे आपका क्‍या होगा? कुन्तीके पुत्र स्वयं ही धनस्वरूप हैं। आप इन्हींको अपनाइये

বিদুর বললেন—মহারাজ, জুয়ার আগেও আপনি ধনের অধিকারী ছিলেন; মনে যতটা চাইতেন, ততটাই পেতে পারতেন। তবে যদি পাশায় বিপুল ধনসম্পন্ন পাণ্ডবদেরও ‘জিতে’ নেন, তাতে আপনার কী লাভ? কুন্তীপুত্রগণ নিজেরাই ধনস্বরূপ; কপটতায় নয়, সদ্ভাবে তাদের আপন করে নিন।

Verse 10

जानीमहे देवितं सौबलस्य वेद द्यूते निकृतिं पर्वतीय: । यतः प्राप्त: शकुनिस्तत्र यातु मा यूयुधो भारत पाण्डवेयान्‌,मैं सुबलपुत्र शकुनिका जूआ खेलना कैसा है, यह जानता हूँ। यह पर्वतीय नरेश जूएकी सारी कपटविद्याको जानता है। मेरी इच्छा है कि यह शकुनि जहाँसे आया है, वहीं लौट जाय। भारत! इस तरह कौरवों तथा पाण्डवोंमें युद्धकी आग न भड़काओ

বিদুর বললেন—সৌবলপুত্র শকুনির দ্যূত-কপট আমি ভালোই জানি। এই পর্বতদেশীয় রাজা পাশাখেলায় প্রতারণায় সম্পূর্ণ পারদর্শী। শকুনি যেখান থেকে এসেছে, সেখানেই ফিরে যাক। হে ভারত! কৌরব ও পাণ্ডবদের মধ্যে বিরোধের আগুন জ্বালিও না।

Verse 63

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि विदुरवाक्ये त्रिषष्टितमो5ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের দ্যূতপর্বে ‘বিদুরবাক্য’ নামে তেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

Whether a person can be treated as a transferable stake when the wagering party’s authority is itself disputed after defeat—i.e., the dharma-status of claims made through compromised agency and coercive court procedure.

Ethical governance requires active restraint: when procedure is used to rationalize harm, elders and rulers must intervene; additionally, Draupadī’s refusal of a third boon models alobha (non-greed) as a stabilizing virtue amid crisis.

No explicit phalaśruti appears; the chapter’s meta-function is juridical and ethical—showing how understanding dharma in contested authority contexts is crucial for interpreting the epic’s later escalation and the moral accounting of outcomes.