
Chapter Arc: राजसभा के वैभव से लौटकर दुर्योधन का मन जलता है; वह धृतराष्ट्र के सामने अपनी असह्य पीड़ा और अपमान-बोध को वाणी का शस्त्र बनाकर रख देता है—‘आप मुझे जान-बूझकर भ्रमित कर रहे हैं, जैसे एक बँधी हुई नाव दूसरी को खींचे।’ → वह विदुर की नीति-बुद्धि पर कटाक्ष करता है और धृतराष्ट्र की ‘अनुशासन-शक्ति’ को चुनौती देता है—जिसके अधीन धार्तराष्ट्र हैं, वही यदि दूसरों की बुद्धि पर चले तो उसके अनुयायी कैसे सही पथ पाएँ? फिर वह मित्र-शत्रु की परिभाषा उलट देता है—जो संताप दे वही शत्रु—और अपने असंतोष को ‘नीति’ बताकर पाण्डव-समृद्धि के सामने अपनी अस्थिर उन्नति का विलाप करता है। → दुर्योधन अंतिम सीमा तक जाकर घोषणा करता है: ‘जब तक पाण्डवों का ऐश्वर्य नहीं पाऊँगा, मुझे चैन नहीं; या तो वही श्री प्राप्त करूँगा, या युद्ध में मारा जाकर शय्या लूँगा।’ जीवन को ही निरर्थक ठहराकर वह धृतराष्ट्र पर निर्णायक दबाव डाल देता है। → धृतराष्ट्र के सम्मुख दुर्योधन का संताप एक स्पष्ट राजनीतिक मांग में बदल जाता है—पाण्डव-ऐश्वर्य को छीनने का उपाय खोजा जाए। अध्याय का अंत इस ‘संताप’ को अगले षड्यंत्र की भूमिका बनाकर छोड़ देता है। → धृतराष्ट्र इस आग को कैसे दिशा देंगे—विदुर की नीति मानेंगे या दुर्योधन की ज्वाला को साधन देंगे?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल १२३ “लोक हैं) भ्न्ैमा+ () अिमनने पञ्चपज्चाशत्तमो< ध्याय: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना दुर्योधन उवाच यस्य नास्ति निजा प्रज्ञा केवलं तु बहुश्रुतः । न स जानाति शान््त्रार्थ दर्वी सूपरसानिव,दुर्योधन बोला--पिताजी! जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं है, जिसने केवल बहुत-से शास्त्रोंका श्रवणभर किया है, वह शास्त्रके तात्पर्यको नहीं समझ सकता; ठीक उसी तरह, जैसे कलछी दालके रसको नहीं जानती
দুর্যোধন বলল—পিতা! যার নিজের প্রজ্ঞা নেই, যে কেবল বহু শাস্ত্র শুনেছে মাত্র, সে শাস্ত্রের অর্থ বুঝতে পারে না; যেমন খুন্তি স্যুপের স্বাদ জানে না।
Verse 2
जानन् वै मोहयसि मां नावि नौरिव संयता | स्वार्थे कि नावधानं ते उताहो द्वेष्टि मां भवान्,एक नौकामें बँधी हुई दूसरी नौकाके समान आप विदुरकी बुद्धिके आश्रित हैं। जानते हुए भी मुझे मोहमें क्यों डालते हैं, स्वार्थलाधनके लिये क्या आपमें तनिक भी सावधानी नहीं है अथवा आप मुझसे द्वेष रखते हैं?
আপনি জেনেও কেন আমাকে মোহে ফেলছেন—যেন এক নৌকার সঙ্গে বাঁধা আরেক নৌকা! নিজের স্বার্থসাধনে কি আপনার সামান্যও সতর্কতা নেই, না কি আপনি আমাকে ঘৃণা করেন?
Verse 3
॥! _ 8 ५) 0 ५. 735 १ 0 5 २५ [७-7 865 न सन्तीमे धार्तराष्ट्रा येषां त्वमनुशासिता । भविष्यमर्थमाख्यासि सर्वदा कृत्यमात्मन:,आप जिनके शासक हैं, वे धार्तराष्ट्र नहींके बराबर हैं (क्योंकि आप उन्हें स्वेच्छासे उन्नतिके पथपर बढ़ने नहीं देते)) आप सदा अपने वर्तमान कर्तव्यको भविष्यपर ही टालते रहते हैं
যাদের আপনি শাসন করেন, তারা যেন ধার্তরাষ্ট্র-পুত্রই নয়—আপনার নিয়ন্ত্রণে তারা সম্পূর্ণ রুদ্ধ। আর যা এখনই করা উচিত, তা আপনি সর্বদা ভবিষ্যতের ওপর ঠেলে দেন।
Verse 4
परनेयोडग्रणीर्यस्य स मार्गान् प्रति मुहृति । पन्थानमनुगच्छेयु: कथं तस्य पदानुगा:,जिस दलका अगुआ दूसरेकी बुद्धिपर चलता हो, वह अपने मार्गमें सदा मोहित होता रहता है। फिर उसके पीछे चलनेवाले लोग अपने मार्गका अनुसरण कैसे कर सकते हें?
যে নেতাই অন্যের বুদ্ধির উপর নির্ভর করে, সে নিজের পথেই বারবার বিভ্রান্ত হয়। তবে তার পদাঙ্ক অনুসরণকারীরা কীভাবে স্থির পথে চলবে?
Verse 5
राजन् परिणतप्रज्ञो वृद्धसेवी जितेन्द्रिय: । प्रतिपन्नान् स्वकार्येषु सम्मोहयसि नो भृूशम्,राजन्! आपकी बुद्धि परिपक्व है, आप वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करते रहते हैं, आपने अपनी इन्द्रियोंपर विजय पा ली है, तो भी जब हमलोग अपने कार्योंमें तत्पर होते हैं, उस समय आप हमें बार-बार मोहमें ही डाल देते हैं
রাজন! আপনার বুদ্ধি পরিণত, আপনি বৃদ্ধদের সেবা করেন, ইন্দ্রিয়জয়ীও বটে; তবু আমরা যখন নিজেদের কাজে প্রবৃত্ত হই, তখন আপনি আমাদের বারবার গভীর বিভ্রান্তিতে নিক্ষেপ করেন।
Verse 6
लोकवृत्ताद् राजवृत्तमन्यदाह बृहस्पति: । तस्माद् राज्ञाप्रमत्तेन स्वार्थश्रिन्त्य: सदैव हि,बृहस्पतिने राजव्यवहारको लोकव्यवहारसे भिन्न बताया है; अतः राजाको सावधान होकर सदा अपने प्रयोजनका ही चिन्तन करना चाहिये। महाराज! क्षत्रियकी वृत्ति विजयमें ही लगी रहती है, वह चाहे धर्म हो या अधर्म। अपनी वृत्तिके विषयमें क्या परीक्षा करनी है?
বৃহস্পতি বলেছেন, রাজকার্যের আচরণ সাধারণ লোকাচার থেকে ভিন্ন। অতএব রাজাকে অপ্রমত্ত হয়ে সর্বদা নিজের স্বার্থের কথাই ভাবতে হবে।
Verse 7
क्षत्रियस्य महाराज जये वृत्ति: समाहिता । स वै धर्मस्त्वधर्मो वा स्ववृत्तौ का परीक्षणा,बृहस्पतिने राजव्यवहारको लोकव्यवहारसे भिन्न बताया है; अतः राजाको सावधान होकर सदा अपने प्रयोजनका ही चिन्तन करना चाहिये। महाराज! क्षत्रियकी वृत्ति विजयमें ही लगी रहती है, वह चाहे धर्म हो या अधर्म। अपनी वृत्तिके विषयमें क्या परीक्षा करनी है?
মহারাজ! ক্ষত্রিয়ের বৃত্তি জয়েই স্থিত। তা ধর্ম হোক বা অধর্ম—নিজ নির্ধারিত বৃত্তি নিয়ে আর কী পরীক্ষা?
Verse 8
प्रकालयेद् दिश: सर्वा: प्रतोदेनेव सारथि: । प्रत्यमित्रश्रियं दीप्तां जिघ॒क्षुर्भरतर्षभ
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যেমন সারথি প্রতোদ দিয়ে অশ্বদের তাড়িয়ে রথকে সর্বদিকে চালায়, তেমনি সে প্রতিদ্বন্দ্বীদের দীপ্ত সমৃদ্ধি বিনাশ করতে উদ্যত হয়ে সব দিকে ধাবিত হবে।
Verse 9
भरतकुलभूषण! शत्रुकी जगमगाती हुई राजलक्ष्मीको अपने अधिकारमें करनेकी इच्छावाला भूपाल सम्पूर्ण दिशाओंका उसी प्रकार संचालन करे, जैसे सारथि चाबुकसे घोड़ोंको हाँककर अपनी रुचिके अनुसार चलाता है ।। प्रच्छन्नो वा प्रकाशो वा योगो योडरिं प्रबाधते । तद् वै शस्त्र शस्त्रविदां न शस्त्र छेदनं स्मृतम्,गुप्त या प्रकट, जो उपाय शत्रुको संकटमें डाल दे, वही शस्त्रज्ञ पुरुषोंका शस्त्र है। केवल काटनेवाला शस्त्र ही शस्त्र नहीं है
দুর্যোধন বলল—“ভরতকুলভূষণ! যে রাজা শত্রুর দীপ্তিমান রাজলক্ষ্মীকে নিজের অধীনে আনতে চায়, তাকে সর্বদিক এমনভাবে পরিচালনা করতে হবে, যেমন সারথি চাবুক দিয়ে অশ্বদের তাড়িয়ে নিজের ইচ্ছামতো চালায়। কৌশল গোপন হোক বা প্রকাশ্য—যে উপায় শত্রুকে বিপদে ফেলে, অস্ত্রবিদদের মতে সেটাই ‘অস্ত্র’। শুধু কাটে এমন অস্ত্রই অস্ত্র নয়; গোপন বা প্রকাশ্য যে কোনো উপায়ে শত্রুকে বশ করা গেলে, সেটিও অস্ত্র বলে গণ্য।”
Verse 10
शत्रुश्चैव हि मित्रं च न लेख्यं न च मातृका । यो वै संतापयति यं स शत्रु: प्रोच्यते नृप,राजन्! अमुक शत्रु है और अमुक मित्र, इसका कोई लेखा नहीं है और न शत्रु- मित्रसूचक कोई अक्षर ही है। जो जिसको संताप देता है, वही उसका शत्रु कहा जाता है
দুর্যোধন বলল—“রাজন! ‘এ শত্রু’ আর ‘এ মিত্র’—এমন স্থায়ী কোনো নথি নেই, এমন কোনো অক্ষরচিহ্নও নেই যা চিরদিনের জন্য শত্রু-মিত্র নির্ধারণ করে। যে যাকে কষ্ট দেয়, সেই তার শত্রু বলে গণ্য হয়।”
Verse 11
असंतोष: श्रियो मूलं तस्मात् तं कामयाम्यहम् । समुच्छूये यो यतते स राजन् परमो नयः
দুর্যোধন বলল—“অসন্তোষই সমৃদ্ধির মূল; তাই আমি সেই মনোভাবই কামনা করি। রাজন! যে ক্রমাগত উচ্চতর হতে চেষ্টা করে—সেই-ই পরম নীতির পথ ধরে।”
Verse 12
असंतोष ही लक्ष्मीकी प्राप्तिका मूल कारण है; अतः मैं असंतोष चाहता हूँ। राजन्! जो अपनी उन्नतिके लिये प्रयत्न करता है, उसका वह प्रयत्न ही सर्वोत्तम नीति है ।। ममत्वं हि न कर्तव्यमैश्व॒र्ये वा धनेडपि वा । पूर्वावाप्तं हरन्त्यन्ये राजधर्म हि तं विदु:,ऐश्वर्य अथवा धनमें ममता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि पहलेके उपार्जित धनको दूसरे लोग बलात् छीन लेते हैं। यही राजधर्म माना गया है
দুর্যোধন বলল—“অসন্তোষই লক্ষ্মীপ্রাপ্তির মূল কারণ; তাই আমি অসন্তোষকেই বেছে নিই। রাজন! যে নিজের উন্নতির জন্য চেষ্টা করে, সেই চেষ্টাই তার শ্রেষ্ঠ নীতি। ঐশ্বর্য বা ধনে মমতা করা উচিত নয়; কারণ পূর্বে অর্জিত ধন অন্যেরা বলপূর্বক কেড়ে নেয়—এটাই রাজধর্ম বলে মানা হয়।”
Verse 13
अद्रोहसमयं कृत्वा चिच्छेद नमुचे: शिर: । शक्र: साभिमता तस्य रिपौ वृत्ति: सनातनी,इन्द्रने नमुचिसे कभी वैर न करनेकी प्रतिज्ञा करके उसपर विश्वास जमाया और मौका देखकर उसका सिर काट लिया। तात! शत्रुके प्रति इसी प्रकारका व्यवहार सदासे होता चला आया है। यह इन्द्रको भी मान्य है
দুর্যোধন বলল—“অদ্রোহের চুক্তি করে শক্র (ইন্দ্র) নমুচির বিশ্বাস অর্জন করেছিল, তারপর সুযোগ পেয়ে তার মস্তক ছিন্ন করেছিল। তাত! শত্রুর প্রতি এমন আচরণ প্রাচীনকাল থেকেই চলে আসছে; ইন্দ্রও তা অনুমোদন করে।”
Verse 14
द्वावेतौ ग्रसते भूमि: सर्पों बिलशयानिव । राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्,जैसे सर्प बिलमें रहनेवाले चूहों आदिको निगल जाता है, उसी प्रकार यह भूमि विरोध न करनेवाले राजा तथा परदेशमें न विचरनेवाले ब्राह्मण (संन्यासी)-को ग्रस लेती है
পৃথিবী এই দুইজনকে গ্রাস করে—যেমন গর্তে-বাসী প্রাণীকে সাপ গিলে ফেলে: যে রাজা প্রতিরোধ করে ধর্ম-শাসন রক্ষা করে না, এবং যে ব্রাহ্মণ গৃহাসক্ত থেকে প্রব্রজ্যা গ্রহণ করে না।
Verse 15
नास्ति वै जातित:ः शत्रु: पुरुषस्य विशाम्पते । येन साधारणी वृत्ति: स शत्रुर्नेतरो जन:,नरेश्वर! मनुष्यका जन्मसे कोई शत्रु नहीं होता, जिसके साथ एक-सी जीविका होती है अर्थात् जो लोग एक ही वृत्तिसे जीवननिर्वाह करते हैं, वे ही (ईष्यॉके कारण) आपसमें एक-दूसरेके शत्रु होते हैं, दूसरे नहीं
হে জননায়ক! জন্মমাত্রেই মানুষের শত্রু হয় না। যার সঙ্গে জীবিকা ও কর্মক্ষেত্র এক, সেই ঈর্ষায় শত্রু হয়; অন্যেরা নয়।
Verse 16
शत्रुपक्षं समृध्यन्तं यो मोहात् समुपेक्षते । व्याधिराप्यायित इव तस्य मूलं छिनत्ति सः,जो निरन्तर बढ़ते हुए शत्रुपक्षकी ओरसे मोहवश उदासीन हो जाता है, बढ़े हुए रोगकी भाँति शत्रु उस उदासीन राजाकी जड़ काट डालता है
যে মোহবশত সমৃদ্ধ হতে থাকা শত্রুপক্ষকে উপেক্ষা করে, সেই শত্রু—পুষ্ট রোগের মতো—তার মূলই কেটে দেয়।
Verse 17
अल्पो5पि हारिरत्यर्थ वर्धमान: पराक्रमै: । वल्मीको मूलज इव ग्रसते वृक्षमन्तिकात्,जैसे वृक्षकी जड़में उत्पन्न हुई दीमक उसमें लगी रहनेके कारण उस वृक्षको ही खा जाती है, वैसे ही छोटा-सा भी शत्रु यदि पराक्रमसे बहुत बढ़ जाय, तो वह पहलेके प्रबल शत्रुको भी नष्ट कर डालता है
অল্প হলেও শত্রু যদি পরাক্রমে অত্যন্ত বৃদ্ধি পায়, তবে সে—গাছের গোড়ায় জন্মানো উইপোকার মতো—কাছে লেগে থেকেই সেই গাছকে গ্রাস করে।
Verse 18
आजमीढ रिपोर्लक्ष्मीमा ते रोचिष्ट भारत । एष भार: सत्त्ववतां नय: शिरसि विछित:,भरतकुलभूषण! अजमीढनन्दन! आपको शत्रुकी लक्ष्मी अच्छी नहीं लगनी चाहिये। हर समय न्यायको सिरपर चढ़ाये रखना भी बुद्धिमानोंके लिये भार ही है
হে ভারত, আজমীঢ়-নন্দন! শত্রুর লক্ষ্মী তোমার কাছে রুচিকর না হোক। আর এই ‘নয়’—ন্যায়-নীতিকে সর্বদা মাথায় তুলে রাখা—বলবান ও বুদ্ধিমানদের পক্ষেও এক ভার।
Verse 19
जन्मवृद्धिमिवार्थानां यो वृद्धिमभिकाड्क्षते | एधते ज्ञातिषु स वै सद्यो वृद्धि्हि विक्रम:,जो जन्मकालसे शरीर आदिकी वृद्धिके समान धनवृद्धिकी भी अभिलाषा करता है, वह कुट॒म्बीजनोंमें बहुत आगे बढ़ जाता है। पराक्रम करना तत्काल उन्नतिका कारण है
যেমন জন্মের সঙ্গে জীবের স্বাভাবিক বৃদ্ধি ঘটে, তেমনি যে ব্যক্তি ধনের বৃদ্ধি কামনা করে এবং তা অর্জনে উদ্যোগী হয়, তার ধনও বৃদ্ধি পায়। সে স্বজনদের মধ্যে দ্রুতই উন্নত হয়; কারণ তৎক্ষণাৎ উন্নতির মূল কারণই হলো সাহসী উদ্যোগ ও পরাক্রম।
Verse 20
नाप्राप्य पाण्डवैश्वर्य संशयो मे भविष्यति । अवाप्स््ये वा श्रियं तां हि शयिष्ये वा हतो युधि,जबतक मैं पाण्डवोंकी सम्पत्तिको प्राप्त न कर लूँ, तबतक मेरे मनमें दुविधा ही रहेगी। इसलिये या तो मैं पाण्डवोंकी उस सम्पत्तिको ले लूँगा अथवा युद्धमें मरकर सो जाऊँगा (तभी मेरी दुविधा मिटेगी)
পাণ্ডবদের ঐশ্বর্য অর্জন না করা পর্যন্ত আমার মনে সংশয় দূর হবে না। অতএব আমি হয় সেই রাজশ্রী নিজের করে নেব, নয়তো যুদ্ধে নিহত হয়ে মৃত্যুশয্যায় শুয়ে পড়ব।
Verse 21
एतादृशस्य किं मेडद्य जीवितेन विशाम्पते । वर्धन्ते पाण्डवा नित्यं वयं त्वस्थिरवृद्धय:,महाराज! आज जो मेरी दशा है, इसमें मेरे जीवित रहनेसे क्या लाभ? पाण्डव प्रतिदिन उन्नति कर रहे हैं और हम लोगोंकी वृद्धि (उन्नति) अस्थिर है--अधिक कालतक टिकनेवाली नहीं जान पड़ती है
হে মহারাজ! এমন অবস্থায় আজ আমার বেঁচে থাকারই বা কী লাভ? পাণ্ডবরা প্রতিদিনই উন্নতি করছে, আর আমাদের বৃদ্ধি অস্থির—স্থায়ী বলে মনে হয় না।
Verse 55
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे पठचपज्चाशत्तमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দ্যূতপর্বে দুর্যোধনের সন্তাপ-বিষয়ক পঞ্চপঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।