Adhyaya 46
Sabha ParvaAdhyaya 4636 Verses

Adhyaya 46

Dyūta-kathā-praśnaḥ — Inquiry into the Dice-Game Calamity

Upa-parva: Dyūta-prastāva (Prelude to the Dice-Game)

Janamejaya requests a detailed account of the dice-game that became a major calamity for the brothers (Pāṇḍavas) and asks which kings were present, who supported the event, and who opposed it (1–3). The narrative relay is marked: Sauti introduces Vaiśaṃpāyana’s response to the king’s query (4–5). Dhṛtarāṣṭra, having understood Vidura’s position, speaks privately to Duryodhana, urging restraint and aligning Vidura’s counsel with authoritative instruction (Bṛhaspati) and with a pragmatic warning: gambling generates division, and division leads to the ruin of the kingdom (6–12). Dhṛtarāṣṭra further argues that Duryodhana already possesses inherited sovereignty, education, security, and abundance, and therefore should identify the true root of his distress (13–17). Duryodhana replies with a psychology of status injury: he is not satisfied by “common” prosperity, suffers upon seeing Yudhiṣṭhira’s expansive influence, and recounts humiliating incidents in the sabhā—misrecognitions, laughter by Bhīma and others, a fall into water mistaken for stone, and subsequent mockery—culminating in burning resentment (18–34). He also notes the overwhelming display of rare jewels and tribute, intensifying his sense of exclusion and comparative loss (23–35). The chapter thus anatomizes the shift from ethical counsel to grievance-driven strategy, establishing the motivational substrate for the dice-game initiation.

Chapter Arc: द्यूत के अनिष्ट की छाया पहले ही उतर आती है—धर्मराज युधिष्ठिर के मन में अनजानी चिन्ता उठती है, और उसी समय महर्षि व्यास का आगमन होता है। → युधिष्ठिर भाइयों सहित व्यास का सत्कार करते हैं; व्यास सुवर्णासन पर बैठकर भविष्यसूचक वाणी कहते हैं—राजा को स्वप्न में वृषध्वज, नीलकण्ठ, त्रिपुरान्तक शिव के दर्शन होंगे, और यह संकेत किसी महान् अनर्थ की ओर है। युधिष्ठिर के भीतर यह भय गहराता है कि कहीं समस्त क्षत्रिय-विनाश का कारण वे स्वयं न बन जाएँ। → व्यास की वाणी सुनकर युधिष्ठिर का मन ‘मरणे निश्चिता मति’ जैसा कठोर हो उठता है—वे अपने ही भाग्य-बंधन को देख लेते हैं और यह स्वीकारने लगते हैं कि यदि सर्वक्षत्र-निधन का हेतु बनना ही लिखा है तो वह उनके ही द्वारा होगा; यह आत्म-आरोप और नियति-बोध अध्याय का शिखर है। → युधिष्ठिर व्यास-वचन पर विचार कर भाइयों से परामर्श करते हैं; व्यास विदा लेने की अनुमति माँगते हैं और युधिष्ठिर उन्हें प्रणाम कर विदा करते हैं। विदाई के बाद भी युधिष्ठिर के मन में एक भारी संशय शेष रहता है—जिसका समाधान वे व्यास के अतिरिक्त किसी से नहीं मानते। → व्यास के चले जाने पर युधिष्ठिर का ‘भारी संशय’ खुलकर सामने आता है—आगे वही संशय द्यूत-आह्वान और धर्म-संकट की ओर कथा को धकेलता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४२ श्लोक मिलाकर कुल ११० श्लोक हैं) नशा (0) आज अत न (द्यूतपर्व) षट्चत्वारिशो< ध्याय: व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिछिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा वैशम्पायन उवाच समाप्ते राजसूये तु क्रतुश्रेष्ठे सुदुर्लभे । शिष्यै: परिवृतो व्यास: पुरस्तात्‌ समपद्यत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यज्ञोंमें श्रेष्ठ परम दुर्लभ राजसूययज्ञके समाप्त हो जानेपर शिष्योंसे घिरे हुए भगवान्‌ व्यास राजा युधिष्ठिरके पास आये

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! যজ্ঞসমূহের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ও অতি দুর্লভ রাজসূয় যজ্ঞ সমাপ্ত হলে, শিষ্যবেষ্টিত ভগবান ব্যাস রাজা যুধিষ্ঠিরের সম্মুখে উপস্থিত হলেন।

Verse 2

सो<भ्ययादासनात्‌ तूर्ण भ्रातृभि: परिवारित: । पाद्येनासनदानेन पितामहमपूजयत्‌,उन्हें देखकर भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठटिर तुरंत आसनसे उठकर खड़े हो गये और आसन एवं पाद्य आदि समर्पण करके उन्होंने पितामह व्यासजीका यथावत्‌ पूजन किया

তাঁকে দেখে ভ্রাতৃবেষ্টিত রাজা যুধিষ্ঠির তৎক্ষণাৎ আসন থেকে উঠে দাঁড়ালেন এবং পাদ্য ও আসন নিবেদন করে পিতামহ ব্যাসদেবকে যথাবিধি পূজা করলেন।

Verse 3

अथोपविश्य भगवान्‌ काञ्चने परमासने । आस्यतामिति चोवाच धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌,तत्पश्चात्‌ सुवर्णमय उत्तम आसनपर बैठकर भगवान्‌ व्यासने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा --बैठ जाओ”

তারপর ভগবান ব্যাস স্বর্ণময় শ্রেষ্ঠ আসনে উপবিষ্ট হয়ে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে বললেন—“বসো।”

Verse 4

अथोपविष्ट राजानं भ्रातृभि: परिवारितम्‌ | उवाच भगवान्‌ व्यासस्तत्तद्वाक्यविशारद:,भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरके बैठ जानेपर बातचीतमें कुशल भगवान्‌ व्यासने उनसे कहा--

ভ্রাতৃবেষ্টিত রাজা যুধিষ্ঠির বসে পড়লে, সময়োচিত বাক্যে পারদর্শী ভগবান ব্যাস তাঁকে বললেন—

Verse 5

दिष्ट्या वर्धसि कौन्तेय साम्राज्य प्राप्य दुर्लभम्‌ | वर्धिता: कुरव: सर्वे त्वया कुरुकुलोद्वह,“कुन्तीनन्दन! बड़े आनन्दकी बात है कि तुम परम दुर्लभ सम्राट्का पद पाकर सदा उन्नतिशील हो रहे हो। कुरुकुलका भार वहन करनेवाले नरेश! तुमने समस्त कुरुवंशियोंको समृद्धिशाली बना दिया

“কৌন্তেয়! সৌভাগ্য যে তুমি দুর্লভ সাম্রাজ্যলাভ করে ক্রমে উন্নতি লাভ করছ। হে কুরু-কুলের ভারবাহক, তোমার দ্বারা সমগ্র কুরুবংশ সমৃদ্ধ হয়েছে।”

Verse 6

आपूृच्छे त्वां गमिष्यामि पूजितो5स्मि विशाम्पते । एवमुक्त: स कृष्णेन धर्मराजो युधिष्ठिर:

“হে বিশামপতে, আমি তোমার নিকট বিদায় নিচ্ছি; এখন প্রস্থান করব। তুমি আমাকে যথোচিত সম্মান দিয়েছ।” এভাবে বলা হলে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির উত্তর দিলেন।

Verse 7

युधिछिर उवाच संशयो द्विपदां श्रेष्ठ ममोत्पन्न: सुदुर्लभ:

যুধিষ্ঠির বললেন—হে দ্বিপদশ্রেষ্ঠ! আমার মনে এক দুর্লভ সংশয় উদিত হয়েছে, যা নির্ণয় করা অতিশয় কঠিন।

Verse 8

उत्पातांस्त्रिविधान्‌ प्राह नारदो भगवानृषि:

তখন ভগবান ঋষি নারদ বললেন—উৎপাত তিন প্রকার।

Verse 9

दिव्यांश्ैवान्तरिक्षांश्व॒ पार्थिवांश्व पितामह । अपि चैट्यस्य पतनाच्छन्नमौत्पातिकं महत्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—হে পিতামহ! কতক উৎপাত দিব্য, কতক অন্তরীক্ষে, আর কতক পার্থিব। আর এই চৈত্যের পতনে এক মহৎ অশুভ লক্ষণ প্রকাশ পেয়েছে—গুপ্ত হলেও তার তাৎপর্য গুরুতর।

Verse 10

पितामह! देवर्षि भगवान्‌ नारदने स्वर्ग, अन्तरिक्ष और पृथ्वीविषयक तीन प्रकारके उत्पात बताये हैं। क्या शिशुपालके मारे जानेसे वे महान्‌ उत्पात शान्त हो गये? ।। वैशम्पायन उवाच राज्ञस्तु वचन श्रुत्वा पराशरसुत: प्रभु: । कृष्णद्वैपायनो व्यास इदं वचनमबत्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा युधिष्ठिरका यह प्रश्न सुनकर पराशरनन्दन कृष्णद्वैपायन भगवान्‌ व्यासने इस प्रकार कहा--

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! যুধিষ্ঠির জিজ্ঞাসা করলেন—“পিতামহ! দেবর্ষি ভগবান নারদ স্বর্গ, অন্তরীক্ষ ও পৃথিবী-সম্পর্কিত তিন প্রকার উৎপাতের কথা বলেছেন। শিশুপালের বধের পর কি সেই মহৎ উৎপাতগুলি প্রশমিত হয়েছে?” রাজার বাক্য শুনে পরাশরনন্দন, প্রভু কৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাস এই কথা বললেন।

Verse 11

त्रयोदश समा राजन्ुत्पातानां फलं महत्‌ | सर्वक्षत्रविनाशाय भविष्यति विशाम्पते,“राजन! उत्पातोंका महान्‌ फल तेरह वर्षोतक हुआ करता है। इस समय जो उत्पात प्रकट हुआ था, वह समस्त क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला होगा

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! উৎপাতের মহৎ ফল তেরো বছরে পরিপক্ব হয়। হে প্রজাপতি! এখন যে অশুভ লক্ষণগুলি প্রকাশ পেয়েছে, তা সমগ্র ক্ষত্রিয়বংশের বিনাশ ঘটাবে।

Verse 12

त्वामेक॑ कारणं कृत्वा कालेन भरतर्षभ | समेत पार्थिव क्षत्रं क्षयं यास्यति भारत । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च,“भरतकुलतिलक! एकमात्र तुम्हींको निमित्त बनाकर यथासमय समस्त भूमिपालोंका समुदाय आपसमें लड़कर नष्ट हो जायगा। भारत! क्षत्रियोंका यह विनाश दुर्योधनके अपराधसे तथा भीमसेन और अर्जुनके पराक्रमद्वारा सम्पन्न होगा

বৈশম্পায়ন বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! কেবল তোমাকেই নিমিত্ত করে, যথাকালে সমবেত রাজা ও ক্ষত্রিয়সমূহ বিনাশের পথে যাবে। হে ভরতবংশধর! এই ক্ষত্রিয়-সংহার দুর্যোধনের অপরাধে এবং ভীম ও অর্জুনের পরাক্রমে সম্পন্ন হবে।

Verse 13

स्वप्रे द्रक्ष्यसि राजेन्द्र क्षपान्ते त्वं वृषध्वजम्‌ | नीलकण्ठं भवं स्थाणुं कपालिं त्रिपुरान्तकम्‌,'राजेन्द्र! तुम रातके अन्तमें स्वप्नमें उन वृषभध्वज भगवान्‌ शंकरका दर्शन करोगे, जो नीलकण्ठ, भव, स्थाणु, कपाली, त्रिपुरान्तक, उग्र, रुद्र, पशुपति, महादेव, उमापति, हर, शर्व, वृष, शूली, पिनाकी तथा कृत्तिवासा कहलाते हैं

বৈশম্পায়ন বললেন— হে রাজেন্দ্র! রাত্রির অন্তে তুমি স্বপ্নে বৃষধ্বজ ভগবান শিবকে দর্শন করবে— যিনি নীলকণ্ঠ, ভব, স্থাণু, কপালী ও ত্রিপুরান্তক নামে প্রসিদ্ধ।

Verse 14

उग्र रुद्रे पशुपतिं महादेवमुमापतिम्‌ | हरं शर्व वृषं शूलं पिनाकि कृत्तिवाससम्‌,'राजेन्द्र! तुम रातके अन्तमें स्वप्नमें उन वृषभध्वज भगवान्‌ शंकरका दर्शन करोगे, जो नीलकण्ठ, भव, स्थाणु, कपाली, त्रिपुरान्तक, उग्र, रुद्र, पशुपति, महादेव, उमापति, हर, शर्व, वृष, शूली, पिनाकी तथा कृत्तिवासा कहलाते हैं

উগ্র, রুদ্র, পশুপতি, মহাদেব, উমাপতি; হর, শর্ব; বৃষধ্বজ, শূলধারী, পিনাকধারী ও কৃত্তিবাস— এইরূপ ভগবান শিবকে (তুমি স্বপ্নে) দর্শন করবে। হে রাজাধিরাজ! রাত্রির অন্তে তুমি তাঁকে স্বপ্নে দেখবে।

Verse 15

कैलासकूटप्रतिमं वृषभे5वस्थितं शिवम्‌ । निरीक्षमाणं सततं पितृराजाश्रितां दिशम्‌,“उन भगवान्‌ शिवकी कान्ति कैलासशिखरके समान उज्ज्वल होगी। वे वृषभपर आरूढ़ हुए सदा दक्षिण दिशाकी ओर देख रहे होंगे

তুমি শিবকে কৈলাসশিখরের ন্যায় দীপ্তিমান, বৃষভে আরূঢ় দেখবে; তিনি অবিরত সেই দিকেই দৃষ্টি রাখবেন যা পিতৃরাজ যমের অধীন— অর্থাৎ দক্ষিণ দিক।

Verse 16

एवमीदृशकं स्वप्न द्रक्ष्यसि त्वं विशाम्पते । मा तत्कृते हानुध्याहि कालो हि दुरतिक्रम:,“राजन! तुम्हें इस प्रकार ऐसा स्वप्न दिखायी देगा, किंतु उसके लिये तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि काल सबके लिये दुर्लडघ है

হে প্রজাপতি! তুমি এইরূপই স্বপ্ন দেখবে। কিন্তু তার জন্য মনঃক্ষুণ্ণ হয়ো না; কারণ কালের সীমা অতিক্রম করা কারও পক্ষেই দুরূহ।

Verse 17

स्वस्ति ते5स्तु गमिष्यामि कैलासं पर्वतं प्रति । अप्रमत्त: स्थितो दान्त: पृथिवीं परिपालय,“तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं कैलासपर्वतपर जाऊँगा। तुम सावधान एवं जितेन्द्रिय होकर पृथ्वीका पालन करो”

তোমার মঙ্গল হোক। আমি এখন কৈলাস পর্বতের দিকে যাত্রা করছি। তুমি সতর্ক, স্থির ও ইন্দ্রিয়সংযত হয়ে পৃথিবী শাসন করো।

Verse 18

वैशम्पायन उवाच एवमुक्‍्त्वा स भगवान्‌ कैलासं पर्वतं ययौ । कृष्णद्वैपायनो व्यास: सह शिष्यै: श्रुतानुगै:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ऐसा कहकर भगवान्‌ कृष्ण द्वैपायन व्यास वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले अपने शिष्योंके साथ कैलासपर्वतपर चले गये

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা বলে ভগবান কৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাস, বেদশ্রুতি-অনুসারী শিষ্যদের সঙ্গে কৈলাস পর্বতের দিকে চলে গেলেন।

Verse 19

गते पितामहे राजा चिन्ताशोकसमन्वित: । निःश्वसन्नुष्णमसकृत्‌ तमेवार्थ विचिन्तयन्‌,अपने पितामह व्यासजीके चले जानेपर चिन्ता और शोकसे युक्त राजा युधिष्छिर बारंबार गरम साँसें लेते हुए उसी बातका चिन्तन करते रहे। अहो! दैवका विधान पुरुषार्थसे किस प्रकार टाला जा सकता है? महर्षिने जो कुछ कहा है, वह निश्चय ही होगा

পিতামহ চলে গেলে রাজা যুধিষ্ঠির চিন্তা ও শোকে আচ্ছন্ন হলেন। তিনি বারবার উষ্ণ নিশ্বাস ফেলতে ফেলতে সেই বিষয়ই মনে মনে ভাবতে লাগলেন।

Verse 20

कथं तु दैवं शक्येत पौरुषेण प्रबाधितुम्‌ । अवश्यमेव भविता यदुक्तं परमर्षिणा,अपने पितामह व्यासजीके चले जानेपर चिन्ता और शोकसे युक्त राजा युधिष्छिर बारंबार गरम साँसें लेते हुए उसी बातका चिन्तन करते रहे। अहो! दैवका विधान पुरुषार्थसे किस प्रकार टाला जा सकता है? महर्षिने जो कुछ कहा है, वह निश्चय ही होगा

মানুষের প্রচেষ্টায় ভাগ্যকে কীভাবে রোধ করা যায়? পরমর্ষি যা বলেছেন, তা অবশ্যম্ভাবীভাবে ঘটবেই।

Verse 21

ततोअब्रवीन्महातेजा: सर्वान्‌ भ्रातृन्‌ युधिष्ठिर: । श्रुतं वै पुरुषव्याप्रा यन्मां द्वैधवायनो5ब्रवीत्‌

তখন মহাতেজস্বী যুধিষ্ঠির সকল ভ্রাতাকে বললেন—“হে পুরুষব্যাঘ্রগণ! দ্বৈধবায়ন আমাকে যা বলেছেন, আমি তা শুনেছি।”

Verse 22

तदा तद्वचन श्रुत्वा मरणे निश्चिता मति: । सर्वक्षत्रस्य निधने यद्य॒हं हेतुरीप्सित:

সে কথা শুনে তাঁর মন মৃত্যুতে স্থির হল—“যদি সমগ্র ক্ষত্রিয়কুলের বিনাশের কারণ হিসেবে আমাকেই চাওয়া হয়, তবে তাই হোক।”

Verse 23

कालेन निर्मितस्तात को ममार्थो5स्ति जीवत: । एवं ब्रुवन्तं राजानं फाल्गुन: प्रत्यभाषत

“হে প্রিয়! যখন সবই কালের দ্বারা নির্মিত ও নিয়ন্ত্রিত, তখন জীবিত থেকে আমার আর কী উদ্দেশ্য?” এভাবে বলিতে থাকা রাজাকে ফাল্গুন (অর্জুন) উত্তর দিলেন।

Verse 24

यही सोचते-सोचते महातेजस्वी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे कहा--'पुरुषसिंहो! महर्षि व्यासने मुझसे जो कहा है, उसे तुमलोगोंने सुना है न? उनकी वह बात सुनकर मैंने मरनेका निश्चय कर लिया है। तात! यदि समस्त क्षत्रियोंके विनाशमें विधाताने मुझे ही निमित्त बनानेकी इच्छा की है, कालने मुझे ही इस अनर्थका कारण बनाया है तो मेरे जीवनका क्‍या प्रयोजन है?” राजाकी ऐसी बातें सुनकर अर्जुनने उत्तर दिया-- || २१-- २३ || मा राजन्‌ कश्मलं घोर प्रविशो बुद्धिनाशनम्‌ । सम्प्रधार्य महाराज यत्‌ क्षेमं तत्‌ समाचर,“राजन्‌! इस भयंकर मोहमें न पड़िये, यह बुद्धिको नष्ट करनेवाला है। महाराज! अच्छी तरह सोच-विचारकर आपको जो कल्याणप्रद जान पड़े, वह कीजिये”

বৈশম্পায়ন বললেন—এমন ভাবতে ভাবতে মহাতেজস্বী যুধিষ্ঠির সকল ভ্রাতাকে বললেন—“হে সিংহসম পুরুষেরা! মহর্ষি ব্যাস আমাকে যা বলেছেন, তোমরা তা শুনেছ। তাঁর কথা শুনে আমি মৃত্যুর সংকল্প করেছি। প্রিয়জনেরা! যদি বিধাতা সমগ্র ক্ষত্রিয়দের বিনাশে আমাকেই নিমিত্ত করতে চান, যদি কালই আমাকে এই অনর্থের কারণ করেছে, তবে আমার জীবনের আর কী উদ্দেশ্য?” রাজার এ কথা শুনে অর্জুন উত্তর দিলেন—“হে রাজন, এই ভয়ংকর বিষাদে প্রবেশ করবেন না; এটি বুদ্ধিনাশক। মহারাজ, ভালো করে বিচার করে যা কল্যাণকর, তাই করুন।”

Verse 25

ततोअब्रवीत्‌ सत्यधृतिर्भ्रातृन्‌ सर्वान्‌ युधिष्ठिर: । द्वैपायनस्य वचन होवं समनुचिन्तयन्‌,तब सत्यवादी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे व्यासजीकी बातोंपर विचार करते हुए कहा--

তখন সত্যে অবিচল যুধিষ্ঠির, দ্বৈপায়নের (ব্যাসের) বচন গভীরভাবে বিবেচনা করে, সকল ভ্রাতাকে সম্বোধন করলেন।

Verse 26

अद्यप्रभृति भद्रें वः प्रतिज्ञां मे निबोधत । त्रयोदश समास्तात को ममार्थो5स्ति जीवत:,“तात! तुमलोगोंका कल्याण हो, भाइयोंके विनाशका कारण बननेके लिये मुझे तेरह वर्षोतक जीवित रहनेसे क्या लाभ? यदि जीना ही है तो आजसे मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो --

“আজ থেকে, হে কল্যাণময়গণ, আমার প্রতিজ্ঞা জেনে রাখো। প্রিয়! যদি আমার বেঁচে থাকা ভাইদের বিনাশের কারণ হয়, তবে তেরো বছর জীবিত থাকারই বা কী অর্থ?”

Verse 27

न प्रवक्ष्यामि परुषं भ्रातृनन्यांश्व पार्थिवान्‌ । स्थितो निदेशे ज्ञातीनां योक्ष्ये तत्‌ समुदाहरन्‌,“मैं अपने भाइयों तथा दूसरे राजाओंसे कभी कड़वी बात नहीं बोलूँगा। बन्धु- बान्धवोंकी आज्ञामें रहकर प्रसन्नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ लानेमें संलग्न रहूँगा'

আমি আমার ভাইদের কিংবা অন্য কোনো রাজাদের প্রতি কখনও কঠোর বাক্য বলব না। আত্মীয়স্বজনের নির্দেশে থেকে, তারা যা চাইবে তা এনে দেওয়া ও জোগাড় করে দিতে আনন্দের সঙ্গে নিয়োজিত থাকব।

Verse 28

एवं मे वर्तमानस्य स्वसुतेष्वितरेषु च । भेदो न भविता लोके भेदमूलो हि विग्रह:,“इस प्रकार समतापूर्ण बर्ताव करते हुए मेरा अपने पुत्रों तथा दूसरोंके प्रति भेदभाव न होगा; क्योंकि जगतमें लड़ाई-झगड़ेका मूल कारण भेदभाव ही है

এইভাবে সমভাবে আচরণ করলে আমার নিজের পুত্রদের প্রতিও এবং অন্যদের প্রতিও কোনো পক্ষপাত থাকবে না; কারণ এই জগতে বিবাদ-কলহের মূলই হলো ভেদবুদ্ধি।

Verse 29

विग्रहं दूरतो रक्षन्‌ प्रियाण्येव समाचरन्‌ | वाच्यतां न गमिष्यामि लोकेषु मनुजर्षभा:,“नररत्नो! विग्रह या वैर-विरोधको अपनेसे दूर ही रखकर सबका प्रिय करते हुए मैं संसारमें निन्दाका पात्र नहीं हो सकूँगा”

হে নরশ্রেষ্ঠ! বিবাদ-বৈরকে দূরে সরিয়ে রেখে, সকলের প্রিয় ও মধুর আচরণ করেই আমি লোকসমাজে নিন্দার পাত্র হব না।

Verse 30

भ्रातुर्ज्येष्स्य वचनं पाण्डवा: संनिशम्य तत्‌ | तमेव समवर्तन्त धर्मराजहिते रता:,अपने बड़े भाईकी वह बात सुनकर सब पाण्डव उन्हींके हितमें तत्पर हो सदा उनका ही अनुसरण करने लगे

জ্যেষ্ঠ ভ্রাতার সেই বাক্য শুনে সকল পাণ্ডব ধর্মরাজের মঙ্গলকামনায় নিবিষ্ট হয়ে কেবল তাঁরই অনুসরণ করতে লাগল।

Verse 31

संसत्सु समयं कृत्वा धर्मराड्‌ भ्रातृभि: सह | पितृंस्तर्प्प यथान्यायं देवताश्न विशाम्पते,राजन! धर्मराजने अपने भाइयोंके साथ भरी सभामें यह प्रतिज्ञा करके देवताओं तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण किया

হে রাজন! ভরা সভায় শপথ গ্রহণ করে ধর্মরাজ তাঁর ভ্রাতৃগণের সঙ্গে বিধিমতো দেবতাদের ও পিতৃপুরুষদের তर्पণ করলেন।

Verse 32

कृतमड़लकल्याणो भ्रातृभि: परिवारित: । गतेषु क्षत्रियेन्द्रेषु सर्वेषु भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! समस्त क्षत्रियोंक चले जानेपर कल्याणमय मांगलिक कृत्य पूर्ण करके भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने मन्त्रियोंक साथ अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया। महाराज! दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि ये दोनों उस रमणीय सभामें ही रह गये

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সকল প্রধান ক্ষত্রিয়রাজ চলে গেলে, মঙ্গলময় আচার সম্পন্ন করে ভ্রাতৃবেষ্টিত রাজা যুধিষ্ঠির মন্ত্রীদের সঙ্গে নিজ উৎকৃষ্ট নগরে প্রবেশ করলেন। কিন্তু মহারাজ! দুর্যোধন ও সুবলপুত্র শকুনি সেই মনোরম সভাগৃহেই রয়ে গেল—বাহ্য শিষ্টতার আড়ালে অন্তরের অভিসন্ধির অশুভ ইঙ্গিত যেন।

Verse 33

युधिष्ठिर: सहामात्य: प्रविवेश पुरोत्तमम्‌ दुर्योधनो महाराज शकुनिश्चापि सौबल: । सभायां रमणीयायां तत्रैवास्ते नराधिप,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! समस्त क्षत्रियोंक चले जानेपर कल्याणमय मांगलिक कृत्य पूर्ण करके भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने मन्त्रियोंक साथ अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया। महाराज! दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि ये दोनों उस रमणीय सभामें ही रह गये

বৈশম্পায়ন বললেন—যুধিষ্ঠির মন্ত্রীদের সঙ্গে নিজ উৎকৃষ্ট নগরে প্রবেশ করলেন। কিন্তু মহারাজ! দুর্যোধন ও সৌবল শকুনি সেই মনোরম সভাগৃহেই সেখানেই বসে রইল। এই পংক্তি ন্যায়সম্মত শাসনের পথে প্রত্যাবর্তনকারী রাজার সঙ্গে, শীঘ্রই যে দু’জন সেই সভাকে প্রতারণা ও নৈতিক পতনের মঞ্চ করবে—তাদের স্থবির উপস্থিতির সূক্ষ্ম বৈপরীত্য তুলে ধরে।

Verse 46

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरसमये षट्चत्वारिंशो5ध्याय: ।। ४६ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्वूतपर्वमें युधिष्ठिर-प्रतिज्ञाविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দ্যূতপর্বে যুধিষ্ঠির-প্রসঙ্গের ছেচল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 66

अभिवाद्योपसंगृह्‌ पितामहमथाब्रवीत्‌ । “राजन! अब मैं जाऊँगा। इसके लिये तुम्हारी अनुमति चाहता हूँ। तुमने मेरा अच्छी तरह सम्मान किया है।' महात्मा कृष्णद्वैपायन व्यासके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्छिरने उन पितामहके दोनों चरणोंको पकड़कर प्रणाम किया और कहा

তারপর পিতামহ (ব্যাস)কে প্রণাম করে বিদায় গ্রহণের প্রসঙ্গে তিনি বললেন—“রাজন! এখন আমি যেতে চাই; আপনার অনুমতি প্রার্থনা করি। আপনি আমাকে যথাযথ সম্মান দিয়েছেন।” মহাত্মা কৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাস এ কথা বললে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির পিতামহের দুই চরণ ধরে প্রণাম করে বললেন—

Verse 73

तस्य नान्यो<स्ति वक्ता वै त्वामृते द्विजपुड़व । युधिष्ठिर बोले--नरश्रेष्ठ! मेरे मनमें एक भारी संशय उत्पन्न हो गया है। विप्रवर! आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उसका समाधान कर सके

যুধিষ্ঠির বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! আমার মনে এক গুরুতর সংশয় উদ্ভূত হয়েছে। হে ব্রহ্মর্ষিশ্রেষ্ঠ! আপনার ব্যতীত এখানে আর কেউ নেই, যে কথার দ্বারা তা দূর করতে পারে।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether state leadership should privilege prudent counsel and social cohesion by rejecting dyūta, or permit a prestige-driven contest that predictably produces factional division and institutional harm.

The chapter teaches that envy and reputational injury, when ungoverned, can override welfare-oriented reasoning; wise counsel is identifiable by its long-term, stability-centered orientation rather than by its alignment with immediate desires.

No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the meta-function is causal and diagnostic—positioning dyūta and unrestrained resentment as roots of systemic collapse within the epic’s broader dharma inquiry.