
Śakuni–Duryodhana-saṃvāda: Dyūta-yojanā (Śakuni and Duryodhana on Planning the Dice-Game)
Upa-parva: Dyūta-prastāva (Prelude to the Dice-Game)
Chapter 44 records a strategic dialogue in which Śakuni addresses Duryodhana’s agitation toward Yudhiṣṭhira. Śakuni first normalizes the Pāṇḍavas’ prosperity as their rightful share and notes the concrete sources of their strength: alliances (Draupadī and Drupada with sons), support networks, and the prestige of a well-built sabhā associated with Maya and extraordinary attendants. He then corrects Duryodhana’s claim of Pāṇḍava ‘lack of support’ by listing Kaurava-side champions, yet immediately cautions that the Pāṇḍavas and their allies are not readily defeatable by force. The chapter’s pivot is Śakuni’s proposal of an alternative victory-condition: exploit Yudhiṣṭhira’s fondness for dyūta and his inability to refuse a formal challenge, coupled with Śakuni’s own expertise in play. Duryodhana accepts the plan, foreseeing total political gain (land, kings, and the sabhā’s wealth), and urges Śakuni to present the proposal to Dhṛtarāṣṭra according to courtly propriety.
Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की सभा में शिशुपाल, भीष्म के कृष्ण-स्तवन से चिढ़कर कटु वचन बरसाता है और सभा की मर्यादा को चुनौती देता है। → वह भीष्म को अपमानित करता, कृष्ण की प्रशंसा को ‘अतिशयोक्ति’ बताकर अनेक राजाओं (द्रोण, अश्वत्थामा, जयद्रथ, दन्तवक्र, भगदत्त आदि) के पराक्रम गिनाता है और प्रश्न उठाता है कि केशव को सर्वोच्च क्यों माना जाए। भीमसेन सहित पाण्डव-पक्ष में रोष उमड़ता है; राजाओं के बीच भी उथल-पुथल फैलती है। → शिशुपाल उन्मत्त होकर राजाओं को उकसाता है—‘भीष्म को पशुवत् मारो या आग में जला दो’—और अंततः कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारता है, ‘चक्र-गदा-धारी गोविन्द को आज रण में लाओ।’ → भीष्म शिशुपाल की बुद्धि-भ्रष्टता को ‘काल-ग्रस्त’ कहकर उसकी उग्रता का अर्थ खोलते हैं और संकेत देते हैं कि शिशुपाल का तेज स्वयं हरि का अंश होकर भी अब विनाश की ओर दौड़ रहा है; सभा का नैतिक केंद्र कृष्ण की ओर स्थिर हो जाता है। → कृष्ण को खुले युद्ध-आह्वान के बाद सभा श्वास रोके है—क्या अब यज्ञ-सभा ही रणभूमि बनेगी और शिशुपाल का अंत यहीं होगा?
Verse 1
ऑपन-माज बक। ्-ज:डिडिअ चतुश्नत्वारिशो< ध्याय: भीष्मकी बातोंसे चिढ़े हुए शिशुपालका उन्हें फटकारना तथा भीष्मका श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये समस्त राजाओंको चुनौती देना भीष्म उवाच नैषा चेदिपते्ुद्धिर्यया त्वा55ह्दयतेड्च्युतम् । नूनमेष जगद्धरतुः कृष्णस्यैव विनिश्चय:,भीष्मजी कहते हैं--भीमसेन यह चेदिराज शिशुपालकी बुद्धि नहीं है, जिसके द्वारा वह युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले तुम-जैसे महावीरको ललकार रहा है, अवश्य ही सम्पूर्ण जगतके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णका ही यह निश्चित विधान है
ভীষ্ম বললেন—হে চেদিরাজ! যে বুদ্ধিতে তুমি অচ্যুত কৃষ্ণকে উসকাচ্ছ, তা তোমার নিজের নয়। নিশ্চয়ই এ জগদ্ধারী কৃষ্ণেরই স্থির বিধান।
Verse 2
को हि मां भीमसेनाद्य क्षितावहति पार्थिव: | क्षेप्तुं कालपरीतात्मा यथैष कुलपांसन:,भीमसेन! कालने ही इसके मन और बुद्धिको ग्रस लिया है, अन्यथा इस भूमण्डलमें कौन ऐसा राजा होगा, जो मुझपर इस तरह आक्षेप कर सके, जैसे यह कुलकलंक शिशुपाल कर रहा है
ভীষ্ম বললেন—হে ভীমসেন! আজ এই পৃথিবীতে কোন রাজা আমার প্রতি এমন নিন্দা ছুঁড়তে পারে? কেবল যার মন কাল (ভাগ্য) গ্রাস করেছে—যেমন এই বংশকলঙ্ক শিশুপাল করছে।
Verse 3
एष हास्य महाबाहुस्तेजों5शश्न हरेर्धुवम् । तमेव पुनरादातुमिच्छत्युत तथा विभु:,यह महाबाहु चेदिराज निश्चय ही भगवान् श्रीकृष्णके तेजका अंश है। ये सर्वव्यापी भगवान् अपने उस अंशको पुनः समेट लेना चाहते हैं
ভীষ্ম বললেন—এই মহাবাহু চেদিরাজ নিশ্চিতই হরির তেজের এক অংশ। আর এখন সেই সর্বব্যাপী প্রভু সেই অংশটিকেই পুনরায় প্রত্যাহার করতে চান।
Verse 4
येनैष कुरुशार्दूल शार्दूल इव चेदिराट् गर्जत्यतीव दुर्बुद्धि: सर्वानस्मानचिन्तयन्,कुरुसिंह भीम! यही कारण है कि यह दुर्बुद्धि शिशुपाल हम सबको कुछ न समझकर आज सिंहके समान गरज रहा है
ভীষ্ম বললেন—হে কুরুদের ব্যাঘ্র ভীম! এই কারণেই চেদিরাজ শিশুপাল, মূঢ়বুদ্ধি হয়ে, আমাদের সকলকে তুচ্ছ জেনে আজ সিংহের মতো প্রবল গর্জন করছে।
Verse 5
वैशम्पायन उवाच ततो न ममृषे चैद्यस्तद् भीष्मवचनं तदा । उवाच चैन संक्रुद्धः पुनर्भीष्ममथोत्तरम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मकी यह बात शिशुपाल न सह सका। वह पुनः अत्यन्त क्रोधमें भरकर भीष्मको उनकी बातोंका उत्तर देते हुए बोला
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন চৈদ্য (শিশুপাল) ভীষ্মের সেই বাক্য সহ্য করতে পারল না। ক্রোধে দগ্ধ হয়ে সে আবার ভীষ্মকে প্রত্যুত্তর দিল।
Verse 6
शिशुपाल उवाच द्विषतां नोअस्तु भीष्मैष प्रभाव: केशवस्थ यः । यस्य संस्तववक्ता त्वं वन्दिवत् सततोत्थित:,शिशुपालने कहा--भीष्म! तुम सदा भाटकी तरह खड़े होकर जिसकी स्तुति गाया करते हो, उस कृष्णका जो प्रभाव है, वह हमारे शत्रुओंके पास ही रहे
শিশুপাল বলল—হে ভীষ্ম! যার (কেশবের) স্তব তুমি সদা ভাটের মতো দাঁড়িয়ে গাও, তার এই প্রভাব আমাদের নয়; তা আমাদের শত্রুদের কাছেই থাকুক।
Verse 7
संस्तवे च मनो भीष्म परेषां रमते यदि । तदा संस्तौषि राज्ञस्त्वमिमं हित्वा जनार्दनम्,भीष्म! यदि तुम्हारा मन सदा दूसरोंकी स्तुतिमें ही लगता है तो इस जनार्दनको छोड़कर इन राजाओंकी ही स्तुति करो
শিশুপাল বলল—হে ভীষ্ম! যদি তোমার মন সত্যিই পরের স্তবেই রমে, তবে জনার্দনকে ছেড়ে এই রাজাদেরই প্রশংসা করো।
Verse 8
दरदं स्तुहि बाह्लीकमिमं पार्थिवसत्तमम् | जायमानेन येनेयमभवद् दारिता मही,ये दरददेशके राजा हैं, इनकी स्तुति करो। ये भूमिपालोंमें श्रेष्ठ बाह्नीक बैठे हैं, इनके गुण गाओ। इन्होंने जन्म लेते ही अपने शरीरके भारसे इस पृथ्वीको विदीर्ण कर दिया था
শিশুপাল বলল—দরদকে স্তব করো, আর এই পার্থিবশ্রেষ্ঠ বাহ্লীককে প্রশংসা করো। তার গুণগান করো—যার জন্মমুহূর্তেই নাকি তার ভারে পৃথিবী বিদীর্ণ হয়েছিল।
Verse 9
वड़ाड्रविषयाध्यक्षं सहस्राक्षसमं बले | स्तुहि कर्णमिमं भीष्म महाचापविकर्षणम्,भीष्म! ये जो वंग और अंग दोनों देशोंके राजा हैं, इन्द्रके समान बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं तथा महान् धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेवाले हैं, इन वीरवर कर्णकी कीर्तिका गान करो
শিশুপাল বলল—হে ভীষ্ম! বঙ্গ ও অঙ্গ দেশের অধিপতি, বল-পরাক্রমে সহস্রনেত্র ইন্দ্রের সমান, মহাধনুকের জ্যা টানতে সক্ষম এই কর্ণের কীর্তি গাও।
Verse 10
यस्येमे कुण्डले दिव्ये सहजे देवनिर्मिते । कवचं च महाबाहो बालार्कसदृशप्रभम्,महाबाहो! इन कर्णके ये दोनों दिव्य कुण्डल जन्मके साथ ही प्रकट हुए हैं। किसी देवताने ही इन कुण्डलोंका निर्माण किया है। कुण्डलोंके साथ-साथ इनके शरीरपर यह दिव्य कवच भी जन्मसे ही पैदा हुआ है, जो प्रातःकालके सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है
মহাবাহো! কর্ণের এই দুই দিব্য কুণ্ডল জন্মলগ্নেই প্রকাশিত, দেবনির্মিত; আর সঙ্গে সঙ্গে জন্মজাত এই দিব্য কবচও আছে, যা প্রভাতসূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান।
Verse 11
वासवप्रतिमो येन जरासंधो$तिदुर्जय: । विजितो बाहुयुद्धेन देहभेदं च लम्भित:,जिन्होंने इन्द्रके तुल्य पराक्रमी तथा अत्यन्त दुर्जय जरासंधको बाहुयुद्धके द्वारा केवल परास्त ही नहीं किया, उनके शरीरको चीर भी डाला, उन भीमसेनकी स्तुति करो
যাঁর দ্বারা বাসবসম পরাক্রমী ও অতিদুর্জয় জরাসন্ধ বাহুযুদ্ধে পরাভূত হল এবং দেহবিদারণও প্রাপ্ত হল—সেই ভীমসেনের স্তব করো।
Verse 12
द्रोणं द्रौर्णिं च साधु त्वं पितापुत्रौ महारथौ । स्तुहि स्तुत्यावुभी भीष्म सततं द्विजसत्तमौ,द्रोणाचार्य और अभश्वत्थामा दोनों पिता-पुत्र महारथी हैं तथा ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ हैं, अतएव स्तुत्य भी हैं। भीष्म! तुम उन दोनोंकी अच्छी तरह स्तुति करो
দ্রোণ ও দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা—এই পিতা-পুত্র যুগল মহারথী এবং দ্বিজদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ; অতএব স্তবযোগ্য। ভীষ্ম! তুমি তাঁদের উভয়েরই যথোচিত প্রশংসা করো।
Verse 13
ययोरन्यतरो भीष्म संक़ुद्ध: सचराचराम् | इमां वसुमतीं कुर्यान्नि:शेषामिति मे मति:,भीष्म! इन दोनों पिता-पुत्रोंमेंसे यदि एक भी अत्यन्त क्रोधमें भर जाय, तो चराचर प्राणियोंसहित इस सारी पृथ्वीको नष्ट कर सकता है, ऐसा मेरा विश्वास है
ভীষ্ম! ঐ পিতা-পুত্র দুজনের মধ্যে যদি একজনও প্রবল ক্রোধে উদ্দীপ্ত হয়, তবে চল-অচল সকল প্রাণীসহ এই সমগ্র পৃথিবীকে নিঃশেষ করতে পারে—এমনই আমার মত।
Verse 14
द्रोणस्य हि सम॑ युद्धे न पश्यामि नराधिपम् । नाश्वृत्थाम्न: समं भीष्म न च तौ स्तोतुमिच्छसि,भीष्म! मुझे तो कोई भी ऐसा राजा नहीं दिखायी देता, जो युद्धमें द्रोण अथवा अश्वत्थामाकी बराबरी कर सके। तो भी तुम इन दोनोंकी स्तुति करना नहीं चाहते
ভীষ্ম! যুদ্ধে দ্রোণের সমান কোনো নরাধিপকে আমি দেখি না; অশ্বত্থামার সমানও কাউকে দেখি না। তবু তুমি তাঁদের দুজনেরই স্তব করতে চাও না।
Verse 15
पृथिव्यां सागरान्तायां यो वै प्रतिसमो भवेत् | दुर्योधन त्वं राजेन्द्रमतिक्रम्य महाभुजम्,इस समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर जो अद्वितीय अनुपम वीर हैं, उन राजाधिराज महाबाहु दुर्योधनको, अस्त्रविद्यामें निपुण और सुदृढ़पराक्रमी राजा जयद्रथको और विश्वविख्यात विक्रमशाली महाबली किम्पुरुषा-चार्य ट्रमको छोड़कर तुम कृष्णकी प्रशंसा क्यों करते हो?
সমুদ্রবেষ্টিত এই পৃথিবীতে যদি কারও সমকক্ষ কেউ থাকে, তবে রাজাধিরাজ মহাবাহু দুর্যোধনকে উপেক্ষা করে তুমি কেন কেশবের প্রশংসা করছ?
Verse 16
जयद्रथं च राजानं कृतास्त्रं दृढविक्रमम् । द्रुमं किम्पुरुषाचार्य लोके प्रथितविक्रमम् । अतिक्रम्य महावीर्य कि प्रशंससि केशवम्,इस समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर जो अद्वितीय अनुपम वीर हैं, उन राजाधिराज महाबाहु दुर्योधनको, अस्त्रविद्यामें निपुण और सुदृढ़पराक्रमी राजा जयद्रथको और विश्वविख्यात विक्रमशाली महाबली किम्पुरुषा-चार्य ट्रमको छोड़कर तुम कृष्णकी प्रशंसा क्यों करते हो?
অস্ত্রবিদ্যায় প্রশিক্ষিত ও দৃঢ় পরাক্রমী রাজা জয়দ্রথকে, আর জগতে খ্যাত বীর্যবান কিম্পুরুষ-আচার্য দ্রুমকে উপেক্ষা করে, হে মহাবীর্য, তুমি কেন কেশবের প্রশংসা করছ?
Verse 17
वृद्धं च भारताचार्य तथा शारद्वतं कृपम् । अतिक्रम्य महावीर्य कि प्रशंससि केशवम्,शरद्वान् मुनिके पुत्र महापराक्रमी कृप भरतवंशके वृद्ध आचार्य हैं। इनका उल्लंघन करके तुम कृष्णका गुण क्यों गाते हो?
ভারতদের বৃদ্ধ আচার্যকে এবং শারদ্বত কৃপকে উপেক্ষা করে, হে মহাবীর্য, তুমি কেন কেশবের প্রশংসা করছ?
Verse 18
धनुर्धराणां प्रवरं रुक्मिणं पुरुषोत्तमम् अतिक्रम्य महावीरय॑ कि प्रशंससि केशवम्,धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ पुरुषरत्न महाबली रुक्मीकी अवहेलना करके तुम केशवकी प्रशंसाके गीत क्यों गाते हो?
ধনুর্ধরদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, পুরুষোত্তম মহাবলী রুক্মীকে উপেক্ষা করে তুমি কেন কেশবের প্রশংসা করছ?
Verse 19
भीष्मकं च महावीर्य दन््तवक्रं च भूमिपम् । भगदत्तं यूपकेतुं जयत्सेनं च मागधम्
মহাবীর্য ভীষ্মককে, ভূমিপ দন্তবক্রকে, ভগদত্তকে, ইউপকেতুকে এবং মগধের জয়ৎসেনকেও (কীভাবে উপেক্ষা করা যায়)?
Verse 20
विराटद्रुपदौ चोभौ शकुनिं च बृहद्धलम् । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पाण्ड्यं श्वेतमथोत्तरम्
বিরাট ও দ্রুপদ—উভয়ই; আর শকুনি ও বৃহদ্ধল; অবন্তীর বিন্দ ও অনুবিন্দ; পাণ্ড্যরাজ, শ্বেত এবং পরে উত্তর—(এদেরও স্মরণ করো)।
Verse 21
शड़्खं च सुमहाभागं वृषसेनं च मानिनम् । एकलव्यं च विक्रान्तं कालिडूं च महारथम्
আর মহাভাগ্যবান শঙ্খ; অহংকারী বৃষসেন; পরাক্রান্ত একলব্য; এবং মহারথী কালিডূ—(এদেরও)।
Verse 22
अतिक्रम्य महावीर कि प्रशंससि केशवम् । महापराक्रमी भीष्मक, भूमिपाल दन्तवक्र, भगदत्त, यूपकेतु, जयत्सेन, मगधराज सहदेव, विराट, द्रुपद, शकुनि, बृहद्धल, अवन्तीके राजकुमार विन्द-अनुविन्द, पाण्ड्यनरेश, श्वेत, उत्तर, महाभाग शंख, अभिमानी वृषसेन, पराक्रमी एकलव्य तथा महारथी एवं महाबली कलिंगनरेशकी अवहेलना करके कृष्णकी प्रशंसा क्यों कर रहे हो? ।। १९--२१ $ || शल्यादीनपि कस्मात् त्वं न सतौषि वसुधाधिपान् । स्तवाय यदि ते बुद्धिर्वर्तते भीष्म सर्वदा,भीष्म! यदि तुम्हारा मन सदा दूसरोंकी स्तुति करनेमें ही लगता है तो इन शल्य आदि श्रेष्ठ राजाओंकी स्तुति क्यों नहीं करते?
হে মহাবীর! এতসব প্রসিদ্ধ রাজাকে অতিক্রম করে তুমি কেন কেশবের প্রশংসা করছ? ভীষ্মক, দন্তবক্র, ভাগদত্ত, যূপকেতু, জয়ৎসেন, মগধরাজ সহদেব, বিরাট, দ্রুপদ, শকুনি, বৃহদ্ধল, অবন্তীর রাজপুত্র বিন্দ ও অনুবিন্দ, পাণ্ড্যরাজ, শ্বেত, উত্তর, মহাভাগ শঙ্খ, অহংকারী বৃষসেন, পরাক্রান্ত একলব্য এবং মহাবলী কলিঙ্গরাজ—যিনি মহারথী—এদের সকলকে উপেক্ষা করে তুমি মধুসূদনের স্তব করছ কেন? আর ভীষ্ম! যদি তোমার বুদ্ধি সর্বদা স্তবেই প্রবৃত্ত থাকে, তবে শল্য প্রভৃতি অন্যান্য ভূমিপালদের প্রশংসা কর না কেন?
Verse 23
कि हि शक्यं मया कर्तु यद् वृद्धानां त्वया नृप । पुरा कथयतां नून॑ न श्रुतं धर्मवादिनाम्,भीष्म! तुमने पहले बड़े-बूढ़े धर्मोपदेशकोंके मुखसे यदि यह धर्मसंगत बात, जिसे मैं अभी बताऊँगा नहीं सुनी, तो मैं क्या कर सकता हूँ?
হে নৃপ! যদি তুমি পূর্বে বৃদ্ধ ধর্মবক্তাদের মুখ থেকে এ কথা নিশ্চয়ই না শুনে থাকো, তবে আমি কীই বা করতে পারি?
Verse 24
आत्मनिन्दा55त्मपूजा च परनिन्दा परस्तव: । अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम्,भीष्म! अपनी निन्दा, अपनी प्रशंसा, दूसरेकी निन््दा और दूसरेकी स्तुति--ये चार प्रकारके कार्य पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने कभी नहीं किये हैं
আত্মনিন্দা, আত্মপ্রশংসা, পরনিন্দা ও পরস্তব—এই চার প্রকার আচরণ আর্যদের দ্বারা কখনও আচরিত হয়নি।
Verse 25
यदस्तव्यमिमं शश्वन्मोहात् संस्तौषि भक्तित: | केशवं तच्च ते भीष्म न कश्चिदनुमन्यते,भीष्म! जो स्तुतिके सर्वथा अयोग्य है, उसी केशवकी तुम मोहवश सदा भक्तिभावसे जो स्तुति करते रहते हो, उसका कोई अनुमोदन नहीं करता
শিশুপাল বলল—ভীষ্ম! মোহবশত ভক্তিভাবে তুমি যাঁকে বারবার স্তব কর, সেই কেশব প্রকৃতপক্ষে স্তবের অযোগ্য। তোমার সেই স্তবকে কেউই সমর্থন করে না।
Verse 26
कथं भोजस्य पुरुषे वर्गपाले दुरात्मनि । समावेशयसे सर्व जगत् केवलकाम्यया,दुरात्मा कृष्ण तो राजा कंसका सेवक है, उनकी गौओंका चरवाहा रहा है। तुम केवल स्वार्थवश इसमें सारे जगत्का समावेश कर रहे हो
শিশুপাল বলল—ভোজবংশজাত সেই দুষ্ট, নীচ লোকের মধ্যে তুমি কেবল স্বার্থপর কামনায় কীভাবে সমগ্র জগতের সম্মান আরোপ করছ—যে তো কেবল গোপাল, তুচ্ছ গো-রক্ষক মাত্র?
Verse 27
अथ चैषा न ते बुद्धि: प्रकृतिं याति भारत । मयैव कथित पूर्व भूलिड्रशकुनिर्यथा,भारत! तुम्हारी बुद्धि ठिकानेपर नहीं आ रही है। मैं यह बात पहले ही बता चुका हूँ कि तुम भूलिंग पक्षीके समान कहते कुछ और करते कुछ हो
তবু হে ভারত! তোমার বুদ্ধি স্বাভাবিক অবস্থায় ফিরে আসে না। আমি আগেই বলেছি—তুমি ভূলিঙ্গ পাখির মতো; মুখে এক কথা, কাজে আরেক।
Verse 28
भूलिड्शशकुनिर्नाम पाश्वे हिमवतः परे । भीष्म तस्या: सदा वाच: श्रूयन्ते<र्थविगर्हिता:,भीष्म! हिमालयके दूसरे भागमें भूलिंग नामसे प्रसिद्ध एक चिड़िया रहती है। उसके मुखसे सदा ऐसी बात सुनायी पड़ती है, जो उसके कार्यके विपरीत भावकी सूचक होनेके कारण अत्यन्त निन्दनीय जान पड़ती है
শিশুপাল বলল—ভীষ্ম! হিমবতের ওপারে এক ‘ভূলিঙ্গ’ নামে পাখি আছে। তার মুখে সর্বদা এমন বাক্য শোনা যায়, যার অর্থ নিন্দনীয়।
Verse 29
मा साहसमितीदं सा सततं वाशते किल । साहसं चात्मनातीव चरन्ती नावबुध्यते,वह चिड़िया सदा यही बोला करती है--“मा साहसम' (अर्थात् साहसका काम न करो), परंतु वह स्वयं ही भारी साहसका काम करती हुई भी यह नहीं समझ पाती
সে নাকি সর্বদা চিৎকার করে—“সাহস কোরো না!” অথচ নিজে ভীষণ দুঃসাহসিক কাজ করেও তা বুঝতে পারে না।
Verse 30
सा हि मांसार्गलं भीष्म मुखात् सिंहस्य खादत: । दन्तान्तरविलग्नं यत् तदादत्तेडल्पचेतना,भीष्म! वह मूर्ख चिड़िया मांस खाते हुए सिंहके दाँतोंमें लगे हुए मांसके टुकड़ेको अपनी चोंचसे चुगती रहती है
হে ভীষ্ম! ‘মাংসার্গলা’ নামে সেই মন্দবুদ্ধি পাখিটি সিংহ আহার করতে থাকলে তার দাঁতের ফাঁকে আটকে থাকা মাংসের টুকরো ঠোঁট দিয়ে খুঁটে খায়।
Verse 31
इच्छत: सा हि सिंहस्य भीष्म जीवत्यसंशयम् | तद्वत् त्वमप्यधर्मिष्ठ सदा वाच: प्रभाषसे,निःसंदेह सिंहकी इच्छासे ही वह अबतक जी रही है। पापी भीष्म! इसी प्रकार तुम भी सदा बढ़-बढ़कर बातें करते हो
হে ভীষ্ম! নিঃসন্দেহে সে সিংহের ইচ্ছাতেই আজও বেঁচে আছে; তেমনি হে অধর্মিষ্ঠ, তুমিও বারবার উদ্ধত বাক্য উচ্চারণ করছ।
Verse 32
इच्छतां भूमिपालानां भीष्म जीवस्यसंशयम् | लोकविद्धिष्टकर्मा हि नान्यो5स्ति भवता सम:,भीष्म! निःसंदेह तुम्हारा जीवन इन राजाओंकी इच्छासे ही बचा हुआ है; क्योंकि तुम्हारे समान दूसरा कोई राजा ऐसा नहीं है, जिसके कर्म सम्पूर्ण जगतसे द्वेष करनेवाले हों
হে ভীষ্ম! নিঃসন্দেহে এই রাজাদের ইচ্ছাতেই তোমার প্রাণ রক্ষা পেয়েছে; কারণ তোমার সমান আর কোনো নৃপ নেই—যার কর্ম সমগ্র জগতে বিদ্বেষজনক ও কুখ্যাত।
Verse 33
वैशम्पायन उवाच ततश्रेदिपते: श्रुत्वा भीष्म: स कटुकं वच: । उवाचेदं वचो राजंश्रेदिराजस्य शृण्वत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शिशुपालका यह कटु वचन सुनकर भीष्मजीने शिशुपालके सुनते हुए यह बात कही--
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! শ্রেদির অধিপতি শিশুপালের সেই তিক্ত বাক্য শুনে ভীষ্ম, শ্রেদিরাজার শুনতে শুনতে, রাজার প্রতি এই কথা বললেন।
Verse 34
इच्छतां किल नामाहं जीवाम्येषां महीक्षिताम् । सो<5हं न गणयाम्येतांस्तृणेनापि नराधिपान्,“अहो! शिशुपालके कथनानुसार मैं इन राजाओंकी इच्छापर जी रहा हूँ; परंतु मैं तो इन समस्त भूपालोंको तिनके-बराबर भी नहीं समझता”
“আহা! শিশুপালের কথামতে আমি নাকি এই রাজাদের ইচ্ছায় বেঁচে আছি; কিন্তু আমি তো এই নরাধিপদের তৃণসমও গণ্য করি না।”
Verse 35
एवमुक्ते तु भीष्मेण ततः संचुक्रुशुर्न॒पा: । केचिज्जह्ृषिरे तत्र केचिद् भीष्मं॑ जगहिरे,भीष्मके ऐसा कहनेपर बहुत-से राजा कुपित हो उठे। कुछ लोगोंको हर्ष हुआ तथा कुछ भीष्मजीकी निन्दा करने लगे
ভীষ্ম এমন কথা বলতেই বহু রাজা উত্তেজিত হয়ে চিৎকার করে উঠল। কেউ কেউ আনন্দিত হল, আর কেউ ভীষ্মকে নিন্দা করতে লাগল।
Verse 36
केचिदूचुर्महेष्वासा: श्रुत्वा भीष्मस्य तद् वच: । पापो5वलिप्तो वृद्धश्न नायं भीष्मो$्हति क्षमाम्,कुछ महान् धनुर्धर नरेश भीष्मकी वह बात सुनकर कहने लगे--“यह बूढ़ा भीष्म पापी और घमण्डी है; अत: क्षमाके योग्य नहीं है
ভীষ্মের সেই কথা শুনে কতক মহাধনুর্ধর রাজা বলল—“এই বৃদ্ধ ভীষ্ম পাপী ও অহংকারী; অতএব সে ক্ষমার যোগ্য নয়।”
Verse 37
हन्यतां दुर्मतिर्भीष्म: पशुवत् साध्वयं नृपा: । सर्वे: समेत्य संरब्धैर्दहुतां वा कटाग्निना,“राजाओ! क्रोधमें भरे हुए हम सब लोग मिलकर इस खोटी बुद्धिवाले भीष्मको पशुकी भाँति गला दबाकर मार डालें अथवा घास-फूसकी आगमें इसे जीते-जी जला दें”
“হে রাজাগণ! ক্রোধে উন্মত্ত আমরা সকলে একত্র হয়ে এই কুমতিসম্পন্ন ভীষ্মকে পশুর মতো শ্বাসরোধ করে হত্যা করি; অথবা শুকনো ঘাসের আগুনে একে জীবন্ত দগ্ধ করি।”
Verse 38
इति तेषां वच: श्रुत्वा ततः कुरुपितामह: । उवाच मतिमान् भीष्मस्तानेव वसुधाधिपान्,उन राजाओंकी ये बातें सुनकर कुरुकुलके पितामह बुद्धिमान् भीष्मजी फिर उन्हीं नरेशोंसे बोले--
সেই রাজাদের কথা শুনে কুরুবংশের পিতামহ, বুদ্ধিমান ভীষ্ম, আবার সেই ভূ-অধিপতিদেরই উদ্দেশ করে বললেন।
Verse 39
उक्तस्योक्तस्य नेहान्तमहं समुपलक्षये । यत् तु वक्ष्यामि तत् सर्व शृणुध्वं वसुधाधिपा:,“राजाओ! यदि मैं सबकी बातका अलग-अलग उत्तर दूँ तो यहाँ उसकी समाप्ति होती नहीं दिखायी देती। अतः मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह सब ध्यान देकर सुनो
“হে ভূ-অধিপতিরা! একেকটি কথার একেকটি উত্তর দিতে গেলে এখানে তার শেষ আমি দেখতে পাই না। অতএব আমি যা বলব, তা সব মনোযোগ দিয়ে শোন।”
Verse 40
पशुवद् घातनं वा मे दहनं वा कटाग्निना | क्रियतां मूर्थ्नि वो न्यस्तं मयेदं सकल॑ पदम्,“तुमलोगोंमें साहस या शक्ति हो, तो पशुकी भाँति मेरी हत्या कर दो अथवा घास- फ़ूसकी आगमें मुझे जला दो। मैंने तो तुमलोगोंके मस्तकपर अपना यह पूरा पैर रख दिया
বৈশম্পায়ন বললেন—যদি তোমাদের সাহস বা শক্তি থাকে, তবে পশুর মতো আমাকে হত্যা করো, অথবা শুকনো ঘাস-খড়ের আগুনে আমাকে দগ্ধ করো; কারণ আমি তো তোমাদের মস্তকের উপর আমার সম্পূর্ণ পদ স্থাপন করেছি।
Verse 41
एष तिष्ठति गोविन्द: पूजितो<स्माभिरच्युत: । यस्य वस्त्वरते बुद्धिर्मरणाय स माधवम्,“हमने जिनकी पूजा की है, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले वे भगवान् गोविन्द तुमलोगोंके सामने मौजूद हैं। तुमलोगोंमेंसे जिसकी बुद्धि मृत्युका आलिंगन करनेके लिये उतावली हो रही हो, वह इन्हीं यदुकुल-तिलक चक्रगदाधर श्रीकृष्णको आज युद्धके लिये ललकारे और इनके हाथों मारा जाकर इन्हीं भगवानके शरीरमें प्रविष्ट हो जाय”
বৈশম্পায়ন বললেন—দেখো, আমাদের দ্বারা পূজিত, মহিমা থেকে কখনও বিচ্যুত নন এমন অচ্যুত গোবিন্দ এখানে দাঁড়িয়ে আছেন। তোমাদের মধ্যে যার বুদ্ধি মৃত্যুকে আলিঙ্গন করতে ব্যাকুল, সে আজ মাধবকে যুদ্ধে আহ্বান করুক; তাঁর হাতে নিহত হয়ে সে সেই প্রভুর দেহেই প্রবেশ করুক।
Verse 42
कृष्णमाह्दनयतामद्य युद्धे चक्रगदाधरम् । यादवस्यैव देवस्य देहं विशतु पातित:,“हमने जिनकी पूजा की है, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले वे भगवान् गोविन्द तुमलोगोंके सामने मौजूद हैं। तुमलोगोंमेंसे जिसकी बुद्धि मृत्युका आलिंगन करनेके लिये उतावली हो रही हो, वह इन्हीं यदुकुल-तिलक चक्रगदाधर श्रीकृष्णको आज युद्धके लिये ललकारे और इनके हाथों मारा जाकर इन्हीं भगवानके शरीरमें प्रविष्ट हो जाय”
বৈশম্পায়ন বললেন—যে আজ মৃত্যুকে আলিঙ্গন করতে চায়, সে চক্র ও গদাধারী কৃষ্ণকে যুদ্ধে আহ্বান করুক। তাঁর দ্বারা পতিত হয়ে সে সেই যাদব-দেবের দেহেই প্রবেশ করুক।
Verse 44
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि भीष्मवाक्ये चतुश्नत्वारिंशो5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের শিশুপালবধপর্বে ভীষ্মের বাক্য-প্রসঙ্গে চুয়াল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Whether a politically engineered contest can be treated as ethically valid merely because it appears voluntary and rule-governed—especially when one party’s known vulnerability (attachment to gaming and reluctance to refuse summons) is deliberately targeted.
The chapter warns that dharma can be undermined not only by overt force but also by procedural manipulation; ethical evaluation must consider intent, power asymmetry, and engineered compulsion, not only formal consent.
No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as causal scaffolding, clarifying how strategic counsel and institutional procedure initiate the later crisis central to the Sabhā Parva.