Adhyaya 4
Sabha ParvaAdhyaya 440 Verses

Adhyaya 4

Sabhā-praveśa, Dāna, and the Courtly Convergence (सभा-प्रवेशः दानं च)

Upa-parva: Sabhā-praveśa and Sabhā-upāsanā (Assembly Entry, Consecratory Hospitality, and Court Attendance)

Vaiśaṃpāyana narrates Yudhiṣṭhira’s entry into the assembly hall and the immediate establishment of auspicious order (puṇyāha). The king feeds an ayuta (ten-thousand) brāhmaṇas and distributes lavish provisions—ghṛta-pāyasa, honey, foods, roots and fruits—along with new garments and garlands. He gifts cattle in large numbers and performs worship, installing/propitiating deities within the hall. Over seven nights, performers (wrestlers, actors, bards, charioteer-bards) attend upon him, and the Pāṇḍava court is described as Indra-like in splendor. The chapter then catalogs the presence of eminent ṛṣis (including Kṛṣṇa Dvaipāyana Vyāsa and Śuka among many) seated with the Pāṇḍavas, and a wide range of visiting rulers from multiple regions. It also depicts cultured entertainment and musical performance: Tumburu, Citraseṇa, gandharvas, and apsarases coordinate song and instrumentality with measured rhythm and tempo, delighting the Pāṇḍavas and sages. The closing image frames Yudhiṣṭhira as being attended like Brahmā by devas—an ideological statement that kingship is validated through dharma, ritual propriety, and public concord.

Chapter Arc: मय-निर्मित अद्भुत सभाभवन में धर्मराज युधिष्ठिर का प्रवेश—जहाँ पृथ्वी के राजाओं की भीड़ और दिव्य-मानवी वैभव एक साथ उमड़ पड़ता है। → युधिष्ठिर अतिथियों का सत्कार करते हैं—घृत-मधु मिश्रित पायस, कूष्माण्ड/कृसर, हविष्य, विविध फल-भक्ष्य; फिर नये-नये वस्त्र, हार और उपहारों से दूर-दूर से आये विप्रों और राजाओं को तृप्त करते हैं। सभा में एक-एक कर अनेक नरेशों के नाम गूँजते हैं—किरात, यवन, शैब्य, शिशुपाल (सहपुत्र), करूँषाधिपति आदि—और पाण्डव-वैभव का सार्वजनिक प्रदर्शन बनता जाता है। → तुम्बुरु के संचोदन से गन्धर्व-किन्नर दिव्य तानों में गाते-बजाते हैं; और सभा में बैठे सत्यव्रती, सत्यसंगर पाण्डवों की उपासना ऐसे करते हैं जैसे देवगण ब्रह्मा की—युधिष्ठिर का तेज सभा-केन्द्र बनकर प्रकट होता है। → सभा ‘राजसूय-पूर्व’ की प्रतिष्ठा-भूमि बन जाती है: अतिथि-सत्कार, संगीत, और राजाओं की उपस्थिति से इन्द्रप्रस्थ की सार्वभौम गरिमा स्थापित होती है; युधिष्ठिर का राजधर्म—दान, सम्मान, और मर्यादा—सर्वत्र मान्य होता है। → इतना वैभव और सार्वजनिक प्रशंसा आगे चलकर ईर्ष्या की अग्नि को किसके हृदय में भड़काएगी—और यह सभा किस परीक्षा का द्वार बनेगी?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल ३८३ “लोक हैं) भीकम (2 अमान चतुथों5 ध्याय: मयद्वारा निर्मित सभाभवनमें धर्मराज युधिष्ठटिरका प्रवेश तथा सभामें स्थित महर्षियों और राजाओं आदिका वर्णन (वैशग्पायन उवाच तां तु कृत्वा सभां श्रेष्ठां मयश्लार्जुनमब्रवीत्‌ । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उस श्रेष्ठ सभाभवनका निर्माण करके मयासुरने अर्जुनसे कहा। मय उवाच एषा सभा सव्यसाचिन्‌ ध्वजो ह्वात्र भविष्यति ।। मयासुर बोला--सव्यसाचिन्‌! यह है आपकी सभा, इसमें एक ध्वजा होगी। भूतानां च महावीर्यों ध्वजाग्रे किड़करो गण: । तव विस्फारघोषेण मेघवन्निनदिष्यति ।। उसके अग्रभागमें भूतोंका महापराक्रमी किंकर नामक गण निवास करेगा। जिस समय तुम्हारे धनुषकी टंकारध्वनि होगी, उस समय उस ध्वनिके साथ ये भूत भी मेघोंके समान गर्जना करेंगे। अयं हि सूर्यसंकाशो ज्वलनस्य रथोत्तम: | इमे च दिविजा: श्वेता वीर्यवन्तो हयोत्तमा: ।। मायामय: कृतो होष ध्वजो वानरलक्षण: । असज्जमानो वृक्षेषु धूमकेतुरिवोच्छित: ।। यह जो सूर्यके समान तेजस्वी अग्निदेवका उत्तम रथ है और ये जो श्वेत वर्णवाले दिव्य एवं बलवान अश्वरत्न हैं तथा यह जो वानरचिह्नसे उपलक्षित ध्वज है, इन सबका निर्माण मायासे ही हुआ है। यह ध्वज वृक्षोंमें कहीं अटकता नहीं है तथा अग्निकी लपटोंके समान सदा ऊपरकी ओर ही उठा रहता है। बहुवर्ण हि लक्ष्येत ध्वजं वानरलक्षणम्‌ । ध्वजोत्कटं हाुनवमं युद्धे द्रक्ष्यसि विष्ठितम्‌ ।। आपका यह वानरचिह्वित ध्वज अनेक रंगका दिखायी देता है। आप युद्धमें इस उत्कट एवं स्थिर ध्वजको कभी झुकता नहीं देखेंगे। इत्युक्त्वा5डलिड्ग्य बीभत्सुं विसृष्ट: प्रययौ मय: ।) ऐसा कहकर मयासुरने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उनसे विदा लेकर (अभीष्ट स्थानको) चला गया। वैशम्पायन उवाच ततः प्रवेशनं तस्यां चक्रे राजा युधिष्ठिर: । अयुतं भोजयित्वा तु ब्राह्मणानां नराधिप:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति-भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय (शर्बत) आदि सामग्रियों-द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा-भवनमें प्रवेश किया

বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর রাজা যুধিষ্ঠির সেই সভাগৃহে প্রবেশ করলেন। কিন্তু প্রবেশের আগে নরাধিপ দশ হাজার ব্রাহ্মণকে ঘি-ও-মধু-মিশ্রিত পায়স, হব্য, নানাবিধ ভক্ষ্য, ফল, চোষ্য এবং প্রচুর পানীয় দ্বারা তৃপ্ত করে, তারপর সভায় পদার্পণ করলেন।

Verse 2

साज्येन पायसेनैव मधुना मिश्रितेन च । कूृसरेणाथ जीवन्त्या हविष्येण च सर्वश:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति-भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय (शर्बत) आदि सामग्रियों-द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा-भवनमें प्रवेश किया

ঘি-সমৃদ্ধ পায়স মধু মিশিয়ে, কৃসর (খিচুড়ি), জীবন্‌তী শাক এবং সর্বপ্রকার হব্য দ্বারা—বৈশম্পায়ন বললেন—এইসব দিয়ে রাজা যুধিষ্ঠির দশ হাজার ব্রাহ্মণকে তৃপ্ত করে তারপর সভাগৃহে প্রবেশ করলেন।

Verse 3

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापव॑के अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभानिर्माणविषयक तीयरा अध्याय पूरा हुआ,भनक्ष्यप्रकारैविंविधै: फलैश्वापि तथा नृप । चोष्यैश्न विविध राजन्‌ पेयैश्व बहुविस्तरै: वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति-भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय (शर्बत) आदि सामग्रियों-द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा-भवनमें प्रवेश किया

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন (জনমেজয়)! তারপর রাজা যুধিষ্ঠির ঘি-ও-মধু-মিশ্রিত পায়স, খিচুড়ি, জীবন্‌তিকার শাক, সর্বপ্রকার হব্য, নানাবিধ ভক্ষ্য, ফল, আখ প্রভৃতি চোষ্য এবং প্রচুর পানীয় দ্বারা দশ হাজার ব্রাহ্মণকে তৃপ্ত করে, নবনির্মিত সভাগৃহে প্রবেশ করলেন।

Verse 4

अहतैश्नैव वासोभिममल्यैरुच्चावचैरपि । तर्पयामास विप्रेन्द्रान नानादिग्भ्य:ः समागतान्‌,उन्होंने नये-नये वस्त्र और छोटे-बड़े अनेक प्रकारके हार आदिके उपहार देकर अनेक दिशाओंसे आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभाप्रवेशो नाम चतुर्थो5ध्याय: ।। ४ ।। इस प्रकार श्रीमह्या भारत सभथापवके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभाप्रवेश नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ

বৈশম্পায়ন বললেন—তিনি নতুন, নির্মল বস্ত্র এবং ছোট-বড় নানা প্রকার মালা প্রভৃতি উপহার দিয়ে, নানা দিক থেকে সমবেত শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের তৃপ্ত করলেন।

Verse 5

ददौ तेभ्य: सहस्राणि गवां प्रत्येकश: पुन: । पुण्याहघोषस्तत्रासीद्‌ दिवस्पृगिव भारत,भारत! तत्पश्चात्‌ उन्होंने प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक हजार गौएँ दीं। उस समय वहाँ ब्राह्मणोंके पुण्याह-वाचनका गम्भीर घोष मानो स्वर्गलोकतक गूँज उठा

হে ভারত! তারপর তিনি প্রত্যেক ব্রাহ্মণকে পৃথকভাবে এক-এক হাজার গাভী দান করলেন। তখন সেখানে ব্রাহ্মণদের ‘পুণ্যাহ’ উচ্চারণের গম্ভীর ধ্বনি যেন স্বর্গলোক পর্যন্ত প্রতিধ্বনিত হল।

Verse 6

वादिन्रैविविषधीर्दिव्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि । पूजयित्वा कुरुश्रेष्ठो दैवतानि निवेश्य च,कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिने अनेक प्रकारके बाजे तथा भाँति-भाँतिके दिव्य सुगन्धित पदार्थोद्वारा उस भवनमें देवताओंकी स्थापना एवं पूजा की। इसके बाद वे उस भवनमें प्रविष्ट हुए

কুরুশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির নানা প্রকার বাদ্য এবং বিচিত্র দিব্য সুগন্ধি দ্রব্য দ্বারা সেই ভবনে দেবতাদের প্রতিষ্ঠা করে পূজা সম্পন্ন করলেন; তারপর তিনি সেই ভবনে প্রবেশ করলেন।

Verse 7

तत्र मल्‍ला नटा झल्ला: सूता वैतालिकास्तथा | उपतस्थुर्महात्मानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्‌,वहाँ धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिरकी सेवामें कितने ही मल्ल (बाहुयुद्ध करनेवाले), नट, झल्ल (लकुटियोंसे युद्ध करनेवाले), सूत और वैतालिक उपस्थित हुए

সেখানে ধর্মপুত্র মহাত্মা যুধিষ্ঠিরের সেবায় বহু মল্ল, নট, ঝল্ল, সূত এবং বৈতালিকও উপস্থিত হল।

Verse 8

तथा स कृत्वा पूजां तां भ्रातृभि: सह पाण्डव: । तस्यां सभायां रम्यायां रेमे शक्रो यथा दिवि,इस प्रकार पूजनका कार्य सम्पन्न करके भाइयोंसहित पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर स्वर्ममें इन्द्रकी भाँति उस रमणीय सभामें आनन्दपूर्वक रहने लगे

এইভাবে পূজা সম্পন্ন করে, ভ্রাতৃগণের সঙ্গে পাণ্ডব যুধিষ্ঠির সেই মনোরম সভাগৃহে এমনই আনন্দে রইলেন, যেমন স্বর্গে শক্র (ইন্দ্র) আনন্দ করেন।

Verse 9

सभायामृषयस्तस्यां पाण्डवै: सह आसते । आसांचक्रुनरिन्द्राश्न नानादेशसमागता:,उस सभामें ऋषि तथा विभिन्न देशोंसे आये हुए नरेश पाण्डवोंके साथ बैठा करते थे

সেই রাজসভায় ঋষিগণ পাণ্ডবদের সঙ্গে উপবিষ্ট থাকতেন; আর নানা দেশ থেকে আগত নৃপতিরাও সেখানে এসে নিজ নিজ আসনে বসতেন।

Verse 10

असितो देवल: सत्य: सर्पिर्माली महाशिरा: । अर्वावसु: सुमित्रश्न मैत्रेय: शुनको बलि:

সেখানে অসিত, দেবল, সত্য, সৰ্পির্মালী, মহাশিরা, অর্বাবসু, সুমিত্র, মৈত্রেয়, শুনক ও বলি—এই ঋষিগণ উপস্থিত ছিলেন।

Verse 11

बको दाल्भ्य: स्थूलशिरा: कृष्णद्वैपायन: शुक: । सुमन्तुर्जैमिनि: पैलो व्यासशिष्यास्तथा वयम्‌

বক দাল্ভ্য, স্থূলশিরা, কৃষ্ণদ্বৈপায়ন (ব্যাস), শুক, সুমন্তু, জৈমিনি ও পৈল—এরা সকলেই ব্যাসের শিষ্য; আমরাও সেই পরম্পরারই।

Verse 12

तित्तिरियज्ञवल्क्यश्न॒ ससुतो लोमहर्षण: । अप्सुहोम्यश्न धौम्यश्न अणीमाण्डव्यकौशिकौ

তিত্তিরি, যাজ্ঞবল্ক্য, পুত্রসহ লোমহর্ষণ; এবং অপ্সুহোম্য, ধৌম্য, অণীমাণ্ডব্য ও কৌশিক—এরাও সেখানে ছিলেন।

Verse 13

दामोष्णीषस्त्रैबलिश्व पर्णादो घटजानुक: । मौज्जायनो वायुभक्ष: पाराशर्यश्ष सारिक:

সেখানে দামোষ্ণীষ, ত্রৈবলী, পর্ণাদ, ঘটজানুক, মৌজ্জায়ন, বায়ুভক্ষ, পারাশর্য ও সারিক—এমন বহু তপস্বীও ছিলেন, যাঁদের ব্রত ও লক্ষণ ছিল বিচিত্র।

Verse 14

बलिवाक: सिनीवाक: सत्यपाल: कृतश्रम: । जातूकर्ण: शिखावांश्व॒ आलम्ब: पारिजातक:

বৈশম্পায়ন বললেন— সেখানে বলিবাক, সিনীবাক, সত্যপাল ও কৃতশ্রম; জাতূকর্ণ ও শিখাবান; আর আলম্ব ও পারিজাতকও উপস্থিত ছিলেন।

Verse 15

पर्वतश्न महाभागो मार्कण्डेयो महामुनि: । पवित्रपाणि: सावर्णो भालुकिर्गालवस्तथा

বৈশম্পায়ন বললেন— সেখানে পর্বতশ্ন; মহাভাগ্যবান মহামুনি মার্কণ্ডেয়; পবিত্রপাণি; সাবর্ণ; ভালুকি; এবং গালবও ছিলেন।

Verse 16

जड्घाबन्धुश्न रैभ्यश्व॒ कोपवेगस्तथा भृगुः । हरिबभ्ुश्न कौण्डिन्यो बश्रुमाली सनातन:

বৈশম্পায়ন বললেন— সেখানে জড্ঘাবন্ধু, রৈভ্যাশ্ব, কোপবেগ ও ভৃগু; তদ্রূপ হরিবভ্রু, কৌণ্ডিন্য, বশ্রুমালী এবং প্রাচীন ঋষি সনাতনও ছিলেন।

Verse 17

काक्षीवानौशिजश्चनैव नाचिकेतो5थ गौतम: । पैड़यो वराह: शुनक: शाण्डिल्यश्व महातपा:

বৈশম্পায়ন বললেন— সেখানে কাক্ষীবান, ঔশিজ, নাচিকেত ও গৌতম; তদ্রূপ পাইড্য, বরাহ, শুনক এবং মহাতপস্বী শাণ্ডিল্যও ছিলেন।

Verse 18

कुक्कुरो वेणुजड्यो5थ कालाप: कठ एव च | मुनयो धर्मविद्वांसो धृतात्मानो जितेन्द्रिया:

বৈশম্পায়ন বললেন— কুক্কুর, বেণুজড্য, কালাপ ও কঠ— এঁরা ছিলেন ধর্মজ্ঞ মুনি, স্থিরচিত্ত এবং ইন্দ্রিয়জয়ী।

Verse 19

असित, देवल, सत्य, सर्पिर्माली, महाशिरा, अर्वावसु, सुमित्र, मैत्रेय, शुनक, बलि, बक, दाल्भ्य, स्थूलशिरा, कृष्णद्वैपायन, शुकदेव, व्यासजीके शिष्य सुमन्तु, जैमिनि, पैल तथा हमलोग, तित्तिरि, याज्ञवल्क्य, पुत्रसहित लोमहर्षण, अप्सुहोम्य, धौम्य, अणीमाण्डव्य, कौशिक, दामोष्णीष, त्रैबलि, पर्णाद, घटजानुक, मौंजायन, वायुभक्ष, पाराशर्य, सारिक, बलिवाक, सिनीवाक, सत्यपाल, कृतश्रम, जातूकर्ण, शिखावानू, आलम्ब, पारिजातक, महाभाग पर्वत, महामुनि मार्कण्डेय, पवित्रपाणि, सावर्ण, भालुकि, गालव, जंघाबन्धु, रैभ्य, कोपवेग, भृगु, हरिबभ्रु, कौण्डिन्य, बभ्रुमाली, सनातन, काक्षीवान्‌ू, औशिज, नाचिकेत, गौतम, पैंगय, वराह, शुनक (द्वितीय), महातपस्वी शाण्डिल्य, कुक्कुर, वेणुजंघ, कालाप तथा कठ आदि धर्मज्ञ, जितात्मा और जितेन्द्रिय मुनि उस सभामें विराजते थे || १०-- १८ || एते चान्ये च बहवो वेदवेदाड्गपारगा: । उपासते महात्मानं सभायामृषिसत्तमा:,ये तथा और भी वेद-वेदांगोंके पारंगत बहुत-से मुनिश्रेष्ठ उस सभामें महात्मा युधिष्ठिरके पास बैठा करते थे

সেই রাজসভায় বেদ ও বেদাঙ্গে পারদর্শী, আত্মসংযমী ও ইন্দ্রিয়জয়ী, ধর্মজ্ঞ ও শুচি বহু ঋষিশ্রেষ্ঠ আসীন ছিলেন এবং মহাত্মা ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের সেবা-উপাসনা করতেন। এই দৃশ্য নির্দেশ করে—যেখানে বিদ্যা, সংযম ও আধ্যাত্মিক কর্তৃত্বকে জনজীবনের কেন্দ্রে সম্মান দেওয়া হয়, সেখানে ধর্মসম্মত রাজ্য আরও সুদৃঢ় হয়।

Verse 20

कथयन्तः कथा: पुण्या धर्मज्ञा: शुचयो5मला: । तथैव क्षत्रियश्रेष्ठा धर्मराजमुपासते,वे धर्मज्ञ, पवित्रात्मा और निर्मल महर्षि राजा युधिष्ठिरको पवित्र कथाएँ सुनाया करते थे। इसी प्रकार क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ नरेश भी वहाँ धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—ধর্মজ্ঞ, শুচি ও নির্মল ঋষিগণ ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে পুণ্য ও পবিত্র কাহিনি শোনাতেন। তদ্রূপ ক্ষত্রিয়দের মধ্যে শ্রেষ্ঠ রাজাগণও সেবাভক্তি ও বিনীত উপস্থিতির দ্বারা ধর্মরাজকে সম্মান জানিয়ে সেখানে অবস্থান করতেন।

Verse 21

श्रीमान्‌ महात्मा धर्मात्मा मुण्जकेतुर्विवर्धन: । संग्रामजिद्‌ दुर्मुखश्न॒ उग्रसेनश्व॒ वीर्यवान्‌,श्रीमान्‌ महामना धर्मात्मा मुंजकेतु, विवर्धन, संग्रामजित, दुर्मुख, पराक्रमी उग्रसेन, राजा कक्षसेन, अपराजित क्षेमक, कम्बोजराज कमठ और महाबली कम्पन, जो अकेले ही बल-पौरुषसम्पन्न, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा अमिततेजस्वी यवनोंको सदा उसी प्रकार कँपाते रहते थे, जैसे वज्रधारी इन्द्रने कालकेय नामक असुरोंको कम्पित किया था। (ये सभी नरेश धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते रहते थे)

বৈশম্পায়ন বললেন—সেখানে মুঞ্জকেতু, বিবর্ধন, সংগ্রামজিত, দুর্মুখ এবং পরাক্রমশালী উগ্রসেন প্রমুখ শ্রীসম্পন্ন, মহাত্মা ও ধর্মাত্মা রাজাগণ উপস্থিত ছিলেন। বল-পুরুষে সমৃদ্ধ, অস্ত্রবিদ্যায় নিপুণ এবং অপরিমেয় তেজস্বী তাঁরা যবনদের সর্বদা কাঁপিয়ে রাখতেন—যেমন বজ্রধারী ইন্দ্র একদা কালকেয় অসুরদের কাঁপিয়েছিলেন। এ সকল নৃপতি ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের সেবায় নিয়ত রত ছিলেন।

Verse 22

कक्षसेन: क्षितिपति: क्षेमकश्चापराजित: । कम्बोजराज: कमठ: कम्पनश्न महाबल:,श्रीमान्‌ महामना धर्मात्मा मुंजकेतु, विवर्धन, संग्रामजित, दुर्मुख, पराक्रमी उग्रसेन, राजा कक्षसेन, अपराजित क्षेमक, कम्बोजराज कमठ और महाबली कम्पन, जो अकेले ही बल-पौरुषसम्पन्न, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा अमिततेजस्वी यवनोंको सदा उसी प्रकार कँपाते रहते थे, जैसे वज्रधारी इन्द्रने कालकेय नामक असुरोंको कम्पित किया था। (ये सभी नरेश धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते रहते थे)

পৃথিবীপতি কক্ষসেন, অপরাজিত ক্ষেমক, কম্বোজরাজ কমঠ এবং মহাবলী কম্পন—এবং মুঞ্জকেতু প্রমুখ অন্যান্য শ্রীসম্পন্ন, মহামনা ও ধর্মাত্মা নৃপতিগণ—সকলেই ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের নিত্য সেবায় উপস্থিত থাকতেন। তাঁদের অটল আনুগত্য দেখায় যে সত্য রাজধর্ম ন্যায়বান ও সংযমী রাজার সম্মানেই দৃঢ় হয়।

Verse 23

सततं कम्पयामास यवनानेक एव यः । बलपौरुषसम्पन्नान्‌ कृतास्त्राममितौजस: । यथासुरान्‌ कालकेयान्‌ देवो वज्रधरस्तथा,श्रीमान्‌ महामना धर्मात्मा मुंजकेतु, विवर्धन, संग्रामजित, दुर्मुख, पराक्रमी उग्रसेन, राजा कक्षसेन, अपराजित क्षेमक, कम्बोजराज कमठ और महाबली कम्पन, जो अकेले ही बल-पौरुषसम्पन्न, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा अमिततेजस्वी यवनोंको सदा उसी प्रकार कँपाते रहते थे, जैसे वज्रधारी इन्द्रने कालकेय नामक असुरोंको कम्पित किया था। (ये सभी नरेश धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते रहते थे)

বৈশম্পায়ন বললেন—তিনি একাই বহু যবনকে সর্বদা কাঁপিয়ে রাখতেন—যারা বল-পুরুষে সমৃদ্ধ, অস্ত্রবিদ্যায় প্রশিক্ষিত এবং অপরিমেয় তেজস্বী—যেমন বজ্রধারী ইন্দ্র কালকেয় অসুরদের কাঁপিয়েছিলেন। ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের সেবায় উপস্থিত রাজাদের মধ্যে ছিলেন মুঞ্জকেতু, বিবর্ধন, সংগ্রামজিত, দুর্মুখ, পরাক্রমশালী উগ্রসেন, রাজা কক্ষসেন, অপরাজিত ক্ষেমক, কম্বোজরাজ কমঠ এবং মহাবলী কম্পন।

Verse 24

जटासुरो मद्रकाणां च राजा कुन्ति: पुलिन्दश्च॒ किरातराज: । तथा<<ड्रवाज्ौ सह पुण्ड्रकेण पाण्ड्योड्रराजौ च सहान्ध्रकेण

বৈশম্পায়ন বললেন— জটাসুর, মদ্রকদের রাজা; কুন্তি, পুলিন্দদের প্রধান ও কিরাতদের রাজা; তদ্রূপ পুণ্ড্র-নৃপসহ দ্রবাজগণ, এবং অন্ধ্র-নৃপসহ পাণ্ড্য ও উড়্র-রাজা—সকলেই সেখানে সমবেত ছিলেন।

Verse 25

अड्ढो वड्ढः सुमित्रश्न शैब्यश्चामित्रकर्शन: । किरातराज: सुमना यवनाधिपतिस्तथा

বৈশম্পায়ন বললেন— অড্ঢ, বড্ঢ, সুমিত্রশ্ন, এবং শৈব্য—যিনি শত্রুদমনকারী; সঙ্গে কিরাতরাজ সুমনা, এবং যবনদের অধিপতিও সেখানে উপস্থিত ছিলেন।

Verse 26

चाणूरो देवरातश्न भोजो भीमरथश्न यः । श्रुतायुधश्न॒ कालिड्रो जयसेनश्व॒ मागध:

বৈশম্পায়ন বললেন— চাণূর, দেবরাত, ভোজ, ভীমরথ; শ্রুতায়ুধ, কালিড্র, জয়সেন, এবং মগধ-নৃপও সেখানে ছিলেন।

Verse 27

सुकर्मा चेकितानश्व पुरुश्चामित्रकर्शन: । केतुमान्‌ वसुदानश्च वैदेहो&थ कृतक्षण:

বৈশম্পায়ন বললেন— সুকর্মা, চেকিতানশ্ব, এবং পুরু—শত্রুনাশক; তদ্রূপ কেতুমান ও বসুদান; আর তারপর বিদেহের রাজপুত্র কৃতক্ষণও সেখানে ছিলেন।

Verse 28

सुधर्मा चानिरुद्धश्न श्रुतायुश्न महाबल: । अनूपराजो दुर्धर्ष: क्रमजिच्च सुदर्शन:

বৈশম্পায়ন বললেন— সুধর্মা ও অনিরুদ্ধ; মহাবলী শ্রুতায়ু; দুর্ধর্ষ অনূপরাজ; ক্রমজিত; এবং সুদর্শনও সেখানে ছিলেন।

Verse 29

शिशुपाल: सहसुतः करूषाधिपतिस्तथा । वृष्णीनां चैव दुर्धर्षा: कुमारा देवरूपिण:

শিশুপাল পুত্রসমেত, এবং করূষের অধিপতিও; আর বৃষ্ণিবংশের সেই দুর্ধর্ষ, দেবসদৃশ রাজকুমারগণ—তাঁরাও সেখানে উপস্থিত ছিলেন।

Verse 30

आहुको विपृथुश्चैव गद: सारण एव च । अक्रूरः कृतवर्मा च सत्यकश्न शिने: सुत:

আহুক, বিপৃথু ও গদ; তদুপরি সারণ; অক্রূর; কৃতবর্মা; এবং শিনির পুত্র সত্যক—তাঁরাও সেখানে ছিলেন।

Verse 31

भीष्मको<थाकृतिश्रैव द्युमत्सेनश्व वीर्यवान्‌ । केकयाश्न महेष्वासा यज्ञसेनश्षु सौमकि:

ভীষ্মক ও আকৃতি; পরাক্রমশালী দ্যুমৎসেন; মহাধনুর্ধর কেকয়গণ; এবং সোমকবংশীয় যজ্ঞসেন—তাঁরাও সেখানে ছিলেন।

Verse 32

केतुमान्‌ वसुमांश्वैव कृतास्त्रश्न महाबल: । एते चान्ये च बहव: क्षत्रिया मुख्यसम्मता:

কেতুমান ও বসুমান; এবং অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী মহাবলী যোদ্ধা—এরা ও আরও বহু ক্ষত্রিয়, যাঁরা নিজ নিজ বর্গে শ্রেষ্ঠ বলে স্বীকৃত, সেখানে উপস্থিত ছিলেন।

Verse 33

उपासते सभायां सम कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्‌ । इनके सिवा जटासुर, मद्रराज शल्य, राजा कुन्तिभोज, किरातराज पुलिन्द, अंगराज, वंगराज, पुण्ड्रक, पाण्ड्य, उड़्राज, आन्ध्रनरेश, अंग, वंग, सुमित्र, शत्रुसूदन शैब्य, किरातराज सुमना, यवननरेश, चाणूर, देवरात, भोज, भीमरथ, कलिंगराज श्रुतायुध, मगधदेशीय जयसेन, सुकर्मा, चेकितान, शत्रुसंहारक पुरु, केतुमानू, वसुदान, विदेहराज कृतक्षण, सुधर्मा, अनिरुद्ध, महाबली श्रुतायु, दुर्धर्ष वीर अनूपराज, क्रमजित्‌, सुदर्शन, पुत्रसहित शिशुपाल, करूषराज दन्तवक्त्र, वृष्णिवंशियोंके देवस्वरूप दुर्धर्ष राजकुमार, आहुक, विपृथु, गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, शिनिपुत्र सत्यक, भीष्मक, आकृति, पराक्रमी द्ुमत्सेन, महान्‌ धनुर्धर केकयराजकुमार, सोमक-पौत्र द्रुपद, केतुमान्‌ (द्वितीय) तथा अस्त्रविद्यामें निपुण महाबली वसुमान--ये तथा और भी बहुत-से प्रधान क्षत्रिय उस सभामें कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी सेवामें बैठते थे || २४--३२ ह ।। अर्जुन ये च संश्रित्य राजपुत्रा महाबला:,जो महाबली राजकुमार अर्जुनके पास रहकर कृष्णमृगचर्म धारण किये धरनुर्वेदकी शिक्षा लेते थे (वे भी उस सभाभवनमें बैठकर राजा युधिष्ठिरकी उपासना करते थे)। राजन! वृष्णिवंशको आनन्दित करनेवाले राजकुमारोंको वहीं शिक्षा मिली थी

তাঁরা সকলেই সেই সভায় কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরের যথাবিধি উপাসনা করছিলেন। সেখানে ছিলেন মদ্ররাজ শল্য, রাজা কুন্তিভোজ, কিরাতরাজ পুলিন্দ, অঙ্গরাজ, বঙ্গরাজ, পুণ্ড্রক, পাণ্ড্য, উড্ররাজ, অন্ধ্রনরেশ; অঙ্গ, বঙ্গ, সুমিত্র, শত্রুসূদন শৈব্য, কিরাতরাজ সুমনা, যবননরেশ; চাণূর, দেবরাত, ভোজ, ভীমরথ; কলিঙ্গরাজ শ্রুতায়ুধ, মগধদেশীয় জয়সেন; সুকর্মা, চেকিতান, শত্রুসংহারক পুরূ; কেতুমান, বসুদান, বিদেহরাজ কৃতক্ষণ; সুধর্মা, অনিরুদ্ধ, মহাবলী শ্রুতায়ু; দুর্ধর্ষ অনূপরাজ, ক্রমজিত্, সুদর্শন; পুত্রসমেত শিশুপাল, করূষরাজদন্তবক্ত্র; বৃষ্ণিবংশের দেবসদৃশ দুর্ধর্ষ রাজকুমারগণ; আহুক, বিপৃথু, গদ, সারণ, অক্রূর, কৃতবর্মা, শিনিপুত্র সত্যক; ভীষ্মক, আকৃতি, পরাক্রমী দ্যুমৎসেন; মহাধনুর্ধর কেকয়; সোমক-পৌত্র দ্রুপদ; এবং (দ্বিতীয়) কেতুমান ও মহাবলী বসুমান—এরা ও আরও বহু প্রধান ক্ষত্রিয় সেখানে উপবিষ্ট ছিলেন। আর যে মহাবলী রাজপুত্রগণ অর্জুনের আশ্রয়ে থেকে, কৃষ্ণমৃগচর্ম ধারণ করে ধনুর্বেদের শিক্ষা গ্রহণ করছিলেন—তারাও সেই সভাগৃহে বসে রাজা যুধিষ্ঠিরের সেবায় নিবিষ্ট ছিলেন। এভাবে ধর্মের অধীনে সেই সভা আনুগত্য, রাজস্বীকৃতি ও যোদ্ধাশিক্ষার শৃঙ্খলা—সব কিছুর মিলনস্থল হয়ে উঠেছিল।

Verse 34

अशिक्षन्त थनुर्वेदे रौरवाजिनवासस: । तत्रैव शिक्षिता राजन्‌ कुमारा वृष्णिनन्दना:,जो महाबली राजकुमार अर्जुनके पास रहकर कृष्णमृगचर्म धारण किये धरनुर्वेदकी शिक्षा लेते थे (वे भी उस सभाभवनमें बैठकर राजा युधिष्ठिरकी उपासना करते थे)। राजन! वृष्णिवंशको आनन्दित करनेवाले राजकुमारोंको वहीं शिक्षा मिली थी

বৈশম্পায়ন বললেন—রৌরব হরিণচর্ম পরিধান করে তারা সেখানেই ধনুর্বেদের শিক্ষা গ্রহণ করত। হে রাজন, বৃষ্ণিবংশকে আনন্দিত করা রাজপুত্ররাও সেখানেই যথাবিধি শিক্ষালাভ করেছিল।

Verse 35

रौक्मिणेयश्व साम्बश्न युयुधानश्व सात्यकि: । सुधर्मा चानिरुद्धश्न शैब्यश्न नरपुड्व:,रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, जाम्बवतीकुमार साम्ब, सत्यकपुत्र (सात्यकि) युयुधान, सुधर्मा, अनिरुद्ध, नरश्रेष्ठ शैब्य--ये और दूसरे भी बहुत-से राजा उस सभामें बैठते थे। पृथ्वीपते! अर्जुनके सखा तुम्बुरु गन्धर्व भी उस सभामें नित्य विराजमान होते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—রুক্মিণীপুত্র প্রদ্যুম্ন, জাম্ববতীপুত্র সাম্ব, সত্যকপুত্র যুযুধান (সাত্যকি), সুধর্মা, অনিরুদ্ধ এবং নরশ্রেষ্ঠ শৈব্য—এরা এবং আরও বহু রাজা সেই সভায় বসতেন। আর অর্জুনের সখা গন্ধর্ব তুম্বুরু সেখানেই সর্বদা উপস্থিত থাকত।

Verse 36

एते चान्ये च बहवो राजान: पृथिवीपते । धनंजयसखा चात्र नित्यमास्ते सम तुम्बुरु:,रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, जाम्बवतीकुमार साम्ब, सत्यकपुत्र (सात्यकि) युयुधान, सुधर्मा, अनिरुद्ध, नरश्रेष्ठ शैब्य--ये और दूसरे भी बहुत-से राजा उस सभामें बैठते थे। पृथ्वीपते! अर्जुनके सखा तुम्बुरु गन्धर्व भी उस सभामें नित्य विराजमान होते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—হে পৃথিবীপতি! এরা এবং আরও বহু রাজা সেই সভায় বসতেন; আর ধনঞ্জয় (অর্জুন)-এর সখা গন্ধর্ব তুম্বুরু সেখানে সর্বদা উপস্থিত থাকত।

Verse 37

उपासते महात्मानमासीनं सप्तविंशति: । चित्रसेन: सहामात्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा,मन्त्रीसहित चित्रसेन आदि सत्ताईस गन्धर्व और अप्सराएँ सभामें बैठे हुए महात्मा युधिष्ठिरकी उपासना करती थीं

বৈশম্পায়ন বললেন—সভায় আসীন মহাত্মা যুধিষ্ঠিরকে চিত্রসেন তাঁর মন্ত্রীসহ এবং সাতাশ জন গন্ধর্ব ও অপ্সরা ভক্তিভরে সেবা-উপাসনা করত।

Verse 38

गीतवादित्रकुशला: साम्यतालविशारदा: । प्रमाणे5थ लये स्थाने किन्नरा: कृतनिश्रमा:,गाने-बजानेमें कुशल, साम्य5 और तालकेः विशेषज्ञ तथा प्रमाण, लय और स्थानकी जानकारीके लिये विशेष परिश्रम किये हुए मनस्वी किन्नर तुम्बुरुकी आज्ञासे वहाँ अन्य गन्धर्वोके साथ दिव्य तान छेड़ते हुए यथोचित रीतिसे गाते और पाण्डवों तथा महर्षियोंका मनोरंजन करते हुए धर्मराजकी उपासना करते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—গান ও বাদ্যে পারদর্শী, সাম্য ও তালের বিশেষজ্ঞ, এবং প্রমাণ, লয় ও স্থানে কঠোর সাধনায় সিদ্ধ কিন্নররা তুম্বুরুর আদেশে সেখানে অন্যান্য গন্ধর্বদের সঙ্গে দিব্য তান তুলত ও যথোচিত রীতিতে গাইত। পাণ্ডব ও মহর্ষিদের আনন্দ দান করে তারা সেইভাবেই ধর্মরাজের প্রতি শ্রদ্ধাময় উপাসনা নিবেদন করত।

Verse 39

संचोदितास्तुम्बुरुणा गन्धर्वसहितास्तदा । गायन्ति दिव्यतानैस्ते यथान्यायं मनस्विन: । पाण्डुपुत्रानृषीश्वैव रमयन्त उपासते,गाने-बजानेमें कुशल, साम्य5 और तालकेः विशेषज्ञ तथा प्रमाण, लय और स्थानकी जानकारीके लिये विशेष परिश्रम किये हुए मनस्वी किन्नर तुम्बुरुकी आज्ञासे वहाँ अन्य गन्धर्वोके साथ दिव्य तान छेड़ते हुए यथोचित रीतिसे गाते और पाण्डवों तथा महर्षियोंका मनोरंजन करते हुए धर्मराजकी उपासना करते थे

তখন তুম্বুরুর প্রেরণায়, গন্ধর্বদের সহিত সেই উচ্চমনস্ক শিল্পীরা দিব্য তানে শাস্ত্রসম্মত নিয়মে গীত গাইতে লাগল। পাণ্ডুপুত্রগণ ও ঋষিদের আনন্দ দান করে, পরিশীলিত সঙ্গীত ও শৃঙ্খলিত পরিবেশনার দ্বারা তারা ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের সেবায় শ্রদ্ধাভরে উপস্থিত থাকল।

Verse 40

तस्यां सभायामासीना: सुव्रता: सत्यसंगरा: । दिवीव देवा ब्रह्माणं युधिष्ठिरमुपासते,जैसे देवतालोग दिव्यलोककी सभामें ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार कितने ही सत्यप्रतिज्ञ और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महापुरुष उस सभामें बैठकर महाराज युधिष्ठिरकी आराधना करते थे

সেই সভায় উপবিষ্ট ছিলেন বহু মহাপুরুষ—উত্তম ব্রতধারী ও সত্যপ্রতিজ্ঞ। যেমন স্বর্গসভার দেবগণ ব্রহ্মাকে শ্রদ্ধায় উপাসনা করেন, তেমনি ধর্মের অধিষ্ঠাতা মহারাজ যুধিষ্ঠিরকে তারা সম্মানে আরাধনা ও সেবায় নিয়োজিত থাকলেন।

Frequently Asked Questions

No explicit dharma-saṅkaṭa is staged as a dispute; the ethical focus is normative: how a ruler should inaugurate and legitimize a public institution through generosity, ritual propriety, and inclusive court protocol.

Sovereignty is portrayed as a moral performance anchored in dāna, hospitality, and respect for learned and sacred authority; the sabhā’s splendor is meaningful only when aligned with dharmic order and social responsibility.

A formal phalaśruti is not stated here; the meta-commentary is implicit in the framing similes (Indra/Brahmā): righteous kingship gains cosmic-style legitimacy when public auspiciousness, worship, and ethical distribution are established at the court’s foundation.