Adhyaya 39
Sabha ParvaAdhyaya 3937 Verses

Adhyaya 39

Adhyāya 39: Śiśupāla’s Censure and Bhīma’s Contained Wrath (शिशुपाल-निन्दा तथा भीमक्रोध-निग्रहः)

Upa-parva: Rājasūya-sabhā-vāda (Assembly Disputation in the Rājasūya Context)

This chapter presents a structured exchange in the royal assembly. Śiśupāla opens by praising Jarāsandha’s strength and reframes Kṛṣṇa’s role in Jarāsandha’s death as indirect and therefore, in his rhetoric, ethically or valorously suspect. He emphasizes entry “by a non-gate,” disguise, and brahminical pretext to argue that Kṛṣṇa assessed Jarāsandha’s power through stratagem rather than open contest, and he uses this to question the assembly’s standards of excellence. He then broadens the critique to the Pāṇḍavas’ judgment, implying deviation from the path of the virtuous, and attributes it to their reliance on an elder advisor whose guidance he disparages. Vaiśaṃpāyana narrates the immediate affective consequence: Bhīma’s anger manifests physically (reddened eyes, knitted brow, threatening posture), generating a crisis of decorum. Bhīṣma, acting as senior authority, physically restrains Bhīma and uses varied counsel to calm him, restoring order without immediate punitive action. Śiśupāla remains rhetorically confident, even inviting the audience to witness Bhīma’s defeat by his “splendor,” thereby further testing the assembly’s capacity for restraint. The chapter closes with Bhīṣma addressing Bhīma again, indicating continued management of escalation through institutional authority and speech.

Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ के वैभव के बीच युधिष्ठिर की सभा में राजाओं का जमघट है; सहदेव कृष्ण के अर्घ्य-पूजन का प्रस्ताव रखकर सबके सामने एक निर्णायक कसौटी रख देता है। → सहदेव घोषणा करता है कि केशीहन्ता, अप्रमेय-पराक्रमी केशव की पूजा को जो राजा सहन नहीं करेगा, वही उसके द्वारा वध्य होगा—और वह अपना पग ‘बलिनां मूर्ध्नि’ रखने की चुनौती देता है, जिससे मान-अपमान और राज-गौरव की आग भड़क उठती है। → क्रोध से मूर्छित-से अनेक राजा भीतर ही भीतर उबलते हैं, पर सहदेव के निर्भीक वचन और धर्मसम्मत तर्क के सामने कोई प्रतिवाद का साहस नहीं कर पाता; सभा में निर्णायक मौन छा जाता है। → अंततः बुद्धिमान राजा सहदेव के अर्घ्य-निवेदन को अनुमोदित करते हैं—‘अर्च्यमर्चितमर्घाहम्’—और सहदेव के मस्तक पर आकाश से पुष्प-वर्षा होती है; अदृश्य देववाणी ‘साधु, साधु’ कहकर निर्णय को धर्म-समर्थन देती है। → कृष्ण-पूजन की स्वीकृति के साथ ही उन हृदयों में ईर्ष्या और अपमान का बीज पड़ जाता है जो इसे सहन नहीं कर सके—आगामी अध्यायों में वही बीज द्यूत और विनाश की ओर बढ़ेगा।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७२८६ श्लोक मिलाकर कुल ७६१३ “लोक हैं) न२््््स्निताथ् श््यु #ा-ान्तल्स - जिनमें ऋतुधर्म (रजस्वलावस्था)-का प्रादुर्भाव न हुआ हो, उन्हें नग्निका कहते हैं। - मूर्ति या शिवलिंगके आकारका कोई दुर्भेद्य गृह, जो पृथ्वीके भीतर गुफामें बनाया गया हो। शत्रुओंसे आत्मरक्षाकी दृष्टिसे नरकासुरने ऐसे निवासस्थानका निर्माण करा रखा था। - रोहिणीके गद और सारण आदि कई पुत्र थे। एकोनचत्वारिशोड् ध्याय: सहदेवकी राजाओंको चुनौती तथा क्षुब्ध हुए शिशुपाल आदि नरेशोंका युद्धके लिये उद्यत होना वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा ततो भीष्मो विरराम महाबल: । व्याजहारीत्तरं तत्र सहदेवो<र्थवद्‌ वच:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ऐसा कहकर महाबली भीष्म चुप हो गये। तत्पश्चात्‌ माद्रीकुमार सहदेवने शिशुपालकी बातोंका मुँहतोड़ उत्तर देते हुए यह सार्थक बात कही--

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! এ কথা বলে মহাবলী ভীষ্ম নীরব হলেন। তখন মাদ্রীপুত্র সহদেব সেখানে শিশুপালের কথার প্রত্যুত্তরে তীক্ষ্ণ ও অর্থবহ বাক্য উচ্চারণ করল।

Verse 2

केशवं केशिहन्तारमप्रमेयपराक्रमम्‌ । पूज्यमानं मया यो व: कृष्णं न सहते नृपा:,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

হে রাজাগণ! কেশী দানববধকারী, অপরিমেয় পরাক্রমশালী কেশব শ্রীকৃষ্ণকে আমি যে পূজা করেছি, তোমাদের মধ্যে যে তা সহ্য করতে পারে না—সে-ই আমার দ্বারা বধ্য হবে; এতে সন্দেহ নেই।

Verse 3

सर्वेषां बलिनां मूर्थ्नि मयेदं निहितं पदम्‌ । एवमुक्ते मया सम्यगुत्तरं प्रत्रवीतु सः,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

হে রাজাগণ! যারা বলবান হয়েও আমার কৃত কেশীহন্তা, অনন্ত পরাক্রমশালী শ্রীকৃষ্ণের পূজা সহ্য করতে পারে না, তাদের সকলের মস্তকে যেন আমি পদ স্থাপন করেছি। আমি ভেবে-চিন্তে এ কথা বলেছি। যে উত্তর দিতে চায়, সে সামনে আসুক; সে-ই আমার দ্বারা বধ্য হবে—এতে সন্দেহ নেই।

Verse 4

मतिमन्तश्न ये केचिदाचार्य पितरं गुरुम्‌,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

হে রাজাগণ! তোমাদের মধ্যে যে কেউ—যতই জ্ঞানী হোক—আমার দ্বারা পূজিত শ্রীকৃষ্ণের সম্মান সহ্য করতে না পেরে তার বিরোধিতা করে, সে-ই আমার দ্বারা বধ্য হবে; এতে সন্দেহ নেই।

Verse 5

ततो न व्याजहारैषां कक्रिद्‌ बुद्धिमतां सताम्‌,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন সেই জ্ঞানী ও সজ্জনদের মধ্যে কেউই প্রত্যুত্তর দিল না। কারণ যে-ই পাল্টা জবাব দিতে এগিয়ে আসত, সেই কাজের দ্বারাই সে আমার হাতে বধযোগ্য হয়ে যেত—এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 6

ततो<5पतत्‌ पुष्पवृष्टि: सहदेवस्य मूर्थनि,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

তখন সহদেবের মস্তকে পুষ্পবৃষ্টি পড়ল। সহদেব বললেন—“হে রাজাগণ! কেশী দানববধকারী, অনন্ত-পরাক্রমী শ্রীকৃষ্ণের যে পূজা আমি করেছি, তা যে সহ্য করতে পারে না, সেই সকল বলবানদের মস্তকের উপর আমি আমার পদ স্থাপন করেছি। ভেবে-চিন্তেই এ কথা বলেছি। যে উত্তর দিতে চায়, সে সামনে আসুক; সে আমার দ্বারা বধযোগ্য হবে—এতে সন্দেহ নেই।”

Verse 7

आविध्यदजितं कृष्णं भविष्यद्भूतजल्पक:,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है तदनन्तर कभी पराजित न होनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णकी महिमाके ज्ञाता, भूत, वर्तमान और भविष्य--तीनों कालोंकी बातें बतानेवाले, सब लोगोंके सभी संशयोंका निवारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण लोकोंसे परिचित देवर्षि नारद समस्त उपस्थित प्राणियोंके बीच स्पष्ट शब्दोंमें बोले--

বৈশম্পায়ন বললেন—অতীত ও ভবিষ্যৎ কথনে পারদর্শী সেই ঋষি অজেয় শ্রীকৃষ্ণকে বিদ্ধ করে কটুক্তি করল এবং বলল—“সে-ই আমার দ্বারা বধযোগ্য হবে; এতে সন্দেহ নেই।” তারপর অজেয় শ্রীকৃষ্ণের মহিমাজ্ঞ, ভূত-বর্তমান-ভবিষ্যৎ-বিদ্, সকলের সংশয়নাশক এবং সর্বলোকপরিচিত দেবর্ষি নারদ, সমবেত প্রাণীদের মধ্যে স্পষ্ট ভাষায় বললেন।

Verse 8

सर्वसंशयनिर्मोक्ता नारद: सर्वलोकवित्‌ | उवाचाखिलभूतानां मध्ये स्पष्टतरं वच:,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है तदनन्तर कभी पराजित न होनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णकी महिमाके ज्ञाता, भूत, वर्तमान और भविष्य--तीनों कालोंकी बातें बतानेवाले, सब लोगोंके सभी संशयोंका निवारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण लोकोंसे परिचित देवर्षि नारद समस्त उपस्थित प्राणियोंके बीच स्पष्ट शब्दोंमें बोले--

সকল সংশয়নাশক ও সর্বলোকবিদ্ নারদ, সকল প্রাণীর মধ্যস্থলে আরও স্পষ্ট ভাষায় কথা বললেন।

Verse 9

कृष्णं कमलपत्राक्षं नार्चयिष्यन्ति ये नरा: । जीवन्मृतास्तु ते ज्ञेया न सम्भाष्या: कदाचन,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है “जो मानव कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णकी पूजा नहीं करेंगे, वे जीते-जी ही मृतक- तुल्य समझे जायँगे। ऐसे लोगोंसे कभी बातचीत नहीं करनी चाहिये”

“যে মানুষ কমলনয়ন ভগবান শ্রীকৃষ্ণের আরাধনা করবে না, তাকে জীবিত অবস্থাতেই মৃত বলে জেনো; এমন লোকের সঙ্গে কখনও কথাবার্তা বলা উচিত নয়।”

Verse 10

वैशम्पायन उवाच पूजयित्वा च पूजाहतनि ब्रद्मक्षत्रविशेषवित्‌ । सहदेवो नृणां देव: समापद्यत कर्म तत्‌,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! वहाँ आये हुए ब्राह्मणों और क्षत्रियोंमें विशिष्ट व्यक्तियोंको पहचानने-वाले नरदेव सहदेवने क्रमशः पूज्य व्यक्तियोंकी पूजा करके वह अर्घ्यनिवेदनका कार्य पूरा कर दिया

বৈশম্পায়ন বললেন—যাঁরা পূজার যোগ্য, তাঁদের যথাবিধি সম্মান করে, ব্রাহ্মণ ও ক্ষত্রিয়দের মধ্যে শ্রেষ্ঠকে চিনতে পারদর্শী নরদেব সহদেব সেই অর্ঘ্য-নিবেদনের ক্রিয়া সম্পূর্ণ করলেন। আর যে সেই (নির্বাচিত পাত্রের) সম্মান সহ্য করতে পারে না, সে-ই আমার দ্বারা বধযোগ্য—এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 11

तस्मिन्नभ्यर्चिते कृष्णे सुनीथ: शत्रुकर्षण: । अतिताम्रेक्षण: कोपादुवाच मनुजाधिपान्‌,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है इस प्रकार श्रीकृष्णका पूजन सम्पन्न हो जानेपर शत्रुविजयी शिशुपालने क्रोधसे अत्यन्त लाल आँखें करके समस्त राजाओंसे कहा--

কৃষ্ণকে এভাবে যথাবিধি পূজা করা হলে, শত্রুদমনকারী সুনীথ-পুত্র শিশুপাল ক্রোধে চোখ লাল করে সমবেত রাজাদের উদ্দেশে বলল—“সেই ব্যক্তিই আমার দ্বারা বধযোগ্য—এতে কোনো সন্দেহ নেই।”

Verse 12

स्थित: सेनापतिर्यो5हं मन्यध्वं कि तु साम्प्रतम्‌ । युधि तिष्ठाम संनहा समेतान्‌ वृष्णिपाण्डवान्‌,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है 'भूमिपालो! मैं सबका सेनापति बनकर खड़ा हूँ। अब तुमलोग किस चिन्तामें पड़े हो। आओ, हम सब लोग युद्धके लिये सुसज्जित हो पाण्डवों और यादवोंकी सम्मिलित सेनाका सामना करनेके लिये डट जाये

“হে ভূমিপালগণ! আমি তোমাদের সেনাপতি হয়ে দাঁড়িয়ে আছি; তবে এখন তোমরা কী ভাবছ? এসো, আমরা অস্ত্রসজ্জিত হয়ে যুদ্ধে স্থির থাকি এবং বৃষ্ণি ও পাণ্ডবদের সম্মিলিত বাহিনীর মুখোমুখি হই। যে আমার সামনে দাঁড়াবে, সে-ই আমার দ্বারা বধযোগ্য—এতে কোনো সন্দেহ নেই।”

Verse 13

इति सर्वान्‌ समुत्साहा राज्ञस्तांश्चैदिपुड़व: । यज्ञोपघाताय तत: सोअमन्त्रयत राजभि:,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है इस प्रकार उन सब राजाओंको युद्धके लिये उत्साहित करके चेदिराजने युधिष्ठिरके यज्ञमें विघ्न डालनेके उद्देश्यसे राजाओंसे सलाह की। शिशुपालके इस प्रकार बुलानेपर उसके सेनापतित्वमें सुनीथ आदि कुछ प्रमुख नरेशगण चले आये। वे सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे भर रहे थे एवं उनके मुखकी कान्ति बदली हुई दिखायी देती थी

বৈশম্পায়ন বললেন—এইভাবে সকল রাজাকে উসকে দিয়ে ও যুদ্ধে উদ্দীপ্ত করে, চেদিরাজ যুধিষ্ঠিরের যজ্ঞে বিঘ্ন ঘটানোর উদ্দেশ্যে রাজাদের সঙ্গে পরামর্শ করল। সে দৃঢ়স্বরে বলল—“সেই ব্যক্তিই আমার দ্বারা বধযোগ্য—এতে কোনো সন্দেহ নেই।”

Verse 14

तत्राहूता गता: सर्वे सुनीथप्रमुखा गणा: । समदृश्यन्त संक्रुद्धा विवर्णवदनास्तथा,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है इस प्रकार उन सब राजाओंको युद्धके लिये उत्साहित करके चेदिराजने युधिष्ठिरके यज्ञमें विघ्न डालनेके उद्देश्यसे राजाओंसे सलाह की। शिशुपालके इस प्रकार बुलानेपर उसके सेनापतित्वमें सुनीथ आदि कुछ प्रमुख नरेशगण चले आये। वे सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे भर रहे थे एवं उनके मुखकी कान्ति बदली हुई दिखायी देती थी

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন আহ্বান করা হলে সুনীথ-প্রমুখ সকল দল সেখানে এসে উপস্থিত হল। তারা প্রবল ক্রোধে জ্বলছিল, আর তাদের মুখমণ্ডল বিবর্ণ দেখাচ্ছিল। (শিশুপালের ঘোষণা অটল রইল:) “সেই ব্যক্তিই আমার দ্বারা বধযোগ্য—এতে কোনো সন্দেহ নেই।”

Verse 15

युधिष्ठिराभिषेकं च वासुदेवस्य चार्हणम्‌ । न स्याद्‌ यथा तथा कार्यमेवं सर्वे तदाब्रुवन्‌,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है उन सबने यह कहा कि “युधिष्ठिरके अभिषेक और श्रीकृष्णकी पूजाका कार्य सफल न हो, वैसा प्रयत्न करना चाहिये”

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন সকল রাজাই বলল—যে কোনো উপায়ে এমন চেষ্টা করতে হবে, যাতে যুধিষ্ঠিরের অভিষেক এবং বাসুদেবের আরাধনা সফল না হয়।

Verse 16

निष्कर्षन्निश्चयात्‌ सर्वे राजान: क्रोधमूर्छिता: । अब्लुव॑ंस्तत्र राजानो निर्वेदादात्मनिश्चयात्‌,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है इस निर्णय एवं निष्कर्षपर पहुँचकर वे सभी नरेश क्रोधसे मोहित हो गये। सहदेवकी बातोंसे अपमानका अनुभव करके अपनी शक्तिकी प्रबलताका विश्वास करके राजाओंने उपर्युक्त बातें कही थीं

বৈশম্পায়ন বললেন—দৃঢ় সিদ্ধান্তে পৌঁছে সকল রাজা ক্রোধে মূর্ছিত হয়ে সেখানে বলল। অপমানবোধে দগ্ধ হয়ে এবং নিজের শক্তি ও সংকল্পে ভরসা করে তারা বলল—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে; এতে সন্দেহ নেই।”

Verse 17

सुहृद्धिवार्यमाणानां तेषां हि वपुराबभौ । आमिषादपकृष्टानां सिंहानामिव गर्जताम्‌,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—সুহৃদদের বাধা সত্ত্বেও তাদের দেহ ক্রোধে জ্বলে উঠল, যেন শিকার থেকে টেনে সরানো গর্জনরত সিংহ। আর সে বলল—“যে কেউ এই আহ্বানে সাড়া দেবে, সে-ই আমার হাতে নিহত হবে; এতে সন্দেহ নেই।”

Verse 18

अपने सगे-सम्बन्धियोंके मना करनेपर भी उनका क्रोधसे तमतमाता हुआ शरीर उन सिंहोंके समान सुशोभित हुआ, जो मांससे वंचित कर दिये जानेके कारण दहाड़ रहे हों। त॑ बलौघमपर्यन्तं राजसागरमक्षयम्‌ | कुर्वाणं समयं कृष्णो युद्धाय बुबुधे तदा,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है राजाओंका वह समुदाय अक्षय समुद्रकी भाँति उमड़ रहा था। उसका कहीं अन्त नहीं दिखायी देता था। सेनाएँ ही उसकी अपार जलराशि थीं। उसे इस प्रकार शपथ करते देख भगवान्‌ श्रीकृष्णने यह समझ लिया कि अब ये नरेश युद्धके लिये तैयार हैं

আত্মীয়স্বজনেরা নিষেধ করলেও তাদের দেহ ক্রোধে রক্তিম হয়ে কাঁপছিল, যেন মাংস থেকে বঞ্চিত সিংহ গর্জন করছে। রাজাদের সেই সমাবেশ অক্ষয় সাগরের মতো উথলে উঠল—তার শেষ দেখা গেল না; সেনাবাহিনীই ছিল তার সীমাহীন জলরাশি। তাদের এমন শপথ ও চ্যালেঞ্জ করতে দেখে শ্রীকৃষ্ণ বুঝলেন—এরা এখন যুদ্ধের জন্য স্থিরসংকল্প।

Verse 19

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে; এতে সন্দেহ নেই।”

Verse 20

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিঃসন্দেহে নিহত হবে। হে রাজাগণ! কেশী দানববধকারী অনন্ত-পরাক্রমী ভগবান শ্রীকৃষ্ণের যে পূজা আমি করেছি, তা তোমাদের মধ্যে যারা সহ্য করতে পারে না, সেই সকল বলবানের মস্তকে আমি এই পদ স্থাপন করেছি। ভেবে-চিন্তেই আমি এ কথা বলেছি। যে উত্তর দিতে চায়, সে সামনে আসুক। সে আমার দ্বারা বধযোগ্য—এতে কোনো সংশয় নেই।”

Verse 21

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সে নিশ্চয়ই আমার হাতে নিহত হবে; এতে কোনো সংশয় নেই। হে রাজাগণ! কেশী দানববধকারী অনন্ত-পরাক্রমী ভগবান শ্রীকৃষ্ণের যে পূজা আমি করেছি, তা তোমাদের মধ্যে যারা সহ্য করতে পারে না, সেই সকল বলবানের মস্তকে আমি এই পদ স্থাপন করেছি। ভেবে-চিন্তেই আমি এ কথা বলেছি। যে উত্তর দিতে চায়, সে সামনে আসুক। সে আমার দ্বারা বধযোগ্য; এতে সন্দেহ নেই।”

Verse 22

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিঃসন্দেহে নিহত হবে; এতে কোনো সংশয় নেই।”

Verse 23

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিঃসন্দেহে নিহত হবে; এতে কোনো সংশয় নেই।”

Verse 24

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিঃসন্দেহে নিহত হবে; এতে কোনো সংশয় নেই।”

Verse 25

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে; এতে কোনো সন্দেহ নেই। হে রাজাগণ! কেশী দানববধকারী অনন্ত-পরাক্রমী ভগবান শ্রীকৃষ্ণের যে পূজা আমি করেছি, তোমাদের মধ্যে যে তা সহ্য করতে পারে না, সেই সকল বলবানের মস্তকে আমি এই পদ স্থাপন করেছি। ভেবে-চিন্তেই আমি এ কথা বলেছি। যে এর উত্তর দিতে চায়, সে সামনে আসুক। সে আমার দ্বারা বধযোগ্য; এতে সন্দেহ নেই।”

Verse 26

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে; এতে কোনো সন্দেহ নেই।”

Verse 27

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে; এতে কোনো সন্দেহ নেই।” এ ছিল সম্মান ও প্রতিশোধের প্রকাশ্য আহ্বান—কেশীবধকারী শ্রীকৃষ্ণের প্রতি প্রদর্শিত ভক্তি যে সহ্য করতে পারে না এবং বৈরিতায় এগিয়ে আসে, তাকে বধযোগ্য ঘোষণা করা হল।

Verse 28

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে; এতে কোনো সন্দেহ নেই।” প্রসঙ্গে এটি ছিল ইচ্ছাকৃত উসকানি—কেশীবধকারী শ্রীকৃষ্ণকে প্রদত্ত সম্মান যে সহ্য করতে পারে না, সে সামনে আসুক; তাকে বধযোগ্য গণ্য করা হবে।

Verse 29

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে; এতে কোনো সন্দেহ নেই।” এই কথোপকথনে হুমকিটিকে ইচ্ছাকৃতভাবে প্রকাশ্য চ্যালেঞ্জ করা হল—শ্রীকৃষ্ণকে প্রদত্ত সম্মান যে সহ্য করতে পারে না এবং বিরোধ করতে চায়, সে এগিয়ে আসুক; তাকে বধযোগ্য বলা হল।

Verse 30

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে—এতে কোনো সন্দেহ নেই। হে রাজাগণ! কেশী দানববধকারী অনন্ত-পরাক্রমী ভগবান শ্রীকৃষ্ণের যে পূজা আমি করেছি, তোমাদের মধ্যে যারা তা সহ্য করতে পারে না, সেই সকল বলবানের মস্তকে আমি এই পদ স্থাপন করলাম। ভেবে-চিন্তেই আমি এ কথা বলেছি। যে এর উত্তর দিতে চায়, সে সম্মুখে আসুক। আমার দ্বারা সে বধ্য; এতে সন্দেহ নেই।”

Verse 31

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

“সে একাই আমার হাতে নিহত হবে—এতে কোনো সন্দেহ নেই। হে রাজাগণ! কেশী দানববধকারী অনন্ত-পরাক্রমী ভগবান শ্রীকৃষ্ণের যে পূজা আমি করেছি, তোমাদের মধ্যে যারা তা সহ্য করতে পারে না, সেই সকল বলবানের মস্তকে আমি এই পদ স্থাপন করলাম। ভেবে-চিন্তেই আমি এ কথা বলেছি। যে এর উত্তর দিতে চায়, সে সম্মুখে আসুক। আমার দ্বারা সে বধ্য; এতে সন্দেহ নেই।”

Verse 32

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে—এতে কোনো সন্দেহ নেই।”

Verse 33

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है

“সেই ব্যক্তিই আমার হাতে নিহত হবে—এতে কোনো সন্দেহ নেই।”

Verse 39

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहररणपर्वणि राजमन्त्रणे एकोनचत्वारिंशो5ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অর্ঘাভিহরণ-পর্বে রাজমন্ত্রণা-প্রসঙ্গে ঊনচল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 43

अर्च्यमर्चितमर्घाहमनुजानन्तु ते नृपा: । 'जो बुद्धिमान्‌ राजा हों वे मेरे द्वारा की हुई आचार्य, पिता, गुरु, पूजनीय तथा अर्घ्यनिवेदनके सर्वथा योग्य भगवान्‌ श्रीकृष्णकी पूजाका हृदयसे अनुमोदन करें”

বৈশম্পায়ন বললেন— যে রাজারা সত্যই জ্ঞানী, তারা যেন অন্তর থেকে আমার সম্পাদিত এই পূজাকে অনুমোদন করেন— আচার্য, পিতা ও গুরুর ন্যায় পূজনীয় এবং অর্ঘ্য-অর্পণের পরম যোগ্য ভগবান শ্রীকৃষ্ণের পূজা।

Verse 53

मानिनां बलिनां राज्ञां मध्ये वै दर्शिते पदे । सहदेवने महामानी और बलवान्‌ राजाओंके बीच खड़े होकर अपना पैर दिखाया था, तो भी जो बुद्धिमान एवं श्रेष्ठ नरेश थे, उनमेंसे कोई कुछ न बोला

বৈশম্পায়ন বললেন— গর্বিত ও বলবান রাজাদের মাঝখানে সহদেব দাঁড়িয়ে নিজের পা প্রদর্শন করল; তবু সেখানে উপস্থিত জ্ঞানী ও শ্রেষ্ঠ নৃপতিদের মধ্যে কেউই একটি কথাও বলল না।

Verse 66

अदृश्यरूपा वाचश्चाप्यब्रुवन्‌ साधु साध्विति । उस समय सहदेवके मस्तकपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और अदृश्यरूपसे खड़े हुए देवताओंने 'साधु', 'साधु” कहकर उनके सत्साहसकी प्रशंसा की

বৈশম্পায়ন বললেন— অদৃশ্য কণ্ঠস্বর উঠল, “সাধু! সাধু!” তখন সহদেবের মস্তকের উপর আকাশ থেকে পুষ্পবৃষ্টি হল, আর অদৃশ্য দেবগণ তাঁর সৎসাহসের প্রশংসা করলেন।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether a provoked warrior response (Bhīma’s impulse to act) should override assembly order, or whether restraint under institutional authority (Bhīṣma’s intervention) better serves dharma in a public, multi-king setting.

The chapter underscores that dharma in governance includes managing anger and preserving procedural stability; senior counsel and self-restraint are portrayed as necessary correctives when rhetoric threatens to convert deliberation into immediate violence.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-level emphasis is conveyed narratively through Vaiśaṃpāyana’s depiction of anger’s effects and Bhīṣma’s successful de-escalation as an implicit lesson on sabhā-dharma.