
Adhyāya 32: Rājasūya-Dīkṣā and Appointment of Court Offices (राजसूयदीक्षा तथा अधिकारविनियोगः)
Upa-parva: Rājasūya-Yajña (Consecration and Court Administration Episode)
Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira, after respectfully approaching and saluting elders and teachers (including Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Aśvatthāman, and the Kaurava princes), requests their comprehensive support in the ongoing sacrifice. He declares his person and wealth as available for the ritual’s requirements and invites them to be satisfied according to their wish, without constraint, thereby framing the yajña as a collective institutional undertaking. Having been initiated (dīkṣita), he immediately assigns responsibilities: Duḥśāsana is placed over provisioning of foods and delicacies; Aśvatthāman is tasked with managing brāhmaṇa requisitions and allocations; Saṃjaya is appointed for receiving and honoring visiting kings; Bhīṣma and Droṇa are positioned to evaluate what has been done and what remains (kṛtākṛta-parijñāna), functioning as senior auditors and supervisors. Kṛpa is assigned oversight of gold, precious metals, gems, and the distribution of dakṣiṇā, while other ‘men of prowess’ are placed in further roles as needed. The narrative then describes the influx of rulers and populations eager to witness the sabhā and the Dharmarāja, the competitive gifting of jewels and wealth, and the construction of splendid residences and brāhmaṇa lodgings. The sacrifice is depicted as abundantly provisioned, ritually complete with homa offerings and mantra discipline, satisfying deities, sages, brāhmaṇas, and all social orders through food, gifts, and orderly hospitality.
Chapter Arc: खाण्डवप्रस्थ/इन्द्रप्रस्थ की राजसभा में युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ हेतु दिग्विजय का संकल्प—और माद्रीपुत्र नकुल का पश्चिमाभिमुख प्रस्थान, विशाल सेना के साथ धरती को रथ-नेमि-निनाद और सिंहनाद से कंपाता हुआ। → नकुल की यात्रा ‘प्रतीची’ दिशा में दूर-दूर तक फैलती है—पञ्चनद, अमरपर्वत, उत्तरज्योतिष, दिव्यकट-पुर जैसे प्रदेशों का उल्लेख; फिर समुद्र-कुक्षि-स्थित द्वीपों के ‘म्लेच्छ’ समुदायों (पह्नव, बर्बर, किरात, यवन, शक) से सामना, जिनकी ‘परमदारुण’ प्रकृति विजय को कठिन बनाती है। → समुद्री द्वीपों के कठोर जनों पर नकुल का निर्णायक पराक्रम—उन्हें वश में कर रत्न-संपदा का संग्रह; आगे दशार्ण आदि जनपदों तथा ‘उत्सवसंकेत’ नामक गणों पर विजय, जिससे पश्चिम-दिग्विजय की धुरी स्थिर हो जाती है। → विजय-रत्नों सहित नकुल का इन्द्रप्रस्थ लौटना और युधिष्ठिर को धन-समर्पण; मार्ग में शल्य द्वारा नकुल का यथावत् सत्कार और भेंट-स्वरूप बहु-रत्न प्रदान—राजसूय के लिए आवश्यक वैभव का संचित होना। → राजसूय-यज्ञ की तैयारी अब निर्णायक चरण में—अन्य दिशाओं के विजयों और समर्पित धन-रत्नों के साथ सभा में बढ़ती प्रतिष्ठा आगे किसको असह्य होगी?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०० श्लोक मिलाकर कुल १७८ श्लोक हैं) पम्प छा अड्-कााज - यह इक्ष्वाकुवंशीय दुर्जयका पुत्र था। इसका दूसरा नाम दुर्योधन था। यह राजा बड़ा धर्मात्मा था। इसकी कथा अनुशासनपर्वके दूसरे अध्यायमें आती है। > जो अपने कानोंसे ही शरीरको ढक लें उन्हें “कर्णप्रावरण' कहते हैं। प्राचीन कालमें ऐसी जातिके लोग थे, जिनके कान पैरोंतक लटकते थे। द्वात्रिशोडध्याय: नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय वैशम्पायन उवाच नकुलस्य तु वक्ष्यामि कर्माणि विजयं तथा । वासुदेवजितामाशां यथासावजयतू प्रभु:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अब मैं नकुलके पराक्रम और विजयका वर्णन करूँगा। शक्तिशाली नकुलने जिस प्रकार भगवान् वासुदेवद्वारा अधिकृत पश्चिम दिशापर विजय पायी थी, वह सुनो
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়, এখন আমি নকুলের কর্ম ও বিজয়ের কথা বলব—পরাক্রমী নকুল কীভাবে বাসুদেবের অধিকারভুক্ত পশ্চিম দিক জয় করেছিলেন, তা শোনো।
Verse 2
निर्याय खाण्डवप्रस्थात् प्रतीचीमभितोदिशम् । उद्दिश्य मतिमान् प्रायान्महत्या सेनया सह,बुद्धिमान माद्रीकुमारने विशाल सेनाके साथ खाण्डवप्रस्थसे निकलकर पश्चिम दिशामें जानेके लिये प्रस्थान किया
খাণ্ডবপ্রস্থ থেকে বেরিয়ে প্রজ্ঞাবান রাজপুত্র মহাসেনাসহ পশ্চিম দিক অভিমুখে, স্থির সংকল্পে যাত্রা করলেন।
Verse 3
सिंहनादेन महता योधानां गर्जितिेन च । रथनेमिनिनादैश्व कम्पयन् वसुधामिमाम्,वे अपने सैनिकोंके महान् सिंहनाद, गर्जना तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटकी तुमुल ध्वनिसे इस पृथ्वीको कम्पित करते हुए जा रहे थे
যোদ্ধাদের মহাসিংহনাদ, গর্জন এবং রথচক্রের গম্ভীর ঘর্ঘরধ্বনিতে তারা এই পৃথিবীকেই কাঁপিয়ে অগ্রসর হচ্ছিল।
Verse 4
ततो बहुधनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत् | कार्तिकेयस्य दयितं रोहीतकमुपाद्रवत्,जाते-जाते वे बहुत धन-धान्यसे सम्पन्न, गौओंकी बहुलतासे युक्त तथा स्वामिकार्तिकेयके अत्यन्त प्रिय रमणीय रोहीतक- पर्वत एवं उसके समीपवर्ती देशमें जा पहुँचे
তারপর তারা রোহীতকে পৌঁছাল—অতিশয় মনোরম, বিপুল ধন-ধান্যে সমৃদ্ধ, গবাদিপশুতে পরিপূর্ণ, এবং দেবসেনাপতি কার্ত্তিকেয়ের প্রিয় সেই দেশ।
Verse 5
तत्र युद्ध महच्चासीच्छूरैर्मत्तमयूरकै: । मरुभूमिं स कार्त्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम्,वहाँ उनका मत्तमयूर नामवाले शूरवीर क्षत्रियोंके साथ घोर संग्राम हुआ। उसपर अधिकार करनेके पश्चात् महान् तेजस्वी नकुलने समूची मरुभूमि (मारवाड़), प्रचुर धन- धान्यपूर्ण शैरीषक और महोत्थ नामक देशोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया। महोत्थ देशके अधिपति राजर्षि आक्रोशको भी जीत लिया। आक्रोशके साथ उनका बड़ा भारी युद्ध हुआ था
সেখানে ‘মত্তময়ূর’ নামে খ্যাত বীর ক্ষত্রিয়দের সঙ্গে এক মহাযুদ্ধ সংঘটিত হল; তারপর তিনি সমগ্র মরুভূমি-প্রদেশ এবং ‘বহুধান্যক’ দেশকেও বশে আনলেন।
Verse 6
शैरीषकं महोत्थं च वशे चक्रे महाद्युति: । आक्रोशं चैव राजर्षि तेन युद्धमभून्महत्,वहाँ उनका मत्तमयूर नामवाले शूरवीर क्षत्रियोंके साथ घोर संग्राम हुआ। उसपर अधिकार करनेके पश्चात् महान् तेजस्वी नकुलने समूची मरुभूमि (मारवाड़), प्रचुर धन- धान्यपूर्ण शैरीषक और महोत्थ नामक देशोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया। महोत्थ देशके अधिपति राजर्षि आक्रोशको भी जीत लिया। आक्रोशके साथ उनका बड़ा भारी युद्ध हुआ था
মহাতেজস্বী (নকুল) শৈরীষক ও মহোত্থকে বশে আনলেন; আর রাজর্ষি আক্রোশকেও পরাভূত করলেন—তার সঙ্গে এক মহাযুদ্ধ সংঘটিত হয়েছিল।
Verse 7
तान् दशार्णान् स जित्वा च प्रतस्थे पाण्डुनन्दन: । शिबींस्त्रिगर्तानम्बष्ठानू मालवान् पञज्चकर्पटान्
বৈশম্পায়ন বললেন—দশার্ণদের জয় করে পাণ্ডুনন্দন অগ্রসর হলেন; তারপর ক্রমে শিবি, ত্রিগর্ত, অম্বষ্ঠ, মালব ও পঞ্চকর্ফটদেরও পরাভূত করে বশে আনলেন।
Verse 8
पुनश्न परिवृत्याथ पुष्करारण्यवासिन:
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর তারা আবার ফিরে ঘুরে, পুষ্কর অরণ্যের অধিবাসীরা অগ্রসর হল।
Verse 9
सिन्धुकूलश्रिता ये च ग्रामणीया महाबला:,समुद्रके तटपर रहनेवाले जो महाबली ग्रामणीय (ग्राम शासकके वंशज) क्षत्रिय थे, सरस्वती नदीके किनारे निवास करनेवाले जो शूद्र आभीरगण थे, मछलियोंसे जीविका चलानेवाले जो धीवर जातिके लोग थे तथा जो पर्वतोंपर वास करनेवाले दूसरे-दूसरे मनुष्य थे, उन सबको नकुलने जीतकर अपने वशमें कर लिया
বৈশম্পায়ন বললেন—সিন্ধুর তীরে বসবাসকারী গ্রামণীয়-বংশোদ্ভূত মহাবলী ক্ষত্রিয় প্রধানরা, সরস্বতীর তীরে থাকা শূদ্র আভীরগণ, মৎস্যজীবী ধীবররা এবং পর্বতবাসী নানা জনপদীয় মানুষ—এ সকলকে মহাবলী নকুল জয় করে বশে আনলেন।
Verse 10
शूद्राभीरगणाश्रैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम् । वर्तयन्ति च ये मत्स्यैयें च पर्वतवासिन:,समुद्रके तटपर रहनेवाले जो महाबली ग्रामणीय (ग्राम शासकके वंशज) क्षत्रिय थे, सरस्वती नदीके किनारे निवास करनेवाले जो शूद्र आभीरगण थे, मछलियोंसे जीविका चलानेवाले जो धीवर जातिके लोग थे तथा जो पर्वतोंपर वास करनेवाले दूसरे-दूसरे मनुष्य थे, उन सबको नकुलने जीतकर अपने वशमें कर लिया
বৈশম্পায়ন বললেন—সরস্বতীর তীরে আশ্রিত শূদ্র ও আভীরগণ, মৎস্যজীবী লোকেরা এবং পর্বতবাসী অন্যান্য মানুষ—এ সকলকে মহাবলী নকুল জয় করে বশে আনলেন।
Verse 11
कृत्स्नं पज्चनदं चैव तथैवामरपर्वतम् | उत्तरज्योतिषं चैव तथा दिव्यकटं पुरम्
বৈশম্পায়ন বললেন—সমগ্র পঞ্চনদ অঞ্চল, তদ্রূপ অমরপর্বত; এবং উত্তরজ্যোতিষ, আর দিব্যকট নামে নগর—এসবও (তার) অধিকার/বিবরণে অন্তর্ভুক্ত হল।
Verse 12
द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युति: । फिर सम्पूर्ण पंचनददेश (पंजाब), अमरपर्वत, उत्तरज्योतिष, दिव्यकट नगर और द्वारपालपुरको अत्यन्त कान्तिमान् नकुलने शीघ्र ही अपने अधिकारमें कर लिया ।। ११ $ || रामठान् हारहृणांश्व प्रतीच्याश्नैव ये नृपा:,रामठ, हार, हूण तथा अन्य जो पश्चिमी नरेश थे, उन सबको पाण्डुकुमार नकुलने आज्ञामात्रसे ही अपने अधीन कर लिया। भारत! वहीं रहकर उन्होंने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके पास दूत भेजा
বৈশম্পায়ন বললেন—মহাতেজস্বী নকুল ত্বরায় দ্বারপালকেও বশে আনলেন। তারপর তিনি পঞ্চনদদেশ (পাঞ্জাব), অমরপর্বত, উত্তরজ্যোতিষ, দিব্যকট নগর এবং দ্বারপালপুরও দ্রুত নিজের অধিকারে আনলেন।
Verse 13
तान् सर्वान् स वशे चक्रे शासनादेव पाण्डव: । तत्रस्थ: प्रेषयामास वासुदेवाय भारत,रामठ, हार, हूण तथा अन्य जो पश्चिमी नरेश थे, उन सबको पाण्डुकुमार नकुलने आज्ञामात्रसे ही अपने अधीन कर लिया। भारत! वहीं रहकर उन्होंने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके पास दूत भेजा
পাণ্ডব নকুল কেবল আদেশমাত্রেই তাদের সকলকে বশে আনলেন। হে ভারত! সেখানেই অবস্থান করে তিনি বাসুদেবনন্দন শ্রীকৃষ্ণের কাছে দূত পাঠালেন।
Verse 14
स चास्य गतभी राजन् प्रतिजग्राह शासनम् | तत: शाकलमभ्येत्य मद्राणां पुटभेदनम्,मातुलं प्रीतिपूर्वेण शल्यं चक्रे वशे बली । राजन! उन्होंने केवल प्रेमके कारण नकुलका शासन स्वीकार कर लिया। इसके बाद शाकलदेशको जीतकर बलवान् नकुलने मद्रदेशकी राजधानीमें प्रवेश किया और वहाँके शासक अपने मामा शल्यको प्रेमसे ही वशमें कर लिया
রাজন! তিনি ভয়মুক্ত হয়ে নকুলের আদেশ গ্রহণ করলেন। তারপর শাকল জয় করে বলবান নকুল মদ্রদের রাজধানী পুটভেদনে প্রবেশ করলেন এবং সেখানে কেবল স্নেহবশে মাতুল শল্যকে নিজের প্রভাবে আনলেন।
Verse 15
स तेन सत्कृतो राज्ञा सत्काराहों विशाम्पते
হে বিশামপতে! সম্মানের যোগ্য নকুলকে সেই রাজা যথোচিত মর্যাদা দিলেন।
Verse 16
ततः सागरकुक्षिस्थान् म्लेच्छान्ू परमदारुणान्,तदनन्तर समुद्री टापुओंमें रहनेवाले अत्यन्त भयंकर म्लेच्छ, पह्नव, बर्बर, किरात, यवन और शकोंको जीतकर उनसे रत्नोंकी भेंट ले विजयके विचित्र उपायोंके जाननेवाले कुरुश्रेष्ठ नकुल इन्द्रप्रसथ्थकी ओर लौटे
তারপর নকুল সমুদ্রকোলে ও দ্বীপাঞ্চলে বসবাসকারী অতিভয়ংকর ম্লেচ্ছদের জয় করলেন। তাদের কাছ থেকে রত্ন-উপহার গ্রহণ করে, বিচিত্র বিজয়োপায়ে পারদর্শী কুরুশ্রেষ্ঠ নকুল ইন্দ্রপ্রস্থের দিকে প্রত্যাবর্তন করলেন।
Verse 17
पह्ववान् बर्बरांश्नैव किरातान् यवनाञछ्छकान् । ततो रत्नान्युपादाय वशे कृत्वा च पार्थिवान् | न्यवर्तत कुरुश्रेष्ठो नकुलश्रित्रमार्गवित्,तदनन्तर समुद्री टापुओंमें रहनेवाले अत्यन्त भयंकर म्लेच्छ, पह्नव, बर्बर, किरात, यवन और शकोंको जीतकर उनसे रत्नोंकी भेंट ले विजयके विचित्र उपायोंके जाननेवाले कुरुश्रेष्ठ नकुल इन्द्रप्रसथ्थकी ओर लौटे
বৈশম্পায়ন বললেন— কুরুশ্রেষ্ঠ নকুল, নানাবিধ কৌশলে পারদর্শী, সমুদ্রদ্বীপবাসী ভয়ংকর ম্লেচ্ছ—পহ্লব, বর্বর, কিরাত, যবন ও শক—এদের জয় করে বশে আনলেন। তারপর সেই রাজাদের কাছ থেকে রত্ন-উপহার গ্রহণ করে তিনি ইন্দ্রপ্রস্থের দিকে প্রত্যাবর্তন করলেন।
Verse 18
करभाणां सहस्राणि कोशं तस्य महात्मन: । ऊहुर्दश महाराज कृच्छादिव महाधनम्,महाराज! उन महामना नकुलके बहुमूल्य खजानेका बोझ दस हजार हाथी बड़ी कठिनाईसे ढो रहे थे
বৈশম্পায়ন বললেন— মহারাজ! সেই মহাত্মা নকুলের কোষাগারের ধন হাজার হাজার উট বহন করছিল; আর দশ হাজার হাতি যেন কষ্টসাধ্যভাবে সেই বিপুল সম্পদের ভার বয়ে নিয়ে চলেছিল।
Verse 19
इन्द्रप्रस्थगतं वीरमभ्येत्य स युधिष्ठटिरम् । ततो माद्रीसुत: श्रीमान् धनं तस्मै न््यवेदयेत्,तदनन्तर श्रीमान् माद्रीकुमारने इन्द्रप्रस्थमें विराजमान वीरवर राजा युधिष्ठिससे मिलकर वह सारा धन उन्हें समर्पित कर दिया
বৈশম্পায়ন বললেন— ইন্দ্রপ্রস্থে অবস্থানরত বীর যুধিষ্ঠিরের কাছে গিয়ে মাদ্রীপুত্র শ্রীমান নকুল তাঁর অর্জিত সমস্ত ধন যথাবিধি নিবেদন করলেন।
Verse 20
एवं विजित्य नकुलो दिशं वरुणपालिताम् | प्रतीचीं वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान् वासुदेवके द्वारा अपने अधिकारमें की हुई, वरुणपालित पश्चिम दिशापर विजय पाकर नकुल इन्द्रप्रस्थ लौट आये
বৈশম্পায়ন বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এইভাবে বরুণ-রক্ষিত পশ্চিম দিক—যা পূর্বেই ভগবান বাসুদেবের দ্বারা বশীভূত হয়েছিল—তা জয় করে কুরুনন্দন নকুল ইন্দ্রপ্রস্থে প্রত্যাবর্তন করলেন।
Verse 31
इस प्रकार श्रीमहाभारत यभापव॑के अन्तर्गत विग्विजयपर्वमें सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দিগ্বিজয়পর্বে সহদেবের দক্ষিণ দিক-বিজয় বিষয়ক একত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 32
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि नकुलप्रतीचीविजये द्वात्रिंशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের দিগ্বিজয়পর্বে নকুলের পশ্চিমদিগ্বিজয়-বিষয়ক বত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 76
तथा माध्यमिकांश्चैव वाटधानान् द्विजानथ । तत्पश्चात् दशार्णदेशपर विजय प्राप्त करके पाण्डुनन्दन नकुलने शिबि, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, मालव, पंचकर्पट एवं माध्यमिक देशोंको प्रस्थान किया और उन सबको जीतकर वाटधानदेशीय क्षत्रियोंको भी हराया
বৈশম্পায়ন বললেন—তদ্রূপ তিনি মাধ্যমিকদের এবং পরে বাটধানদেরও বশে আনলেন। তারপর দশার্ণদেশে বিজয় লাভ করে পাণ্ডুনন্দন নকুল শিবি, ত্রিগর্ত, অম্বষ্ঠ, মালব, পঞ্চকರ್ಪট ও মাধ্যমিক জনপদের দিকে অগ্রসর হলেন; সকলকে জয় করে বাটধানদেশীয় ক্ষত্রিয়দেরও পরাভূত করলেন।
Verse 86
गणानुत्सवसंकेतान् व्यजयत् पुरुषर्षभ: । पुनः उधरसे लौटकर नरश्रेष्ठ नकुलने पुष्करारण्य-निवासी उत्सवसंकेत नामक गणोंको परास्त किया
বৈশম্পায়ন বললেন—পুরুষশ্রেষ্ঠ তিনি ‘উৎসবসংকেত’ নামে পরিচিত গণসমূহকে জয় করলেন। পরে আবার উধরসা থেকে ফিরে এসে নরশ্রেষ্ঠ নকুল পুষ্কর অরণ্যে নিবাসকারী সেই উৎসবসংকেত গণদের পরাভূত করলেন।
Verse 153
रत्नानि भूरीण्यादाय सम्प्रतस्थे युधाम्पति: । राजन! राजा शल्यने सत्कारके योग्य नकुलका यथावत् सत्कार किया। शल्यसे भेंटमें बहुत-से रत्न लेकर योद्धाओंके अधिपति माद्रीकुमार आगे बढ़ गये
বৈশম্পায়ন বললেন—অসংখ্য রত্ন সঙ্গে নিয়ে যোদ্ধাদের অধিপতি অগ্রসর হলেন। রাজন, রাজা শল্য সম্মানের যোগ্য নকুলকে যথাযথ আতিথ্য ও সম্মান প্রদান করলেন। তারপর শল্যের জন্য উপহারস্বরূপ বহু রত্ন নিয়ে মাদ্রীপুত্র, যোদ্ধাদের অগ্রগণ্য, এগিয়ে গেলেন।
The chapter foregrounds ethical governance through delegation: authority is distributed to prevent disorder, bias, and waste, implying that ritual and public legitimacy depend on transparent roles and supervision rather than personal will alone.
Effective leadership is shown as the capacity to align respected elders, skilled agents, and clear procedures—provisioning, honoring guests, auditing progress, and regulating wealth—so that collective aims are achieved without coercive micromanagement.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is implicit in the narrative logic: orderly administration and principled giving are presented as the enabling conditions for ritual completion and broad social satisfaction.