
मागधगिरिव्रजप्रवेशः — Entry into Girivraja and Jarāsandha’s Protocol Inquiry
Upa-parva: Giri-vraja (Māgadha) Praveśa — Jarāsandha-sanniveśa Episode
The chapter opens with Vāsudeva describing to Pārtha (Arjuna) the auspicious Māgadha settlement and the natural fortification of Girivraja by five prominent peaks, portraying the city as protected by mountain ridges and fragrant forests. The narration (Vaiśaṃpāyana) then follows Kṛṣṇa, Bhīma, and Arjuna as they proceed to the Māgadha capital, observing its populous, prosperous streets, markets, and festival-like abundance. They forcefully acquire garlands and adopt an outward appearance consistent with a chosen disguise, moving toward Jarāsandha’s residence with deliberate intent. Jarāsandha, engaged in ritual proceedings, receives them with the customary honors due to visiting brāhmaṇas, yet becomes suspicious because their bodily marks and ornamentation conflict with snātaka norms. He questions their identity, their breach of a mountain-shrine structure for entry, and the purpose of their arrival, emphasizing that truth is fitting for kings. Kṛṣṇa replies with a calibrated ethical rationale: social rules differ by class and context, kṣatriya prosperity is associated with visible signs, and entry conventions vary between hostile and friendly houses. He concludes that those who arrive with an objective do not accept honors from an adversary, presenting a principled justification for refusing ritual hospitality while maintaining truthful discourse.
Chapter Arc: तपोवन-चर महर्षि चण्डकौशिक का आगमन होता है; मथुरा के नरेश बृहद्रथ (भविष्य के जरासंध के पिता) उन्हें नगर-समेत, अमात्यों और परिवार सहित आदरपूर्वक लेने निकलते हैं। → राजा पाद्य-अर्घ्य-आचमनीय से पूजन कर महर्षि को संतुष्ट करता है और राज्य-समृद्धि सहित अपने पुत्र के विषय में जिज्ञासा/निवेदन करता है—यह पुत्र कैसा होगा, उसका भाग्य क्या लिखेगा? → चण्डकौशिक दिव्यदृष्टि से भविष्यवाणी करते हैं: यह पुत्र (जरासंध) असाधारण सामर्थ्यवान होगा; अन्य नरेश उसके आज्ञाधीन होंगे—जैसे देहधारी प्राणियों पर वायु का स्वाभाविक अधिकार होता है, वैसे ही उसका प्रभुत्व फैलेगा। → वैशम्पायन आगे बताते हैं कि दीर्घकाल तपोवन में रहकर बृहद्रथ पत्नी सहित स्वर्गगमन करते हैं; समय के साथ मथुरा-प्रदेश में गदा-परंपरा/गदावसान की ख्याति और जरासंध के राज्य-तंत्र का उभार संकेतित होता है। → मथुरा के निकट ‘गदावसान’ की सूचना नगरवासियों द्वारा श्रीकृष्ण तक पहुँचती है और जरासंध के मंत्रि-परिषद (हंस-डिम्भक आदि) का उल्लेख आगे के राजनीतिक संघर्ष की भूमिका बाँध देता है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १३ श्लोक हैं) ऑपनआक्राा बा 5 एकोनविशो< ध्याय: चण्डकौशिक मुनिके द्वारा जरासंधका भविष्यकथन तथा पिताके द्वारा उसका राज्याभिषेक करके वनमें जाना श्रीकृष्ण उवाच कस्यचित् त्वथ कालस्य पुनरेव महातपा: । मगधेषूपचक्राम भगवांश्षण्डकौशिक:,श्रीकृष्ण कहते हैं--राजन्! कुछ कालके पश्चात् महातपस्वी भगवान् चण्डकौशिक मुनि पुनः मगधदेशमें घूमते हुए आये
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—হে রাজন! কিছু কাল পরে মহাতপস্বী ভগবান চণ্ডকৌশিক মুনি পুনরায় মগধদেশে বিচরণ করতে করতে এলেন।
Verse 2
तस्यागमनसंदृष्ट: सामात्य: सपुर:सर: । सभार्य: सह पुत्रेण निर्जगाम बृहद्रथ:,उनके आगमनसे राजा बृहद्रथको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे मन्त्री, अग्रगामी सेवक, रानी तथा पुत्रके साथ मुनिके पास गये
মুনির আগমন দেখে রাজা বৃহদ্রথ পরম আনন্দিত হলেন। তিনি মন্ত্রীগণ, অগ্রগামী পরিচারকবর্গ, রানি ও পুত্রসহ মুনির অভ্যর্থনায় বাইরে গেলেন।
Verse 3
पाद्यार्ष्याचमनीयैस्तमर्चयामास भारत | स नृपो राज्यसहितं पुत्र॑ तस्मै न््यवेदयत्,भारत! पाद्य, अर््ध और आचमनीय आदिके द्वारा राजाने महर्षिका पूजन किया और अपने सारे राज्यके सहित पुत्रको उन्हें सौंप दिया
হে ভারত, রাজা পাদ্য, অর্ঘ্য ও আচমনীয় প্রভৃতি নিবেদন করে মহর্ষিকে পূজা করলেন। তারপর তিনি সমগ্র রাজ্যসহ নিজের পুত্রকে তাঁর হাতে অর্পণ করলেন।
Verse 4
प्रतिगृह् च तां पूजां पार्थिवाद् भगवानृषि: । उवाच मागध॑ राजन प्रह्ृष्टेनान्तरात्मना,महाराज! राजाकी ओरसे प्राप्त हुई उस पूजाको स्वीकार करके ऐश्वर्यशाली महर्षिने मगधनरेशको सम्बोधित करके प्रसन्न चित्तसे कहा--“राजन्! जरासंधके जन्मसे लेकर अबतककी सारी बातें मुझे दिव्य दृष्टिसे ज्ञात हो चुकी हैं। राजेन्द्र! अब यह सुनो कि तुम्हारा पुत्र भविष्यमें कैसा होगा?
রাজার প্রদত্ত সেই পূজা গ্রহণ করে ভগবান ঋষি অন্তরে প্রীত হয়ে মগধরাজকে বললেন—“হে রাজন, তোমার পুত্রের জন্ম থেকে এ পর্যন্ত সকল ঘটনা আমার দিব্যদৃষ্টিতে জ্ঞাত। এখন শোনো, ভবিষ্যতে তোমার পুত্র কেমন হবে।”
Verse 5
सर्वमेतन्मया ज्ञातं राजन् दिव्येन चक्षुषा । पुत्रस्तु शृणु राजेन्द्र यादृशो5यं भविष्यति,महाराज! राजाकी ओरसे प्राप्त हुई उस पूजाको स्वीकार करके ऐश्वर्यशाली महर्षिने मगधनरेशको सम्बोधित करके प्रसन्न चित्तसे कहा--“राजन्! जरासंधके जन्मसे लेकर अबतककी सारी बातें मुझे दिव्य दृष्टिसे ज्ञात हो चुकी हैं। राजेन्द्र! अब यह सुनो कि तुम्हारा पुत्र भविष्यमें कैसा होगा?
হে রাজন, এ সবই আমার দিব্যদৃষ্টিতে জ্ঞাত। হে রাজেন্দ্র, এখন শোনো—ভবিষ্যতে এই পুত্র কেমন হবে।
Verse 6
अस्य रूपं च सत्त्वं च बलमूर्जितमेव च । एष श्रिया समुदित: पुत्रस्तव न संशय:,“इसमें रूप, सत्त्व, बल और ओजका विशेष आविर्भाव होगा। इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारा यह पुत्र साम्राज्यलक्ष्मीसे सम्पन्न होगा
এ পুত্রে রূপ, সত্ত্ব, বল ও তেজের বিশেষ প্রকাশ হবে। সন্দেহ নেই—তোমার এই পুত্র শ্রী-সমৃদ্ধিতে সমুজ্জ্বল হবে।
Verse 7
प्रापयिष्यति तत् सर्व विक्रमेण समन्वित: । अस्य वीर्यवतो वीर्य नानुयास्यन्ति पार्थिवा:,“यह पराक्रमयुक्त होकर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेगा। जैसे उड़ते हुए गरुडके वेगको दूसरे पक्षी नहीं पा सकते, उसी प्रकार इस बलवान् राजकुमारके शौर्यका अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सकेंगे। जो लोग इससे शत्रुता करेंगे, वे नष्ट हो जायूँगे
এই বীর পরাক্রমে সমন্বিত হয়ে নিজ শক্তিতেই সমস্ত অভীষ্ট লাভ করবে। যেমন উড়ন্ত গরুড়ের বেগ অন্য পাখি ধরতে পারে না, তেমনি এই শক্তিমান রাজপুত্রের বীর্য অনুসরণ করতে পারবে না অন্য পার্থিব রাজারা।
Verse 8
पततो वैनतेयस्य गतिमन्ये यथा खगा: । विनाशमुपयास्यन्ति ये चास्य परिपन्थिन:,“यह पराक्रमयुक्त होकर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेगा। जैसे उड़ते हुए गरुडके वेगको दूसरे पक्षी नहीं पा सकते, उसी प्रकार इस बलवान् राजकुमारके शौर्यका अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सकेंगे। जो लोग इससे शत्रुता करेंगे, वे नष्ट हो जायूँगे
যেমন উড়ন্ত বৈনতেয় (গরুড়)-এর গতি অন্য পাখিরা ধরতে পারে না, তেমনি এর পরাক্রমের সঙ্গে কেউ পাল্লা দিতে পারবে না। আর যারা শত্রুতা করে এর পথে বাধা হবে, তারা অবশ্যম্ভাবীভাবে বিনাশে পতিত হবে।
Verse 9
देवैरपि विसृष्टानि शस्त्राण्यस्य महीपते । न रुजं जनयिष्यन्ति गिरेरिव नदीरया:,“महीपते! जैसे नदीका वेग किसी पर्वतको पीड़ा नहीं पहुँचा सकता, उसी प्रकार देवताओंके छोड़े हुए अस्त्र-शस्त्र भी इसे चोट नहीं पहुँचा सकेंगे
হে মহীপতি! দেবতাদের নিক্ষিপ্ত অস্ত্রশস্ত্রও একে ব্যথিত করতে পারবে না; যেমন নদীর প্রবল স্রোত পর্বতকে আঘাত করতে পারে না।
Verse 10
सर्वमूर्धाभिषिक्तानामेष मुर्धश्नि ज्वलिष्यति । प्रभाहरो<यं सर्वेषां ज्योतिषामिव भास्कर:,“जिनके मस्तकपर राज्याभिषेक हुआ है, उन सभी राजाओंके ऊपर रहकर यह अपने तेजसे प्रकाशित होता रहेगा। जैसे सूर्य समस्त ग्रह-नक्षत्रोंकी कान्ति हर लेते हैं, उसी प्रकार यह राजकुमार समस्त राजाओंके तेजको तिरस्कृत कर देगा
মস্তকে রাজ্যাভিষেকপ্রাপ্ত সকল রাজার ঊর্ধ্বে এ রাজপুত্র শিরোমণির ন্যায় দীপ্ত হবে। যেমন ভাস্কর সকল জ্যোতির দীপ্তি হরণ করে, তেমনি সে সকল নৃপতির তেজকে ম্লান করে দেবে।
Verse 11
एनमासाद्य राजान: समृद्धबलवाहना: । विनाशमुपयास्यन्ति शलभा इव पावकम्,“जैसे फतिंगे आगमें जलकर भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार सेना और सवारियोंसे भरे- पूरे समृद्धिशाली नरेश भी इससे टक्कर लेते ही नष्ट हो जायँगे
সৈন্য ও বাহনে সমৃদ্ধ রাজারা পর্যন্ত একে সম্মুখে পেয়ে বিনাশে পতিত হবে—যেমন পতঙ্গ আগুনে ঝাঁপ দেয়।
Verse 12
एष श्रिय: समुदिता: सर्वराज्ञां ग्रहीष्यति । वर्षास्विवोदीर्णजला नदीर्नदनदीपति:,“यह समस्त राजाओंकी संगृहीत सम्पदाओंको उसी प्रकार अपने अधिकारमें कर लेगा, जैसे नदों और नदियोंका अधिपति समुद्र वर्षा-ऋतुमें बढ़े हुए जलवाली नदियोंको अपनेमें मिला लेता है
এ সমগ্র রাজাদের সঞ্চিত ঐশ্বর্যকে তেমনই নিজের অধিকারে আনবে, যেমন বর্ষাকালে স্ফীত জলধারার নদীগুলিকে নদ-নদীর অধিপতি সমুদ্র নিজের মধ্যে বিলীন করে নেয়।
Verse 13
एष धारयिता सम्यक् चातुर्वर्ण्य महाबल: । शुभाशुभमिव स्फीता सर्वसस्यधरा धरा,“यह महाबली राजकुमार चारों वर्णोको भलीभाँति धारण करेगा (उन्हें आश्रय देगा;) ठीक वैसे ही, जैसे सभी प्रकारके धान्योंको धारण करनेवाली समृद्धिशालिनी पृथ्वी शुभ और अशुभ सबको आश्रय देती है
এই মহাবলী রাজকুমার চার বর্ণকে যথাযথভাবে ধারণ করবে (আশ্রয় দেবে); যেমন সর্বশস্যধারিণী সমৃদ্ধ পৃথিবী শুভ-অশুভ সকলকেই আশ্রয় দেয়।
Verse 14
अस्याज्ञावशगा: सर्वे भविष्यन्ति नराधिपा: । सर्वभूतात्मभूतस्य वायोरिव शरीरिण:,“जैसे सब देहधारी समस्त प्राणियोंके आत्मारूप वायुदेवके अधीन होते हैं, उसी प्रकार सभी नरेश इसकी आज्ञाके अधीन होंगे
যেমন দেহধারী সকল প্রাণী সর্বভূতের আত্মাস্বরূপ বায়ুর অধীন, তেমনই সকল নরাধিপতি এর আজ্ঞাধীন হবে।
Verse 15
एष रुद्रं महादेवं त्रिपुरान्तकरं हरम् | सर्वलोकेष्वतिबल: साक्षाद् द्रक्ष्यति मागध:,“यह मगधराज सम्पूर्ण लोकोंमें अत्यन्त बलवान् होगा और त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले सर्वदुःखहारी महादेव रुद्रकी आराधना करके उनका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त करेगा”
এই মগধরাজ সর্বলোকের মধ্যে অতিবলবান হবে এবং ত্রিপুরান্তক, দুঃখহারী মহাদেব রুদ্রের আরাধনা করে তাঁর প্রত্যক্ষ দর্শন লাভ করবে।
Verse 16
एवं ब्रुवन्नेव मुनि: स्वकार्यमिव चिन्तयन् । विसर्जयामास नृपं बृहद्रथमथारिहन्,शत्रुसूदन नरेश! ऐसा कहकर अपने कार्यके चिन्तनमें लगे हुए मुनिने राजा बृहद्रथको विदा कर दिया
হে শত্রুসূদন নৃপ! এ কথা বলে, যেন নিজেরই কর্তব্যচিন্তায় নিমগ্ন, মুনি তখন রাজা বৃহদ্রথকে বিদায় দিলেন।
Verse 17
प्रविश्य नगरीं चापि ज्ञातिसम्बन्धिभिववृत: । अभिषिच्य जरासंधं मगधाधिपतिस्तदा,राजधानीमें प्रवेश करके अपने जाति-भाइयों और सगे-सम्बन्धियोंसे घिरे हुए मगधनरेश बृहद्रथने उसी समय जरासंधका राज्याभिषेक कर दिया। ऐसा करके उन्हें बड़ा संतोष हुआ। जरासंधका अभिषेक हो जानेपर महाराज बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनमें चले गये
রাজধানীতে প্রবেশ করে, আত্মীয়স্বজন ও কুলবর্গে পরিবৃত মগধাধিপতি বৃহদ্রথ তখনই জরাসন্ধকে রাজ্যাভিষেক করালেন। সিংহাসনে প্রতিষ্ঠা করে তিনি পরম তৃপ্তি লাভ করলেন; আর জরাসন্ধের অভিষেক সম্পন্ন হলে বৃহদ্রথ দুই রাণীসহ তপোবনে গমন করলেন।
Verse 18
बृहद्रथो नरपति: परां निर्वतिमाययौ । अभिषिक्ते जरासंधे तदा राजा बूृहद्रथ: । पत्नीद्रयेनानुगतस्तपोवनचरो5भवत्,राजधानीमें प्रवेश करके अपने जाति-भाइयों और सगे-सम्बन्धियोंसे घिरे हुए मगधनरेश बृहद्रथने उसी समय जरासंधका राज्याभिषेक कर दिया। ऐसा करके उन्हें बड़ा संतोष हुआ। जरासंधका अभिषेक हो जानेपर महाराज बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनमें चले गये
নরপতি বৃহদ্রথ পরম তৃপ্তি লাভ করলেন। জরাসন্ধের বিধিপূর্বক অভিষেক সম্পন্ন হলে, বৃহদ্রথ দুই রাণীসহ তপোবনে বাস করতে লাগলেন।
Verse 19
ततो वनस्थे पितरि मात्रोश्वैव विशाम्पते । जरासंध: स्ववीर्येण पार्थिवानकरोद् वशे,महाराज! दोनों माताओं और पिताके वनवासी हो जानेपर जरासंधने अपने पराक्रमसे समस्त राजाओंको वशमें कर लिया इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधप्रशंसायामेकोनविंशतितमो<5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजयूयारग्भपर्वमें जरासंधप्रशंसाविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
হে প্রজাপতি! পিতা বনবাসী হলে এবং দুই মাতাও তপোবনে গমন করলে, জরাসন্ধ নিজের পরাক্রমে পৃথিবীর রাজাদের বশে আনল।
Verse 20
वैशम्पायन उवाच अथ दीर्घस्य कालस्य तपोवनचरो नृपः । सभार्य: स्वर्गमगमत् तपस्तप्त्वा बृहद्रथ:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर दीर्घकालतक तपोवनमें रहकर तपस्या करते हुए महाराज बृहद्रथ अपनी पत्नियोंके साथ स्वर्गवासी हो गये
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! দীর্ঘকাল তপোবনে থেকে তপস্যা করে মহারাজ বৃহদ্রথ তাঁর পত্নীদেরসহ স্বর্গে গমন করলেন।
Verse 21
जरासंधो<पि नृपतिर्यथोक्तं कौशिकेन तत् | वरप्रदानमखिलं प्राप्पय राज्यमपालयत्,इधर जरासंध भी चण्डकौशिक मुनिके कथनानुसार भगवान् शंकरसे सारा वरदान पाकर राज्यकी रक्षा करने लगा
অপরদিকে নৃপতি জরাসন্ধও কৌশিক মুনির কথামতো (শংকরদেবের নিকট থেকে) সম্পূর্ণ বর লাভ করে রাজ্য রক্ষা ও পালন করতে লাগল।
Verse 22
निहते वासुदेवेन तदा कंसे महीपतौ । जातो वै वैरनिर्बन्ध: कृष्णेन सह तस्य वै,वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके द्वारा अपने जामाता राजा कंसके मारे जानेपर श्रीकृष्णके साथ उसका वैर बहुत बढ़ गया
বৈশম্পায়ন বললেন—বাসুদেবনন্দন শ্রীকৃষ্ণ যখন ভূমিপতি রাজা কংসকে বধ করলেন, তখন তার অন্তরে শ্রীকৃষ্ণের প্রতি দৃঢ় ও অটুট বৈর জন্ম নিল।
Verse 23
भ्रामयित्वा शतगुणमेकोनं येन भारत । गदा क्षिप्ता बलवता मागधेन गिरिव्रजात्,भारत! उसी वैरके कारण बलवान् मगधराजने अपनी गदा निन्यानबे बार घुमाकर गिरिव्रजसे मथुराकी ओर फेंकी। उन दिनों अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण मथुरामें ही रहते थे। वह उत्तम गदा निन्यानबे योजन दूर मथुरामें जाकर गिरी
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! সেই বৈরের বশে বলবান মগধরাজ গিরিব্রজ থেকে গদাটি নিরানব্বই বার ঘুরিয়ে প্রবল বেগে নিক্ষেপ করল।
Verse 24
तिष्ठतो मथुरायां वै कृष्णस्याद्भुतकर्मण: । एकोनयोजनशते सा पपात गदा शुभा,भारत! उसी वैरके कारण बलवान् मगधराजने अपनी गदा निन्यानबे बार घुमाकर गिरिव्रजसे मथुराकी ओर फेंकी। उन दिनों अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण मथुरामें ही रहते थे। वह उत्तम गदा निन्यानबे योजन दूर मथुरामें जाकर गिरी
বৈশম্পায়ন বললেন—অদ্ভুতকর্মা শ্রীকৃষ্ণ যখন মথুরায় অবস্থান করছিলেন, তখন সেই শুভ গদা একশ যোজনের এক যোজন কম দূরত্ব অতিক্রম করে মথুরায় এসে পড়ল।
Verse 25
दृष्टवा पौरैस्तदा सम्यग् गदा चैव निवेदिता । गदावसानं तत् ख्यातं मथुराया: समीपत:,पुरवासियोंने उसे देखकर उसकी सूचना भगवान् श्रीकृष्णको दी। मथुराके समीपका वह स्थान, जहाँ गदा गिरी थी, गदावसानके नामसे विख्यात हुआ
বৈশম্পায়ন বললেন—নগরবাসীরা তা স্পষ্ট দেখে সেই গদার সংবাদ ভগবান শ্রীকৃষ্ণকে জানাল। মথুরার নিকটে যেখানে গদাটি এসে থামল, সেই স্থান ‘গদাবসান’ নামে প্রসিদ্ধ হল।
Verse 26
तस्यास्तां हंसडिम्भकावशस्त्रनिधनावुभौ । मन्त्रे मतिमतां श्रेष्ठो नीतिशास्त्रे विशारदौ,जरासंधको सलाह देनेके लिये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ तथा नीतिशास्त्रमें निपुण दो मन्त्री थे, जो हंस और डिम्भकके नामसे विख्यात थे। वे दोनों किसी भी शस्त्रसे मरनेवाले नहीं थे
বৈশম্পায়ন বললেন—জরাসন্ধের হংস ও ডিম্ভক নামে দুই মন্ত্রী ছিলেন; পরামর্শে তাঁরা জ্ঞানীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এবং নীতিশাস্ত্রে পারদর্শী। আরও বলা হত, কোনো অস্ত্রেই তাঁদের মৃত্যু ঘটানো যায় না।
Verse 27
यौ तौ मया ते कथितौ पूर्वमेव महाबलौ । त्रयस्त्रयाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मति:,जनमेजय! उन दोनों महाबली वीरोंका परिचय मैंने तुम्हें पहले ही दे दिया है। मेरा ऐसा विश्वास है, जरासंध और वे तीनों मिलकर तीनों लोकोंका सामना करनेके लिये पर्याप्त थे
জনমেজয়! যাঁদের কথা আমি পূর্বেই তোমাকে বলেছি—সেই দুই মহাবলী বীর সম্পর্কে আমার মত এই যে, তারা (এবং তাদের সঙ্গে) সেই তিনজন মিলেও তিন লোকের মোকাবিলায় যথেষ্ট সক্ষম ছিল।
Verse 28
एवमेव तदा वीर बलिभि: कुकुरान्धकै: । वृष्णिभ्रिश्न महाराज नीतिहेतोरुपेक्षित:,वीरवर महाराज! इस प्रकार नीतिका पालन करनेके लिये ही उस समय बलवान कुकुर, अन्धक और वृष्णिवंशके योद्धाओंने जरासंधकी उपेक्षा कर दी
বীরশ্রেষ্ঠ মহারাজ! এইভাবেই তখন নীতিধর্ম রক্ষার উদ্দেশ্যে বলবান কুকুর, অন্ধক ও বৃষ্ণিবংশীয় যোদ্ধারা ইচ্ছাকৃতভাবে জরাসন্ধকে উপেক্ষা করেছিল।
The tension lies between strategic concealment and public truth: the visitors employ disguise and unconventional entry, while Jarāsandha insists that identity and intent be stated truthfully within the norms of royal hospitality and accountability.
Kṛṣṇa frames dharma as context-sensitive: social markers and rules vary by role, yet truthful speech remains a stabilizing virtue; additionally, accepting honors from an adversary is not obligatory when one arrives with a defined political objective.
No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is structural—establishing the ethical vocabulary (satya, ātithya, nīti) and procedural setting necessary for the ensuing confrontation with Jarāsandha.