
Jarāsandha-vadha-upadeśa and the Departure toward Magadha (जरासन्धवधोपदेशः मागधप्रस्थानं च)
Upa-parva: Jarāsandha-vadha-upāya (Strategic Counsel for the Fall of Jarāsandha)
Kṛṣṇa (Vāsudeva) frames the strategic situation: Haṃsa and Ḍibhaka—associates of Kaṃsa—have fallen, and the time has come to address Jarāsandha. He assesses Jarāsandha as not readily conquerable in open battle even by collective forces, implying the necessity of a life-and-death duel as the appropriate tactical form. Kṛṣṇa allocates functional roles among the trio—policy in himself, strength in Bhīma, and protective support in Arjuna—arguing that a threefold coordinated approach will compel Jarāsandha to accept single combat, particularly due to reputational pressure and perceived affront. Yudhiṣṭhira responds by affirming Kṛṣṇa as the Pāṇḍavas’ refuge and acknowledges that success in liberating kings and obtaining rājasūya depends on Kṛṣṇa’s direction. The discourse expands into a general principle of governance: force must be led by the wise, as water follows gradients and skilled agents exploit openings. The chapter closes with the party’s departure toward Magadha and a geographically specific itinerary across rivers and regions, culminating in sighting the Magadhan city near the Goratha mountain.
Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की छाया में कथा अचानक मगध के भयावह सम्राट जरासंध की उत्पत्ति पर लौटती है—एक ऐसा जन्म, जो स्वयं असंभवता से बना है। → एक राक्षसी-स्वरूप गृहदेवी का रहस्योद्घाटन होता है: वह कहती है कि वह हर घर में निवास करती है, दानव-विनाश के लिए नियुक्त है, और जिसकी दीवारों पर उसकी पुत्रों सहित यौवनयुक्त आकृति भक्तिभाव से लिखी-पूजी जाती है, वहाँ वृद्धि होती है, अन्यथा क्षय। वह अपने पूजन के प्रत्युपकार के रूप में राजा को एक विचित्र बालक (दो टुकड़ों में जन्मे) के संस्कार और भविष्य की व्यवस्था बताती है। → राजा बृहद्रथ उस बालक का नामकरण करते हैं—‘जरया संधितः’ (जरा द्वारा जोड़ा गया) इसलिए इसका नाम ‘जरासंध’ हो; जन्म का रहस्य नाम में ही स्थिर हो जाता है। → जरासंध मगधाधिपति का तेजस्वी पुत्र बनकर बढ़ता है—अग्नि में आहुति की तरह प्रबल, माता-पिता को आनंद देने वाला, शुक्लपक्ष के चंद्रमा की भाँति बढ़ता हुआ। गृहदेवी के वरदान/उपकार का फल राजवंश की दृढ़ता में प्रकट होता है। → यह तेजस्वी बालक आगे चलकर राजसूय के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध बनेगा—उसकी शक्ति और क्रूर नीति का संकेत कथा को अगले प्रसंगों की ओर धकेलता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें जरासंधकी उत्पत्तिविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १७ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९३ “लोक मिलाकर कुल ६१३ “लोक हैं) >> ह्य हि की अष्टादशो<् ध्याय: जरा राक्षसीका अपना परिचय देना और उसीके नामपर बालकका नामकरण होना राक्षस्युवाच जरा नामास्मि भद्रें ते राक्षमी कामरूपिणी । तव वेश्मनि राजेन्द्र पूजिता न्यवसं सुखम्,राक्षसीने कहा--राजेन्द्र! तुम्हारा कल्याण हो। मेरा नाम जरा है। मैं इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी हूँ और तुम्हारे घरमें पूजित हो सुखपूर्वक रहती चली आयी हूँ
রাক্ষসী বলল—রাজেন্দ্র, তোমার মঙ্গল হোক। আমার নাম জরা। আমি ইচ্ছামতো রূপ ধারণকারী রাক্ষসী। তোমার গৃহে সম্মানিত হয়ে আমি সুখে দীর্ঘকাল বাস করেছি।
Verse 2
गृहे गृहे मनुष्याणां नित्यं तिष्ठामि राक्षसी | गृहदेवीति नाम्ना वै पुरा सृष्टा स्वयंभुवा,मैं मनुष्योंके घर-घरमें सदा मौजूद रहती हूँ। कहनेको मैं राक्षसी ही हूँ; किंतु पूर्वकालमें ब्रह्माजीने गृहदेवीके नामसे मेरी सृष्टि की थी
আমি মানুষের ঘরে ঘরে নিত্য অবস্থান করি। লোকের মুখে আমি রাক্ষসী; কিন্তু প্রাচীনকালে স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা ‘গৃহদেবী’ নামে আমাকে সৃষ্টি করেছিলেন।
Verse 3
दानवानां विनाशाय स्थापिता दिव्यरूपिणी । यो मां भक्त्या लिखेत् कुड्ये सपुत्रां यौवनान्विताम्,और उन्होंने मुझे दानवोंके विनाशके लिये नियुक्त किया था। मैं दिव्य रूप धारण करनेवाली हूँ। जो अपने घरकी दीवारपर मुझे अनेक पुत्रोंसहित युवती स्त्रीके रूपमें भक्तिपूर्वक लिखता है (मेरा चित्र अंकित करता है), उसके घरमें सदा वृद्धि होती है; अन्यथा उसे हानि उठानी पड़ती है। प्रभो! मैं तुम्हारे घरमें रहकर सदा पूजित होती चली आयी हूँ
দানবদের বিনাশের জন্য আমাকে নিয়োজিত করা হয়েছে; আমি দিব্যরূপধারিণী। যে ভক্তিভরে নিজের গৃহের প্রাচীরে আমাকে বহু পুত্রসহ যৌবনবতী নারীরূপে অঙ্কিত করে—
Verse 4
गृहे तस्य भवेद् वृद्धिरन्यथा क्षयमाप्नुयात् । त्वदगृहे तिष्ठमानाहं पूजिताहं सदा विभो,और उन्होंने मुझे दानवोंके विनाशके लिये नियुक्त किया था। मैं दिव्य रूप धारण करनेवाली हूँ। जो अपने घरकी दीवारपर मुझे अनेक पुत्रोंसहित युवती स्त्रीके रूपमें भक्तिपूर्वक लिखता है (मेरा चित्र अंकित करता है), उसके घरमें सदा वृद्धि होती है; अन्यथा उसे हानि उठानी पड़ती है। प्रभो! मैं तुम्हारे घरमें रहकर सदा पूजित होती चली आयी हूँ
তার গৃহে সমৃদ্ধি হয়; নচেৎ ক্ষয় আসে। হে বিভো, তোমার গৃহে অবস্থান করে আমি সর্বদাই পূজিতা হয়ে এসেছি।
Verse 5
लिखिता चैव कुड्येषु पुत्रैबहुभिरावृता । गन्धपुष्पैस्तथा धूपैर्भक्ष्यभोज्यै: सुपूजिता,एवं तुम्हारे घरकी दीवारोंपर मेरा ऐसा चित्र अंकित किया गया है, जिसमें मैं अनेक पुत्रोंसे घिरी हुई खड़ी हूँ। उस चित्रके रूपमें मेरा गन्ध, पुष्प, धूप और भक्ष्य-भोज्य पदार्थोद्वारा भलीभाँति पूजन होता आ रहा है
তোমাদের গৃহের প্রাচীরে আমার এমনই এক চিত্র অঙ্কিত আছে—যেখানে আমি বহু পুত্রে পরিবেষ্টিতা হয়ে দাঁড়িয়ে আছি। সেই রূপেই সুগন্ধ, পুষ্প, ধূপ এবং ভক্ষ্য-ভোজ্য নিবেদ্য দ্বারা আমার যথাযথ পূজা দীর্ঘকাল ধরে হয়ে আসছে।
Verse 6
साहं प्रत्युपकारार्थ चिन्तयाम्पनिशं तव । तवेमे पुत्रशकले दृष्टवत्यस्मि धार्मिक,अतः मैं उस पूजनके बदले तुम्हारा कोई उपकार करनेकी बात सदा सोचती रहती थी। धर्मात्मन! मैंने तुम्हारे पुत्रके शरीरके इन दोनों टुकड़ोंको देखा और दोनोंको जोड़ दिया। महाराज! दैववश तुम्हारे भाग्यसे ही उन टुकड़ोंके जुड़नेसे यह राजकुमार प्रकट हो गया है। मैं तो इसमें केवल निमित्तमात्र बन गयी हूँ
সেই পূজার প্রতিদানস্বরূপ তোমার কোনো উপকার করব—এই চিন্তাই আমি সর্বদা করে এসেছি। হে ধর্মাত্মা, আমি তোমার পুত্রের দেহের এই দুই খণ্ড দেখেছি।
Verse 7
संश्लेषिते मया दैवात् कुमार: समपद्यत । तव भाग्यान्महाराज हेतुमात्रमहं त्विह,अतः मैं उस पूजनके बदले तुम्हारा कोई उपकार करनेकी बात सदा सोचती रहती थी। धर्मात्मन! मैंने तुम्हारे पुत्रके शरीरके इन दोनों टुकड़ोंको देखा और दोनोंको जोड़ दिया। महाराज! दैववश तुम्हारे भाग्यसे ही उन टुकड़ोंके जुड़नेसे यह राजकुमार प्रकट हो गया है। मैं तो इसमें केवल निमित्तमात्र बन गयी हूँ
আমি যখন সেগুলি জুড়ে দিলাম, তখন দैববলে এই কুমার প্রকাশ পেল। মহারাজ, এ ঘটনা তোমার ভাগ্যবশতই ঘটেছে; আমি এখানে কেবল নিমিত্তমাত্র।
Verse 8
(तस्य बालस्य यत् कृत्यं तत् कुरुष्व नराधिप । मम नाम्ना च लोके5स्मिन् ख्यात एष भविष्यति ।।) राजन्! अब इस बालकके लिये जो आवश्यक संस्कार हैं, उन्हें करो। यह इस संसारमें मेरे ही नामसे विख्यात होगा। मेरुं वा खादितुं शक्ता कि पुनस्तव बालकम् | गृहसम्पूजनात् तुष्ट्या मया प्रत्यर्पितस्तव,मुझमें सुमेरु पर्वतको भी निगल जानेकी शक्ति है; फिर तुम्हारे इस बच्चेको खा जाना कौन बड़ी बात है? किंतु तुम्हारे घरमें जो मेरी भलीभाँति पूजा होती आयी है, उसीसे संतुष्ट होकर मैंने तुम्हें यह बालक समर्पित किया है
রাজন! এই শিশুর জন্য যে যে প্রয়োজনীয় সংস্কার ও কর্তব্য আছে, তা সম্পন্ন করো। এ লোকেতে সে আমারই নামে খ্যাত হবে। আমি সুমেরু পর্বত পর্যন্ত গিলে ফেলতে সক্ষম—তোমার শিশুকে ভক্ষণ করা তবে কী কঠিন? কিন্তু তোমাদের গৃহে দীর্ঘকাল যে ভক্তিভরে আমার পূজা হয়েছে, তাতে সন্তুষ্ট হয়ে আমি এই শিশুকে তোমার কাছে প্রত্যর্পণ করছি।
Verse 9
श्रीकृष्ण उवाच एवमुक््त्वा तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत । स संगृहा कुमारं तं॑ प्रविवेश गृहं नूप:,श्रीकृष्ण कहते हैं--राजन्! ऐसा कहकर जरा राक्षसी वहीं अन्तर्धान हो गयी और राजा उस बालकको लेकर अपने महलमें चले आये
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—রাজন, এ কথা বলে সেই রাক্ষসী সেখানেই অন্তর্ধান করল। তারপর রাজা সেই কুমারকে গ্রহণ করে প্রাসাদে প্রবেশ করলেন।
Verse 10
तस्य बालस्य यत् कृत्यं तच्चकार नृपस्तदा । आज्ञापयच्च राक्षस्या मगधेषु महोत्सवम्,उस समय राजाने उस बालकके जातकर्म आदि सभी आवश्यक संस्कार सम्पन्न किये और मगधदेशमें जरा राक्षसी (गृहदेवी)-के पूजनका महान् उत्सव मनानेकी आज्ञा दी
তখন রাজা সেই শিশুর জন্য জাতকর্মাদি যেসব কর্তব্য সংস্কার ছিল, সবই সম্পন্ন করলেন; এবং মগধদেশে গৃহদেবীরূপা রাক্ষসী জরা-দেবীর পূজার মহোৎসব পালনের আদেশ দিলেন।
Verse 11
तस्य नामाकरोच्चैव पितामहसम: पिता । जरया संधितो यस्माज्जरासंधो भवत्वयम्,ब्रह्माजीके समान प्रभावशाली राजा बृहद्रथने उस बालकका नाम रखते हुए कहा --“इसको जराने संधित किया (जोड़ा) है, इसलिये इसका नाम जरासंध होगा”
তারপর পিতামহসম প্রভাবশালী পিতা শিশুটির নামকরণ করে বললেন—“জরা তাকে সংধিত (জোড়া) দিয়েছে; অতএব এর নাম হোক জরাসন্ধ।”
Verse 12
सो<वर्धत महातेजा मगधाधिपते: सुतः । प्रमाणबलसम्पन्नों हुताहुतिरिवानल: । मातापित्रोर्नन्दिकर: शुक्लपक्षे यथा शशी,मगधराजका वह महातेजस्वी बालक माता-पिताको आनन्द प्रदान करते हुए आकार और बलसे सम्पन्न हो घीकी आहुति दी जानेसे प्रज्वलित हुई अग्नि और शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोदिन बढ़ने लगा
এভাবে মগধাধিপতির সেই মহাতেজস্বী পুত্র, সুগঠিত দেহ ও বলসম্পন্ন হয়ে, ঘৃতাহুতিতে প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান হতে লাগল; আর মাতাপিতাকে আনন্দ দান করে, শুক্লপক্ষে চন্দ্রের মতো দিন দিন বৃদ্ধি পেতে লাগল।
Verse 18
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधोत्पत्तौ अष्टादशो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें जरासंधकी उत्पत्तिविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত রাজসূয়ারম্ভপর্বে জরাসন্ধের উৎপত্তি-বিষয়ক অষ্টাদশ অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The chapter stages an ethical-policy tension: whether confronting a powerful ruler should rely on mass warfare or a constrained form of engagement (single combat) designed to limit broader harm while still achieving a politically necessary objective.
Power is not self-justifying; it becomes effective and ethically defensible when guided by discernment (naya) and appropriate means (upāya). The text underscores that unled strength is ‘blind,’ whereas wise direction converts capacity into successful action.
No explicit phalāśruti appears in this chapter; its meta-commentary is implicit in the governance analogies (water following the low point; strength directed through openings), positioning the episode as instructional rājadharma material within the broader narrative.