
मयस्य प्रतिकृतिः — Maya’s Offer and the Commissioning of the Sabhā
Upa-parva: Maya-sabhā-nirmāṇa (Construction of the Assembly Hall Episode)
Vaiśaṃpāyana reports that Maya addresses Arjuna in Kṛṣṇa’s presence, repeatedly honoring him and stating that he was rescued from peril. Arjuna responds with restraint, affirming that nothing is owed, yet he declines to invalidate Maya’s intention to reciprocate. Maya identifies himself as a master artisan aligned with Viśvakarman-like creative skill among the Dānavas and expresses the wish to do something meaningful for the Pāṇḍavas. Prompted, Kṛṣṇa reflects briefly and then directs Maya to construct a sabhā for Dharmarāja Yudhiṣṭhira—one that astonishes observers and integrates extraordinary design beyond ordinary human replication. Maya gladly accepts, and Kṛṣṇa and Arjuna introduce him to Yudhiṣṭhira, who receives and honors Maya with appropriate royal hospitality. Maya then begins planning and measuring the hall: auspicious rites are performed, learned Brahmins are gratified with offerings and gifts, and the sabhā is specified as richly endowed with seasonal excellences, divine beauty, and large dimensions. The chapter thematically links gratitude, kingship, and architecture as instruments of political visibility and ordered rule.
Chapter Arc: खाण्डवदाह के अनन्तर, जनमेजय के समक्ष वैशम्पायन उस अद्भुत क्षण का सूत्र पकड़ते हैं जब मयासुर—अग्नि के दाह और कृष्ण के क्रोध से घिरा—अर्जुन के शरणागत होकर अपने प्राण-रक्षण का ऋण स्वीकार करता है। → मयासुर स्वयं को दानवों का विश्वकर्मा और महाकवि बताकर प्रतिदान माँगता नहीं, बल्कि प्रतिदान देने की उत्कंठा प्रकट करता है—‘ब्रूहि किं करवाणि ते’; प्रश्न यह बनता है कि पाण्डव किस प्रकार का वर स्वीकार करें जो उनके यश, राज्य-प्रतिष्ठा और धर्मराज युधिष्ठिर की राजसूय-यात्रा के योग्य हो। → कृष्ण का निर्णायक निर्देश: ‘मनुष्यलोक में जिसे देखकर सब विस्मित हों—ऐसी सभा बनाओ’; यह आदेश मय की शिल्प-शक्ति को एक ऐसे दिव्य सभाभवन में रूपान्तरित करने का शिखर क्षण है जो पृथ्वी पर अद्वितीय हो। → कृष्ण और अर्जुन युधिष्ठिर को समस्त वृत्तान्त निवेदित करते हैं; मय पाण्डवों और कृष्ण की अभिरुचि के अनुसार पुण्याह में कृतकौतुक होकर निर्माण आरम्भ करता है, ब्राह्मणों को सहस्रों की संख्या में पायस से तृप्त कर, बहुविध दान देकर, सर्वऋतु-गुणसम्पन्न, दिव्यरूप, मनोरम और विशाल (दशकिष्कुसहस्र-परिमाण) सभा का मापन-निर्धारण करता है। → यह दिव्य सभा जब पूर्ण होगी, तब उसी के भीतर राजकीय प्रतिष्ठा, ईर्ष्या और छल का कौन-सा बीज अंकुरित होगा—कथा उसी अनागत परिणाम की ओर संकेत करती है।
Verse 1
ऑपन- मा बक। अप" (आदिपर्व सम्पूर्णम) अनुष्ट्प् छन्द अनुष्ट्प्के अनुसार गिननेपर उत्तरभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक-- ७८७० ३ ७३६ ६ दक्षिणभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक-- ७४०१ २६ आदिपर्वकी पूर्ण श्लोकसंख्या--९६२६ ३् ३ श्रीपरमात्मने नम: श्रीमहाभारतम् सभापर्व सभाक्रियापर्व प्रथमो 5 ध्याय: भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाके मयासुरद्वारा सभाभवन बनानेकी तैयारी नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् | देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्,अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्यसखा-नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये
নারায়ণকে, নরোত্তম নরকে, দেবী সরস্বতীকে এবং ব্যাসকে প্রণাম করে, তারপর ‘জয়’ (মহাভারত) উচ্চারণ করা উচিত।
Verse 2
वैशम्पायन उवाच ततोअब्रवीन्मय: पार्थ वासुदेवस्य संनिधौ । प्राउ्जलि: श्लक्षणया वाचा पूजयित्वा पुन: पुन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! खाण्डवदाहके अनन्तर मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णके पास बैठे हुए अर्जुनकी बारंबार प्रशंसा करके हाथ जोड़कर मधुर वाणीमें उनसे कहा
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন বাসুদেবের সন্নিধানে ময়, বারংবার সম্মান জানিয়ে, করজোড়ে মধুর বাক্যে পার্থকে বলল।
Verse 3
मय उवाच अस्मात् कृष्णात् सुसंरब्धात् पावकाच्च दिधक्षत: । त्वया त्रातो5स्मि कौन्तेय ब्रूहि कि करवाणि ते,मयासुर बोला--कुन्तीनन्दन! आपने अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए इन भगवान् श्रीकृष्णसे तथा जला डालनेकी इच्छावाले अग्निदेवसे भी मेरी रक्षा की है। अतः बताइये, मैं (इस उपकारके बदले) आपकी क्या सेवा करूँ?
ময়াসুর বলল—কুন্তীনন্দন! প্রবল ক্রোধে উন্মত্ত কৃষ্ণ এবং আমাকে দগ্ধ করতে উদ্যত অগ্নিদেব—উভয়ের হাত থেকে আপনি আমাকে রক্ষা করেছেন। বলুন, এই উপকারের প্রতিদানে আমি আপনার কী সেবা করব?
Verse 4
अर्जुन उवाच कृतमेव त्वया सर्व स्वस्ति गच्छ महासुर । प्रीतिमान् भव मे नित्य॑ं प्रीतिमन्तो वयं च ते,अर्जुनने कहा--असुरराज! तुमने इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करके मेरे उपकारका मानो सारा बदला चुका दिया। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम जाओ। मुझपर प्रेम बनाये रखना। हम भी तुम्हारे प्रति सदा स्नेहका भाव रखेंगे
অর্জুন বললেন—হে মহাসুর! কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে তুমি যেন সবই শোধ করে দিলে। কল্যাণসহকারে যাও। আমার প্রতি সদা স্নেহবান থেকো; আমরাও তোমার প্রতি চিরকাল প্রীতিবান থাকব।
Verse 5
मय उवाच युक्तमेतत् त्वयि विभो यथा55त्थ पुरुषर्षभ । प्रीतिपूर्वमहं किंचित् कर्तुमिच्छामि भारत,मयासुर बोला--प्रभो! पुरुषोतम! आपने जो बात कही है, वह आप-जैसे महापुरुषके अनुरूप ही है; परंतु भारत! मैं बड़े प्रेमसे आपके लिये कुछ करना चाहता हूँ
ময়াসুর বলল—প্রভু, পুরুষশ্রেষ্ঠ! আপনি যা বলেছেন, তা আপনার মতো মহাপুরুষেরই উপযুক্ত। তবু, হে ভারত, স্নেহবশে আমি আপনার জন্য সামান্য কিছু করতে চাই।
Verse 6
अहं हि विश्वकर्मा वै दानवानां महाकवि: । सोऊ हं वै त्वत्कृते कर्तु किंचिदिच्छामि पाण्डव,पाण्डुनन्दन! मैं दानवोंका विश्वकर्मा एवं शिल्प-विद्याका महान् पण्डित हूँ। अतः मैं आपके लिये किसी वस्तुका निर्माण करना चाहता हूँ
ময়াসুর বলল—হে পাণ্ডব, পাণ্ডুনন্দন! আমি দানবদের মধ্যে বিশ্বকর্মা, মহাশিল্পী। অতএব তোমার জন্য আমি কিছু নির্মাণ করতে চাই।
Verse 7
(दानवानां पुरा पार्थ प्रासादा हि मया कृता: | रम्याणि सुखगर्भाणि भोगाढ्यानि सहस्रश: ।। उद्यानानि च रम्याणि सरांसि विविधानि च । विचित्राणि च शस्त्राणि रथा: कामगमास्तथा ।। नगराणि विशालानि साट्टप्राकारतोरणै: । वाहनानि च मुख्यानि विचित्राणि सहस्रश: ।। बिलानि रमणीयानि सुखयुक्तानि वै भृशम् । एतत् कृतं मया सर्व तस्मादिच्छामि फाल्गुन ।।) कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें मैंने दानवोंके बहुत-से महल बनाये हैं। इसके सिवा देखनेमें रमणीय, सुख और भोगसाधनोंसे सम्पन्न अनेक प्रकारके रमणीय उद्यानों, भाँति-भाँतिके सरोवरों, विचित्र अस्त्र-शस्त्रों, इच्छानुसार चलनेवाले रथों, अट्टालिकाओं, चहारदीवारियों और बड़े-बड़े फाटकोंसहित विशाल नगरों, हजारों पी श्रेष्ठ वाहनों तथा बहुत-सी मनोहर एवं अत्यन्त सुखदायक सुरंगोंका मैंने निर्माण है। अत: अर्जुन! मैं आपके लिये भी कुछ बनाना चाहता हूँ। अजुन उवाच प्राणकृच्छाद् विमुक्तं त्वमात्मानं मन््यसे मया । एवं गते न शक्ष्यामि किंचित् कारयितुं त्वया,अर्जुन बोले--मयासुर! तुम मेरे द्वारा अपनेको प्राणसंकटसे मुक्त हुआ मानते हो और इसीलिये कुछ करना चाहते हो। ऐसी दशामें मैं तुमसे कोई काम नहीं करा सकूँगा
ময়াসুর বলল—হে পার্থ! প্রাচীন কালে আমি দানবদের জন্য সহস্র সহস্র প্রাসাদ নির্মাণ করেছি—দর্শনীয়, সুখে পরিপূর্ণ, ভোগবৈভবে সমৃদ্ধ। আমি মনোরম উদ্যান, নানা প্রকার সরোবর, বিচিত্র অস্ত্রশস্ত্র এবং ইচ্ছামতো চলতে পারে এমন রথও গড়েছি। অট্টালিকা, প্রাচীর ও তোরণসহ বিশাল নগর, এবং সহস্র সহস্র উৎকৃষ্ট, বিচিত্র যানও আমি নির্মাণ করেছি। অতিশয় আরামদায়ক মনোহর ভূগর্ভস্থ কক্ষও আমি সৃষ্টি করেছি। এ সবই আমার কৃত; তাই, হে ফাল্গুন, তোমার জন্যও আমি কিছু নির্মাণ করতে চাই। অর্জুন বললেন—ময়াসুর! তুমি মনে কর যে আমি তোমাকে প্রাণসঙ্কট থেকে মুক্ত করেছি, তাই প্রতিদান দিতে চাও। এমন অবস্থায় আমি তোমার দ্বারা কোনো কাজ করাতে পারব না।
Verse 8
न चापि तव संकल्पं मोघमिच्छामि दानव । कृष्णस्य क्रियतां किंचित् तथा प्रतिकृतं मयि,दानव! साथ ही मैं यह भी नहीं चाहता कि तुम्हारा यह संकल्प व्यर्थ हो। इसलिये तुम भगवान् श्रीकृष्णका कोई कार्य कर दो, इससे मेरे प्रति तुम्हारा कर्तव्य पूर्ण हो जायगा
হে দানব! তোমার সংকল্প যেন বৃথা না যায়—আমি তাও চাই না। অতএব শ্রীকৃষ্ণের কোনো সেবা করো; তাতেই আমার প্রতি তোমার কর্তব্য পরিশোধ হবে।
Verse 9
चोदितो वासुदेवस्तु मयेन भरतर्षभ । मुहूर्तमिव संदध्यौ किमयं चोद्यतामिति,भरतश्रेष्ठ) तब मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णसे काम बतानेका अनुरोध किया। उसके प्रेरणा करनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अनुमानतः दो घड़ीतक विचार किया कि “इसे कौन-सा काम बताया जाय?” इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभास्थाननिर्णये प्रथमो5ध्याय: ।। १२ |। इस प्रकार श्रीमह़्ा भारत यभापव॑के अन्तर्गत सभाक्रियापवनें सभास्थाननिर्णयविषयक पहला जध्याय पूरा हुआ
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! মায়ার প্রেরণায় বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণ এক মুহূর্ত স্থির হয়ে ভাবলেন—“একে কী বলাতে প্ররোচিত করা হচ্ছে, কী অনুরোধ করানো উচিত?”
Verse 10
ततो विचिन्त्य मनसा लोकनाथ: प्रजापति: । चोदयामास त॑ कृष्ण: सभा वै क्रियतामिति,तदनन्तर मन-ही-मन कुछ सोचकर प्रजापालक लोकनाथ भगवान् श्रीकृष्णने उससे कहा--'शिल्पियोंमें श्रेष्ठ दैत्वराज मय! यदि तुम मेरा कोई प्रिय कार्य करना चाहते हो तो तुम धर्मराज युधिष्ठिके लिये जैसा ठीक समझो, वैसा एक सभाभवन बना दो
তারপর মনে মনে বিচার করে লোকনাথ, প্রজাপতি শ্রীকৃষ্ণ তাকে বললেন—“এক রাজসভাগৃহ নির্মাণ করাই হোক।”
Verse 11
यदि त्वं कर्तुकामोसि प्रियं शिल्पवतां वर । धर्मराजस्य दैतेय यादृशीमिह मनन््यसे,तदनन्तर मन-ही-मन कुछ सोचकर प्रजापालक लोकनाथ भगवान् श्रीकृष्णने उससे कहा--'शिल्पियोंमें श्रेष्ठ दैत्वराज मय! यदि तुम मेरा कोई प्रिय कार्य करना चाहते हो तो तुम धर्मराज युधिष्ठिके लिये जैसा ठीक समझो, वैसा एक सभाभवन बना दो
হে শিল্পীদের শ্রেষ্ঠ দৈত্য! যদি তুমি আমার প্রিয় কাজ করতে চাও, তবে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের জন্য এখানে তোমার বিবেচনায় যেমন উপযুক্ত মনে হয়, তেমনই এক রাজসভাগৃহ নির্মাণ করো।
Verse 12
यां कृतां नानुकुर्वन्ति मानवा: प्रेक्ष्य विस्मिता: । मनुष्यलोके सकले तादृशीं कुरु वै सभाम्,“वह सभाभवन ऐसा बनाओ, जिसके बन जानेपर सम्पूर्ण मनुष्यलोकके मानव देखकर विस्मित हो जायँ एवं कोई उसकी नकल न कर सके
এমন এক সভাগৃহ নির্মাণ করো যে তা সম্পন্ন হলে সমগ্র মানবলোকে মানুষ দেখে বিস্মিত হবে, আর কেউ তার অনুকরণ করতে পারবে না।
Verse 13
यत्र दिव्यानभिप्रायान् पश्येम हि कृतांस्त्वया । आसुरान् मानुषांश्वैव सभां तां कुरु वै मय,“मयासुर! तुम ऐसे सभाभवनका निर्माण करो, जिसमें हम तुम्हारे द्वारा अंकित देवता, असुर और मनुष्योंकी शिल्पनिपुणताका दर्शन कर सकें”
অর্জুন বললেন—হে ময়াসুর! আমার জন্য এমন এক সভাগৃহ নির্মাণ করো, যেখানে তোমার নির্মিত দিব্য ও বিস্ময়কর নকশা আমরা প্রত্যক্ষ করতে পারি—দেব, অসুর ও মানবের শিল্পকুশলতার মহিমা একত্রে প্রকাশিত হবে।
Verse 14
वैशम्पायन उवाच प्रतिगृहा तु तद्वाक्यं सम्प्रहृष्टो मयस्तदा । विमानप्रतिमां चक्रे पाण्डवस्य शुभां सभाम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके मयासुर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिकके लिये विमान-जैसी सुन्दर सभाभवन बनानेका निश्चय किया
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! সেই বাক্যকে আদেশরূপে গ্রহণ করে ময়াসুর অত্যন্ত প্রীত হল; এবং তখনই পাণ্ডুপুত্র যুধিষ্ঠিরের জন্য বিমানের ন্যায় শুভ ও দীপ্তিমান এক সভাগৃহ নির্মাণের সংকল্প করল।
Verse 15
ततः कृष्णश्न पार्थश्च धर्मराजे युधिष्ठिरे । सर्वमेतत् समावेद्य दर्शयामासतुर्मयम्,तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरको ये सब बातें बताकर मयासुरको उनसे मिलाया
তারপর কৃষ্ণ ও পার্থ (অর্জুন) ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে সমস্ত বিষয় যথাযথভাবে জানিয়ে ময়াসুরকে তাঁর সম্মুখে উপস্থিত করালেন।
Verse 16
तस्मै युधिष्ठिर: पूजां यथा्हमकरोत् तदा । सतुतां प्रतिजग्राह मय: सत्कृत्य भारत,भारत! राजा युधिष्ठिरने उस समय मयासुरका यथायोग्य सत्कार किया और मयासुरने भी बड़े आदरके साथ उनका वह सत्कार ग्रहण किया
তখন যুধিষ্ঠির ময়াসুরকে যথোচিত পূজা ও আতিথ্য দিলেন; আর হে ভারত! ময়ও সম্মানের সঙ্গে সেই অভ্যর্থনা গ্রহণ করল।
Verse 17
स पूर्वदेवचरितं तदा तत्र विशाम्पते । कथयामास दैतेय: पाण्डुपुत्रेषु भारत,जनमेजय! दैत्ययाज मयने उस समय वहाँ पाण्डवोंको दैत्योंके अद्भुत चरित्र सुनाये
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়, জনসমাজের অধিপতি! সেই সময় সেখানে দৈত্য ময় পাণ্ডুপুত্রদের মধ্যে প্রাচীন দেবগণের বিস্ময়কর কীর্তিকথা বর্ণনা করল।
Verse 18
स कालं कंचिदाश्वस्य विश्वकर्मा विचिन्त्य तु । सभां प्रचक्रमे कर्तु पाण्डवानां महात्मनाम्,कुछ दिनोंतक वहाँ आरामसे रहकर दैत्योंके विश्वकर्मा मयासुरने सोच-विचारकर महात्मा पाण्डवोंके लिये सभाभवन बनानेकी तैयारी की
কিছুদিন সেখানে বিশ্রাম করে, দৈত্যদের ‘বিশ্বকর্মা’ নামে খ্যাত ময়াসুর গভীরভাবে চিন্তা করে মহাত্মা পাণ্ডবদের জন্য সভাগৃহ নির্মাণের প্রস্তুতি শুরু করল।
Verse 19
अभिप्रायेण पार्थानां कृष्णस्य च महात्मन: । पुण्ये5हनि महातेजा: कृतकौतुकमड्ल:ः,उसने कुन्तीपुत्रों तथा महात्मा श्रीकृष्णकी रुचिके अनुसार सभाभवन बनानेका निश्चय किया। किसी पवित्र तिथिको (शुभ मुहूर्तमें) मंगलानुष्ठान, स्वस्तिवाचन आदि करके महातेजस्वी और पराक्रमी मयने हजारों श्रेष्ठ ब्राह्यणोंको खीर खिलाकर तृप्त किया तथा उन्हें अनेक प्रकारका धन दान किया। इसके बाद उसने सभाभवन बनानेके लिये समस्त ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न दिव्य रूपवाली मनोरम सब ओरसे दस हजार हाथकी (अर्थात् दस हजार हाथ चौड़ी और दस हजार हाथ लम्बी) धरती नपवायी
কুন্তীপুত্রদের এবং মহাত্মা শ্রীকৃষ্ণের অভিপ্রায় অনুসারে তেজস্বী ময় সভাগৃহ নির্মাণের সংকল্প করল। কোনো পুণ্য তিথিতে শুভ মুহূর্তে মঙ্গলানুষ্ঠান ও স্বস্তিবাচন প্রভৃতি সম্পন্ন করে সে কাজের সূচনা করল।
Verse 20
तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठानू पायसेन सहस्रश: । धनं बहुविध॑ दत्त्वा तेभ्य एव च वीर्यवान्,उसने कुन्तीपुत्रों तथा महात्मा श्रीकृष्णकी रुचिके अनुसार सभाभवन बनानेका निश्चय किया। किसी पवित्र तिथिको (शुभ मुहूर्तमें) मंगलानुष्ठान, स्वस्तिवाचन आदि करके महातेजस्वी और पराक्रमी मयने हजारों श्रेष्ठ ब्राह्यणोंको खीर खिलाकर तृप्त किया तथा उन्हें अनेक प्रकारका धन दान किया। इसके बाद उसने सभाभवन बनानेके लिये समस्त ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न दिव्य रूपवाली मनोरम सब ओरसे दस हजार हाथकी (अर्थात् दस हजार हाथ चौड़ी और दस हजार हाथ लम्बी) धरती नपवायी
পরাক্রমশালী ময় সহস্র সহস্র শ্রেষ্ঠ দ্বিজকে পায়স দিয়ে তৃপ্ত করল এবং তাদের নানাবিধ ধন দান করল।
Verse 21
सर्वर्तुगुणसम्पन्नां दिव्यरूपां मनोरमाम् | दशकिष्कुसहस्रां तां मापयामास सर्वत:,उसने कुन्तीपुत्रों तथा महात्मा श्रीकृष्णकी रुचिके अनुसार सभाभवन बनानेका निश्चय किया। किसी पवित्र तिथिको (शुभ मुहूर्तमें) मंगलानुष्ठान, स्वस्तिवाचन आदि करके महातेजस्वी और पराक्रमी मयने हजारों श्रेष्ठ ब्राह्यणोंको खीर खिलाकर तृप्त किया तथा उन्हें अनेक प्रकारका धन दान किया। इसके बाद उसने सभाभवन बनानेके लिये समस्त ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न दिव्य रूपवाली मनोरम सब ओरसे दस हजार हाथकी (अर्थात् दस हजार हाथ चौड़ी और दस हजार हाथ लम्बी) धरती नपवायी
তারপর সে সকল ঋতুর গুণে সমৃদ্ধ, দিব্যরূপে মনোরম, চারিদিকে দশ হাজার কিষ্কু বিস্তৃত সেই ভূমি মাপিয়ে নিল।
Arjuna faces the ethical tension between refusing personal reward (to avoid transactionalizing protection) and honoring Maya’s intent to reciprocate; the resolution is to redirect gratitude toward a public good (the sabhā).
The chapter teaches that ethical action includes both restraint and constructive acceptance: one may decline private gain while still enabling another’s righteous intention to mature into socially beneficial work.
No explicit phalaśruti is stated in this unit; its significance is contextual—establishing the sabhā as an institutional and symbolic precondition for later political developments within Sabhā-parva.