Adhyaya 3
Mahaprasthanika ParvaAdhyaya 338 Verses

Adhyaya 3

Adhyāya 3: Indra’s Invitation and Yudhiṣṭhira’s Refusal to Abandon the Dog (Svargārohaṇa Test)

Upa-parva: Svargārohaṇa-saṃvāda (Indra–Yudhiṣṭhira Dialogue on Ascending to Heaven)

Vaiśaṃpāyana describes Indra’s thunderous arrival and invitation for Yudhiṣṭhira to mount the celestial chariot. Seeing his companions fallen, Yudhiṣṭhira requests that his brothers and Draupadī be allowed to accompany him and refuses to seek svarga alone. Indra replies that they have already reached the divine realm after casting off mortal bodies and assures Yudhiṣṭhira of bodily ascent. A further dispute arises over a dog that has remained devoted: Indra urges abandonment, citing heavenly exclusion and alleged loss of merit associated with dogs. Yudhiṣṭhira counters with a structured ethical argument: abandoning a devotee is a grave sin, comparable (in his framing) to major transgressions such as betrayal and harm to protected persons; moreover, he distinguishes his earlier “leaving” of the dead from abandoning the living dependent. Dharma then reveals approval, praising Yudhiṣṭhira’s compassion and recalling earlier tests (e.g., Dvaita-vana episode), declaring his unmatched status and confirming his attainment. Devas and ṛṣis accompany him; Nārada publicly attests the rarity of bodily ascent. Yudhiṣṭhira reiterates his wish to go wherever his brothers and Draupadī have gone, refusing isolated bliss.

Chapter Arc: भाइयों और द्रौपदी के पतन के बाद भी युधिष्ठिर का पग नहीं रुकता; पर स्वर्ग-मार्ग पर देवेन्द्र का साक्षात् आगमन कथा को दिव्य न्यायालय में बदल देता है। → युधिष्ठिर अपने गिरे हुए भ्राताओं को देखकर शोकाकुल होकर इन्द्र से विनती करता है कि वे भी साथ स्वर्ग जाएँ; इन्द्र उत्तर देता है कि वे देह त्यागकर पहले ही स्वर्ग पहुँच चुके हैं, पर युधिष्ठिर को इसी शरीर सहित स्वर्ग-प्रवेश का अधिकार है—एक शर्त के साथ। → इन्द्र जब श्वान को छोड़ देने का संकेत देता है, तब युधिष्ठिर धर्म-प्रतिज्ञा पर अडिग होकर कहता है कि यह श्वान उसका भक्त और शरणागत है; वह उसे त्यागकर स्वर्ग नहीं जाएगा—और वह चार महापापों के समकक्ष ‘भक्त-त्याग’ को मानता है। → युधिष्ठिर स्पष्ट करता है कि उसे अन्य लोक नहीं चाहिए; उसे वही स्थान स्वीकार है जो उसके भ्राताओं और द्रौपदी को मिला है—शुभ हो या पाप। वह देवेन्द्र से पुनः कहता है कि उनके बिना वह वहाँ ठहर नहीं सकता और वहीं जाना चाहता है जहाँ वे गए हैं। → युधिष्ठिर की अडिग करुणा और धर्म-निष्ठा के सामने देवेन्द्र का अगला निर्णय क्या होगा—स्वर्ग का द्वार श्वान सहित खुलेगा या परीक्षा और कठोर होगी?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत गहाप्रस्थानिकपर्वमें द्रौपदी आदिका पतनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥/ २ ॥ अपन क्ाा छा अर: तृतीयो<थध्याय: इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप

বৈশম্পায়ন বললেন— “তারপর শক্র (ইন্দ্র) চারিদিকে স্বর্গ ও পৃথিবীকে ধ্বনিত করে রথসহ পার্থ (যুধিষ্ঠির)-এর কাছে এসে বললেন— ‘কুন্তীনন্দন, এই রথে আরোহণ করো।’”

Verse 2

स्वभातृन्‌ पतितान्‌ दृष्टवा धर्मराजो युधिष्ठिर: । अब्रवीच्छोकसंतप्त: सहस्राक्षमिदं वच:,अपने भाइयोंको धराशायी हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर शोकसे संतप्त हो इन्द्रसे इस प्रकार बोले--

নিজ ভ্রাতাদের পতিত অবস্থায় দেখে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির শোকে দগ্ধ হয়ে সহস্রাক্ষ (ইন্দ্র)-কে এই কথা বললেন—

Verse 3

भ्रातर: पतिता मे>त्र गच्छेयुस्ते मया सह । न विना क्षातृभि: स्वर्गमिच्छे गन्तुं सुरेश्वर

যুধিষ্ঠির বললেন—হে দেবেশ্বর! আমার ভ্রাতারা এখানে পথে পতিত হয়েছে। এমন ব্যবস্থা করুন যেন তারা-ও আমার সঙ্গে যেতে পারে; কারণ ভ্রাতৃবিহীন স্বর্গে প্রবেশ করতে আমি ইচ্ছুক নই।

Verse 4

सुकुमारी सुखारहा च राजपुत्री पुरंदर । सास्माभि: सह गच्छेत तद्‌ भवाननुमन्यताम्‌,'पुरन्दर! राजकुमारी द्रौपदी सुकुमारी है। वह सुख पानेके योग्य है। वह भी हमलोगोंके साथ चले, इसकी अनुमति दीजिये”

বৈশম্পায়ন বললেন—হে পুরন্দর! রাজকন্যা দ্রৌপদী কোমলাঙ্গী, সুখের যোগ্য। অনুগ্রহ করে অনুমতি দিন, সে-ও যেন আমাদের সঙ্গে যায়।

Verse 5

शक्र उवाच भ्रातृन्‌ द्रक्ष्यसि स्वर्गे त्वमग्रतस्त्रिदिवं गतान्‌ । कृष्णया सहितान्‌ सर्वान्‌ मा शुचो भरतर्षभ

শক্র (ইন্দ্র) বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! শোক কোরো না। তোমার ভ্রাতারা তোমার আগেই ত্রিদিবে গমন করেছে; কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-সহ তাদের সকলকে তুমি স্বর্গে দেখবে।

Verse 6

निक्षिप्य मानुषं देहं गतास्ते भरतर्षभ | अनेन त्वं शरीरेण स्वर्गे गन्ता न संशय:,भरतभूषण! वे मानवशरीरका परित्याग करके स्वर्गमें गये हैं; किंतु तुम इसी शरीरसे वहाँ चलोगे, इसमें संशय नहीं है

ইন্দ্র বললেন—হে ভরতর্ষভ! তারা মানবদেহ ত্যাগ করে স্বর্গে গিয়েছে; কিন্তু তুমি এই দেহ নিয়েই স্বর্গে যাবে—এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 7

युधिछिर उवाच अयं श्वा भूतभव्येश भक्तो मां नित्यमेव ह | स गच्छेत मया सार्धमानृशंस्या हि मे मति:

যুধিষ্ঠির বললেন—এই কুকুরটি অতীত ও ভবিষ্যৎ—সব কালে সর্বদা আমার প্রতি ভক্ত থেকেছে। সে-ও আমার সঙ্গে যাক; কারণ আমার সংকল্প করুণা ও অহিংসার উপর প্রতিষ্ঠিত।

Verse 8

युधिष्ठिर बोले--भूत और वर्तमानके स्वामी देवराज! यह कुत्ता मेरा बड़ा भक्त है। इसने सदा ही मेरा साथ दिया है; अतः यह भी मेरे साथ चले--ऐसी आज्ञा दीजिये; क्योंकि मेरी बुद्धिमें निष्ठरताका अभाव है ।।

শক্র (ইন্দ্র) বললেন—হে রাজন! আজ তুমি অমরত্ব, আমার সমতা, সম্পূর্ণ ঐশ্বর্য এবং মহাসিদ্ধি লাভ করেছ। তুমি স্বর্গের সুখও প্রাপ্ত হয়েছ; অতএব কুকুরটিকে ত্যাগ করো। এতে কোনো নিষ্ঠুরতা নেই।

Verse 9

इन्द्रने कहा--राजन! तुम्हें अमरता, मेरी समानता, पूर्ण लक्ष्मी और बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई है, साथ ही तुम्हें स्वर्गीय सुख भी उपलब्ध हुए हैं; अतः इस कुत्तेको छोड़ो और मेरे साथ चलो। इसमें कोई कठोरता नहीं है ।।

যুধিষ্ঠির বললেন—হে সহস্রনেত্র দেবরাজ! আর্য পুরুষের পক্ষে অনার্য কর্ম করা অত্যন্ত কঠিন; তা আর্যের যোগ্য নয়। যে ঐশ্বর্যের জন্য ভক্তজনকে ত্যাগ করতে হয়, এমন শ্রী যেন কখনও আমার সঙ্গে যুক্ত না হয়।

Verse 10

इन्द्र उवाच स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति घिष्ण्य- मिष्टापूर्त क्रोधवशा हरन्ति । ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति

ইন্দ্র বললেন—হে ধর্মরাজ! স্বর্গলোকে কুকুর-পালকদের জন্য স্থান নেই। ক্রোধবশ (নামক) রাক্ষস তাদের যজ্ঞ ও ইষ্টাপূর্তের পুণ্য হরণ করে। অতএব বিচার করে স্থির করো—কুকুরটিকে ত্যাগ করো; এতে কোনো নিষ্ঠুরতা নেই।

Verse 11

इन्द्रने कहा--धर्मराज! कुत्ता रखनेवालोंके लिये स्वर्गलोकमें स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवानेका जो पुण्य होता है उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं; इसलिये सोच-विचारकर काम करो। छोड़ दो इस कुत्तेको। ऐसा करनेमें कोई निर्दयता नहीं है ।।

যুধিষ্ঠির বললেন—হে মহেন্দ্র! ভক্তকে ত্যাগ করা পরম পাপ—এ কথা মহাত্মারা বলেন; এবং জগতে তা ব্রাহ্মণহত্যার সমান গণ্য। অতএব নিজের সুখের জন্য আমি আজ কোনোভাবেই এই কুকুরটিকে ত্যাগ করব না।

Verse 12

भीतं भक्त नान्यदस्तीति चार्त॑ प्राप्तं क्षीणं रक्षणे प्राणलिप्सुम्‌ । प्राणत्यागादप्यहं नैव मोक्तुं यतेयं वै नित्यमेतद्‌ व्रतं मे

যে ভীত, ভক্ত, ‘তুমি ছাড়া আমার আর আশ্রয় নেই’ বলে আর্তভাবে শরণে এসেছে, দুর্বল, আত্মরক্ষায় অক্ষম এবং প্রাণ বাঁচাতে চায়—এমন জনকে আমি প্রাণ ত্যাগ করলেও ত্যাগ করতে পারি না। এটাই আমার নিত্য ব্রত।

Verse 13

इन्द्र रवाच शुना दृष्ट क्रोधवशा हरन्ति यद्दत्तमिष्टं विवृतमथो हुतं च । तस्माच्छुनस्त्यागमिमं कुरुष्व शुनस्त्यागाद्‌ प्राप्स्यसे देवलोकम्‌

ইন্দ্র বললেন—বীরশ্রেষ্ঠ! মানুষ দান, যজ্ঞ, স্বাধ্যায় ও হোমে যে পুণ্যফল অর্জন করে, তাতে যদি কুকুরের দৃষ্টিও পড়ে, তবে ‘ক্রোধবশ’ নামে দানবেরা ক্রোধবশত সেই ফল হরণ করে। অতএব এই কুকুরটিকে ত্যাগ করো; কুকুর ত্যাগ করলেই তুমি দেবলোক লাভ করবে।

Verse 14

त्यक्त्वा भ्रातृन्‌ दयितां चापि कृष्णां प्राप्तो लोक: कर्मणा स्वेन वीर | श्वानं चैनं न त्यजसे कथं नु त्यागं कृत्स्नं चास्थितो मुहा[से5द्य

ইন্দ্র বললেন—বীর! তুমি তোমার ভ্রাতৃগণ ও প্রিয় কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-কেও ত্যাগ করে, নিজ কর্মের পুণ্যফলে দেবলোক লাভ করেছ। তবে এই কুকুরটিকে কেন ত্যাগ করছ না? সর্বত্যাগ গ্রহণ করে এখন কীভাবে কুকুরের মোহে বিভ্রান্ত হলে?

Verse 15

युधिछिर उवाच न विद्यते संधिरथापि विग्रहो मृतैर्मत्यैरिति लोकेषु निष्ठा । न ते मया जीवयितुं हि शक्‍्या- स्ततस्त्यागस्तेषु कृतो न जीवताम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—ভগবান! জগতে স্থির সিদ্ধান্ত এই যে মৃত মানুষের সঙ্গে না সন্ধি হয়, না বিরোধ। দ্রৌপদী ও আমার ভ্রাতৃগণকে জীবিত করা আমার সাধ্য নয়; তাই তারা মৃত্যুবরণ করার পরেই আমি তাদের ছেড়েছি—জীবিত অবস্থায় নয়।

Verse 16

भीतिप्रदानं शरणागतस्य स्त्रिया वधो ब्राह्मणस्वापहार: । मित्रद्रोहस्तानि चत्वारि शक्र भक्तत्यागश्चनैव समो मतो मे

যুধিষ্ঠির বললেন—হে শক্র! আশ্রয়প্রার্থীকে ভয় দেখানো, নারীবধ, ব্রাহ্মণের ধন হরণ, এবং মিত্রদ্রোহ—এই চারটি মহাপাপ। কিন্তু আমার মতে ভক্তকে ত্যাগ করাও তাদেরই সমান গুরুতর।

Verse 17

शरणमें आये हुए को भय देना, स्त्रीका वध करना, ब्राह्मणका धन लूटना और मित्रोंके साथ द्रोह करना--ये चार अधर्म एक ओर और भक्तका त्याग दूसरी ओर हो तो मेरी समझमें यह अकेला ही उन चारोंके बराबर है ।।

যুধিষ্ঠির বললেন—আশ্রয়প্রার্থীকে ভয় দেখানো, নারীবধ, ব্রাহ্মণের ধন লুণ্ঠন ও মিত্রদ্রোহ—এই চার অধর্ম একদিকে; আর অন্যদিকে ভক্তকে ত্যাগ—আমার মতে সেই একটিই চারটির সমান। বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের এই বাক্য শুনে, কুকুররূপে আগত ধর্মস্বয়ং ভগবান অত্যন্ত প্রসন্ন হলেন। তিনি রাজা যুধিষ্ঠিরকে প্রশংসা করে কোমল, প্রশস্তিময় বাক্যে এভাবে উত্তর দিলেন।

Verse 18

धर्मरज उवाच अभिजातोऊसि राजेन्द्र पितुर्व॒त्तेन मेधया । अनुक्रोशेन चानेन सर्वभूतेषु भारत

ধর্মরাজ বললেন—হে রাজেন্দ্র, হে ভরতবংশধর! তোমার সদাচার, প্রজ্ঞা এবং সকল জীবের প্রতি এই করুণার দ্বারা তুমি সত্যই সুকুলজাত—পিতৃবংশের মর্যাদার যোগ্য প্রমাণিত।

Verse 19

पुरा द्वैतवने चासि मया पुत्र परीक्षित: । पानीयार्थे पराक्रान्ता यत्र ते भ्रातरो हता:

ধর্মরাজ বললেন—হে পুত্র! পূর্বে দ্বৈতবন অরণ্যে আমি তোমাকে পরীক্ষা করেছিলাম—যখন তুমি জল আনতে দৃঢ় সংকল্পে গিয়েছিলে, সেই স্থানে যেখানে তোমার ভ্রাতারা নিহত হয়ে পড়েছিল।

Verse 20

बेटा! पूर्वकालमें द्वैतववनके भीतर रहते समय भी एक बार मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी; जब कि तुम्हारे सभी भाई पानी लानेके लिये उद्योग करते हुए मारे गये थे ।।

ধর্মরাজ বললেন—বৎস! পূর্বে দ্বৈতবনে থাকাকালেও আমি তোমাকে পরীক্ষা করেছিলাম; যখন জল আনতে গিয়ে তোমার ভ্রাতারা নিহত হয়ে পড়েছিল। সেখানে ভীম ও অর্জুন—নিজ সহোদর—কে ত্যাগ করে, দুই মায়ের প্রতি সমতা কামনা করে তুমি নকুলকে বাঁচাতে চেয়েছিলে।

Verse 21

उस समय तुमने कुन्ती और माद्री दोनों माताओंमें समानताकी इच्छा रखकर अपने सगे भाई भीम और अर्जुनको छोड़ केवल नकुलको जीवित करना चाहा था ।।

ধর্মরাজ বললেন—সেই সময় কুন্তী ও মাদ্রী—দুই মায়ের প্রতি সমান ভাব রেখে তুমি ভীম ও অর্জুনকে ত্যাগ করে কেবল নকুলকে বাঁচাতে চেয়েছিলে। আর যখন বলা হল, “এ কুকুর ভক্ত,” তখনও তুমি তাকে পরিত্যাগ করোনি—দেবরাজের রথ ত্যাগ করতেও দ্বিধা করোনি। অতএব, হে নরাধিপ! স্বর্গে তোমার সমান কেউ নেই।

Verse 22

इस समय भी “यह कुत्ता मेरा भक्त है” ऐसा सोचकर तुमने देवराज इन्द्रके भी रथका परित्याग कर दिया है; अतः स्वर्गलोकमें तुम्हारे समान दूसरा कोई राजा नहीं है ।।

ধর্মরাজ বললেন—এখনও “এই কুকুর আমার ভক্ত” মনে করে তুমি দেবরাজ ইন্দ্রের রথও ত্যাগ করেছ। অতএব, হে নরাধিপ! স্বর্গে তোমার সমান কেউ নেই। এই কারণেই, হে ভারত, হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তুমি এই দেহসহ অক্ষয় লোক লাভ করেছ; তুমি অনুত্তম দিব্য গতিতে উপনীত হয়েছ।

Verse 23

वैशम्पायन उवाच ततो धर्मक्ष शक्रश्न मरुतश्षाश्विनावपि । देवा देवर्षयश्चैव रथमारोप्य पाण्डवम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন ধর্ম, শক্র (ইন্দ্র), মরুদ্গণ, দুই অশ্বিনীকুমার, দেবগণ ও দেবর্ষিরা পাণ্ডব যুধিষ্ঠিরকে রথে আরূঢ় করালেন। যথোচিত সম্মান জানিয়ে তাঁরা নিজ নিজ বিমানে স্বর্গলোকে যাত্রা করলেন।

Verse 24

प्रययु: स्वैर्विमानैस्ते सिद्धा: कामविहारिण: । सर्वे विरजस: पुण्या: पुण्यवाग्बुद्धिकर्मिण:

সেই সিদ্ধজনেরা নিজেদের নিজেদের বিমানে যাত্রা করলেন। তাঁরা ইচ্ছামতো বিচরণকারী, রজোগুণহীন, পুণ্যস্বভাব এবং পবিত্র বাক্য, বুদ্ধি ও কর্মে সমৃদ্ধ ছিলেন।

Verse 25

स तं रथं समास्थाय राजा कुरुकुलोदवह: । ऊर्ध्वमाचक्रमे शीघ्रं तेजसा55वृत्य रोदसी,कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठिर उस रथमें बैठकर अपने तेजसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करते हुए तीव्र गतिसे ऊपरकी ओर जाने लगे

কুরুবংশের শ্রেষ্ঠ রাজা যুধিষ্ঠির সেই রথে আরূঢ় হয়ে, নিজের তেজে পৃথিবী ও আকাশ আচ্ছাদিত করে, দ্রুত ঊর্ধ্বদিকে আরোহণ করতে লাগলেন।

Verse 26

ततो देवनिकायस्थो नारद: सर्वलोकवित्‌ | उवाचोच्चैस्तदा वाक्‍्यं बृहद्वादी बृहत्तपा:

তখন দেবসমূহের মধ্যে অবস্থানকারী, সর্বলোকের সংবাদ-জ্ঞাতা, বাক্যে নিপুণ ও মহাতপস্বী দেবর্ষি নারদ উচ্চস্বরে বললেন।

Verse 27

ये5पि राजर्षय: सर्वे ते चापि समुपस्थिता: । कीर्ति प्रच्छाद्य तेषां वै कुरुराजो5धितिष्ठति

স্বর্গে আগত সকল রাজর্ষিই এখানে উপস্থিত; তবু কুরু-রাজ যুধিষ্ঠির নিজ নির্মল যশে তাঁদের সকলের কীর্তিকে আচ্ছাদিত করে শ্রেষ্ঠ আসনে অধিষ্ঠিত আছেন।

Verse 28

लोकानावृत्य यशसा तेजसा वृत्तसम्पदा । स्वशरीरेण सम्प्राप्तं नान्‍्यं शुश्रुम पाण्डवात्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—যশ, তেজ ও সদাচার-সম্পদায় সকল লোক আচ্ছাদিত করে পাণ্ডব স্বদেহেই নিজের নির্ধারিত পরিণতি লাভ করলেন; তাঁর বিষয়ে আমরা অন্য কোনো পরিণাম কখনও শুনিনি।

Verse 29

“अपने यश, तेज और सदाचाररूप सम्पत्तिसे तीनों लोकोंको आवृत करके अपने भौतिक शरीरसे स्वर्गलोकमें आनेका सौभाग्य पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकके सिवा और किसी राजाको प्राप्त हुआ हो, ऐसा हमने कभी नहीं सुना है ।।

বৈশম্পায়ন বললেন—পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠির ব্যতীত এমন কোনো রাজা আমরা কখনও শুনিনি, যিনি যশ, তেজ ও ধর্মাচরণ-সম্পদে ত্রিলোক আচ্ছাদিত করে স্বদেহেই স্বর্গে গমন করার দুর্লভ সৌভাগ্য লাভ করেছেন। হে বিভো! পৃথিবীতে থাকতে তুমি যে যে দীপ্তি দেখেছিলে, সেগুলিই এখন সহস্র সহস্র দেবলোকের দেবভবন—দেখো।

Verse 30

'प्रभो! युधिष्ठिर! पृथ्वीपर रहते हुए तुमने आकाशमें नक्षत्र और ताराओंके रूपमें जितने तेज देखे हैं, वे इन देवताओंके सहस्रों लोक हैं; इनकी ओर देखो” ।।

“প্রভু যুধিষ্ঠির! পৃথিবীতে থাকতে আকাশে নক্ষত্র-তারারূপে তুমি যে যে দীপ্তি দেখেছিলে, সেগুলিই এই দেবতাদের সহস্র সহস্র লোক; সেদিকে চাও।” নারদের কথা শুনে ধর্মাত্মা রাজা যুধিষ্ঠির দেবতাদের এবং নিজের পক্ষের রাজাদের অনুমতি নিয়ে বললেন।

Verse 31

शुभं वा यदि वा पापं भ्रातृणां स्थानमद्य मे । तदेव प्राप्तुमिच्छामि लोकानन्यान्न कामये

আমার ভ্রাতাদের গতি শুভ হোক বা পাপময়—আজ আমি সেই একই অবস্থাই লাভ করতে চাই। তাদের লোক ব্যতীত অন্য কোনো লোক আমি কামনা করি না।

Verse 32

'देवेश्वर! मेरे भाइयोंको शुभ या अशुभ जो भी स्थान प्राप्त हुआ हो उसीको मैं भी पाना चाहता हूँ। उसके सिवा दूसरे लोकोंमें जानेकी मेरी इच्छा नहीं है” ।।

যুধিষ্ঠির বললেন—“দেবেশ্বর! আমার ভ্রাতারা শুভ হোক বা অশুভ—যে স্থানই লাভ করে থাকুক, আমিও সেই স্থানই লাভ করতে চাই। তা ছাড়া অন্য লোকগমনের কোনো বাসনা আমার নেই।” রাজার কথা শুনে দেবরাজ পুরন্দর ইন্দ্র করুণায় উদ্বুদ্ধ হয়ে যুধিষ্ঠিরকে কোমল বাক্যে উত্তর দিলেন।

Verse 33

स्थाने5स्मिन्‌ वस राजेन्द्र कर्मभिर्निर्जिते शुभै: । किं त्वं मानुष्यकं स्नेहमद्यापि परिकर्षसि

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজেন্দ্র! তোমার শুভ কর্মে অর্জিত এই লোকেই বাস করো। তবু কেন তুমি এখনও মানব-লোকের স্নেহবন্ধন আঁকড়ে ধরে টেনে নিয়ে চলেছ?

Verse 34

सिद्धि प्राप्तोडसि परमां यथा नान्य: पुमान्‌ क्वचित्‌ | नैव ते भ्रातर: स्थान सम्प्राप्ता: कुरुनन्दन

বৈশম্পায়ন বললেন—হে কুরুনন্দন! তুমি পরম সিদ্ধি লাভ করেছ—যেমন আর কোনো মানুষ কখনও কোথাও লাভ করেনি। কিন্তু তোমার ভ্রাতারা সেই অবস্থায় পৌঁছাতে পারেনি।

Verse 35

अद्यापि मानुषो भाव: स्पृशते त्वां नराधिप । स्वर्गोडयं पश्य देवर्षीन्‌ सिद्धांश्व त्रेदिवालयान्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—হে নরাধিপ! এখনও কি মানবভাব তোমাকে স্পর্শ করছে? এ তো স্বর্গলোক; ত্রিদিবে নিবাসী দেবর্ষি ও সিদ্ধদের দর্শন করো।

Verse 36

युधिष्ठिरस्तु देवेन्द्रमेवंवादिनमी श्वरम्‌ । पुनरेवाब्रवीद्‌ धीमानिदं वचनमर्थवत्‌,ऐसी बात कहते हुए ऐश्वर्यशाली देवराजसे बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिरने पुनः यह अर्थयुक्त वचन कहा--

বৈশম্পায়ন বললেন—এভাবে কথা বলতে থাকা দেবরাজ ইন্দ্রকে উদ্দেশ করে জ্ঞানী যুধিষ্ঠির আবারও অর্থবহ বাক্য উচ্চারণ করলেন।

Verse 37

तैर्विना नोत्सहे वस्तुमिह दैत्यनिबर्हण । गन्तुमिच्छामि तत्राहं यत्र ते भ्रातरो गता:

যুধিষ্ঠির বললেন—হে দৈত্যনিবারণ! ভাইদের ছাড়া এখানে থাকতে আমার উৎসাহ হয় না। আমি সেখানে যেতে চাই, যেখানে আমার ভ্রাতারা গিয়েছে।

Verse 38

यत्र सा बृहती श्यामा बुद्धिसत्त्वगुणान्विता । द्रौपदी योषितां श्रेष्ठा यत्र चैव गता मम

বৈশম্পায়ন বললেন—আমিও সেই লোকেই যেতে চাই, যেখানে আমার দ্রৌপদী গেছেন—উচ্চদেহা, শ্যামবর্ণা, বুদ্ধি ও সত্ত্বগুণে সমন্বিতা, নারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠা।

Frequently Asked Questions

Whether Yudhiṣṭhira should accept entry to svarga by abandoning a dependent companion (the dog) and proceeding without his fallen kin, or uphold non-abandonment and loyalty even at the cost of heavenly access.

Dharma is validated as consistency: principled care for dependents and refusal to trade integrity for reward is portrayed as superior to compliance with status-based conventions.

Yes in functional form: Dharma’s praise and Nārada’s proclamation act as meta-commentary, marking Yudhiṣṭhira’s bodily ascent as exceptionally rare and framing the episode as a completed dharma-test with confirmatory outcome.