प्रच्छन्नरूपां रुधिरेण राजन् रौद्रे मुहूर्तेशतिविराजमाने । नैवावतस्थु: कुरव: समीक्ष्य प्रत्राजिता देवलोकाय सर्वे,राजन! अत्यन्त शोभा पानेवाले उस रौद्रमुहूर्त (सायंकाल)-में, रुधिरसे जिसका स्वरूप छिप गया था, उस भूमिको देखते हुए कौरव-सैनिक वहाँ ठहर न सके। वे सब-के-सब देवलोककी यात्राके लिये उद्यत थे
pracchannarūpāṁ rudhireṇa rājan raudre muhūrte śatirājamāne | naivāvatasthuḥ kuravaḥ samīkṣya pratrājitā devalokāya sarve ||
রাজন! সেই ভয়ংকর রৌদ্র-মুহূর্তে (সন্ধ্যাকালে), যখন রক্তে রণভূমির রূপ আচ্ছন্ন হয়ে গিয়েছিল এবং সেই ক্ষণ আতঙ্কে দীপ্ত হচ্ছিল, তা দেখে কৌরবেরা সেখানে আর দাঁড়াতে পারল না। সকলেই বিমূঢ় হয়ে তাড়িতের মতো, যেন দেবলোক-যাত্রায়ই বেরিয়ে পড়ল।
शल्य उवाच