
द्रौणिप्रतिज्ञा–नारायणास्त्रवर्णनम् (Drauṇi’s Vow and the Description of the Nārāyaṇāstra)
Upa-parva: Nārāyaṇāstra-prayoga (Episode of the Nārāyaṇa Weapon’s Deployment)
Saṃjaya reports that Aśvatthāman wreaks severe devastation upon opponents, likened to end-time destruction. He reiterates a vow before Dhṛtarāṣṭra’s son (Duryodhana), prompting a renewed convergence of Kuru and Pāṇḍava forces. Amid heightened martial sound and imagery, Drauṇi deploys the Nārāyaṇāstra against the Pāṇḍava–Pāñcāla host; countless blazing projectiles and weapon-forms fill the sky, and the astra intensifies in response to resistance. The Pāṇḍava side experiences acute fear as casualties mount. Yudhiṣṭhira, overwhelmed, issues instructions for withdrawal and even expresses self-destructive despair. Kṛṣṇa (Vāsudeva) intervenes with a technical countermeasure: all should lay down weapons and dismount, since the astra targets those who resist. Bhīma refuses the counsel and attempts direct opposition, whereupon the astra’s force increases; the army largely complies by disarming and dismounting, causing the weapon’s pressure to fall away from them while concentrating upon Bhīma, who becomes obscured by blazing energy as the chapter closes.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को रात्रियुद्ध के भीतर उठती नई मुठभेड़ों का वृत्तांत सुनाते हैं—शतानीक का चित्रसेन से सामना, वृषसेन का द्रुपद (यज्ञसेन) पर प्रहार, और प्रतिविन्ध्य का दुःशासन से टकराव। → तीर-प्रतितीर की वर्षा में शतानीक और चित्रसेन एक-दूसरे को बार-बार बेधते हैं; उधर वृषसेन क्रुद्ध होकर यज्ञसेन की छाती में अनेक तीक्ष्ण बाण उतारता है। रात्रि का अंधकार, थकान और भ्रम युद्ध को और निर्दय बनाते हैं। → एक महारथी का धनुष कट जाता है, घोड़े-सारथि मारे जाते हैं और वह विरथ होकर भी तुरंत हार्दिक्य (कृतवर्मा) के रथ पर चढ़कर युद्ध में लौट आता है—रात्रियुद्ध में जीवन-मरण की डोर एक क्षण में टूटती और फिर किसी दूसरे रथ से बंध जाती है। → सारथियों की चतुराई और रथ-परिवर्तन से मोर्चे संभलते हैं; प्रतिविन्ध्य अपने तीक्ष्ण बाणों से घोड़ों को गिराकर दुष्कर पराक्रम दिखाता है। पर निर्णायक विजय किसी एक पक्ष की नहीं—रात्रि के भीतर युद्ध चलता रहता है। → निशीथ के दारुण समय में ‘यमराष्ट्रविवर्धन’ जैसा घोर संग्राम और भड़क उठता है—अगले क्षण किसका रथ टूटेगा, किसका तेज बुझ जाएगा, यह अनिश्चित रह जाता है।
Verse 1
ऑपनआक्रा बछ। अंक अष्टषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय: शतानीकके द्वारा चित्रसेनकी और वृषसेनके द्वारा द्रुपदकी पराजय तथा प्रतिविन्ध्य एवं दुःशासनका युद्ध संजय उवाच शतानीकं शरैस्तूर्ण निर्दहन्तं चमूं तव । चित्रसेनस्तव सुतो वारयामास भारत
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! একদিকে নকুলপুত্র শতানীক তীররূপ অগ্নিতে যেন তোমার সেনাকে দগ্ধ করতে করতে দ্রুত এগিয়ে আসছিল। তাকে তোমার পুত্র চিত্রসেন প্রতিহত করল।
Verse 2
नाकुलिकश्रित्रसेनं तु विदृध्वा पजचभिराशुगै: । सतुतंप्रतिविव्याध दशभिर्निशितै: शरैः,शतानीकने चित्रसेनको पाँच बाण मारे। चित्रसेनने भी दस पैने बाण मारकर बदला चुकाया
সঞ্জয় বললেন—নকুলপুত্র শতানীক শ্রিত্রসেনকে পাঁচটি দ্রুত তীরে বিদ্ধ করল। তখন চিত্রসেনও দশটি ধারালো শর নিক্ষেপ করে শতানীককে আঘাত করে প্রতিশোধ নিল।
Verse 3
चित्रसेनो महाराज शतानीकं पुनर्युधि । नवभिर्निशितैर्बाणैराजघान स्तनान्तरे,महाराज! चित्रसेनने युद्धस्थलमें पुनः नौ तीखे बाणोंद्वारा शतानीककी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! যুদ্ধে চিত্রসেন আবার নয়টি ধারালো তীরে শতানীকের বক্ষদেশে আঘাত করল।
Verse 4
नाकुलिस्तस्य विशिखैर्वर्म संनतपर्वभि: । गात्रात् संच्यावयामास तदद्भुतमिवाभवत्,तब नकुलपुत्रने झुकी हुई गाँठवाले अनेक बाण मारकर चित्रसेनके शरीरसे उसके कवचको काट गिराया। वह अद्धभुत-सा कार्य हुआ
সঞ্জয় বললেন—তখন নকুলপুত্র বাঁকা গাঁটযুক্ত বহু তীরে আঘাত করে তার দেহ থেকে বর্মটি সরিয়ে ফেলল; সে কীর্তি বিস্ময়কর বলে মনে হল।
Verse 5
सो<पेतवर्मा पुत्रस्ते विरराज भृशं नृप । उत्सृज्य काले राजेन्द्र निर्मोकमिव पन्नग:,नरेश्वर! राजेन्द्र! कवच कट जानेपर आपका पुत्र चित्रसेन समयपर केंचुल छोड़नेवाले सर्पके समान अत्यन्त सुशोभित हुआ
সঞ্জয় বললেন—হে নৃপ! হে রাজেন্দ্র! বর্ম খসে পড়লে আপনার পুত্র অপেতবর্মা (চিত্রসেন) যথাসময়ে খোলস ত্যাগকারী সাপের মতো অতিশয় দীপ্তিমান হয়ে উঠল।
Verse 6
ततोअस्य निशितैर्बाणैर्थ्वजं चिच्छेद नाकुलि: । धनुश्वैव महाराज यतमानस्य संयुगे
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! তারপর নকুলপুত্র তীক্ষ্ণ তীরে যুদ্ধে জয়লাভে উদ্যত চিত্রসেনের ধ্বজ কেটে ফেলল এবং তার ধনুকও ছিন্ন করল।
Verse 7
स च्छिन्नधन्वा समरे विवर्मा च महारथ: । धनुरन्यन्महाराज जग्राहारिविदारणम्,राजेन्द्र! समरांगणमें धनुष और कवच कट जानेपर महारथी चित्रसेनने दूसरा धनुष हाथमें लिया, जो शत्रुको विदीर्ण करनेमें समर्थ था
সমরে ধনুক ছিন্ন ও কবচ বিদীর্ণ হলেও, হে মহারাজ, রাজেন্দ্র! সেই মহারথী শত্রুবিদারক আর-এক ধনুক তুলে নিল।
Verse 8
ततस्तूर्ण चित्रसेनो नाकुलिं नवभि: शरै: | विव्याध समरे क्रुद्धो भरतानां महारथ:,उस समय समरभूमिमें कुपित हुए भरतकुलके महारथी वीर चित्रसेनने नकुलपुत्र शतानीकको नौ बाणोंसे घायल कर दिया
তারপর সমরে ক্রুদ্ধ ও ত্বরিত ভরতবংশীয় মহারথী চিত্রসেন নকুলপুত্র শতানীককে নয়টি শর দিয়ে বিদ্ধ করল।
Verse 9
शतानीको<थ संक्रुद्धश्चित्रसेनस्थ मारिष । जघान चतुरो वाहान् सारथिं च नरोत्तम:,माननीय नरेश! तब अत्यन्त कुपित हुए नरश्रेष्ठ शतानीकने चित्रसेनके चारों घोड़ों और सारथिको मार डाला
তখন অতিশয় ক্রুদ্ধ নরশ্রেষ্ঠ শতানীক চিত্রসেনের চারটি ঘোড়া এবং তার সারথিকেও নিধন করল।
Verse 10
अवलप्लुत्य रथात् तस्माच्चित्रसेनो महारथ: । नाकुलिं पञ्चविंशत्या शराणामार्दयद् बली,तब बलवान महारथी चित्रसेनने उस रथसे कूदकर नकुलपुत्र शतानीकको पचीस बाण मारे
তখন বলবান মহারথী চিত্রসেন সেই রথ থেকে লাফিয়ে নেমে নকুলপুত্র শতানীককে পঁচিশটি শর দিয়ে আঘাত করল।
Verse 11
तस्य तत्कुर्वत: कर्म नकुलस्य सुतो रणे । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद चापं रत्नविभूषितम्,यह देख रणक्षेत्रमें नकुलपुत्रने पूर्वोक्त कर्म करनेवाले चित्रसेनके रत्नविभूषित धनुषको एक अर्धचन्द्राकार बाणसे काट डाला
সে কাজ করতে থাকতেই রণক্ষেত্রে নকুলপুত্র অর্ধচন্দ্রাকৃতি শর দিয়ে চিত্রসেনের রত্নখচিত ধনুকটি কেটে ফেলল।
Verse 12
सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वनो हतसारथि: । आरुरोह रथं तूर्ण हार्दिक्यस्य महात्मन:,धनुष कट गया, घोड़े और सारथि मारे गये और वह रथहीन हो गया। उस अवस्थामें चित्रसेन तुरंत भागकर महामना कृतवर्माके रथपर जा चढ़ा
ধনুক ছিন্ন, রথচ্যুত, অশ্বহত ও সারথিহত হয়ে সে রথহীন হল; তখন সে ত্বরিতে মহাত্মা হার্দিক্য (কৃতবর্মা)-র রথে উঠে পড়ল।
Verse 13
ट्रुपदं तु सहानीकं द्रोणप्रेप्सुं महारथम् । वृषसेनो<भ्ययात् तूर्ण किर|ञ्शरशतैस्तदा
দ্রোণকে প্রতিহত করতে সেনাসহ অগ্রসরমান মহারথী দ্রুপদের দিকে বৃষসেন তৎক্ষণাৎ দ্রুত ধেয়ে গেল এবং তখন শত শত শর নিক্ষেপ করে বর্ষণ করল।
Verse 14
यज्ञसेनस्तु समरे कर्णपुत्रं महारथम् । षष्ट्या शराणां विव्याध बाह्दवोरुगसि चानघ,निष्पाप नरेश! समरांगणमें राजा यज्ञसेन (द्रुपद)-ने महारथी कर्णपुत्र वृषसेनकी छाती और भुजाओंमें साठ बाण मारे
হে নিষ্পাপ নৃপ! সমরে যজ্ঞসেন (দ্রুপদ) কর্ণপুত্র মহারথী বৃষসেনকে বাহু ও বক্ষে ষাটটি শর দিয়ে বিদ্ধ করলেন।
Verse 15
वृषसेनस्तु संक्रुद्धो यज्ञसेनं रथे स्थितम् । बहुभि: सायकैस्ती3्ष्णराजघान स्तनान्तरे,तब वृषसेन अत्यन्त कुपित होकर रथपर बैठे हुए यज्ञसेनकी छातीमें बहुत-से पैने बाण मारे
তখন বৃষসেন ক্রুদ্ধ হয়ে রথে স্থিত যজ্ঞসেনের বক্ষদেশে বহু তীক্ষ্ণ শর নিক্ষেপ করে আঘাত করল।
Verse 16
तावुभौ शरनुन्नाज़ौ शरकण्टकितौ रणे । व्यभ्राजेतां महाराज श्वाविधौ शललैरिव
হে মহারাজ! রণে উভয়েই শরবিদ্ধ হয়ে, শররূপ কণ্টকে আচ্ছন্ন, এমন দীপ্তিমান দেখাচ্ছিলেন যেন কাঁটায় ভরা দুই সজারু।
Verse 17
रुक्मपुड्खीै: प्रसन्नाग्रै: शरैश्छिन्नतनुच्छदौ । रुधिरीघपरिक्लिन्नौ व्यभ्राजेतां महामृथे
সঞ্জয় বললেন—সেই মহাযুদ্ধে সোনালি পালকযুক্ত, নির্মল ও তীক্ষ্ণ অগ্রভাগের শর তাদের দু’জনের বর্ম ছিন্নভিন্ন করে দিল। রক্তধারায় সিক্ত হয়েও সেই দুই বীর এক অদ্ভুত, ভয়ংকর দীপ্তিতে উজ্জ্বল হয়ে উঠলেন।
Verse 18
तपनीयनिभौ चित्रौ कल्पवृक्षाविवाद्भुतौ । किंशुकाविव चोत्फुल्लौ व्यकाशेतां रणाजिरे
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে তারা দু’জন তপ্ত সোনার মতো বিচিত্র, কল্পবৃক্ষের মতো আশ্চর্য, আর পূর্ণ প্রস্ফুটিত কিঞ্চুক (পলাশ)-বৃক্ষের মতো দীপ্ত হয়ে প্রকাশিত হচ্ছিল।
Verse 19
वृषसेनस्ततो राजन ट्रुपदं नवभि: शरै: | विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनरन्यैस्त्रिभिस्त्रिभि:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! তখন বৃষসেন দ্রুপদকে নয়টি শর দিয়ে বিদ্ধ করল; তারপর সত্তরটি শর দিয়ে আরও আঘাত করল, এবং পরে আবার অন্য শর তিনটি করে নিক্ষেপ করে বিদ্ধ করতে লাগল।
Verse 20
तत:ः शरसहस्राणि विमुज्चन् विवभौ तदा । कर्णपुत्रो महाराज वर्षमाण इवाम्बुद:,महाराज! तदनन्तर सहस्रों बाणोंका प्रहार करता हुआ कर्णपुत्र वृषसेन जलकी वर्षा करनेवाले मेघके समान सुशोभित होने लगा
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! তখন সহস্র সহস্র শর নিক্ষেপ করতে করতে কর্ণপুত্র বৃষসেন জলবর্ষণকারী মেঘের মতো দীপ্ত হয়ে উঠল।
Verse 21
इससे क्रोधमें भरे हुए राजा द्रपदने एक पानीदार पैने भल्लसे वृषसेनके धनुषके दो टुकड़े कर डाले
সঞ্জয় বললেন—তখন ক্রোধে উন্মত্ত রাজা দ্রুপদ ঝকঝকে ধারালো ভল্ল-শর দিয়ে বৃষসেনের ধনুক দু’খণ্ড করে দিলেন।
Verse 22
सोअन्यत् कार्मुकमादाय रुक्मबद्धं नवं दृढम् । तूणादाकृष्य विमलं भल्लं पीत॑ शितं दृढम्
সঞ্জয় বললেন—তখন বৃষসেন সোনায় বাঁধা নতুন ও দৃঢ় আরেকটি ধনুক হাতে নিল। সে তূণীর থেকে নির্মল, ঝলমলে, পীতবর্ণ, তীক্ষ্ণ ও শক্তিশালী ভল্ল-শর টেনে বের করল। ধনুকে তা বসিয়ে কর্ণপর্যন্ত টেনে, সমস্ত সোমককে ভীতসন্ত্রস্ত করে রাজা দ্রুপদকে লক্ষ্য করে সেই ভল্ল নিক্ষেপ করল।
Verse 23
द्रपदस्तु ततः क्रुद्धो वृषसेनस्य कार्मुकम् । द्विधा चिच्छेद भललेन पीतेन निशितेन च
সঞ্জয় বললেন—তখন ক্রুদ্ধ দ্রুপদ পীতবর্ণ তীক্ষ্ণ ভল্ল-শরে বৃষসেনের ধনুক দ্বিখণ্ডিত করলেন। এরপর বৃষসেন আরেকটি ধনুক জুড়ে দ্রুপদকে লক্ষ্য করে কর্ণপর্যন্ত টেনে, সকল সোমককে আতঙ্কিত করে তীর ছুড়ল।
Verse 24
हृदयं तस्य भित्त्वाच जगाम वसुधातलम् । कश्मलं प्राविशद् राजा वृषसेनशराहत:,वह भल्ल्ल ट्रपदकी छाती छेदकर धरतीपर जा गिरा। वृषसेनके उस भललसे आहत होकर राजा ट्रुपद मूर्च्छित हो गये
সঞ্জয় বললেন—সেই ভল্ল দ্রুপদের হৃদয় বিদ্ধ করে ভূমিতলে পড়ে গেল। বৃষসেনের শরে আঘাতপ্রাপ্ত রাজা বিভ্রান্তিতে আচ্ছন্ন হয়ে মূর্ছিত হয়ে লুটিয়ে পড়লেন।
Verse 25
सारथिस्तमपोवाह स्मरन् सारथिचेष्टितम् । तस्मिन् प्रभग्ने राजेन्द्र पजचालानां महारथे
সঞ্জয় বললেন—হে রাজেন্দ্র! পাঞ্চালদের সেই মহারথী যখন বিপর্যস্ত হলেন, তখন সারথি সারথির কর্তব্য স্মরণ করে তাঁকে সেখান থেকে সরিয়ে নিল।
Verse 26
ततस्तु द्रुपदानीकं शरैश्छिन्नतनुच्छदम् । सम्प्राद्रवत् तदा राजन् निशीथे भैरवे सति
সঞ্জয় বললেন—তারপর, হে রাজন! দ্রুপদের সেনাদল, যাদের দেহ ও বর্ম তীরের আঘাতে ছিন্নভিন্ন, সেই ভয়ংকর মধ্যরাত্রিতে উন্মত্তভাবে পলায়ন করল।
Verse 27
राजेन्द्र! तब सारथि अपने कर्तव्यका स्मरण करके उन्हें रणभूमिसे दूर हटा ले गया। पांचालोंके महारथी द्रपदके हट जानेपर बाणोंसे कटे हुए कवचवाली द्रुपदकी सारी सेना उस भयंकर आधीरातके समय वहाँसे भाग चली ।।
সঞ্জয় বললেন—রাজেন্দ্র! তখন সারথি নিজের ধর্ম স্মরণ করে তাঁদের রণভূমি থেকে দূরে সরিয়ে নিল। পাঞ্চালদের মহারথী দ্রুপদ সরে গেলে, বাণে ছিন্ন-বিক্ষত কবচধারী দ্রুপদের সমগ্র সেনা সেই ভয়ংকর মধ্যরাত্রিতে স্থান ত্যাগ করে পলায়ন করল। পালাতে থাকা সৈন্যরা যে মশালগুলি ফেলে দিয়েছিল, সেগুলি চারদিকে জ্বলছিল; তাদের আলোয়, হে রাজন, সেই ভূমি মেঘহীন আকাশে গ্রহ-নক্ষত্রের মতো দীপ্ত হয়ে উঠেছিল।
Verse 28
तथाडूुदैर्निपतितैव्यराजत वसुंधरा । प्रावृट्काले महाराज विद्युदूभिरिव तोयद:
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! বীরদের পতিত, ঝলমলে বাহুবন্ধে সেই ভূমি দীপ্ত হয়ে উঠেছিল; যেমন বর্ষাকালে বিদ্যুতের ঝলকে মেঘ আলোকিত হয়।
Verse 29
ततः कर्णसुतात् त्रस्ता: सोमका विद्रदुद्रुव॒ुः । यथेन्द्रभयवित्रस्ता दानवास्तारकामये
সঞ্জয় বললেন—তারপর কর্ণপুত্রের ভয়ে সন্ত্রস্ত সোমকরা দ্রুত পালিয়ে গেল; যেমন তারকাময় যুদ্ধে ইন্দ্রভয়ে কাঁপা দানবরা ছত্রভঙ্গ হয়েছিল।
Verse 30
तदनन्तर कर्णपुत्र वृषसेनके भयसे त्रस्त हो सोमकवंशी क्षत्रिय उसी प्रकार भागने लगे, जैसे तारकामय संग्राममें इन्द्रके भयसे डरे हुए दानव भागे थे ।।
সঞ্জয় বললেন—তারপর কর্ণপুত্র বৃষসেনের ভয়ে সন্ত্রস্ত সোমক বংশীয় ক্ষত্রিয়রা পালাতে লাগল; যেমন তারকাময় যুদ্ধে ইন্দ্রভয়ে দানবরা পালিয়েছিল। মহারাজ! সমরে বৃষসেনের তাড়নায় বিশৃঙ্খলভাবে ছুটতে থাকা সোমক যোদ্ধারা মশালের আলোয় উজ্জ্বল হয়ে বিচিত্র শোভা পাচ্ছিল।
Verse 31
तांस्तु निर्जित्य समरे कर्णपुत्रो5प्यरोचत । मध्यंदिनमनुप्राप्तो घर्माशुरिव भारत,भारत! युद्धस्थलमें उन सबको जीतकर कर्णपुत्र वृषसेन भी दोपहरके प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यके समान उद्धासित हो रहा था
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! সমরে তাদের সকলকে জয় করে কর্ণপুত্র বৃষসেনও মধ্যাহ্নে তপ্ত কিরণধারী সূর্যের মতো দীপ্ত হয়ে উঠেছিল।
Verse 32
तेषु राजसहस्रेषु तावकेषु परेषु च । एक एव ज्वलंस्तस्थौ वृषसेन: प्रतापवान्,आपके और शत्रुपक्षेके सहस्नों राजाओंके बीच एकमात्र प्रतापी वृषसेन ही अपने तेजसे प्रकाशित होता हुआ रणभूमिमें खड़ा था
সেই সহস্র রাজাদের মধ্যে—তোমাদের পক্ষেও, শত্রুপক্ষেও—একাই প্রতাপশালী বৃষসেন যুদ্ধক্ষেত্রে জ্বলন্ত দীপ্তিতে দাঁড়িয়ে ছিল।
Verse 33
स विजित्य रणे शूरान् सोमकानां महारथान् | जगाम त्वरितस्तत्र यत्र राजा युधिष्ठटिर:,वह युद्धके मैदानमें शूरवीर सोमक महारथियोंको परास्त करके तुरंत वहाँ चला गया, जहाँ राजा युधिष्छिर खड़े थे
রণে সোমকদের বীর মহারথীদের পরাজিত করে সে তৎক্ষণাৎ দ্রুত সেখানে গেল, যেখানে রাজা যুধিষ্ঠির দাঁড়িয়ে ছিলেন।
Verse 34
प्रतिविन्ध्यमथ क्रुद्ध॑ प्रदहन्तं रणे रिपून् दुःशासनस्तव सुत:ः प्रत्यगच्छन्महारथ:
তখন ক্রোধে দগ্ধ প্রতिवিন্ধ্য যুদ্ধক্ষেত্রে শত্রুদের দহন করতে করতে অগ্রসর হচ্ছিল; তাকে প্রতিহত করতে তোমার পুত্র, মহারথী দুঃশাসন, এগিয়ে এল।
Verse 35
तयो: समागमो राजंश्रित्ररूपो बभूव ह । व्यपेतजलद व्योम्नि बुधभास्करयोरिव,राजन! जैसे मेघरहित आकाशमें बुध और सूर्यका समागम हो, उसी प्रकार युद्धस्थलमें उन दोनोंका अद्भुत मिलन हुआ
রাজন! যুদ্ধক্ষেত্রে তাদের সেই সম্মিলন ছিল বিস্ময়কর—যেন মেঘমুক্ত আকাশে বুধ ও সূর্যের মিলন।
Verse 36
प्रतिविन्ध्यं तु समरे कुर्वाणं कर्म दुष्करम् । दुःशासनस्त्रिभिर्बाणैर्ललाटे समविध्यत,समरांगणमें दुष्कर कर्म करनेवाले प्रतिविन्ध्यके ललाटमें दुःशासनने तीन बाण मारे
সমরে দুরূহ কীর্তি সাধনরত প্রতिवিন্ধ্যের কপালে দুঃশাসন তিনটি বাণ বিদ্ধ করল।
Verse 37
सो5तिविद्धों बलवता तव पुत्रेण धन्विना । विरराज महाबाहु: सशृज्ञ इव पर्वतः
সঞ্জয় বললেন—তোমার শক্তিধর ধনুর্ধর পুত্রের ধনুক থেকে নিক্ষিপ্ত তীক্ষ্ণ বাণে বারংবার বিদ্ধ হয়ে গভীরভাবে আহত হয়েও মহাবাহু প্রতিবিন্ধ্য শৃঙ্গশোভিত পর্বতের ন্যায় দীপ্তিমান রইল।
Verse 38
दुःशासन तु समरे प्रतिविन्ध्यो महारथ: । नवश्ि: सायकैर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सप्तभि:,तत्पश्चात् महारथी प्रतिविन्ध्यने समरभूमिमें दुःशासनको नौ बाणोंसे घायल करके फिर सात बाणोंसे बींध डाला
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধক্ষেত্রে মহারথী প্রতিবিন্ধ্য দুঃশাসনকে নয়টি বাণে বিদ্ধ করে, পরে আবার সাতটি বাণে পুনরায় আঘাত করল।
Verse 39
तत्र भारत पुत्रस्ते कृतवान् कर्म दुष्करम् | प्रतिविन्ध्यहयानुग्रै: पातयामास सायकै:
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত, সেখানে তোমার পুত্র এক দুষ্কর কীর্তি সাধন করল; ভয়ংকর বাণে সে প্রতিবিন্ধ্যের ঘোড়াগুলিকে মাটিতে লুটিয়ে দিল।
Verse 40
सारथिं चास्य भल्लेन ध्वजं च समपातयत् | रथं च तिलशो राजन् व्यधमत् तस्य धन्विन:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, এক ভল্লবাণে সে সেই ধনুর্ধর প্রতিবিন্ধ্যের সারথি ও ধ্বজকে মাটিতে ফেলে দিল; আর তার রথটিকেও তিলের দানার মতো ক্ষুদ্র ক্ষুদ্র খণ্ডে চূর্ণ করল।
Verse 41
पताकाश्व सतूणीरा रश्मीन् योक्त्राणि च प्रभो । चिच्छेद तिलश: क्रुद्ध: शरै: संनतपर्वभि:
সঞ্জয় বললেন—হে প্রভু, ক্রোধে উন্মত্ত দুঃশাসন সুদৃঢ়ভাবে বাঁকানো গাঁটযুক্ত বাণে প্রতিবিন্ধ্যের পতাকা, ঘোড়া, তূণীর, লাগাম ও রথের জোয়ালের বন্ধন—সবই তিল তিল করে কেটে ফেলল।
Verse 42
विरथ: स तु धर्मात्मा धनुष्पाणिरवस्थित: । अयोधयत् तव सुतं किरञ्शरशतान् बहून्
সঞ্জয় বললেন—রথহীন হয়েও সেই ধর্মাত্মা বীর ধনুক হাতে অটল হয়ে দাঁড়াল। শত শত শর বর্ষণ করে সে তোমার পুত্রের সঙ্গে যুদ্ধে প্রবৃত্ত হল।
Verse 43
क्षुरप्रेण धनुस्तस्य चिच्छेद तनयस्तव । अथैनं दशभिर्बाणैश्छिन्नधन्वानमार्दयत्,तब आपके पुत्रने एक क्षुरप्रसे प्रतिविन्ध्यका धनुष काट दिया और धनुष कट जानेपर उसे दस बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी
সঞ্জয় বললেন—তোমার পুত্র ক্ষুরপ্র অগ্রযুক্ত শর দিয়ে তার ধনুক কেটে দিল। তারপর ধনুকছিন্ন অবস্থায় তাকে দশটি শর দিয়ে প্রবল আঘাত করল।
Verse 44
त॑ दृष्टवा विरथं तत्र भ्रातरो5स्य महारथा: । अन्ववर्तन्त वेगेन महत्या सेनया सह,उसे रथहीन हुआ देख उसके अन्य महारथी भाई विशाल सेनाके साथ बड़े वेगसे उसकी सहायताके लिये आ पहुँचे
সঞ্জয় বললেন—সেখানে তাকে রথহীন দেখে তার মহারথী ভ্রাতারা বিশাল সেনাদলসহ প্রবল বেগে তার সাহায্যে ধাবিত হল।
Verse 45
आप्लुत: स ततो यान॑ सुतसोमस्य भास्वरम् | धनुर्गह्ा महाराज विव्याध तनयं तव,महाराज! तब प्रतिविन्ध्य उछलकर सुतसोमके तेजस्वी रथपर जा बैठा और हाथमें धनुष लेकर आपके पुत्रको घायल करने लगा
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! তখন প্রতिवিন্ধ্য লাফ দিয়ে সুতসোমের দীপ্তিমান রথে উঠে পড়ল। ধনুক হাতে নিয়ে সে তোমার পুত্রকে বিদ্ধ করতে লাগল।
Verse 46
ततस्तु तावका: सर्वे परिवार्य सुतं तव । अभ्यवर्तन्त संग्रामे महत्या सेनया वृता:,यह देख आपके सभी योद्धा आपके पुत्र दुःशासनको सब ओरसे घेरकर विशाल सेनाके साथ वहाँ युद्धके लिये डट गये
সঞ্জয় বললেন—এ দেখে তোমার সকল যোদ্ধা তোমার পুত্রকে চারদিক থেকে ঘিরে, বিশাল সেনাবাহিনীর আচ্ছাদনে সুরক্ষিত হয়ে, পুনরায় যুদ্ধে অগ্রসর হল।
Verse 47
ततः प्रववृते युद्ध तव तेषां च भारत । निशीथे दारुणे काले यमराष्ट्रविवर्धनम्,भारत! तदनन्तर उस भयंकर निशीथकालमें आपके पुत्र और द्रौपदीपुत्रोंका घोर युद्ध आरम्भ हुआ, जो यमराजके राज्यकी वृद्धि करनेवाला था
তারপর, হে ভারত! সেই ভয়ংকর মধ্যরাত্রির নিসীথকালে তোমার পুত্রদের সঙ্গে তাদের (দ্রৌপদীপুত্রদের) ঘোর যুদ্ধ শুরু হল—যা কেবল যমরাজের রাজ্যই বৃদ্ধি করে।
Verse 167
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके अवसरपर अलगम्बुषका पराजयविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত ঘটোৎকচবধপর্বে রাত্রিযুদ্ধের প্রসঙ্গে অলম্বুষের পরাজয়-বিষয়ক একশো সাতষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 168
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे शतानीकादियुद्धे5ष्टषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত ঘটোৎকচবধপর্বে রাত্রিযুদ্ধের সময় শতানীক প্রভৃতির যুদ্ধ-বিষয়ক একশো আটষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Whether valor requires continued resistance when resistance predictably worsens collective harm: the chapter frames a dharma-sankat between pride-driven confrontation and restraint-based compliance to protect the wider host.
Under certain conditions, the ethically superior action is controlled non-resistance: disciplined renunciation of aggression can be both morally coherent and strategically effective when a threat is designed to amplify against opposition.
No explicit phalaśruti appears in this passage; the meta-instruction is implicit in Kṛṣṇa’s procedural teaching that correct knowledge of an astra’s operating rule is itself protective within the epic’s broader dharma framework.
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