Adhyaya 123
Drona ParvaAdhyaya 12367 Versesपाण्डव-पक्ष के लिए अनुकूल—सात्यकि के वेग से कौरव-पंक्तियाँ विचलित और सहायक दल नष्ट

Adhyaya 123

Chapter Arc: द्रोण-पर्व के रण में एक विचित्र दृश्य उठता है—म्लेच्छ पाषाणयोधी, पर्वत-से शिलाखण्ड उठाकर, रथों और गजों पर वर्षा करने लगते हैं; और कौरव-सेना के बीच यह प्रश्न गूँजता है कि मृत्यु को सामने देखकर भी धृति कैसे टिकेगी। → कौरव योद्धा अपने ही सैन्य-मध्य में पराजय की लज्जा और क्षात्र-प्रतिष्ठा के भय से काँपते हैं—“सात्यकि युद्ध में कैसे व्यतिक्रान्त हो गया?”—और दूसरी ओर सात्यकि, सिंह की भाँति, द्रोण के निकटवर्ती रण में भीषण वेग से म्लेच्छ-पाषाणयोधियों पर टूट पड़ता है। → सात्यकि का उन्मत्त संहार-प्रवाह—रथसेना, गजसेना, अश्वारोही और दस्यु-म्लेच्छ सबका सर्वथा विनाश; गिरिरूप गजराज धराशायी होते हैं, और भूमि हारों-आभूषणों-वस्त्रों से ऐसी ढँक जाती है मानो आकाश तारागणों से भर गया हो। → कौरवों को यह बोध होता है कि वे प्रस्तरयुद्ध में प्रवीण नहीं; भय-निवारण के लिए पुकार उठती है—“अभिद्रवत, मा भैष्ट, सात्यकि तुम्हें न पा सकेगा”—पर रणभूमि पर सात्यकि की विजय-छाया और शव-शिलाखण्डों का ढेर उनकी बात को खोखला कर देता है। → सात्यकि की इस प्रचण्ड गति को रोकने के लिए कौरव-पक्ष किस महाबली को आगे करेगा—और क्या यह वेग द्रोण-व्यूह के भीतर और गहरे प्रवेश का द्वार बनेगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६३ श्लोक मिलाकर कुल ४८३ “लोक हैं।) फल र (0) आज अत+- एकविशर्त्याधेकशततमो< ध्याय: सात्यकिके द्वारा पाषाणयोधी म्लेच्छोंकी सेनाका संहार और दुःशासनका सेनासहित पलायन धृतराष्ट्र रवाच सम्प्रमृद्य महत्‌ सैन्यं यान्तं शैनेयमर्जुनम्‌ । निर्ह्लीका मम ते पुत्रा: किमकुर्वत संजय

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়! শৈনেয় সাত্যকি ও অর্জুন আমার বিশাল সেনাকে পদদলিত করে অগ্রসর হচ্ছিল; তখন আমার সেই নির্লজ্জ পুত্রেরা কী করছিল?

Verse 2

कथं वैषां तदा युद्धे धृतिरासीन्मुमूर्षताम्‌ । शैनेयचरितं दृष्टवा यादृशं सव्यसाचिन:,वे सब-के-सब मरना चाहते थे। उस समय युद्धस्थलमें अर्जुनके समान ही सात्यकिका चरित्र देखकर उनकी कैसी धारणा हुई थी?

সেই যুদ্ধে যারা মরতে উদ্যত ছিল, তাদের মধ্যে তখন ধৈর্য কীভাবে জাগল? আর শৈনেয় সাত্যকির আচরণ—যা সব্যসাচী অর্জুনের মতো—দেখে তাদের মনে কী রকম দৃঢ় বিশ্বাস জন্মাল?

Verse 3

कि नु वक्ष्यन्ति ते क्षात्र॑ सैन्यमध्ये पराजिता: । कथं नु सात्यकिर्युद्धे व्यतिक्रान्तो महायशा:

নিজেদেরই সেনার মধ্যে পরাজিত হয়ে তারা তাদের ক্ষাত্রবল সম্পর্কে কী বলবে? আর মহাযশস্বী সাত্যকি কীভাবে যুদ্ধে সমগ্র বাহিনীকে অতিক্রম করে সামনে এগিয়ে গেল?

Verse 4

कथं च मम पुत्राणां जीवतां तत्र संजय । शैनेयोडभिययौ युद्धे तन्ममाचक्ष्य संजय,संजय! युद्धस्थलमें मेरे पुत्रोंके जीते-जी शिनिनन्दन सात्यकि किस तरह आगे जा सके? संजय! यह सब मुझे बताओ

সঞ্জয়! সেখানে আমার পুত্রেরা জীবিত থাকা সত্ত্বেও শিনিনন্দন সাত্যকি কীভাবে সেই যুদ্ধে অগ্রসর হল? সঞ্জয়, সব কথা আমাকে বিস্তারিত বলো।

Verse 5

अत्यद्भुतमिदं तात त्वत्सकाशाच्छूणोम्यहम्‌ । एकस्य बहुभि: सार्ध शत्रुभिस्तैर्महारथै:

তাত! তোমার মুখ থেকে আমি এক আশ্চর্য কথা শুনছি—শত্রুপক্ষের সেই অসংখ্য মহারথীর সঙ্গে একমাত্র সাত্যকির এমন ভয়ংকর যুদ্ধ হয়েছে।

Verse 6

विपरीतमहं मन्ये मन्दभाग्यं सुतं प्रति । यत्रावध्यन्त समरे सात्वतेन महारथा:

আমার দুর্ভাগা পুত্রের জন্য আমি সবই বিপরীত হতে দেখছি; কারণ সমরক্ষেত্রে সাত্বত বীর সাত্যকির হাতে বহু মহারথী নিহত হয়েছে।

Verse 7

एकस्य हि न पर्याप्त यत्सैन्यं तस्प संजय । क़ुद्धस्य युयुधानस्य सर्वे तिष्ठन्तु पाण्डवा:,संजय! और सब पाण्डव तो दूर रहें, क्रोधमें भरे हुए अकेले सात्यकिके लिये भी मेरी सारी सेना पर्याप्त नहीं है

সঞ্জয়! ক্রোধে দগ্ধ সেই এক যুযুধান (সাত্যকি)-এর বিরুদ্ধে আমার সমগ্র সেনাও যথেষ্ট নয়; পাণ্ডবরা দূরে থাক—তারা সবাই আলাদা দাঁড়াক।

Verse 8

निर्जित्य समरे द्रोणं कृतिनं चित्रयोधिनम्‌ । यथा पशुगणान्‌ सिंहस्तद्वद्धन्ता सुतानू मम

সমরে কৃতবিদ্য ও বিচিত্রযোদ্ধা দ্রোণকে পরাস্ত করে সাত্যকি তারপর আমার পুত্রদের বধ করবে—যেমন সিংহ পশুর পালকে নিধন করে।

Verse 9

कृतवर्मादिश्ि: शूरैर्यत्तैर्बहुभिराहवे । युयुधानो न शकितो हन्तुं यत्‌ पुरुषर्षभ:,कृतवर्मा आदि बहुत-से शूरवीर समरांगणमें प्रयत्न करते ही रह गये; परंतु पुरुषप्रवर सात्यकि मारे न जा सके

কৃতবর্মা প্রমুখ বহু বীর যুদ্ধে সর্বশক্তি দিয়ে চেষ্টা করেও পুরুষশ্রেষ্ঠ যুযুধান (সাত্যকি)-কে বধ করতে পারল না।

Verse 10

नैतदीदृशकं युद्ध॑ कृतवांस्तत्र फाल्गुन: । यादृशं कृतवान्‌ युद्ध शिनेर्नप्ता महायशा:,शिनिके महायशस्वी पौत्र सात्यकिने वहाँ जैसा युद्ध किया, वैसा तो अर्जुनने भी नहीं किया था

সেখানে ফাল্গুন অর্জুনও এমন যুদ্ধ করেননি, যেমন শিনির মহাযশস্বী পৌত্র সাত্যকি করেছিলেন।

Verse 11

संजय उवाच तव दुर्मन्त्रिते राजन्‌ दुर्योधनकृतेन च । शृणुष्वावहितो भूत्वा यत्‌ ते वक्ष्यामि भारत

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, তোমার কুমন্ত্রণা এবং দুর্যোধনের কুকর্মের ফলেই এ সব ঘটেছে। হে ভারত, মনোযোগ দিয়ে শোনো, আমি যা বলব।

Verse 12

ते पुनः संन्यवर्तन्त कृत्वा संशप्तकान्‌ मिथ: । परां युद्धे मतिं क्रूरां तव पुत्रस्य शासनात्‌

তোমার পুত্রের আদেশে তারা পরস্পর শপথ বেঁধে আবার সংশপ্তক হয়ে, যুদ্ধে নির্মম সংকল্প স্থির করে পুনরায় ফিরে এল।

Verse 13

त्रीणि सादिसहस््राणि दुर्योधनपुरोगमा: । शककाम्बोजबाह्लीका यवना: पारदास्तथा

দুর্যোধনকে অগ্রে রেখে তিন হাজার যোদ্ধা—শক, কাম্বোজ, বাহ্লীক, যবন ও পারদ প্রভৃতি—শৈনেয় সাত্যকির ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল; যেমন পতঙ্গ জ্বলন্ত আগুনে ঝাঁপ দেয়।

Verse 14

कुलिन्दास्तड्भणाम्बष्ठा: पैशाचाश्न सबर्बरा: । पर्वतीयाश्न राजेन्द्र क़ुद्धा: पाषाणपाणय:

সঞ্জয় বললেন—হে রাজেন্দ্র! কুলিন্দ, তঙ্গণ, অম্বষ্ঠ, পৈশাচ, বর্বর ও পর্বতবাসী যোদ্ধারা—সকলেই ক্রুদ্ধ হয়ে, হাতে পাথর নিয়ে, শৈনেয় (সাত্যকি)-র উপর এমনভাবে ঝাঁপিয়ে পড়ল, যেমন পতঙ্গ জ্বলন্ত অগ্নিতে ঝাঁপ দেয়।

Verse 15

।। युक्ताश्न पर्वतीयानां रथा: पाषाणयोधिनाम्‌

সঞ্জয় বললেন—সেই পাথর-যুদ্ধকারী পর্বতবাসীদের রথগুলি পর্বতে জন্মানো অশ্বে যুক্ত ছিল।

Verse 16

ततो रथसहस्रेण महारथशतेन च

তারপর এক হাজার রথ, একশো মহারথী এবং অগণিত পদাতিক নিয়ে তারা শৈনেয় (সাত্যকি)-র উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।

Verse 17

द्विरदानां सहस्नरेण द्विसाहसैश्व॒ वाजिभि: । शरवर्षाणि मुज्चन्तो विविधानि महारथा:

এক হাজার হাতি ও দুই হাজার ঘোড়া নিয়ে সেই মহারথীরা নানাবিধ তীরের বর্ষা ছাড়তে লাগল।

Verse 18

तांश्व संचोदयन्‌ सर्वान्‌ घ्नतैनमिति भारत

হে ভারত! সে সকলকে উদ্দীপ্ত করে চিৎকার করল—“একে বধ করো!”

Verse 19

तत्राद्भुतमपश्याम शैनेयचरितं महत्‌

সঞ্জয় বললেন—সেখানে আমরা শৈনেয়ের আশ্চর্য, মহৎ বীরকর্ম ও বীরাচরণ প্রত্যক্ষ করলাম।

Verse 20

अवधीच्च रथानीकं द्विरदानां च तद्‌ बलम्‌

সঞ্জয় বললেন—সে রথবাহিনীকেও ছিন্নভিন্ন করল, আর হাতিদের সেই শক্তিকেও নিধন করল; এভাবে যুদ্ধমধ্যেই শত্রুর সুসংগঠিত বল আরও ভেঙে দিল।

Verse 21

तत्र चक्रैविमथितैर्भग्नैश्न परमायुधै:

সঞ্জয় বললেন—সেখানে রথচক্রের ঘূর্ণনে যুদ্ধক্ষেত্র চূর্ণ-বিচূর্ণ হয়ে গিয়েছিল, আর শ্রেষ্ঠ অস্ত্রগুলিও ভেঙে পড়েছিল।

Verse 22

अक्षैश्व बहुधा भग्नैरीषादण्डकबन्धुरै: । कुण्जरैर्मथितैश्वापि ध्वजैश्व विनिपातितैः

সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধক্ষেত্র নানা ভাবে ছেয়ে ছিল—ভাঙা অক্ষযুক্ত রথে, ভগ্ন জোয়াল ও দণ্ড-বন্ধনীতে, মথিত-চূর্ণ হাতিতে, আর পতিত ধ্বজা-নিশানে।

Verse 23

वर्मभिश्व तथानीकैव्यवरकीर्णा वसुंधरा । वहाँ चूर-चूर हुए चक्‍कों, टूटे हुए उत्तमोत्तम आयुधों, टूक-टूक हुए धुरों, खण्डित हुए ईषादण्डों और बन्धुरों, मथे गये हाथियों, तोड़कर गिराये हुए ध्वजों, छिन्न-भिन्न कवचों और विनष्ट हुए सैनिकोंकी लाशोंसे वहाँकी पृथ्वी पट गयी थी || २१-२२ ह ।।

সঞ্জয় বললেন—সেখানে ভূমি বর্ম ও ছিন্নভিন্ন সৈন্যবিন্যাসে আচ্ছন্ন ছিল; আর হে মারিষ, মালা, অলংকার, বস্ত্র এবং রথের টানার ফিতা-বন্ধনেও সে ভূমি ছড়িয়ে ছিল।

Verse 24

गिरिरूपधराश्चापि पतिता: कुज्जरोत्तमा:

সঞ্জয় বললেন—পর্বতের ন্যায় আকৃতি ধারণকারী শ্রেষ্ঠ হাতিরাও পতিত হল।

Verse 25

सुप्रतीककुले जाता महापद्मकुले तथा,नरेश्वर! सुप्रतीक, महापद्मय, ऐरावत तथा अन्य [पुण्डरीक, पुष्पदन्‍्त और सार्वभौम-- (इन) दिग्गजोंके] कुलोंमें उत्पन्न हुए बहुतेरे दंतार हाथी भी वहाँ धरतीपर लोट रहे थे

সঞ্জয় বললেন—হে নরেশ! সুপ্রতীক ও মহাপদ্মের বংশে, তদ্রূপ ঐরাবতের বংশে, এবং পুণ্ডরীক, পুষ্পদন্ত, সার্বভৌম প্রভৃতি প্রসিদ্ধ দিগ্গজ-বংশে জন্ম নেওয়া বহু দন্তযুক্ত হাতি সেখানে ভূমিতে গড়াগড়ি খাচ্ছিল।

Verse 26

ऐरावतकुले चैव तथान्येषु कुलेषु च । जाता दन्तिवरा राजन्‌ शेरते बहवो हता:

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! ঐরাবতের বংশে এবং অন্যান্য বংশে জন্ম নেওয়া বহু শ্রেষ্ঠ দন্তযুক্ত হাতি নিহত হয়ে সেখানে পড়ে ছিল।

Verse 27

वनायुजानू्‌ पर्वतीयान्‌ काम्बोजान्‌ बाह्विकानपि | तथा हयवरान्‌ राजन्‌ निजघ्ने तत्र सात्यकि:

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! সেখানে সাত্যকি বনায়ু, পর্বতজাত, কাম্বোজ ও বাহ্লীক দেশজাত শ্রেষ্ঠ অশ্বদেরও নিধন করল।

Verse 28

नानादेशसमुत्थांश्व नानाजातींश्व दन्तिन: । निजघ्ने तत्र शैनेय: शतशो5थ सहस्रश:,शिनिके उस वीर पौत्रने अनेक देशोंमें उत्पन्न हुए विभिन्न जातिके सैकड़ों और हजारों हाथियोंका भी संहार कर डाला

সঞ্জয় বললেন—সেখানে শিনির বীর পৌত্র শৈনেয় (সাত্যকি) নানা দেশজাত ও নানা জাতিভুক্ত হাতিদের শত শত, সহস্র সহস্র করে নিধন করল।

Verse 29

तेषु प्रकाल्यमानेषु दस्यून्‌ दुःशासनोडब्रवीत्‌ । निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं कि सृतेन व:

যখন সেই হাতিগুলিকে মৃত্যুর গহ্বরে ঠেলে নেওয়া হচ্ছিল, তখন দুঃশাসন লুণ্ঠনকারী দস্যুদের বলল— “অধর্মজ্ঞ যোদ্ধারা! এভাবে পালিয়ে তোমাদের কী লাভ? ফিরে এসো, যুদ্ধ করো; এই পলায়নে তোমাদের কী ফল?”

Verse 30

तांश्वातिभग्नान्‌ सम्प्रेक्ष्य पुत्रो द:ःशासनस्तव । पाषाणयोधिन: शूरान्‌ पर्वतीयानचोदयत्‌

তাদের সম্পূর্ণ ভগ্ন ও বিশৃঙ্খলভাবে পলায়ন করতে দেখে, তোমার পুত্র দুঃশাসন পাথর-যুদ্ধে পারদর্শী বীর পার্বত্যদের আক্রমণে তাড়িত করল।

Verse 31

अभश्मयुद्धेषु कुशला नैतज्जानाति सात्यकि: । अश्मयुद्धमजानन्तं घ्नतैनं युद्धकार्मुकम्‌

“বীরগণ! তোমরা পাথর-যুদ্ধে দক্ষ; সাত্যকি এ বিদ্যা জানে না। পাথর-যুদ্ধ না জেনেও যে ধনুর্ধর শত্রু যুদ্ধ চায়, তাকে তোমরা সংহার করো।”

Verse 32

तथैव कुरव: सर्वे नाश्मयुद्धविशारदा: । अभिद्रवत मा भैष्ट न व: प्राप्स्पति सात्यकि:,“इसी प्रकार समस्त कौरव भी प्रस्तरयुद्धमें प्रवीण नहीं हैं। अतः तुम डरो मत। आक्रमण करो। सात्यकि तुम्हें नहीं पा सकता”

“তেমনি কৌরবরাও সবাই পাথর-যুদ্ধে পারদর্শী নয়। অতএব ভয় কোরো না—আক্রমণ করো। সাত্যকি তোমাদের ধরতে পারবে না।”

Verse 33

ते पर्वतीया राजान: सर्वे पाषाणयोधिन: । अभ्यद्रवन्त शैनेयं राजानमिव मन्त्रिण:,जैसे मन्त्री राजाके पास जाते हैं, उसी प्रकार वे पाषाणयोधी समस्त पर्वतीय नरेश सात्यकिकी ओर दौड़े

তখন সেই সকল পার্বত্য রাজা—পাথর-যুদ্ধে রত—মন্ত্রীরা যেমন রাজার কাছে ধাবিত হয়, তেমনি শৈনেয় (সাত্যকি)-র দিকে ছুটে গেল।

Verse 34

ततो गजशिर:प्रख्यैरुपलै: शैलवासिन: । उद्यतैर्युयुधानस्य पुरतस्तस्थुराहवे

তখন পর্বতবাসী যোদ্ধারা হাতির মস্তকের ন্যায় বৃহৎ শিলাখণ্ড উঁচিয়ে ধরে রণক্ষেত্রে যুযুধানের সম্মুখে যুদ্ধের জন্য প্রস্তুত হয়ে দাঁড়াল।

Verse 35

क्षेपणीयैस्तथाप्यन्ये सात्वतस्य वधैषिण: । चोदितास्तव पुत्रेण सर्वतो रुरुधुर्दिश:

আপনার পুত্র দুঃশাসনের প্রেরণায় সাত্বতবীর সাত্যকিকে বধ করতে ইচ্ছুক আরও বহু সৈন্য নিক্ষেপযোগ্য অস্ত্র তুলে চারদিক থেকে তার সকল দিক রুদ্ধ করে দিল।

Verse 36

तेषामापततामेव शिलायुद्ध॑ं चिकीर्षताम्‌ । सात्यकि: प्रतिसंधाय निशितान्‌ प्राहिणोच्छरान्‌

শিলাযুদ্ধ করতে উদ্যত সেই যোদ্ধারা আক্রমণ করতেই সাত্যকি লক্ষ্য স্থির করে ধারালো বাণ ছুড়ে তাদের উপর বর্ষণ করল।

Verse 37

तामश्मवृष्टिं तुमुलां पर्वतीय: समीरिताम्‌ । चिच्छेदोरगसंकाशै्नासचै: शिनिपुड्रव:,पर्वतीय सैनिकोंद्वारा की हुई उस भयंकर पाषाणवर्षाको शिनिप्रवर सात्यकिने अपने सर्पतुल्य नाराचोंद्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया

পর্বতবাসী সৈন্যদের নিক্ষিপ্ত সেই ভয়ংকর, গর্জনময় পাথরবর্ষাকে শিনিকুলশ্রেষ্ঠ সাত্যকি সাপসদৃশ নারাচ বাণে খণ্ড-বিখণ্ড করে দিল।

Verse 38

तैरश्मचूर्णै्दीप्यद्धि: खद्योतानामिव व्रजै: । प्राय: सैन्यान्यहन्यन्त हाहाभूतानि मारिष

হে মান্য নৃপ! জোনাকির ঝাঁকের মতো দীপ্ত সেই শিলাচূর্ণে প্রায় সমগ্র সেনাদল আঘাতপ্রাপ্ত হয়ে ‘হা হা’ ধ্বনি তুলে আর্তনাদ করতে লাগল।

Verse 39

ततः पड्चशतं शूरा: समुद्यतमहाशिला: । निकृत्तबाहवो राजन निपेतुर्धरणीतले,राजन! तदनन्तर बड़े-बड़े प्रस्तरखण्ड उठाये हुए पाँच सौ शूरवीर अपनी भुजाओंके कट जानेसे धरतीपर गिर पड़े

তদনন্তর, হে রাজন, মহাশিলা উঁচিয়ে ধরা পাঁচশো বীর—বাহু ছিন্ন হওয়ায়—ধরণীতলে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 40

पुनर्दशशताश्चान्ये शतसाहस्रिणस्तथा । सोपलैर्बाहुिभिश्क्िन्नै: पेतुरप्राप्पय सात्यकिम्‌

আবার অন্য দল—কেউ হাজার, কেউ লক্ষসংখ্যক—সাত্যকির কাছে পৌঁছানোর আগেই, পাথর আঁকড়ে ধরা ছিন্ন বাহুসহ ধরণীতে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 41

(सात्वतस्य च भल्‍्लेन निष्पिष्टैस्तैस्तथाद्रिभि: । न्यपतन्‌ निहता म्लेच्छास्तत्र तत्र गतासव: ।।

সাত্বত (সাত্যকি)-র ভল্লে বিদীর্ণ হয়ে যে শিলাখণ্ডগুলি চূর্ণ হল, সেই চূর্ণ পাথরেই পিষ্ট হয়ে ম্লেচ্ছ যোদ্ধারা নিহত হয়ে প্রাণশূন্য অবস্থায় এদিক-ওদিক ছড়িয়ে পড়ল। তবু মহাত্মা সাত্বত তাদের বধ করতে থাকলে, তারা সাত্বতের উপর ভয়ংকর পাথরবৃষ্টি বর্ষণ করল। পাথর-যুদ্ধে রত, বিজয়ের জন্য উদ্যত ও অচল বহু সহস্র বীরকে সাত্যকি নিধন করলেন; সে দৃশ্য যেন এক বিস্ময়।

Verse 42

ततः पुनर्व्यात्तमुखास्ते5श्मवृष्टी: समनन्‍्ततः । अयोहस्ता: शूलहस्ता दरदास्तड्रणा: खसा:

তারপর আবার ক্রোধে মুখ হাঁ করে থাকা দরদ, তঙ্গণ ও খসরা—হাতে লোহার গদা-গোল ও ত্রিশূল নিয়ে—চারদিক থেকে সাত্যকির উপর পাথরবর্ষা শুরু করল।

Verse 43

लम्पाकाश्न कुलिन्दाश्न चिक्षिपुस्तांश्न सात्यकि: । नाराचै: प्रतिचिच्छेद प्रतिपत्तिविशारद:

লম্পাক ও কুলিন্দরা আঘাত হানল; কিন্তু প্রতিপত্তিতে পারদর্শী সাত্যকি তাঁর নারাচ-বাণে সেগুলি কেটে ব্যর্থ করে দিলেন।

Verse 44

अद्रीणां भिद्यमानानामन्तरिक्षे शितै: शरै: । शब्देन प्राद्रवन्‌ संख्ये रथाश्वगजपत्तय:

Sañjaya said: As sharp arrows split the rocky masses in mid-air, the crashing sound of those shattering stones spread terror; and on the battlefield charioteers, horsemen, elephant-corps, and foot-soldiers broke ranks and ran in all directions. The verse underscores how war’s violence and noise can dissolve discipline and courage, driving even trained forces into panic.

Verse 45

अश्मचूर्णरवाकीर्णा मनुष्यगजवाजिन: । नाशवनुवन्नवस्थातु भ्रमरैरिव दंशिता:,पत्थरके चूर्णोंसे व्याप्त हुए मनुष्य, हाथी और घोड़े वहाँ ठहर न सके, मानो उन्हें भ्रमरोंने डस लिया हो

Sañjaya said: The ground was strewn and filled with the roar of stone-dust; men, elephants, and horses could not hold their positions there, as if they had been stung by swarming bees. The image underscores the battlefield’s intolerable violence—so overwhelming that even the strongest beings lose steadiness and order amid the chaos.

Verse 46

हतशिष्टा: सरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डिका: । (विभिन्नशिरसो राजन दन्तैश्छिन्नेश्व॒ दन्तिन: । निर्धूतैश्व॒ करैनागा व्यड्राश्न शतश: कृता: ।।

Verse 47

(अश्मनां भिद्यमानानां सायकै: श्रूयते ध्वनि: । घद्मपत्रेषु धाराणां पतन्तीनामिव ध्वनि: ।।

Sanjaya said: “The sound was heard of stones being shattered by arrows—like the soft, continuous murmur of streams falling upon lotus-leaves. Then, O revered one, a great roar arose from your army, tormented by Madhava’s warrior (Sātyaki), like the ocean swelling in thunder on the day of the full moon.”

Verse 48

तं शब्द तुमुलं श्र॒ुत्वा द्रोणो यन्तारमब्रवीत्‌ । एष सूत रणे क्रुद्ध: सात्वतानां महारथ:

Sañjaya said: Hearing that tumultuous roar, Droṇa addressed his charioteer: “O charioteer, this great chariot-warrior of the Sātvatas, enraged in battle, is moving about like Death itself, repeatedly rending the Kaurava host. Drive my chariot to the very place from which that dreadful sound is rising.”

Verse 49

दारयन्‌ बहुधा सैन्यं रणे चरति कालवत्‌ | यत्रैष शब्दस्तुमुलस्तत्र सूत रथं नय

সে বারবার সেনাদল বিদীর্ণ করে রণে যেন স্বয়ং কালরূপে বিচরণ করছে। হে সূত, যেখানে এই ভয়ংকর গর্জন উঠছে, সেখানেই রথ চালাও।

Verse 50

पाषाणयोधिभिननू्‌नं युयुधान: समागत: । तथा हि रथिन: सर्वे ह्वियन्ते विद्रुतैर्हयै:

নিশ্চয়ই যুযুধান পাষাণ-অস্ত্রধারী যোদ্ধাদের সঙ্গে ঘনিষ্ঠ সংঘর্ষে জড়িয়েছে; তাই আতঙ্কে ছুটে যাওয়া ঘোড়াগুলি সব রথীকে যুদ্ধক্ষেত্রের বাইরে টেনে নিয়ে যাচ্ছে।

Verse 51

विशस्त्रकवचा रुग्णास्तत्र तत्र पतन्ति च । न शवनुवन्ति यन्तार: संयन्तुं तुमुले हयान्‌

অস্ত্র ও কবচহীন, আঘাতে আহত হয়ে যোদ্ধারা এখানে-সেখানে লুটিয়ে পড়ছে। এই তুমুল যুদ্ধে সারথিরাও তাদের ঘোড়াগুলিকে সংযত রাখতে পারছে না।

Verse 52

इत्येतद्‌ वचन श्रुत्वा भारद्वाजस्य सारथि: । प्रत्युवाच ततो द्रोणं सर्वशस्त्रभूतां वरम्‌

এই কথা শুনে ভরদ্বাজপুত্র দ্রোণের সারথি তখন সর্বশস্ত্রধারীদের শ্রেষ্ঠ দ্রোণকে প্রত্যুত্তর দিল।

Verse 53

सैन्यं द्रवति चायुष्मन्‌ कौरवेयं समन्तत: । पश्य योधान्‌ रणे भग्नान्‌ धावतो वै ततस्तत:

হে আয়ুষ্মান! কৌরবদের সেনা চারদিকে ভেঙে সরে যাচ্ছে। দেখুন—যুদ্ধে বিধ্বস্ত যোদ্ধারা সর্বদিকে পালিয়ে যাচ্ছে।

Verse 54

द्रोणाचार्यका यह वचन सुनकर सारथिने सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणसे इस प्रकार कहा--'आयुष्मन्‌! कौरव-सेना चारों ओर भाग रही है। देखिये, रणक्षेत्रमें वे सब योद्धा व्यूह-भंग करके इधर-उधर दौड़ रहे हैं ।।

সঞ্জয় বললেন—এ কথা শুনে সারথি সর্বশস্ত্রধারীদের শ্রেষ্ঠ দ্রোণাচার্যের কাছে বলল—“আয়ুষ্মান! কৌরব-সেনা চারদিকে পলায়ন করছে। দেখুন, রণক্ষেত্রে ব্যূহ ভেঙে পড়েছে, আর সব যোদ্ধা এদিক-ওদিক ছুটছে। আর পাণ্ডবদের সঙ্গে একত্রিত বীর পাঞ্চালরা একটিই সংকল্প নিয়ে—আপনাকে বধ করতে—সব দিক থেকে আপনার দিকেই ধেয়ে আসছে।”

Verse 55

अत्र कार्य समाधत्स्व प्राप्तकालमरिंदम । स्थाने वा गमने वापि दूरं यातश्न सात्यकि:

“শত্রুদমন! এই মুহূর্তে যা কর্তব্য উপস্থিত, তাতেই মন স্থির করুন। এখানে স্থির থাকবেন, না অন্যত্র যাবেন—সিদ্ধান্ত নিন; কারণ সাত্যকি তো অনেক দূরে চলে গেছে।”

Verse 56

तथैवं वदतस्तस्य भारद्वाजस्य सारथे: । प्रत्यदृश्यत शैनेयो निध्नन्‌ बहुविधान्‌ रथात्‌,द्रोणाचार्यका सारथि जब इस प्रकार कह रहा था, उसी समय शिनिनन्दन सात्यकि बहुतेरे रथियोंका संहार करते दिखायी दिये

সঞ্জয় বললেন—ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণের সারথি এভাবে বলতেই, সেই মুহূর্তে শৈনেয় যুযুধান (সাত্যকি) চোখে পড়ল—সে নানাবিধ রথীকে আঘাত করে একের পর এক নিপাত করছিল।

Verse 57

ते वध्यमाना: समरे युयुधानेन तावका: । युयुधानरथं त्यक्त्वा द्रोणानीकाय दुद्गरुवु:,समरांगणमें युयुधानकी मार खाते हुए आपके सैनिक उनके रथको छोड़कर द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर भाग गये

সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে যুযুধানের আঘাতে বিধ্বস্ত হয়ে তোমার সৈন্যরা যুযুধানের রথের সন্নিধি ত্যাগ করে দ্রোণাচার্যের সেনাবিন্যাসের দিকে দৌড়ে পালাল।

Verse 58

यैस्तु दुःशासन: सार्ध रथै: पूर्व न्यवर्तत । ते भीतास्त्वभ्यधावन्त सर्वे द्रोणरथं प्रति,पहले दुःशासन जिन रथियोंके साथ लौटा था, वे सब-के-सब भयभीत होकर द्रोणाचार्यके रथकी ओर भाग गये

সঞ্জয় বললেন—দুঃশাসন যেসব রথীর সঙ্গে আগে পিছু হটেছিল, তারা সবাই ভয়ে কাঁপতে কাঁপতে দ্রোণাচার্যের রথের দিকেই ছুটে গেল।

Verse 120

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका शत्रुसेनामें प्रवेश और दुर्योधनका पलायनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে সাত্যকির শত্রুসেনায় প্রবেশ এবং দুর্যোধনের পলায়ন-বিষয়ক একশো কুড়ি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 121

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिकप्रवेशे एकविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতে দ্রোণপর্বণি জয়দ্রথবধপর্বণি সাত্যকিপ্রবেশে একবিংশত্যধিকশততমোऽধ্যায়ঃ।

Verse 153

शूरा: पञ्चशता राजन्‌ शैनेयं समुपाद्रवन्‌ | राजन! पत्थरोंद्वारा युद्ध करनेवाले पर्वतीयोंके पाँच सौ शूरवीर रथी युद्धके लिये सुसज्जित हो सात्यकिपर चढ़ आये

রাজন, পাঁচশো বীর শৈনেয় (সাত্যকি)-এর উপর একযোগে ঝাঁপিয়ে পড়ল। তারা ছিল পর্বতবাসী যোদ্ধা, পাথর নিক্ষেপে অভ্যস্ত; যুদ্ধসজ্জায় সজ্জিত হয়ে তারা সাত্যকিকে আক্রমণ করল।

Verse 173

अभ्यद्रवन्त शैनेयमसंख्येयाश्ष पत्तय: । तत्पश्चात्‌ एक हजार रथी

শৈনেয় (সাত্যকি)-এর উপর অগণিত পদাতিক সৈন্য ধেয়ে এল। তারপর এল এক হাজার রথী, একশো মহারথী, এক হাজার হাতি ও দুই হাজার অশ্বারোহী; আরও বহু মহারথী এবং অসংখ্য পদাতিক নানা প্রকার বাণবর্ষণ করতে করতে চারদিক থেকে সাত্যকির উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।

Verse 186

दुःशासनो महाराज सात्यकिं पर्यवारयत्‌ । भरतवंशी महाराज! “इस सात्यकिको मार डालो”, इस प्रकार उन समस्त सैनिकोंको प्रेरित करते हुए दुःशासनने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया

মহারাজ! দুঃশাসন সাত্যকিকে চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল। “এই সাত্যকিকে মেরে ফেলো”—এই আহ্বানে সকল সৈন্যকে উসকে দিয়ে সে চারদিক থেকে তাকে অবরুদ্ধ করল।

Verse 193

यदेको बहुभि: सार्धमसम्भ्रान्तमयुध्यत । वहाँ हमने सात्यकिका अत्यन्त अद्भुत चरित्र देखा कि वे बिना किसी घबराहटके अकेले ही बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ युद्ध कर रहे थे

সঞ্জয় বললেন—সেখানে আমরা সাত্যকির অতিশয় আশ্চর্য কীর্তি দেখলাম; তিনি নির্ভীক ও অচঞ্চলচিত্তে একাই অসংখ্য যোদ্ধার সঙ্গে যুদ্ধ করছিলেন।

Verse 206

सादिनश्वैव तान्‌ सर्वान्‌ दस्यूनपि च सर्वशः । उन्होंने रथसेना और गजसेनाका तथा उन समस्त घुड़सवारों एवं लुटेरे म्लेच्छोंका भी सब प्रकारसे संहार कर डाला

সঞ্জয় বললেন—তিনি রথসেনা ও গজসেনা, আর সকল অশ্বারোহী এবং লুণ্ঠনপ্রবৃত্ত ম্লেচ্ছ দস্যুদেরও সর্বতোভাবে নিধন করলেন।

Verse 236

संछन्ना वसुधा तत्र द्यौगग्रहैरिव भारत । माननीय भरतनरेश! योद्धाओंके हारों, आभूषणों, वस्त्रों और अनुकर्षोंसे आच्छादित हुई वहाँकी भूमि तारोंसे व्याप्त हुए आकाशके समान जान पड़ती थी

সঞ্জয় বললেন—হে ভরত, হে ভরতবংশীয় মান্য রাজা! সেখানে ভূমি যোদ্ধাদের হার, অলংকার, বস্ত্র ও সাজসজ্জার উপকরণে আচ্ছাদিত হয়ে এমন দেখাচ্ছিল যেন নক্ষত্রে ভরা আকাশ।

Verse 2436

अजगज्जनस्य कुले जाता वामनस्य च भारत । भारत! अंजन और वामन नामक दिग्गजके कुलमें उत्पन्न हुए पर्वताकार श्रेष्ठ गजराज भी वहाँ धराशायी हो गये थे

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! অঞ্জন ও বামন নামক দিগ্গজদের বংশে জন্ম নেওয়া পর্বতসম শ্রেষ্ঠ গজরাজেরাও সেখানে ভূমিসাৎ হয়ে পড়েছিল।