
द्रोणपर्व (अध्याय ११२) — कर्णभीमयोर्युद्धम्, दुर्योधनस्य रक्षणादेशः (Droṇa-parva 112: Karṇa–Bhīma Engagement and Duryodhana’s Protective Order)
Upa-parva: Karna–Bhīmasena Saṃgrāma (Engagement Episode) — Droṇa-parva, Adhyāya 112
Saṃjaya reports that Karṇa, hearing the taut bow-sound of Bhīma, reacts with agitation likened to an enraged elephant. After briefly moving out of Bhīma’s missile-range and seeing Dhṛtarāṣṭra’s sons fallen from their chariots, Karṇa returns against the Pāṇḍava with intensified force. A dense exchange of arrows follows: Karṇa’s volleys are described through solar-ray and bird-flight similes, while Bhīma endures and counters, striking Karṇa and reciprocally ‘covering’ him with shafts. Observers—select warriors and celestial witnesses (cāraṇas)—signal approval of Bhīma’s prowess. Hearing the tumult, Duryodhana urgently commands his brothers and allied princes to go to Karṇa’s aid, fearing Bhīma’s arrows may kill him. Seven of Duryodhana’s brothers surround Bhīma with arrow-rain; Bhīma responds with seven carefully aimed missiles, killing them and producing a lion-roar that reaches Yudhiṣṭhira as a morale signal. The narration then turns reflective: Duryodhana recalls earlier counsel and recognizes the ripening ‘fruit’ of prior sabhā insults to Draupadī, presenting ethical causality as integral to the battle’s unfolding.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है—राजन्, लोमहर्षण संग्राम सुनो: पाण्डव-सेना में युयुधान (सात्यकि) अग्रणी होकर द्रोण की व्यवस्था को हिला देता है, और गुरु स्वयं उसे रोकने को बढ़ते हैं। → युयुधान के प्रहार से कौरव-बल ‘वध्यमान’ दिखता है; द्रोण का क्रोध और कर्तव्य एक साथ जागते हैं। उधर पाण्डव-पक्ष में रणनीति की चर्चा—कौन-कौन सहायक (केशव, बलराम, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न) हों, और यदि द्रोण अर्जुन की ओर बढ़े तो भीमसेन आदि उसे रोकने का संकल्प लेते हैं। → द्रोण, ‘सत्यविक्रम’ सात्यकि पर स्वयं धावा बोलता है—गुरु बनाम शिष्य/सखा का तीखा संग्राम; साथ ही युद्ध-नीति का निर्णायक संकेत उभरता है: ‘जहाँ धनंजय है, वहीं जाओ’—अर्जुन-केंद्रित लक्ष्य के लिए सेना को भीतर तक प्रवेश कराने का आदेश। → अध्याय का अंत एक अस्थायी निष्कर्ष देता है—सात्यकि की प्रशंसा और उसके साहस को मान्यता मिलती है, पर द्रोण का प्रतिरोध भी उतना ही दृढ़ है; दोनों पक्ष अपनी-अपनी सहायता-व्यवस्था और रोक-रणनीति तय कर लेते हैं। → द्रोण को रोकने की प्रतिज्ञाएँ और ‘धनंजय के पास पहुँचो’ का निर्देश अगले अध्याय के लिए प्रश्न छोड़ता है—क्या सात्यकि द्रोण को पार कर अर्जुन तक मार्ग बना पाएगा, या गुरु का चक्रव्यूह-सा प्रतिरोध उसे वहीं बाँध देगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं) अपना बछ। आर: 2 दशाधिकशततमो<् ध्याय: द्रोणाचार्य और कं अड काछ 8543 द्ध 2807 सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश घतयद्र उवाच भारद्वाजं कथं युद्धे युयुधानो न्यवारयत् । संजयाचक्ष्व तत्त्वेन परं कौतूहलं हि मे
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— সঞ্জয়! যুদ্ধের মাঝখানে যুযুধান (সাত্যকি) কীভাবে ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণকে প্রতিহত করেছিল? সত্য কথাই বলো; এ বিষয়ে আমার কৌতূহল অত্যন্ত প্রবল।
Verse 2
संजय उवाच शृणु राजन महाप्राज्ञ संग्रामं लोमहर्षणम् । द्रोणस्य पाण्डवै: सार्थ युयुधानपुरोगमै:
সঞ্জয় বললেন— হে রাজন, মহাপ্রাজ্ঞ! শোনো—যুযুধান (সাত্যকি) অগ্রভাগে থেকে পাণ্ডবদের সঙ্গে দ্রোণাচার্যের যে রোমাঞ্চকর সংঘর্ষ হয়েছিল, তার বৃত্তান্ত।
Verse 3
वध्यमानं बल दृष्टवा युयुधानेन मारिष | अभ्यद्रवत् स्वयं द्रोण: सात्यकिं सत्यविक्रमम्
সঞ্জয় বললেন— হে মান্য নৃপ! যুযুধানের হাতে নিজের সেনা বিধ্বস্ত হতে দেখে দ্রোণ নিজেই সত্যবিক্রমী সাত্যকির দিকে ধেয়ে গেলেন।
Verse 4
तमापतन्तं सहसा भारद्वाजं महारथम् | सात्यकि: पज्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत्,उस समय सहसा आते हुए महारथी द्रोणाचार्यको सात्यकिने पचीस बाण मारे
সঞ্জয় বললেন— তখন হঠাৎ ধেয়ে আসা মহারথী ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণের দিকে সাত্যকি পঁচিশটি তীক্ষ্ণ বাণ নিক্ষেপ করল।
Verse 5
द्रोणो5पि युधि विक्रान्तो युयुधानं समाहित: । अविध्यत् पज्चभिस्तूर्ण हेमपुड्खै: शरै: शितै:
সঞ্জয় বললেন— তখন যুদ্ধে বিক্রান্ত দ্রোণও মন একাগ্র করে তৎক্ষণাৎ সোনালি পালকযুক্ত পাঁচটি ধারালো বাণে যুযুধানকে বিদ্ধ করলেন।
Verse 6
ते वर्म भित्त्वा सुदृढं द्विषत्पिशितभोजना: । अभ्ययुर्थधरणीं राजन् श्वसन्त इव पन्नगा:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! শত্রুভক্ষী, মাংসভোজী জন্তুর ন্যায় সেই যোদ্ধারা সাত্যকির অতি দৃঢ় বর্ম ভেঙে দিয়ে ফোঁসফোঁস করতে থাকা সর্পের মতো ভূমির দিকে ধেয়ে গেল।
Verse 7
दीर्घबाहुरभिक्रुद्धस्तोत्रार्दित इव द्विप: । द्रोणं पजचाशताविषध्यन्नाराचैरग्निसंनिभै:
সঞ্জয় বললেন—দীর্ঘবাহু তিনি ক্রোধে দগ্ধ হয়ে, অঙ্কুশে বিদ্ধ হস্তীর মতো, অগ্নিসদৃশ পঞ্চাশটি নারাচে দ্রোণকে বিদ্ধ করলেন।
Verse 8
तब अंकुशकी मार खाये हुए गजराजके समान अत्यन्त कुपित हुए महाबाहु सात्यकिने अग्निके समान तेजस्वी पचास नाराचोंद्वारा द्रोणाचार्यको वेध दिया ।।
সঞ্জয় বললেন—অঙ্কুশে আঘাতপ্রাপ্ত গজরাজের মতো মহাবাহু যুযুধান (সাত্যকি) ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে অগ্নিসদৃশ পঞ্চাশ নাৰাচে দ্রোণকে বিদ্ধ করল। তারপর যুযুধানের আঘাতে রণক্ষেত্রে আহত ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণ দ্রুত বহু বাণে বিজয়প্রার্থী সাত্যকিকে ক্ষতবিক্ষত করলেন।
Verse 9
ततः क्रुद्धो महेष्वासो भूय एव महाबल: । सात्वतं पीडयामास शरेणानतपर्वणा,तदनन्तर महाथनुर्धर महाबली द्रोणने पुनः कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले एक बाणद्वारा सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी
সঞ্জয় বললেন—তারপর মহাবলী মহেষ্বাস দ্রোণ পুনরায় ক্রুদ্ধ হয়ে, বাঁকা গাঁটযুক্ত এক বাণে সাত্বত বীর (সাত্যকি)-কে প্রবলভাবে পীড়িত করলেন।
Verse 10
स वध्यमान: समरे भारद्वाजेन सात्यकि: । नान्वपद्यत कर्तव्यं किज्चिदेव विशाम्पते,प्रजानाथ! समरभूमिमें द्रोणाचार्यके द्वारा क्षत-विक्षत होकर सात्यकिसे कुछ भी करते नहीं बना
সঞ্জয় বললেন—হে প্রজাপতি, জননায়ক! রণক্ষেত্রে ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণের দ্বারা আঘাতে আঘাতে ক্ষতবিক্ষত হতে হতে সাত্যকি কোনো কর্তব্যপথই খুঁজে পেল না।
Verse 11
विषण्णवदनश्चापि युयुधानो5भवन्नूप । भारद्वाजं रणे दृष्टवा विसृजन्तं शितान् शरान्
হে নৃপ! রণক্ষেত্রে ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণকে ধারালো বাণ অবিরাম নিক্ষেপ করতে দেখে যুযুধান (সাত্যকি)-এর মুখ বিষাদে মলিন হয়ে উঠল।
Verse 12
नरेश्वर! रणक्षेत्रमें पैने बाणोंकी वर्षा करते हुए द्रोणाचार्यको देखकर युयुधानके मुखपर विषाद छा गया ।।
হে নরেশ! রণক্ষেত্রে ধারালো বাণের বর্ষা করতে থাকা দ্রোণকে দেখে যুযুধান (সাত্যকি)-এর মুখ বিষাদে আচ্ছন্ন হল। কিন্তু হে জনাধিপ! তাকে সেই অবস্থায় দেখে তোমার পুত্রগণ ও সৈন্যদল উল্লসিত হয়ে বারবার সিংহের মতো গর্জন করতে লাগল।
Verse 13
त॑ श्रुत्वा निनदं घोरं पीड्यमानं च माधवम् | युधिष्ठिरो5ब्रवीद् राजा सर्वसैन्यानि भारत,भारत! उनकी वह घोर गर्जना सुनकर और सात्यकिको पीड़ित देखकर राजा युधिष्ठिरने अपने समस्त सैनिकोंसे कहा--
হে ভারত! সেই ভয়ংকর গর্জন শুনে এবং মাধব (সাত্যকি)-কে পীড়িত হতে দেখে রাজা যুধিষ্ঠির সমগ্র সেনাদলকে সম্বোধন করলেন।
Verse 14
एष वृष्णिवरो वीर: सात्यकि: सत्यविक्रम: । ग्रस्थते युधि वीरेण भानुमानिव राहुणा
এই বৃষ্ণিবংশের শ্রেষ্ঠ বীর সাত্যকি—যাঁর বিক্রম সত্য ও অচঞ্চল—যুদ্ধে এক মহাবীরের দ্বারা তেমনই গ্রাসিত হচ্ছেন, যেমন রাহু দীপ্তিমান সূর্যকে গ্রাস করে।
Verse 15
धृष्टद्युम्नं च पाउचाल्यमिदमाह जनाधिप:
এরপর জনাধিপ রাজা পাঁচালরাজপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্নকে বললেন—“ত্রুপদনন্দন! কেন দাঁড়িয়ে আছ? শীঘ্রই দ্রোণাচার্যের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ো। তুমি কি দেখছ না, দ্রোণের কারণেই আমাদের জন্য ভয়ংকর ভীতি উপস্থিত হয়েছে?”
Verse 16
अभिद्रव द्रुतं द्रोणं किमु तिष्ठसि पार्षत । न पश्यसि भयं द्रोणाद् घोर॑ न: समुपस्थितम्
সঞ্জয় বললেন—“হে পার্ষতপুত্র! দ্রুত দ্রোণের উপর ঝাঁপিয়ে পড়; কেন স্থির দাঁড়িয়ে আছ? তুমি কি দেখছ না, দ্রোণের দিক থেকে আমাদের উপর ভয়ংকর বিপদ এসে উপস্থিত হয়েছে?”
Verse 17
असौ द्रोणो महेष्वासो युयुधानेन संयुगे । क्रीडते सूत्रबद्धेन पक्षिणा बालको यथा
সঞ্জয় বললেন—“সেই মহাধনুর্ধর দ্রোণ যুদ্ধক্ষেত্রে যুযুধানের সঙ্গে এমন খেলছেন, যেমন একটি শিশু সুতোয় বাঁধা পাখির সঙ্গে খেলে।”
Verse 18
तत्रैव सर्वे गच्छन्तु भीमसेनपुरोगमा: । त्वयैव सहिता: सर्वे युयुधानरथं प्रति,“अतः तुम्हारे साथ भीमसेन आदि सभी महारथी वहीं युयुधानके रथके समीप जायेँ
সঞ্জয় বললেন—“ভীমসেনকে অগ্রে রেখে সবাই সেখানেই যাক; আর সবাই তোমার সঙ্গে একত্র হয়ে যুযুধানের রথের দিকে অগ্রসর হোক।”
Verse 19
पृष्ठतो$नुगमिष्यामि त्वामहं सहसैनिक: । सात्यकिं मोक्षयस्वाद्य यमर्दंष्टान्तरं गतम्,'फिर मैं भी सम्पूर्ण सैनिकोंके साथ तुम्हारे पीछे-पीछे आऊँगा। इस समय यमराजकी दाढ़ोंमें पहुँचे हुए सात्यकिको छुड़ाओ”
সঞ্জয় বললেন—“আমি সমগ্র সৈন্যসহ তোমার পেছনে পেছনে আসব। আজই সাত্যকিকে উদ্ধার কর—সে যেন যমের দন্তের ফাঁকে গিয়ে পড়েছে।”
Verse 20
एवमुक््त्वा ततो राजा सर्वसैन्येन भारत । अभ्यद्रवद् रणे द्रोणं युयुधानस्य कारणात्
সঞ্জয় বললেন—“হে ভারত! এ কথা বলে রাজা যুধিষ্ঠির যুযুধানের রক্ষার জন্য সমগ্র সেনাসহ রণক্ষেত্রে দ্রোণের উপর ঝাঁপিয়ে পড়লেন।”
Verse 21
तत्रारावो महानासीद् द्रोणमेकं॑ युयुत्सताम् । पाण्डवानां च भद्रें ते सृूज्जयानां च सर्वश:
সেখানে দ্রোণকে একাই যুদ্ধ করতে উদ্যত পাণ্ডব ও সৃঞ্জয়দের মধ্যে, হে রাজন, সর্বদিকে মহা কোলাহল উঠল।
Verse 22
ते समेत्य नरव्यात्रा भारद्वाजं महारथम् | अभ्यवर्षन् शरैस्तीक्ष्पै: कड्कबर्हिणवाजितै:
সেই নরব্যাঘ্রসম বীরেরা একত্র হয়ে ভরদ্বাজপুত্র মহারথী দ্রোণের দিকে অগ্রসর হয়ে কঙ্ক ও ময়ূরের পালকে সজ্জিত তীক্ষ্ণ শরবৃষ্টি করতে লাগল।
Verse 23
स्मयन्नेव तु तान् वीरान् द्रोण: प्रत्यग्रहीत् स्वयम् । अतिथीनागतान् यद्धत् सलिलेनासनेन च
দ্রোণ মৃদু হাসি হেসে স্বয়ং এগিয়ে গিয়ে সেই বীরদের গ্রহণ করলেন, হে রাজন, যেমন গৃহস্থ আগত অতিথিকে জল ও আসন দিয়ে অভ্যর্থনা করে।
Verse 24
तर्पितास्ते शरैस्तस्य भारद्वाजस्य धन्विन: । आतियथेयं गृहं प्राप्पय नृपतेडतिथयो यथा
সেই যোদ্ধারা ভরদ্বাজপুত্র ধনুর্ধর দ্রোণের শরবাণে তৃপ্ত হল, হে নৃপতি, যেমন অতিথিরা আতিথ্যপূর্ণ গৃহে পৌঁছে তৃপ্ত হয়।
Verse 25
भारद्वाजं च ते सर्वे न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् । मध्यंदिनमनुप्राप्तं सहस्रांशुमिव प्रभो
হে প্রভু, তারা সকলেই ভরদ্বাজপুত্র দ্রোণের দিকে তাকাতেও পারল না; যেমন মধ্যাহ্নে সহস্ররশ্মি সূর্যের দিকে চেয়ে থাকা দুঃসাধ্য।
Verse 26
तांस्तु सर्वान् महेष्वासान् द्रोण: शस्त्रभृतां वर: । अतापयच्छरब्रातैर्गभस्तिभिरिवांशुमान्
অস্ত্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দ্রোণাচার্য সেই সকল মহাধনুর্ধরকে বাণসমূহের বর্ষায় তেমনি দগ্ধ করতে লাগলেন, যেমন কিরণময় সূর্য তার রশ্মিতে জগতকে তপ্ত করে।
Verse 27
वध्यमाना महाराज पाण्डवा: सृञज्जयास्तथा । त्रातारं नाध्यगच्छन्त पड़कमग्ना इव द्विपा:,महाराज! उस समय द्रोणाचार्यकी मार खाते हुए पाण्डव और सूंजय सैनिक कीचड़में फँसे हुए हाथियोंके समान कोई रक्षक न पा सके
মহারাজ! দ্রোণাচার্যের আঘাতে বিদ্ধ হতে হতে পাণ্ডব ও সৃঞ্জয়রা কাদায় ডুবে থাকা হাতির মতো কোনো রক্ষকই খুঁজে পেল না।
Verse 28
द्रोणस्य च व्यदृश्यन्त विसर्पन्तो महाशरा: । गभस्तय इवार्कस्य प्रतपन्त: समन्ततः
দ্রোণাচার্যের দিক থেকে ছুটে আসা মহাবাণগুলি সর্বদিকে ছড়িয়ে পড়তে দেখা যাচ্ছিল এবং চারদিকে তেমনি দগ্ধ করছিল, যেমন সূর্যের রশ্মি।
Verse 29
जैसे सूर्यकी किरणें सब ओर ताप प्रदान करती हुई फैल जाती हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके विशाल बाण सब ओर फैलते और शत्रुओंको संतप्त करते दिखायी देते थे ।।
যেমন সূর্যের কিরণ চারদিকে তাপ ছড়িয়ে দেয়, তেমনি দ্রোণাচার্যের বিশাল বাণসমূহ সর্বদিকে ছড়িয়ে শত্রুসেনাকে দগ্ধ করতে দেখা গেল। সেই যুদ্ধে দ্রোণাচার্য পাঁচালদের পঁচিশ জন প্রসিদ্ধ মহারথীকে বধ করলেন—যাঁরা ধৃষ্টদ্যুম্নের অতি প্রিয় ছিলেন।
Verse 30
पाण्डूनां सर्वसैन्येषु पड्चालानां तथैव च । द्रोणं सम ददृशु: शूरं विनिध्नन्तं वरान् वरान्
পাণ্ডব ও পাঁচালদের সমগ্র সেনাবাহিনীতে লোকেরা দেখল—বীর দ্রোণাচার্য শ্রেষ্ঠ শ্রেষ্ঠ যোদ্ধাদের বেছে বেছে নিধন করছেন।
Verse 31
महाराज! सौ केकययोद्धाओंको मारकर शेष सैनिकोंको चारों ओर खदेड़नेके पश्चात् द्रोणाचार्य मुँह बाये हुए यमराजके समान खड़े हो गये
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! একশো কেকয় যোদ্ধাকে বধ করে এবং অবশিষ্ট সৈন্যদের চারদিকে তাড়িয়ে দিয়ে দ্রোণাচার্য মুখ হা করে যমরাজের মতো সেখানে দাঁড়িয়ে রইলেন।
Verse 32
पज्चालान् सृञ्जयान् मत्स्यान् केकयांश्व नराधिप । द्रोणोड5जयन्महाबाहु: शतशोडथ सहसत्रश:,नरेश्वर! महाबाहु द्रोणाचार्यने पांचाल, सृंजय, मत्स्य और केकयोंके सैकड़ों तथा सहस्रों वीरोंको परास्त किया
সঞ্জয় বললেন—হে নরাধিপ! মহাবাহু দ্রোণ পাঞ্চাল, সৃঞ্জয়, মৎস্য ও কেকয়দের শত শত ও সহস্র সহস্র করে পরাস্ত করলেন।
Verse 33
केकयानां शतं हत्वा विद्राव्य च समन्ततः । द्रोणस्तस्थौ महाराज व्यादितास्य इवान्तक:
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! কেকয়দের একশো জনকে বধ করে এবং বাকিদের চারদিকে ছত্রভঙ্গ করে দ্রোণ মুখ হা করে অন্তকের মতো স্থির দাঁড়িয়ে রইলেন। দ্রোণের শরবিদ্ধ সেই যোদ্ধাদের আর্তচিৎকার উঠল—যেন ধোঁয়ার কেতু টেনে ছড়িয়ে পড়া দাবানলে আচ্ছন্ন ভয়ংকর অরণ্যে বনচর প্রাণীদের বিলাপধ্বনি।
Verse 34
तत्र देवा: सगन्धर्वा: पितरश्नाब्रुवन् नृप । एते द्रवन्ति पठचाला: पाण्डवाक्ष ससैनिका:
সঞ্জয় বললেন—হে নৃপ! তখন আকাশে অবস্থানকারী দেবতা, গন্ধর্ব ও পিতৃগণ বললেন—‘এই পাঞ্চাল ও পাণ্ডবরা সৈন্যসহ পলায়ন করছে।’
Verse 35
त॑ तथा समरे द्रोणं निघ्नन्तं सोमकान् रणे । न चाप्यभिययु: केचिदपरे नैव विव्यधु:,इस प्रकार समरांगणमें सोमकोंका वध करते हुए द्रोणाचार्यके सामने न तो कोई जा सके और न कोई उन्हें चोट ही पहुँचा सके
সঞ্জয় বললেন—এইভাবে রণক্ষেত্রে সোমকদের বধ করতে থাকা দ্রোণের বিরুদ্ধে কেউই এগিয়ে যেতে পারল না; অন্যদের কেউও তাঁকে সামান্যও আঘাত করতে সক্ষম হল না।
Verse 36
वर्तमाने तथा रौद्रे तस्मिन् वीरवरक्षये । अशृणोत् सहसा पार्थ: पाउ्चजन्यस्य नि:स्वनम्
শ্রেষ্ঠ বীরদের বিনাশসাধক সেই ভয়ংকর যুদ্ধ চলতেই ছিল, এমন সময় হঠাৎ পার্থ পাঞ্চজন্য শঙ্খের গম্ভীর ধ্বনি শুনলেন।
Verse 37
पूरितो वासुदेवेन शड्खराट् स्वनते भृशम् | युध्यमानेषु वीरेषु सैन्धवस्याभिरक्षिषु
বাসুদেবের শ্বাসে পূর্ণ হয়ে শঙ্খরাজ প্রবল গর্জনে ধ্বনিত হল। সৈন্ধব (জয়দ্রথ)-র রক্ষায় নিযুক্ত বীরেরা যুদ্ধে রত ছিল; অর্জুনের রথের কাছে আপনার পুত্র ও সৈন্যরা চিৎকার করছিল, আর চারদিকের কোলাহলে গাণ্ডীবের টংকার ক্ষণকালের জন্য চাপা পড়ে গেল।
Verse 38
नदत्सु धार्तराष्ट्रेषु विजयस्य रथं प्रति । गाण्डीवस्य च निर्घोषे विप्रणष्टे समनन््तत:ः
ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রেরা যখন বিজয় (অর্জুন)-এর রথের দিকে গর্জন করতে করতে ধেয়ে এল, তখন চারদিক থেকে গাণ্ডীবের বজ্রধ্বনি চাপা পড়ে গেল।
Verse 39
कश्मलाभिह्ठतो राजा चिन्तयामास पाण्डव: । न नूनं स्वस्ति पार्थाय यथा नदति शड्खराट्
বিষাদ ও মোহে আচ্ছন্ন পাণ্ডব-রাজা চিন্তা করতে লাগলেন—“নিশ্চয়ই পার্থের মঙ্গল নেই; কারণ শঙ্খরাজ যেমন হওয়া উচিত তেমন ধ্বনিত হচ্ছে না।”
Verse 40
कौरवाश्न यथा हृष्टा विनदन्ति मुहुर्मुहुः । तब पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर मोहके वशीभूत होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगे --'जिस प्रकार शंखराज पांचजन्यकी ध्वनि हो रही है और जिस तरह कौरव-सैनिक बारंबार हर्षनाद कर रहे हैं, उससे जान पड़ता है, निश्चय ही अर्जुनकी कुशल नहीं है” ।।
“আর কৌরবরা যেভাবে উল্লসিত হয়ে বারবার উচ্চনাদ করছে, তাতেও তাই বোঝা যায়।” এ কথা ভেবে অজাতশত্রু যুধিষ্ঠিরের অন্তর ব্যাকুল হয়ে উঠল।
Verse 41
अजातशशणत्रु: कौन्तेय: सात्वतं प्रत्यभाषत । बाष्पगद्गदया वाचा मुहामानो मुहुर्मुहु: । कृत्यस्यानन्तरापेक्षी शैनेयं शिनिपुड़वम्
সঞ্জয় বললেন—অজাতশত্রু কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠির সাত্বতবীরকে সম্বোধন করলেন। অশ্রুতে গদ্গদ কণ্ঠে তিনি বারংবার বিভ্রান্ত হয়ে পড়ছিলেন। জয়দ্রথবধের কাজ যেন বিলম্বহীন ও নির্বিঘ্নে সম্পন্ন হয়—এই উৎকণ্ঠায় শিনিশ্রেষ্ঠ শৈনেয় সাত্যকিকে তিনি পুনঃপুনঃ বললেন।
Verse 42
युधिष्ठिर उवाच यः स धर्म: पुरा दृष्ट: सदूभि: शैनेय शाश्वत: । साम्पराये सुद्ृत्कृत्ये तस्य कालोडयमागत:ः
যুধিষ্ঠির বললেন—হে শৈনেয়! বিপদের সময়ে এক সত্য সুহৃদের কর্তব্য সম্বন্ধে সজ্জনরা প্রাচীনকালে যে শাশ্বত ধর্ম প্রত্যক্ষ করেছিলেন, আজ সেই ধর্ম পালনেরই সময় উপস্থিত হয়েছে।
Verse 43
सर्वेष्वपि च योधेषु चिन्तयन् शिनिपुड्रव । त्वत्त: सुह्तत्तमं कज्चिन्नाभिजानामि सात्यके
হে শিনিশ্রেষ্ঠ সাত্যকি! সকল যোদ্ধাকে বিবেচনা করেও আমি তোমার চেয়ে বড় সুহৃদ আর কাউকে জানি না।
Verse 44
यो हि प्रीतमना नित्यं यश्नच नित्यमनुव्रतः । स कार्य साम्पराये तु नियोज्य इति मे मति:
যে সর্বদা প্রীতচিত্ত এবং নিত্যই আমার প্রতি অনুরক্ত ও অনুগত, সংকটকালে গুরুত্বপূর্ণ কর্মে তাকেই নিয়োজিত করা উচিত—এটাই আমার মত।
Verse 45
यथा च केशवो नित्यं पाण्डवानां परायणम् | तथा त्वमपि वार्ष्णेय कृष्णतुल्यपराक्रम:
হে বার্ষ্ণেয়! যেমন কেশব সর্বদা পাণ্ডবদের পরম আশ্রয়, তেমনি তুমিও; তোমার পরাক্রমও কৃষ্ণের তুল্য।
Verse 46
सो<हं भारं समाधास्ये त्वयि तं वोढुम्हसि । अभिप्रायं च मे नित्यं न वृथा कर्तुमहसि
অতএব আমি তোমার উপর এই দায়িত্ব অর্পণ করছি; তোমাকে তা বহন করে সম্পন্ন করতে হবে। আর সর্বদা এমন চেষ্টা করবে, যাতে আমার অভিপ্রায় বৃথা না যায়।
Verse 47
स व्वं भ्रातुर्वयस्यस्य गुरोरपि च संयुगे । कुरु कृच्छे सहायार्थमर्जुनस्य नरर्षभ
নরশ্রেষ্ঠ! অর্জুন তোমার ভ্রাতা, সখা, এবং এক অর্থে গুরু-তুল্যও। তিনি এখন যুদ্ধক্ষেত্রে মহাসঙ্কটে পতিত; অতএব এই বিপদে তাঁর সহায়তার জন্য চেষ্টা কর।
Verse 48
त्वं हि सत्यव्रतः शूरो मित्राणामभयड्कर: । लोके विख्यायसे वीर कर्मभि: सत्यवागिति,तुम सत्यव्रती, शूरवीर तथा मित्रोंको अभय देनेवाले हो। वीर! तुम अपने कर्माद्वारा संसारमें सत्यवादीके रूपमें विख्यात हो
তুমি সত্যব্রতধারী বীর, বন্ধুদের অভয়দাতা। হে বীর, তোমার কর্মের দ্বারা তুমি জগতে সত্যভাষী বলে খ্যাত।
Verse 49
यो हि शैनेय मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत् तनुम् । पृथिवीं च द्विजातिभ्यो यो दद्यात् स समो भवेत्
হে শৈনেয়! যে বন্ধু-হিতার্থে যুদ্ধ করতে করতে দেহ ত্যাগ করে, আর যে দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) সমগ্র পৃথিবী দান করে—এই দু’জনই সমান পুণ্যের অধিকারী হয়।
Verse 50
श्रुताश्ष बहवो5स्माभी राजानो ये दिवं गता: । दत्त्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि,हमने सुना है कि बहुत-से राजा ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक इस समूची पृथ्वीका दान करके स्वर्गलोकमें गये हैं
আমরা শুনেছি—বহু রাজা বিধি অনুসারে এই সমগ্র পৃথিবী ব্রাহ্মণদের দান করে স্বর্গলোকে গমন করেছেন।
Verse 51
एवं त्वामपि धर्मात्मन् प्रयाचे5हं कृताञज्जलि: । पृथिवीदानतुल्यं स्यादधिकं वा फलं विभो
ধর্মাত্মন্! এইরূপে আমিও অর্জুনের সহায়তার জন্য করজোড়ে তোমার কাছে প্রার্থনা করছি। প্রভো! এ কাজ করলে তোমার পৃথিবী-দানসম, কিংবা তার থেকেও অধিক ফল লাভ হবে।
Verse 52
एक एव सदा कृष्णो मित्राणामभयड्करः । रणे संत्यजति प्राणान् द्वितीयस्त्वं च सात्यके
হে সাত্যকি! বন্ধুদের অভয় দানকারী একজনই সর্বদা—ভগবান শ্রীকৃষ্ণ; যিনি রণে প্রাণ পর্যন্ত ত্যাগ করতে প্রস্তুত থাকেন। আর দ্বিতীয়জন তুমি—হে সাত্যকি!
Verse 53
विक्रान्तस्य च वीरस्य युद्धे प्रार्थथतो यश: । शूर एव सहाय: स्यान्नेतर: प्राकृतो जन:
যুদ্ধে যশ লাভের আকাঙ্ক্ষায় পরাক্রমে অগ্রসর বীরের সহায় হতে পারে কেবল এক শূরবীরই; অন্য কোনো সাধারণ, নিম্নমানের লোক তার সহায় হতে পারে না।
Verse 54
ईदृशे तु परामर्दे वर्तमानस्य माधव । त्वदन्यो हि रणे गोप्ता विजयस्य न विद्यते,माधव! ऐसे घोर युद्धमें लगे हुए रणक्षेत्रमें अर्जुनका सहायक एवं संरक्षक होनेयोग्य तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नहीं है
হে মাধব! এমন ভয়ংকর সংঘর্ষে, এই রণক্ষেত্রে, অর্জুনের সহায় ও রক্ষক হয়ে বিজয়কে রক্ষা করার মতো তোমাকে ছাড়া আর কেউ নেই।
Verse 55
श्लाघन्नेव हि कर्माणि शतशस्तव पाण्डव: । मम संजनयन् हर्ष पुन: पुनरकीर्तयत्,पाणए्डुपुत्र अर्जुनने तुम्हारे सैकड़ों कार्योंकी प्रशंसा करते और मेरा हर्ष बढ़ाते हुए बारंबार तुम्हारे गुणोंका वर्णन किया था
পাণ্ডুপুত্র অর্জুন তোমার শত শত কর্মের প্রশংসা করতে করতে, আমার আনন্দ বাড়িয়ে, বারবার তোমার গুণাবলি বর্ণনা করত।
Verse 56
लघुहस्तश्नित्रयोधी तथा लघुपराक्रम: । प्राज्ञ: सर्वास्त्रविच्छूरों मुहुते न च संयुगे
যুধিষ্ঠির বললেন— “সাত্যকির হাত অত্যন্ত দ্রুত; সে বিচিত্র ও কৌশলী উপায়ে যুদ্ধ করে এবং তৎক্ষণাৎ বীরত্ব প্রকাশ করে। সে প্রজ্ঞাবান, সকল অস্ত্রের জ্ঞানী ও সত্যিকারের বীর; রণক্ষেত্রে সে কখনও মোহগ্রস্ত হয় না—যুদ্ধের মাঝেও এক মুহূর্তের জন্য নয়।”
Verse 57
महास्कन्धो महोरस्को महाबाहुर्महाहनु: । महाबलो महावीर्य: स महात्मा महारथ:
যুধিষ্ঠির বললেন— “তার কাঁধ প্রশস্ত, বক্ষ গভীর; বাহু প্রবল এবং চোয়াল বিশাল। সে মহাবলী, মহাপরাক্রমী, মহাত্মা—একজন শ্রেষ্ঠ রথযোদ্ধা।”
Verse 58
शिष्यो मम सखा चैव प्रियो<स्याहं प्रियश्न मे । युयुधान: सहायो मे प्रमथिष्यति कौरवान्
যুধিষ্ঠির বললেন— “সাত্যকি আমার শিষ্যও, আমার সখাও। আমি তার প্রিয়, সেও আমার প্রিয়। ইউযুধান আমার সহায় হয়ে আমাদের বিরোধী কৌরবদের চূর্ণ করবে।”
Verse 59
अस्मदर्थ च राजेन्द्र संनहोद् यदि केशव: । रामो वाप्यनिरुद्धो वा प्रद्मयुम्नो वा महारथ:
যুধিষ্ঠির বললেন— “রাজেন্দ্র! মহারাজ! আমাদের পক্ষে যদি কেশব (শ্রীকৃষ্ণ) নিজে অস্ত্রধারী হয়ে যুদ্ধের জন্য প্রস্তুত হন, কিংবা বলরাম, কিংবা অনিরুদ্ধ, কিংবা মহারথী প্রদ্যুম্ন—তবুও আমার সহায়তার কাজে আমি পুরুষসিংহ, সত্যপরাক্রমী, শিনিপৌত্র সাত্যকিকেই নিযুক্ত করব; কারণ আমার বিচারে সাত্যকির সমান আর কেউ নেই।”
Verse 60
गदो वा सारणो वापि साम्बो वा सह वृष्णिभि: | सहायार्थ महाराज संग्रामोत्तममूर्थनि
যুধিষ্ঠির বললেন— “মহারাজ! যদি গদ, বা সারণ, কিংবা বৃষ্ণিদের সঙ্গে সাম্বও বর্ম ধারণ করে এই শ্রেষ্ঠ সংগ্রামের অগ্রভাগে আমাদের সাহায্যে প্রস্তুত হন—তবুও সহায়তার কাজে আমি পুরুষসিংহ, সত্যপরাক্রমী, শিনিপৌত্র সাত্যকিকেই নিযুক্ত করব; কারণ আমার বিচারে সাত্যকির সমান কেউ নেই।”
Verse 61
'राजेन्द्र! महाराज! यदि युद्धके श्रेष्ठ मुहानेपर हमारी सहायताके लिये भगवान् श्रीकृष्ण
যুধিষ্ঠির বললেন—রাজেন্দ্র, মহারাজ! এই যুদ্ধের সর্বাধিক নির্ণায়ক সম্মুখভাগে আমাদের সহায়তার জন্য যদি ভগবান শ্রীকৃষ্ণ, বলরাম, অনিরুদ্ধ, মহারথী প্রদ্যুম্ন, এবং গদ, সারণ—অথবা বৃষ্ণিবংশীয় বীরদের সঙ্গে সাম্বও—কবচ ধারণ করে প্রস্তুত হন, তবুও আমি পুরুষসিংহ, সত্যপরাক্রমী শিনিপৌত্র সাত্যকিকেই অবশ্যই আমাদের সহায়তার কাজে নিয়োজিত করব; কারণ আমার বিচারে সাত্যকির সমান আর কেউ নেই।
Verse 62
इति द्वैतवने तात मामुवाच धनंजय: । परोक्षे त्वदगुणांस्तथ्यान् कथयन्नार्यसंसदि
হে তাত! এইরূপে দ্বৈতবন অরণ্যে ধনঞ্জয় (অর্জুন) আমাকে এই কথাগুলি বলেছিল—যখন সে আর্যজনের সভায় তোমার অনুপস্থিতিতে তোমার সত্য গুণাবলি যথার্থভাবে বর্ণনা করছিল।
Verse 63
तथाप्यहं नरव्याप्रं शैनेयं सत्यविक्रमम् । साहाय्ये विनियोक्ष्यामि नास्ति मे5न्यो हि तत्सम:
যুধিষ্ঠির বললেন—তবু হে নরব্যাঘ্র! আমি সত্যবিক্রম শৈনেয়কেই সহায়তার কাজে নিয়োজিত করব; কারণ আমার কাছে তার সমান আর কেউ নেই। অতএব হে বৃষ্ণেয়! অর্জুন, আমি, ভীম এবং মাদ্রীর উভয় পুত্র—আমরা তোমাকে নিয়ে যে সংকল্প করেছি, তুমি তা বৃথা হতে দিও না।
Verse 64
यच्चापि तीर्थानि चरन्नगच्छं द्वारकां प्रति । तत्राहमपि ते भक्तिमर्जुनं प्रति दृष्टवान्
যুধিষ্ঠির বললেন—আর যখন আমি তীর্থভ্রমণ করতে করতে দ্বারকার দিকে গিয়েছিলাম, সেখানেও আমি অর্জুনের প্রতি তোমার ভক্তি ও অনুরাগ স্বচক্ষে দেখেছিলাম।
Verse 65
न तत् सौहदमन्येषु मया शैनेय लक्षितम् | यथा त्वमस्मान् भजसे वर्तमानानुपप्लवे
যুধিষ্ঠির বললেন—হে শৈনেয়! এই সর্বনাশা সংকটে পতিত আমাদের যেভাবে তুমি সেবা ও সহায়তা করছ, তেমন সৌহার্দ্য আমি তোমাকে ছাড়া আর কারও মধ্যে দেখিনি।
Verse 66
सो5भिजात्या च भवत्या च सख्यस्याचार्यकस्य च । सौहृदस्य च वीर्यस्य कुलीनत्वस्य माधव
যুধিষ্ঠির বললেন— হে মাধব! তোমার উচ্চকুলে জন্ম, তোমার নিজ গুণ, বন্ধুত্ব, আচার্যসম শ্রদ্ধেয় ভাব, সৌহার্দ্য, বীর্য ও কুলীনতা—এসবের সঙ্গে সঙ্গত এবং সত্যের অনুরূপ কর্ম করো। এই গুণগুলিকেই আমাদের প্রতি করুণা ও রক্ষার উপায় করে তোলো।
Verse 67
सत्यस्य च महाबाहो अनुकम्पार्थमेव च । अनुरूप महेष्वास कर्म त्वं कर्तुमहसि
হে মহাবাহো, মহেষ্বাস! সত্যের অনুরূপ এবং কেবল অনুকম্পার জন্যই তোমার সেই কর্ম করা উচিত।
Verse 68
सुयोधनो हि सहसा गतो द्रोणेन दंशित: । पूर्वमेवानुयातास्ते कौरवाणां महारथा:
দ্রোণের প্ররোচনায় দংশিত হয়ে সুয়োধন (দুর্যোধন) হঠাৎই অগ্রসর হয়েছে। কৌরবদের সেই মহারথীরা আগেই তার পশ্চাতে যাত্রা করেছিল।
Verse 69
सुमहान् निनदश्चैव श्रूयते विजयं प्रति । स शैनेय जवेनाशु गन्तुमरहसि मानद
বিজয়ের দিক থেকে এক মহা গর্জন শোনা যাচ্ছে। অতএব, হে মানদ শৈনেয়! তোমার উচিত দ্রুত বেগে সেখানে গমন করা।
Verse 70
भीमसेनो वयं चैव संयत्ता: सहसैनिका: । द्रोणमावारयिष्यामो यदि त्वां प्रति यास्यति
ভীমসেন এবং আমরা সবাই সৈন্যসহ সম্পূর্ণ প্রস্তুত ও সতর্ক আছি। যদি দ্রোণ তোমার পশ্চাদ্ধাবন করেন, তবে আমরা তাঁকে প্রতিহত করব।
Verse 71
पश्य शैनेय सैन्यानि द्रवमाणानि संयुगे । महान्तं च रणे शब्द दीर्यमाणां च भारतीम्
দেখো, হে শৈনেয়! যুদ্ধের ঘোরে সেনাদল পলায়ন করছে। রণক্ষেত্রে মহা গর্জন উঠেছে, আর ভারতীয় বাহিনীর ব্যূহ ভেঙে চুরমার হয়ে যাচ্ছে।
Verse 72
महामारुतवेगेन समुद्रमिव पर्वसु । धार्रराष्ट्रबलं तात विक्षिप्तं सव्यसाचिना
হে তাত! যেমন পর্বতপ্রান্তে প্রবল ঝড়ের বেগে সমুদ্র উত্তাল হয়ে ওঠে, তেমনি সব্যসাচী অর্জুন ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের সেনাকে ব্যাকুল করে ছত্রভঙ্গ করে দিয়েছেন।
Verse 73
रथैरविपरिधावद्धिममनुष्यैश्व हयैश्व ह । सैन्यं रज:समुद्धूतमेतत् सम्परिवर्तते,इधर-उधर भागते हुए रथों, मनुष्यों और घोड़ोंके द्वारा उड़ी हुई धूलसे आच्छादित हुई यह सारी सेना चक्कर काट रही है
এদিক-ওদিক ছুটে চলা রথ, মানুষ ও ঘোড়ার তোলা ধুলায় আচ্ছন্ন এই সমগ্র সেনা ব্যাকুল হয়ে ঘুরপাক খাচ্ছে।
Verse 74
संवृतः सिन्धुसौवीरैर्नखरप्रासयोधिभि: । अत्यन्तोपचितै: शूरै: फाल्गुन: परवीरहा
শত্রুবীর-সংহারী ফাল্গুন অর্জুন সিন্ধু ও সৌবীর দেশের সেই সব বীরদের দ্বারা পরিবেষ্টিত হয়েছেন, যারা নখর-অস্ত্র ও বর্শা নিয়ে যুদ্ধ করে এবং বিপুল সংখ্যায় একত্র হয়েছে।
Verse 75
नैतद् बलमसंवार्य शक््यो जेतुं जयद्रथः । एते हि सैन्धवस्यार्थे सर्वे संत्यक्तजीविता:,इस सेनाका निवारण किये बिना जयद्रथको जीतना असम्भव है। ये सभी सैनिक सिन्धुराजके लिये अपना जीवन न्यौछावर कर चुके हैं
এই অপ্রতিরোধ্য শক্তিকে দমন না করে জয়দ্রথকে জয় করা সম্ভব নয়। সিন্ধুরাজের জন্য এরা সকলেই প্রাণ ত্যাগে স্থির—মৃত্যুকে বরণ করতে প্রস্তুত।
Verse 76
शरशक्तिध्वजवरं हयनागसमाकुलम् | पश्यैतद् धार्तराष्ट्राणामनीकं सुदुरासदम्,बाण, शक्ति और ध्वजाओंसे सुशोभित तथा घोड़े और हाथियोंसे भरी हुई कौरवोंकी इस दुर्जय सेनाको देखो
শর, শক্তি ও ধ্বজায় শোভিত, অশ্ব-গজে পরিপূর্ণ—ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের এই দুরাসদ সেনাবিন্যাসটি দেখো।
Verse 77
शणु दुन्दुभिनिर्घोषं शडखशब्दां श्व पुष्कलान् | सिंहनादरवांश्षैव रथनेमिस्वनांस्तथा
শোনো—দুন্দুভির গভীর গর্জন উঠছে; প্রচুর শঙ্খধ্বনি উচ্চস্বরে বাজছে; বীরদের সিংহনাদ ধ্বনিত হচ্ছে; আর রথচক্রের ঘর্ঘর শব্দও শোনা যাচ্ছে।
Verse 78
नागानां शृणु शब्दं च पत्तीनां च सहस्रश: । सादिनां द्रवतां चैव शूणु कम्पयतां महीम्
হস্তীদের চিঁঘাড় শোনো; সহস্র সহস্র পদাতিকের কোলাহল শোনো; আর অশ্বারোহীদের ধাবমান গর্জনও শোনো—যারা পৃথিবীকে কাঁপিয়ে দিচ্ছে।
Verse 79
पुरस्तात् सैन्धवानीकं द्रोणानीकं च पृष्ठत: । बहुत्वाद्धि नरव्याप्र देवेन्द्रमपि पीडयेत्
হে নরব্যাঘ্র! সামনে সিন্ধুরাজের সেনা, আর পেছনে দ্রোণের সেনা। সংখ্যার প্রাবল্যে এ বাহিনী দেবরাজ ইন্দ্রকেও পীড়িত করতে সক্ষম।
Verse 80
अपर्यन्ते बले मग्नो जह्मादपि च जीवितम् | तस्मिंश्न निहते युद्धे कथं जीवेत मादृूश:
এই সীমাহীন বাহিনীর মধ্যে নিমজ্জিত হয়ে আমি জীবনের আশাও ত্যাগ করেছি। যদি তিনি এই যুদ্ধে নিহত হন, তবে আমার মতো জন কীভাবে বাঁচবে?
Verse 81
श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयश्व पाण्डव:
যুধিষ্ঠির বললেন—অর্জুন, শ্যামবর্ণ তরুণ গুড়াকেশ, পাণ্ডবদের মধ্যে অতি মনোহর এবং নিদ্রাজয়ী। সে দ্রুত অস্ত্র প্রয়োগ করে এবং বিচিত্র কৌশলে যুদ্ধ করে। পিতা! সেই মহাবাহু বীর সূর্যোদয়ে একাই কৌরব-সেনার মধ্যে প্রবেশ করেছিল, আর এখন দিন ক্রমে অতিক্রান্ত হয়ে চলেছে।
Verse 82
लघ्वस्त्रश्नित्रयोधी च प्रविष्टस्तात भारतीम् । सूर्योदये महाबाहुर्दिवसश्लातिवर्तते
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতা! সেই মহাবাহু বীর অস্ত্র দ্রুত প্রয়োগে দক্ষ এবং নানা রীতিতে যুদ্ধ করতে পারদর্শী। সে সূর্যোদয়ে কৌরব-সেনায় প্রবেশ করেছিল; আর এখন দিন ক্রমে অতিক্রান্ত হয়ে চলেছে।
Verse 83
तन्न जानामि वार्ष्णेय यदि जीवति वा न वा । कुरूणां चापि तत् सैन्यं सागरप्रतिमं महत्
যুধিষ্ঠির বললেন—হে বার্ষ্ণেয়! আমি জানি না, এই মুহূর্তে অর্জুন জীবিত আছে কি না। কুরুদের সেনা সমুদ্রের মতো বিশাল; মহাযুদ্ধে তার প্রবল বেগ দেবতারাও সহ্য করতে পারেন না। আর সেই কৌরব-সেনার মধ্যে মহাবাহু অর্জুন একাই প্রবেশ করেছে।
Verse 84
एक एव च बीभत्सु: प्रविष्टस्तात भारतीम् । अविषह्ाां महाबाहु: सुरैरपि महाहवे
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতা! বিভৎসু (অর্জুন) একাই কৌরব-সেনায় প্রবেশ করেছে। মহাযুদ্ধে সেই মহাবাহু দেবতাদের কাছেও অসহনীয়। তবু, হে বার্ষ্ণেয়! আমি জানি না, সে এই মুহূর্তে জীবিত আছে কি না; কৌরব-সেনা সমুদ্রের মতো বিপুল।
Verse 85
न हि मे वर्तते बुद्धिरद्य युद्धे कथंचन । दोणो<5पि रभसो युद्धे मम पीडयते बलम्
যুধিষ্ঠির বললেন—আজ কোনোভাবেই আমার বুদ্ধি যুদ্ধে স্থির হচ্ছে না। আর দ্রোণাচার্যও রণক্ষেত্রে প্রবল বেগে আক্রমণ করে আমার বাহিনীকে পীড়িত করছেন।
Verse 86
प्रत्यक्ष ते महाबाहो यथासौ चरति द्विज: । युगपच्च समेतानां कार्याणां त्वं विचक्षण:
মহাবাহো! শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ দ্রোণাচার্য যেমন আচরণ করছেন, তা তোমার চোখের সামনেই। একই সঙ্গে উপস্থিত বহু কর্তব্যের মধ্যে কোনটি পালনীয়—সে সিদ্ধান্তে তুমি বিচক্ষণ।
Verse 87
महार्थ लघुसंयुक्त कर्तुमहसि मानद । तस्य मे सर्वकार्येषु कार्यमेतन््मतं महत्
মানদ! সংক্ষিপ্ত বাক্যে মহৎ অর্থ সংযুক্ত করে তুমি তা রচনা করো। আমার কাছে সকল কর্মের মধ্যে এটাই সর্বাধিক গুরুতর ও অপরিহার্য কাজ—এটাই আমার দৃঢ় মত।
Verse 88
नाहं शोचामि दाशाहं गोप्तारं जगत: पतिम्
তাত! আমি দাশার্হনন্দন শ্রীকৃষ্ণের জন্য শোক করি না; তিনি তো সমগ্র জগতের রক্ষক ও অধিপতি। তবে ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের এই অতিশয় দুর্বল সেনাবল নিয়ে ভয় বা শোকই বা কেন?
Verse 89
स हि शक्तो रणे तात त्रींललोकानपि संगतान् । विजेतुं पुरुषव्याप्र: सत्यमेतद् ब्रवीमि ते
তাত! সেই পুরুষসিংহ যুদ্ধে সক্ষম—যদি তিন লোক একত্রিতও হয়, তবু তাদের জয় করতে পারে। এ সত্যই আমি তোমাকে বলছি।
Verse 90
अर्जुनस्त्वेष वा्ष्णेय पीडितो बहुभिययुधि
হে বাষ্ণেয়! এই অর্জুন যুদ্ধে বহু শত্রুর চাপে পীড়িত হয়ে অত্যন্ত কষ্ট পাচ্ছে।
Verse 91
तस्य त्वं पदवीं गच्छ गच्छेयुस्त्वाद्शा यथा
তুমি তাঁরই পদাঙ্ক অনুসরণ করো—তিনি যে পথ স্থির করেছেন সেই পথেই চলো—যাতে তোমার মতো মানুষ যথোচিতভাবে অগ্রসর হতে পারে।
Verse 92
रणे वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथौ स्मृती
যুধিষ্ঠির বললেন—“যুদ্ধে, বৃষ্ণিকুলের অগ্রগণ্য বীরদের মধ্যে কেবল দু’জনকেই প্রকৃত অতিরথ বলে স্মরণ করা হয়।”
Verse 93
अस्त्रे नारायणसम: संकर्षणसमो बले
যুধিষ্ঠির বললেন—“অস্ত্রপ্রয়োগে সে নারায়ণের সমান, আর বলবীর্যে সে সংকর্ষণের তুল্য।”
Verse 94
भीष्मद्रोणावतिक्रम्य सर्वयुद्धविशारदम्
যুধিষ্ঠির বললেন—“ভীষ্ম ও দ্রোণকে অতিক্রম করে—যাঁরা যুদ্ধের সকল প্রকার বিদ্যায় পারদর্শী—…”
Verse 95
त्वामेव पुरुषव्याप्रं लोके सन्त: प्रचक्षते । इस जगत्में भीष्म और द्रोणके बाद तुझ पुरुषसिंह सात्यकिको ही श्रेष्ठ पुरुष सम्पूर्ण युद्धकलामें निपुण बताते हैं ।।
যুধিষ্ঠির বললেন—“জগতের সৎ ও বিচক্ষণ লোকেরা তোমাকেই সক্ষম পুরুষদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—পুরুষসিংহ—বলে ঘোষণা করে। সাধুজনের সমাবেশে তোমার গুণ সর্বদাই অনন্য বলে উচ্চারিত হয়। তারা বলে—সাত্যকি দেব, অসুর, গন্ধর্ব, কিন্নর ও মহাসর্পসহ শত্রুদের বিরাট বাহিনীর সঙ্গেও যুদ্ধ করে জয়ী হতে পারে; একাই যেন সমগ্র জগতের বিরুদ্ধে দাঁড়াতে পারে। হে মাধব, লোকের মুখে শোনা যায়—সাত্যকির পক্ষে এ জগতে কোনো কাজই অসম্ভব নয়। অতএব সকলের—এবং আমার ও অর্জুনের—তোমার প্রতি যে গভীর শ্রদ্ধা, তা স্মরণ করে, আমি যা বলি তাই করো। পূর্বের সংকল্প থেকে বিচ্যুত হয়ো না; প্রাণের মোহ ত্যাগ করে রণাঙ্গনে নির্ভয়ের মতো অবিচলভাবে বিচরণ করো।”
Verse 96
तत् त्वां यदभिवक्ष्यामि तत् कुरुष्व महाबल । सम्भावना हि लोकस्य मम पार्थस्य चोभयो:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে মহাবলী, আমি যা বলতে যাচ্ছি, ঠিক তাই করো। লোকসমাজ তোমাকে অত্যন্ত সম্মান করে, আর আমি ও পার্থ (অর্জুন) উভয়েই তোমার প্রতি সমান শ্রদ্ধা রাখি; অতএব আমার কথামতোই কার্য করো।
Verse 97
नान्यथा तां महाबाहो सम्प्रकर्तुमिहाहसि । परित्यज्य प्रियान् प्राणान् रणे चर विभीतवत्
যুধিষ্ঠির বললেন—হে মহাবাহু, এ বিষয়ে এখানে অন্যভাবে আচরণ করা তোমার উচিত নয়। প্রিয় প্রাণের আসক্তি ত্যাগ করে রণে নির্ভয়ের মতো বিচরণ করো।
Verse 98
न हि शैनेय दाशार्हा रणे रक्षन्ति जीवितम् । अयुद्धमनवस्थानं संग्रामे च पलायनम्
যুধিষ্ঠির বললেন—হে শৈনেয়, দাশার্হরা রণে জীবন রক্ষা করে না এভাবে—যুদ্ধ না করা, যুদ্ধক্ষেত্রে স্থির না থাকা, আর সংগ্রাম থেকে পলায়ন করা।
Verse 99
भीरूणामसतां मार्गो नैष दाशार्हसेवित: । शैनेय! दशार्हकुलके वीर पुरुष रणक्षेत्रमें अपने प्राण बचानेकी चेष्टा नहीं करते हैं। युद्धसे मुँह मोड़ना, युद्धस्थलमें डटे न रहना और संग्रामभूमिमें पीठ दिखाकर भागना यह कायरों और अधम पुरुषोंका मार्ग है। दशाकुलके वीर पुरुष इससे दूर रहते हैं || ९८ ई ।।
যুধিষ্ঠির বললেন—এটি ভীরু ও অধম লোকদের পথ; দাশার্হরা এ পথ অনুসরণ করে না। হে শৈনেয়, দাশার্হ বংশের বীরেরা রণক্ষেত্রে প্রাণ বাঁচাতে ব্যস্ত হয় না। যুদ্ধ থেকে মুখ ফিরিয়ে নেওয়া, যুদ্ধস্থলে দৃঢ় না থাকা, আর পিঠ দেখিয়ে পালানো—এ ভীরুদের পথ; দাশার্হ বীরেরা তা থেকে দূরে থাকে।
Verse 100
कारणद्वयमेतद्धि जानंस्त्वामहमब्रुवम्
এই দুই কারণ জেনেই আমি তোমাকে এ কথা বলেছি।
Verse 101
वासुदेवमतं चैव मम चैवार्जुनस्य च
যুধিষ্ঠির বললেন—“নিশ্চয়ই এটাই বাসুদেবের মত, আর আমার ও অর্জুনেরও।”
Verse 102
एतद् वचनमाज्ञाय मम सत्यपराक्रम
যুধিষ্ঠির বললেন—“হে সত্যপরাক্রম! আমার এই বাক্য বুঝে…”
Verse 103
प्रविश्य च यथान्यायं संगम्य च महारथै: । यथार्हमात्मन: कर्म रणे सात्वत दर्शय,सात्वत! इसमें प्रवेश करके यथायोग्य सब महारथियोंसे मिलकर युद्धमें अपने अनुरूप पराक्रम दिखाओ
যুধিষ্ঠির বললেন—“হে সাত্বত! বিধিমতো রণে প্রবেশ কর; এবং মহারথীদের সঙ্গে যথাযথভাবে মিলিত হয়ে, যুদ্ধে নিজের যোগ্য কর্ম ও বীরত্ব প্রদর্শন কর।”
Verse 109
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें अलग्बुषवधविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ
সঞ্জয় বললেন—“এইভাবে পবিত্র মহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে অলম্বুষবধ-বিষয়ক একশো নবম অধ্যায় সমাপ্ত হল।”
Verse 110
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये दशाधिकशततमोड<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে জয়দ্রথবধপর্বের অন্তর্গত, যুধিষ্ঠিরের বাক্য-প্রসঙ্গে একশো বারোতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 146
अभिद्रवत गच्छध्वं सात्यकिर्यत्र युध्यते । 'योद्धाओ! जैसे राहु सूर्यको ग्रस लेता है
সঞ্জয় বললেন—“ধাওয়া করো, তৎক্ষণাৎ সেখানে যাও যেখানে সাত্যকি যুদ্ধ করছে। যেমন রাহু সূর্যকে গ্রাস করে, তেমনি বৃষ্ণিবংশের শ্রেষ্ঠ, সত্যপরাক্রমী সাত্যকি মহাবলী দ্রোণাচার্যের হাতে যেন মৃত্যুর মুখে প্রবেশ করতে উদ্যত। অতএব দৌড়ে গিয়ে সেই রণক্ষেত্রেই তাকে পৌঁছে ধরো, যেখানে যুদ্ধ তুঙ্গে।”
Verse 803
सर्वथाहमनुप्राप्त: सुकृच्छ त्वयि जीवति । इस अनन्त सैन्यसमुद्रमें डूबकर अर्जुन अपने प्राणोंका भी परित्याग कर देगा। युद्धमें उसके मारे जानेपर मेरे-जैसा मनुष्य कैसे जीवित रह सकता है? युयुधान! तुम्हारे जीते-जी मैं सब प्रकारसे बड़े भारी संकटमें पड़ गया हूँ
“যুযুধান! তুমি জীবিত থাকতেই আমি সর্বপ্রকারে ভয়ংকর সংকটে পড়েছি। এই অনন্ত সৈন্যসমুদ্রে ডুবে অর্জুন প্রাণ পর্যন্ত ত্যাগ করে দেবে। যুদ্ধে সে নিহত হলে আমার মতো মানুষ কী করে বেঁচে থাকতে পারে?”
Verse 873
अर्जुनस्य परित्राणं कर्तव्यमिति संयुगे । मानद! सबसे महान् प्रयोजनको तुम्हें शीघ्रतापूर्वक सम्पन्न करना चाहिये। मुझे तो सब कार्योमें सबसे महान् कार्य यही जान पड़ता है कि युद्धस्थलमें अर्जुनकी रक्षा की जाय
যুধিষ্ঠির বললেন—“যুদ্ধের মধ্যে অর্জুনের রক্ষা করতেই হবে। হে মানদ! তোমাকে দ্রুতই সর্বোচ্চ প্রয়োজন সম্পন্ন করতে হবে। আমার মতে সকল কর্তব্যের মধ্যে শ্রেষ্ঠ কর্তব্য এই—রণক্ষেত্রে অর্জুনকে রক্ষা করা।”
Verse 896
कि पुनर्धात॑राष्ट्रस्य बलमेतत् सुदुर्बलम् । तात! मैं दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके लिये शोक नहीं करता। वे तो सम्पूर्ण जगत्के संरक्षक और स्वामी हैं। युद्धस्थलमें तीनों लोक संघटित होकर आ जायाँ तो भी वे पुरुषसिंह श्रीकृष्ण उन सबको परास्त कर सकते हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—“তবে ধৃতরাষ্ট্রের পক্ষের এই শক্তি—এ তো অতিশয় দুর্বল! প্রিয়জন, আমি দশার্হনন্দন ভগবান শ্রীকৃষ্ণের জন্য শোক করি না; তিনি সমগ্র জগতের রক্ষক ও অধিপতি। যদি তিন লোক একত্র হয়ে রণক্ষেত্রে ঝাঁপিয়ে পড়ে, তবুও পুরুষসিংহ শ্রীকৃষ্ণ তাদের সকলকে পরাস্ত করতে পারেন—এ কথা আমি তোমাকে সত্যই বলছি। তবে দুর্যোধনের এই অতিদুর্বল সেনাকে জয় করা তাঁর পক্ষে কী এমন বড় কথা?”
Verse 913
तादृशस्येदृशे काले मादृशेनाभिनोदित:ः । अतः तुम मेरे-जैसे मनुष्यसे प्रेरित हो ऐसे संकटके समय अर्जुन-जैसे प्रिय सखाके पथका अनुसरण करो, जैसा कि तुम्हारे-जैसे वीर पुरुष किया करते हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—“এমন অবস্থায়, এমন সংকটকালে, আমার মতো একজনের দ্বারা তুমি উৎসাহিত হচ্ছ। অতএব, আমার মতো কারও প্রেরণাতেও, এই বিপদের মুহূর্তে অর্জুনের মতো প্রিয় সখার পথ অনুসরণ করো—যেমন তোমার মতো বীরপুরুষেরা করে থাকে।”
Verse 923
प्रद्मुम्नश्च महाबाहुस्त्वं च सात्वत विश्रुतः । सात्वत! वृष्णिवंशी प्रमुख वीरोंमें रणक्षेत्रके लिये दो ही व्यक्ति अतिरथी माने गये हैं-- एक तो महाबाह प्रद्युम्न और दूसरे सुविख्यात वीर तुम
যুধিষ্ঠির বললেন— মহাবাহু প্রদ্যুম্ন এবং তুমিও, যিনি সাত্বতদের মধ্যে প্রসিদ্ধ— হে সাত্বত, বৃষ্ণিবংশ-প্রবর! প্রধান বীরদের মধ্যে রণক্ষেত্রের জন্য কেবল দু’জনকেই অতিরথী গণ্য করা হয়— এক মহাবাহু প্রদ্যুম্ন, আর অন্যজন তুমি, খ্যাতনামা যোদ্ধা।
Verse 933
वीरतायां नरव्यात्र धनंजयसमो हासि । नरव्याप्र! तुम अस्त्रविद्याके ज्ञानमें भगवान् श्रीकृष्णके समान, बलमें बलरामजीके तुल्य और वीरतामें धनंजयके समान हो
যুধিষ্ঠির বললেন— হে নরব্যাঘ্র! বীরত্বে তুমি ধনঞ্জয়ের সমান। হে নরশ্রেষ্ঠ! অস্ত্রবিদ্যার জ্ঞানে তুমি ভগবান শ্রীকৃষ্ণের তুল্য, বলের দিক থেকে বলরামের সমকক্ষ, আর শৌর্যে ধনঞ্জয়ের সমান।
Verse 996
वासुदेवो गुरुश्नापि तव पार्थस्य धीमत: । तात! शिनिप्रवर! धर्मात्मा अर्जुन तुम्हारा गुरु है तथा भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे और बुद्धिमान अर्जुनके भी गुरु हैं
যুধিষ্ঠির বললেন— বাসুদেব (ভগবান শ্রীকৃষ্ণ) তোমারও এবং বুদ্ধিমান পার্থ (অর্জুন)-এরও পূজ্য গুরু। হে তাত, শিনিবংশ-প্রবর! ধর্মাত্মা অর্জুন তোমার গুরু, আর ভগবান শ্রীকৃষ্ণ তোমাদের উভয়েরই গুরু।
Verse 1006
मावमंस्था वचो महां गुरुस्तव गुरोह[हम् । इन दोनों कारणोंको जानकर मैं तुमसे इस कार्यके लिये कह रहा हूँ। तुम मेरी बातकी अवहेलना न करो; क्योंकि मैं तुम्हारे गुरुका भी गुरु हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন— আমার বাক্য তুচ্ছ কোরো না। আমি মহান জ্যেষ্ঠ— তোমার গুরুরও গুরু। এই দুই কারণ জেনে আমি এই কাজের জন্য তোমাকে বলছি। আমার কথাকে অমান্য কোরো না, কারণ আমি তোমার গুরুরও গুরু।
Verse 1013
सत्यमेतन्मयोक्तं ते याहि यत्र धनंजय: । तुम्हारा वहाँ जाना भगवान् श्रीकृष्णको, मुझको तथा अर्जुनको भी प्रिय है। यह मैंने तुमसे सच्ची बात कही है। अत: जहाँ अर्जुन है, वहाँ जाओ
যুধিষ্ঠির বললেন— আমি তোমাকে যা বলেছি, তা সত্য। যেখানে ধনঞ্জয় (অর্জুন) আছেন, সেখানে যাও। সেখানে তোমার গমন ভগবান শ্রীকৃষ্ণের, আমার এবং অর্জুনেরও প্রিয়। আমি সত্য কথাই বলেছি; অতএব যেখানে অর্জুন আছেন, সেখানেই যাও।
Verse 1026
प्रविशैतद् बल॑ तात धार्तराष्ट्रस्थ दुर्मते: । सत्यपराक्रमी वत्स! तुम मेरी इस बातको मानकर दुर्बुद्धि दुर्योधनकी इस सेनामें प्रवेश करो
যুধিষ্ঠির বললেন—বৎস, এই বাহিনীতে প্রবেশ করো—ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের পক্ষে স্থিত সেই দুর্মতির সেনাদলে। সত্যপরাক্রমী সন্তান, আমার উপদেশ মান্য করে দুর্বুদ্ধি দুর্যোধনের এই সেনায় প্রবেশ করো।
Verse 9063
प्रजह्मयात् समरे प्राणांस्तस्माद् विन्दामि कश्मलम् | परंतु वार्ष्णेय! यह अर्जुन तो युद्धस्थलमें बहुसंख्यक सैनिकोंद्वारा पीड़ित होनेपर समरांगणमें अपने प्राणोंका परित्याग कर देगा। इसीलिये मैं शोक और दु:खमें डूबा जा रहा हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—যদি সে যুদ্ধে প্রাণ হারায়, তবে আমি গভীর বিষাদে নিমজ্জিত হব। কিন্তু হে বার্ষ্ণেয়! এই অর্জুন যুদ্ধক্ষেত্রে অসংখ্য সৈন্যের চাপে পীড়িত হয়ে রণাঙ্গনে নিজের প্রাণ ত্যাগ করে দেবে; তাই আমি শোক ও দুঃখে ডুবে যাচ্ছি।
The chapter juxtaposes immediate tactical necessity (protecting a key warrior through massed intervention) with the longer ethical ledger of prior wrongdoing, implying that present strategic choices unfold within a moral causality shaped by earlier public humiliation and harsh speech.
Actions and speech-acts operate as durable causal inputs: battlefield outcomes are narrated not only as results of strength and tactics but also as the maturation of earlier intentions and public conduct, reinforcing a karmic model of historical explanation.
No formal phalaśruti is stated; however, the narrative supplies meta-commentary by having Duryodhana recall earlier counsel and interpret the deaths as the ‘fruit’ (phala) of sabhā-era insults, functioning as an internal ethical gloss on events.
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