Mahabharata Adhyaya 105
Drona ParvaAdhyaya 10555 Versesक्षणिक रूप से दुर्योधन की बाण-वर्षा से दबाव; फिर अर्जुन द्वारा घेराबंदी तोड़कर पलटवार—पर अस्त्र-युद्ध की बढ़ती तीव्रता से परिणाम अनिश्चित।

Adhyaya 105

Duryodhana Seeks Droṇa’s Counsel; Imperative to Protect Jayadratha; Pāñcāla Assault on Duryodhana

Upa-parva: Saindhava-rakṣaṇa (Defense of Jayadratha) Episode

Saṃjaya reports that, as the army is disrupted and Arjuna moves against Jayadratha with Bhīma and Sātyaki, Duryodhana rapidly approaches Droṇa, agitated and red-eyed, questioning how Droṇa could be ‘surpassed’ if Arjuna and the others have broken through. Droṇa replies that the situation is complex: with Kṛṣṇa and Arjuna pressing forward, the Kaurava host is effectively seized from front and rear. Droṇa identifies the immediate operational duty as safeguarding Jayadratha from Arjuna’s anger, comparing the battlefield to a decisive dice-wager—where victory and defeat are now determined by this single stake. He instructs Duryodhana to go personally to reinforce the defenders of Jayadratha, while Droṇa remains to contain the Pāñcālas and allied forces. The narrative then depicts Yudhāmanyu and Uttamaujā (as Arjuna’s wheel-guards) engaging Duryodhana: volleys of arrows, the killing of horses and charioteers, a transition to mace action, destruction of a chariot, Duryodhana’s remounting on another ratha, and the Pāñcāla leaders returning to pursue Arjuna—highlighting rapid tactical adaptation amid command objectives.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को रणभूमि का दृश्य सुनाते हैं—दुर्योधन स्वयं रथ बढ़ाकर कृष्ण-सारथी अर्जुन के सम्मुख आता है, मानो राजसिंह अपने भाग्य से भिड़ने चला हो। → दुर्योधन तीव्र बाण-वर्षा करता है; वह वासुदेव के वक्षस्थल को भी बाणों से बेधता और रथ के प्रतोद को काट गिराता है। अर्जुन शांत-चित्त होकर शिलाशित, सान-चढ़े बाणों से प्रत्युत्तर देता है; दोनों ओर से शस्त्र-प्रहारों की झड़ी लगती है। दुर्योधन के पक्ष के रथ, हाथी, घोड़े और पदाति-समूह धनंजय को घेरने दौड़ते हैं। → घेराबंदी के बीच अर्जुन अपने अस्त्र-वीर्य से कौरव-वरूथिनी को चीर देता है—शतशः रथ और द्विप गिरते हैं; पर साथ ही अस्त्र-प्रतिअस्त्र का उत्कर्ष दिखता है, जहाँ अश्वत्थामा ‘सर्वास्त्रधातक’ से अर्जुन के बाणों को काट देता है और युद्ध एक क्षण को भयावह तकनीकी शिखर पर पहुँचता है। → कृष्ण अर्जुन का धैर्य और गाण्डीव-बल जाँचते/उत्साह बढ़ाते हैं—‘पहले जैसा बल है न?’—और अर्जुन पुनः संगठित होकर शत्रु-समूह को पीछे ढकेलता है। दुर्योधन फिर भी विषधर-सदृश बाणों से कृष्ण-अर्जुन को घायल कर अपनी जिद और राजधर्म-हठ का परिचय देता है। → अस्त्र का पुनः प्रयोग स्वयं-विनाशक हो सकता है—यह चेतावनी (कि दो बार प्रयोग करने पर अस्त्र अपने ही पक्ष को मार डालेगा) अगले क्षणों में युद्ध को किस सीमा तक ले जाएगी, यह अनिश्चित रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३९ श्लोक हैं) ््ज-्अ ्ःः छा अकाल त्रयधिकशततमो<ध्याय: दुर्योधन और अर्जुनका युद्ध तथा दुर्योधनकी पराजय संजय उवाच एवमुकक्‍्त्वार्जुनं राजा त्रिभिमर्मातिगै: शरै: । अभ्यविध्यन्महावेगैश्षतुर्भि श्वतुरो हयान्‌

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! অর্জুনকে এ কথা বলে রাজা দুর্যোধন তিনটি অতিশয় দ্রুত, মর্মভেদী শর দিয়ে তাঁকে বিদ্ধ করল; আর আরও চারটি প্রবল বাণে অর্জুনের চারটি ঘোড়াকেও আহত করল।

Verse 2

वासुदेवं च दशभश्रि: प्रत्यविध्यत्‌ स्तनान्तरे | प्रतोद॑ चास्य भल्लेन छित्त्वा भूमावपातयत्‌,इसी प्रकार दस बाण मारकर उसने श्रीकृष्णकी भी छाती छेद डाली और एक भल्लसे उनके चाबुकको काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया

সে দশটি বাণে বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণের বক্ষদেশেও আঘাত করে তাঁকে বিদ্ধ করল; আর একটি ধারালো ভল্ল দিয়ে তাঁর চাবুক কেটে মাটিতে ফেলে দিল।

Verse 3

त॑ चतुर्दशभि: पार्थश्रित्रपुड्खै: शिलाशितै: । अविध्यत्‌ तूर्णमव्यग्रस्ते चा भ्रश्यन्त वर्मणि

তখন অবিচল ও দ্রুতগতিতে অর্জুন শিলায় শান দেওয়া বিচিত্র পালকযুক্ত চৌদ্দটি বাণ নিক্ষেপ করে তাকে বিদ্ধ করল; কিন্তু দुर্যোধনের বর্মে লেগে সেই বাণগুলি পিছলে পড়ে গেল।

Verse 4

तेषां नैष्फल्यमालोक्य पुनर्नव च पञ्च च । प्राहिणोन्निशितान्‌ बाणांस्ते चाभ्रश्यन्त वर्मण:,उन्हें निष्फल हुआ देख अर्जुनने पुनः चौदह तीखे बाण चलाये; परंतु वे भी कवचसे फिसल गये

সেগুলি নিষ্ফল হতে দেখে অর্জুন আবার নয় ও পাঁচ—অর্থাৎ চৌদ্দটি—তীক্ষ্ণ বাণ নিক্ষেপ করল; কিন্তু সেগুলিও বর্মে লেগে পিছলে পড়ে গেল।

Verse 5

अष्टाविंशांस्तु तान्‌ बाणानस्तान्‌ विप्रेक्ष्य निष्फलान्‌ । अब्रवीत्‌ परवीरघ्न: कृष्णो<र्जुनमिदं वच:

অর্জুনের নিক্ষিপ্ত সেই আটাশটি বাণ নিষ্ফল হতে দেখে শত্রুবীর-সংহারী শ্রীকৃষ্ণ অর্জুনকে এই কথা বললেন।

Verse 6

अदृष्टपूर्व पश्यामि शिलानामिव सर्पणम्‌ | त्वया सम्प्रेषिता: पार्थ नार्थ कुर्वन्ति पत्रिण:

“পার্থ! আজ আমি এমন এক দৃশ্য দেখছি যা আগে কখনও দেখিনি—যেন পাথরই সরে চলেছে। তোমার নিক্ষিপ্ত বাণগুলি কোনো কাজ সাধন করছে না।”

Verse 7

कच्चिद्‌ गाण्डीवज: प्राणस्तथैव भरतर्षभ । मुशिश्व ते यथापूर्व भुजयोश्व॒ बलं तव,“भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे गाण्डीव-धनुषकी शक्ति पहले-जैसी ही है न? तुम्हारी मुट्ठी एवं बाहुबल भी पूर्ववत्‌ हैं न?

“ভরতশ্রেষ্ঠ! তোমার গাণ্ডীবের শক্তি কি আগের মতোই আছে? তোমার মুষ্টির দৃঢ়তা ও বাহুবলও কি পূর্বের মতোই আছে?”

Verse 8

न वा कच्चिदयं काल: प्राप्त: स्यादद्य पश्चिम: । तव चैवास्य शत्रोश्व॒ तनन्‍्ममाचक्ष्व पृच्छत:,“आज तुम्हारी और तुम्हारे इस शत्रुकी अन्तिम भेंटका समय नहीं आया है क्या? मैं जो पूछता हूँ, उसका उत्तर दो

সঞ্জয় বললেন—“আজ কি তবে তোমার এবং তোমার এই শত্রুর জন্য শেষ ক্ষণ এসে গেছে? আমি যা জিজ্ঞাসা করছি, তার স্পষ্ট উত্তর দাও।”

Verse 9

विस्मयो मे महान्‌ पार्थ तव दृष्टवा शरानिमान्‌ | व्यर्थान्‌ निपतितान्‌ संख्ये दुर्योधनरथं प्रति

সঞ্জয় বললেন—“হে পার্থ! যুদ্ধে দুর্যোধনের রথের দিকে নিক্ষিপ্ত তোমার এই বাণগুলি নিষ্ফল হয়ে পড়ে যাচ্ছে—এ দেখে আমার মহা বিস্ময় হচ্ছে।”

Verse 10

वज्राशनिसमा घोरा: परकायावभेदिन: । शरा: कुर्वन्ति ते नार्थ पार्थ काद्य विडम्बना

সঞ্জয় বললেন—“হে পার্থ! বজ্র ও অশনির ন্যায় ভয়ংকর, শত্রুর দেহ বিদীর্ণকারী তোমার সেই বাণগুলি আজ কোনো কাজই করছে না—এ কেমন বিদ্রূপ?”

Verse 11

अर्जुन बोले--श्रीकृष्ण! मेरा तो यह विश्वास है कि दुर्योधनको द्रोणाचार्यने अभेद्य कवच बाँधकर उसमें यह अद्भुत शक्ति स्थापित कर दी है। यह कवचधारणा मेरे अस्त्रोंके लिये अभेद्य है

অর্জুন বললেন—“শ্রীকৃষ্ণ! আমার দৃঢ় বিশ্বাস, দ্রোণাচার্য দুর্যোধনের গায়ে অভেদ্য কবচ বেঁধে তাতে এক আশ্চর্য শক্তি প্রতিষ্ঠা করেছেন। সেই কবচ আমার অস্ত্রের কাছে অপ্রবেশ্য।”

Verse 12

अस्मिन्नन्तहितं कृष्ण त्रैलोक्यमपि वर्मणि । एको द्रोणो हि वेदैतदहं तस्माच्च सत्तमात्‌

অর্জুন বললেন—“হে কৃষ্ণ! এই কবচের ভিতরে ত্রিলোকের শক্তিও গোপন আছে। এই গূঢ় বিদ্যা একমাত্র দ্রোণই জানেন; আর সেই শ্রেষ্ঠ গুরুর কাছ থেকেই শিখে আমিও তা জেনেছি।”

Verse 13

अजुन उवाच द्रोणेनैषा मति: कृष्ण धार्तराष्ट्रे निवेशिता । अभेद्या हि ममास्त्राणामेषा कवचधारणा

অর্জুন বললেন—হে কৃষ্ণ! দ্রোণ এই কৌশল ধৃতরাষ্ট্র-পুত্রের মনে স্থাপন করেছেন। সে যে কবচ ধারণ করেছে, তা আমার অস্ত্রে ভেদ্য নয়। কোনোভাবেই বাণ দিয়ে এই কবচ ছিন্ন করা সম্ভব নয়; হে গোবিন্দ! যুদ্ধে স্বয়ং মঘবা ইন্দ্রও তাঁর বজ্র দিয়ে একে বিদীর্ণ করতে পারবেন না।

Verse 14

जानंस्त्वमपि वै कृष्ण मां विमोहयसे कथम्‌ । यद्‌ वृत्तं त्रिषु लोकेषु यच्च केशव वर्तते

অর্জুন বললেন—হে শ্রীকৃষ্ণ! সব জেনেও আপনি আমাকে মোহে কীভাবে ফেলছেন? হে কেশব! তিন লোকেতে যা ঘটেছে এবং যা ঘটছে—সবই আপনার জানা।

Verse 15

तथा भविष्यद्‌ यच्चैव तत्‌ सर्व विदितं तव । न व्विदं वेद वै कश्चिद्‌ यथा त्वं मधुसूदन

আর যা ভবিষ্যতে ঘটবে, তাও সব আপনার জানা। হে মধুসূদন! আপনি যেমন জানেন, তেমন আর কেউ জানে না।

Verse 16

एष दुर्योधन: कृष्ण द्रोणेन विहितामिमाम्‌ | तिष्ठत्यभीतवत्‌ संख्ये बिभ्रत्‌ कवचधारणाम्‌

অর্জুন বললেন—হে কৃষ্ণ! দ্রোণ কর্তৃক বিধিপূর্বক স্থাপিত এই কবচধারণ বহন করে দুর্যোধন যুদ্ধক্ষেত্রে যেন নির্ভয়ে দাঁড়িয়ে আছে।

Verse 17

यत्त्वत्र विहित॑ कार्य नैष तद्‌ वेत्ति माधव | स्त्रीवदेष बिभर्त्येतां युक्तां कवचधारणाम्‌

অর্জুন বললেন—হে মাধব! এই কবচ ধারণের সঙ্গে যে কর্তব্য বিধৃত, সে তা জানে না। যেমন নারী কেবল অলংকার পরে, তেমনই অন্যের দেওয়া এই সুসজ্জিত কবচধারণ সে বহন করছে।

Verse 18

पश्य बल्ोश्व मे वीर्य धनुषश्न जनार्दन । पराजयिष्ये कौरव्यं कवचेनापि रक्षितम्‌,जनार्दन! अब आप मेरी भुजाओं और धनुषका बल देखिये। मैं कवचसे सुरक्षित होनेपर भी दुर्योधनको पराजित कर दूँगा

অর্জুন বললেন— হে জনার্দন, আমার বাহুবল ও ধনুকের পরাক্রম দেখো। কবচে সুরক্ষিত থাকলেও আমি সেই কৌরব (দুর্যোধন)কে পরাজিত করব।

Verse 19

इदमड्िरसे प्रादाद्‌ देवेशो वर्म भास्वरम्‌ | तस्माद्‌ बृहस्पति: प्राप ततः प्राप पुरंदर:

অর্জুন বললেন— দেবেশ্বর এই দীপ্তিমান কবচ অঙ্গিরাকে দিয়েছিলেন। অঙ্গিরা থেকে বৃহস্পতির কাছে তা এল, আর বৃহস্পতি থেকে পুরন্দর (ইন্দ্র) তা লাভ করলেন।

Verse 20

पुनर्ददौ सुरपतिर्महां वर्म ससंग्रहम्‌ । दैवं यद्यस्य वर्मतद्‌ ब्रह्मणा वा स्वयं कृतम्‌

অর্জুন বললেন— তারপর দেবতাদের অধিপতি আবার সকল অংশে সম্পূর্ণ এক মহৎ কবচ দান করলেন। সেই কবচ ছিল দিব্য শক্তিসম্পন্ন—হয় স্বভাবতই দেবীয়, নয়তো স্বয়ং ব্রহ্মার নির্মিত।

Verse 21

संजय उवाच एवमुक्त्वार्जुनो बाणमभिमन्त्रय व्यकर्षयत्‌

সঞ্জয় বললেন— এ কথা বলে অর্জুন মন্ত্রপূত করে তীরকে অভিমন্ত্রিত করলেন এবং টেনে ধরলেন।

Verse 22

मानवास्त्रेण मानार्हस्ती क्ष्णावरण भेदिना । संजय कहते हैं--राजन! ऐसा कहकर माननीय अर्जुनने कठोर आवरणका भेदन करनेवाले मानवास्त्रसे अपने बाणोंको अभिमन्त्रित करके धनुषकी डोरीको खींचा ।।

সঞ্জয় বললেন— রাজন! এ কথা বলে মাননীয় অর্জুন কঠোর আবরণ ভেদকারী মানবাস্ত্র দ্বারা নিজের তীরসমূহ অভিমন্ত্রিত করে ধনুকের জ্যা টানলেন। টানতে টানতে ধনুকের মধ্যভাগে স্থিত শরগুলিও টানটান হয়ে উঠল।

Verse 23

तान्‌ निकृत्तानिषून्‌ दृष्टवा दूरतो ब्रह्म॒वादिना

সঞ্জয় বললেন—দূর থেকে নিহত ও নিথর হয়ে পড়ে থাকা সেই বীরদের দেখে ব্রহ্মবাক্য-ভাষী বর্ণনাকারী যুদ্ধের ভয়ংকর পরিণাম জানালেন।

Verse 24

न्यवेदयत्‌ केशवाय विस्मित: श्वेतवाहन: । ब्रह्मवादी अश्वत्थामाके द्वारा दूरसे ही काट दिये गये उन बाणोंको देखकर श्वेतवाहन अर्जुन चकित हो उठे और श्रीकृष्णको सूचित करते हुए बोले-- || २३ ई ।।

সঞ্জয় বললেন—শ্বেতবাহন অর্জুন বিস্মিত হয়ে কেশবকে জানালেন—“হে জনার্দন, এ অস্ত্র আমার দ্বারা দ্বিতীয়বার প্রয়োগ করা সম্ভব নয়।”

Verse 25

ततो दुर्योधन: कृष्णौ नवभिर्नवशभि: शरै:

সঞ্জয় বললেন—তখন দুর্যোধন নয়টি নয়টি শর দিয়ে সেই দুই কৃষ্ণকে বিদ্ধ করল।

Verse 26

भूय एवाभ्यवर्षच्च समरे कृष्णपाण्डवौ

সঞ্জয় বললেন—পুনরায় সে রণক্ষেত্রে শ্রীকৃষ্ণ ও পাণ্ডুপুত্র ধনঞ্জয়ের উপর ভয়ংকর শরবৃষ্টি বর্ষণ করল। তা দেখে তোমার সৈন্যরা অত্যন্ত আনন্দিত হলো; তারা বাদ্য বাজাতে লাগল এবং সিংহনাদ তুলল।

Verse 27

शरवर्षेण महता ततो<5हृष्पन्त तावका: । चक्रुर्वादित्रनिनदान्‌ सिंहनादरवांस्तथा

সঞ্জয় বললেন—সেই মহাশরবৃষ্টিতে তখন তোমার যোদ্ধারা উল্লসিত হলো। তারা বাদ্যের প্রবল ধ্বনি তুলল এবং তদ্রূপ সিংহনাদও করল।

Verse 28

ततः क्रुद्धो रणे पार्थ: सृक्किणी परिसंलिहन्‌ । नापश्यच्च ततोअस्याजूं यन्न स्याद्‌ वर्मरक्षितम्‌

তখন রণক্ষেত্রে ক্রুদ্ধ পার্থ (অর্জুন) মুখের কোণ চাটতে লাগলেন। তিনি প্রতিপক্ষের এমন কোনো অঙ্গ দেখলেন না যা বর্মে রক্ষিত নয়।

Verse 29

ततो<स्य निशितैर्बाणै: सुमुक्तैरन्‍्तकोपमै: । हयांश्वकार निर्देहानुभौ च पार्ष्णिसारथी

তারপর অর্জুন মৃত্যুসম ভয়ংকর, তীক্ষ্ণ ও সুপ্রক্ষেপিত বাণে দুর্যোধনের চারটি ঘোড়া এবং রথের পশ্চাৎরক্ষী দুজনকে আঘাত করে নিথর করে দিলেন।

Verse 30

धनुरस्याच्छिनत्‌ तूर्ण हस्तावापं च वीर्यवान्‌ । रथं च शकलीकर्तु सव्यसाची प्रचक्रमे,तत्पश्चात्‌ पराक्रमी सव्यसाची अर्जुनने तुरंत ही उसके धनुष और दस्तानेको काट दिया और रथको टूक-टूक करना आरम्भ किया

তারপর পরাক্রমী সব্যসাচী অর্জুন তৎক্ষণাৎ তার ধনুক ও হাতের রক্ষাকবচ কেটে দিলেন এবং রথটিকে খণ্ড খণ্ড করতে শুরু করলেন।

Verse 31

दुर्योधनं च बाणाभ्यां तीक्ष्णाभ्यां विरथीकृतम्‌ । आविषध्यद्धस्ततलयोरुभयोरर्जुनस्तदा

তখন অর্জুন দুইটি তীক্ষ্ণ বাণে দুর্যোধনকে রথহীন করলেন এবং সেই মুহূর্তে তার উভয় হাতের তালুও বিদ্ধ করলেন।

Verse 32

उस समय पार्थने रथहीन हुए दुर्योधनकी दोनों हथेलियोंमें दो पैने बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ।।

সেই সময় পার্থ রথহীন দুর্যোধনের উভয় তালুতে দুইটি ধারালো বাণে গভীর আঘাত করলেন। উপায়জ্ঞ কুন্তীপুত্র পরে তার নখের নীচের কোমল মাংসে বাণ বিদ্ধ করলেন; যন্ত্রণায় কাতর হয়ে দুর্যোধন যুদ্ধক্ষেত্র থেকে পলায়নে উদ্যত হল।

Verse 33

त॑ कृच्छामापदं प्राप्तं दृष्टयवा परमधन्विन: । समापेतु: परीप्सन्तो धनंजयशरार्दितम्‌,धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए दुर्योधनको भारी विपत्तिमें पड़ा हुआ देख श्रेष्ठ धनुर्धर योद्धा उसकी रक्षाके लिये आ पहुँचे

সঞ্জয় বললেন—ধনঞ্জয় (অর্জুন)-এর শরবিদ্ধ দুঃশাসনে দুঃখিত দুর্যোধনকে ভয়ংকর বিপদে পতিত দেখে শ্রেষ্ঠ ধনুর্ধররা তাকে রক্ষা ও উদ্ধার করতে ত্বরিত সেখানে সমবেত হল।

Verse 34

त॑ रथैर्बहुसाहस्रै: कल्पितै: कुञ्जरैहयै: । पदात्योघैश्व संरब्धै: परिवद्रुर्थन॑जयम्‌,उन्होंने कई हजार रथों, सजे-सजाये हाथियों, घोड़ों तथा रोषमें भरे हुए पैदल सैनिकोंद्वारा अर्जुनको चारों ओरसे घेर लिया

সঞ্জয় বললেন—তখন সহস্র সহস্র রথ, সুসজ্জিত গজ ও অশ্ব, এবং ক্রোধে উন্মত্ত পদাতিকদের ঢেউয়ের মতো স্রোত নিয়ে তারা ধেয়ে এসে ধনঞ্জয় (অর্জুন)-কে চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল।

Verse 35

अथ नार्जुनगोविन्दौ न रथो वा व्यदृश्यत | अस्त्रवर्षण महता जनौघैश्वापि संवृती,उस समय बड़ी भारी बाण-वर्षा और जनसमुदायसे घिरे हुए अर्जुन, श्रीकृष्ण और उनका रथ--इनमेैंसे कोई भी दिखायी नहीं देता था

সঞ্জয় বললেন—তখন প্রবল অস্ত্রবৃষ্টি ও যোদ্ধাদের স্রোতে আচ্ছন্ন থাকায় না অর্জুন-গোবিন্দ, না তাঁদের রথ—কোনোটিই দেখা যাচ্ছিল না।

Verse 36

ततोडर्जुनो<स्त्रवीर्येण निजघ्ने तां वरूथिनीम्‌ । तत्र व्यज्रीकृता: पेतु: शतशो<5थ रथद्विपा:

সঞ্জয় বললেন—তখন অর্জুন অস্ত্রশক্তির বীর্যে সেই সেনাবিন্যাসকে বিধ্বস্ত করতে লাগলেন। সেখানে অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ ভগ্ন হয়ে শত শত রথ ও গজ ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 37

ते हता हन्यमानाश्र न्यगृह्लंस्तं रथोत्तमम्‌ । स रथस्तम्भितस्तस्थौ क्रोशमात्रे समन्‍्तत:

সঞ্জয় বললেন—তারা নিহত ও নিহত হতে থাকলেও কৌরব সৈন্যরা সেই শ্রেষ্ঠ রথী অর্জুনকে রুদ্ধ করল। ফলে তাঁর রথ চারদিক থেকে ঘেরা অবস্থায় প্রায় এক ক্রোশ দূরত্বে স্থির হয়ে দাঁড়াল।

Verse 38

ततोर्जुनं वृष्णिवीरस्त्वरितो वाक्यमब्रवीत्‌ । भनुर्विस्फारयात्यर्थमहं ध्मास्यामि चाम्बुजम्‌,तब वृष्णिवीर श्रीकृष्णने तुरंत ही अर्जुनसे कहा--'तुम जोर-जोरसे धनुषको खींचो और मैं अपना शंख बजाऊँगा”

তখন ত্বরিত ভঙ্গিতে বৃষ্ণিবীর শ্রীকৃষ্ণ অর্জুনকে বললেন—“তুমি সম্পূর্ণ শক্তিতে ধনুক টান; আমি আমার শঙ্খ ধ্বনিত করব।”

Verse 39

ततो विस्फार्य बलवदू गाण्डीवं जध्निवान्‌ रिपून्‌ | महता शरवर्षेण तलशब्देन चार्जुन:

এ কথা শুনে অর্জুন প্রবল বেগে গাণ্ডীব টেনে ধরলেন এবং হাততালির তীক্ষ্ণ শব্দের সঙ্গে মহা তীরবৃষ্টি বর্ষণ করে শত্রুনিধন আরম্ভ করলেন।

Verse 40

पाञज्चजन्यं च बलवान्‌ दध्मौ तारेण केशव: । रजसा ध्वस्तपक्ष्मान्ता: प्रस्विन्ननदनो भूशम्‌

তখন বলবান কেশব তীক্ষ্ণ উচ্চ স্বরে পাঞ্চজন্য শঙ্খ বাজালেন। ধূলিতে তাঁর চোখের পাতার প্রান্ত মলিন হয়ে উঠেছিল, আর মুখমণ্ডলে ঘামের বিন্দু জমে ছিল।

Verse 41

(तेनाच्युतोष्ठयुगपूरितमारुतेन शंखान्तरोदरविवृद्धविनि:सृतेन । नादेन सासुरवियत्सुरलोकपाल- मुद्विग्नमीश्वर जगत्‌ स्फुटतीव सर्वम्‌ ।।

হে নরেশ্বর! অচ্যুতের দুই ওষ্ঠের মাঝে সঞ্চিত শ্বাস শঙ্খের গহ্বরে প্রবেশ করে, ভেতরে স্ফীত হয়ে যখন গম্ভীর নাদরূপে বাইরে বেরোল, তখন অসুরলোক, অন্তরীক্ষ, দেবলোক এবং দিক্‌পালসহ সমগ্র জগৎ ভয়ে উদ্বিগ্ন হয়ে যেন বিদীর্ণ হতে লাগল। সেই শঙ্খধ্বনি ও ধনুকের টংকারে বিচলিত হয়ে ভীরু ও সাহসী—উভয় প্রকার শত্রুসৈন্যই তখন ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 42

तैरविमुक्तो रथो रेजे वाय्वीरित इवाम्बुद: । जयद्रथस्य गोप्तारस्तत: क्षुब्धा: सहानुगा:

তাদের বেষ্টনী থেকে মুক্ত হয়ে অর্জুনের রথ বায়ুচালিত মেঘের মতো দীপ্ত হয়ে উঠল। তা দেখে জয়দ্রথের রক্ষকেরা অনুচরসহ বিচলিত ও ক্ষুব্ধ হয়ে উঠল।

Verse 43

ते दृष्टवा सहसा पार्थ गोप्तार: सैन्धवस्य तु । चक्कुर्नादान्‌ महेष्वासा: कम्पयन्तो वसुंधराम्‌

হঠাৎ অর্জুনকে দেখে জয়দ্রথের রক্ষায় নিযুক্ত মহাধনুর্ধর বীরেরা পৃথিবী কাঁপিয়ে প্রবল যুদ্ধনাদ তুলল।

Verse 44

बाणशब्दरवांश्रोग्रान्‌ विमिश्रान शड्खनिःस्वनै: । प्रादुश्चक्रुमहात्मान: सिंहनादरवानपि,उन महामनस्वी वीरोंने शंखध्वनिसे मिले हुए बाणजनित भयंकर शब्दों और सिंहनादको भी प्रकट किया

সেই মহাত্মা বীরেরা শঙ্খধ্বনির সঙ্গে মিশে থাকা তীরের ভয়ংকর গর্জন তুলল, আর সিংহনাদের মতো বজ্রনিনাদও ছড়িয়ে দিল।

Verse 45

त॑ श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां समुत्थितम्‌ | प्रदध्मतु: शड्खवरौ वासुदेवधनंजयौ,आपके सैनिकोंद्वारा किये हुए उस भयंकर कोलाहलको सुनकर श्रीकृष्ण और अर्जुनने अपने श्रेष्ठ शंखोंको बजाया

তোমাদের সৈন্যদের তোলা সেই ভয়ংকর কোলাহল শুনে বাসুদেব কৃষ্ণ ও ধনঞ্জয় অর্জুন তাঁদের শ্রেষ্ঠ শঙ্খ দু’টি ফুঁকলেন।

Verse 46

तेन शब्देन महता पूरितेयं वसुंधरा । सशैला सार्णवद्वीपा सपाताला विशाम्पते,प्रजानाथ! उस महान्‌ शब्दसे पर्वत, समुद्र, द्वीप और पातालसहित यह सारी पृथ्वी गूँज उठी

হে প্রজাপতি! সেই মহাশব্দে পর্বত, সমুদ্র, দ্বীপ এবং পাতালসহ সমগ্র পৃথিবী প্রতিধ্বনিত হয়ে উঠল।

Verse 47

स शब्दो भरतश्रेष्ठ व्याप्य सर्वा दिशो दश । प्रतिसस्वान तत्रैव कुरुपाण्डवयोर्बले

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেই শব্দ দশ দিক জুড়ে ছড়িয়ে পড়ে, সেখানেই কুরু ও পাণ্ডব সেনাদ্বয়ের মধ্যে বারবার প্রতিধ্বনিত হতে লাগল।

Verse 48

भरतश्रेष्ठ)] वह शब्द सम्पूर्ण दसों दिशाओंमें व्याप्त होकर वहीं कौरव-पाण्डव सेनाओंमें प्रतिध्वनित होता रहा ।। तावका रथिनस्तत्र दृष्टवा कृष्णधनंजयौ । सम्भ्रमं परमं प्राप्तास्त्वरमाणा महारथा:

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেই ধ্বনি দশ দিক জুড়ে ছড়িয়ে পড়ে কৌরব-পাণ্ডব সেনাদ্বয়ের মধ্যেই প্রতিধ্বনিত হতে লাগল। সেখানে কৃষ্ণ ও ধনঞ্জয়কে দেখে তোমাদের রথী-মহারথীরা চরম আতঙ্কে বিহ্বল হয়ে তাড়াহুড়ো করে অগ্রসর হল।

Verse 49

आपके रथी और महारथी वहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुनको उपस्थित देख बड़े भारी उद्वेगमें पड़कर उतावले हो उठे ।।

তখন তোমাদের যোদ্ধারা বর্মধারী মহাভাগ্যবান কৃষ্ণ ও অর্জুনকে সেখানে উপস্থিত দেখে ক্রুদ্ধ হয়ে তাঁদের দিকে ধেয়ে গেল। সে দৃশ্য যেন বিস্ময়করই মনে হল।

Verse 102

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनवचनविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে দুর্যোধনের বাক্যবিষয়ক একশো দ্বিতীয় অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 103

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनपराजये त्रयधिकशततमो<ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে জয়দ্রথবধপর্বের অন্তর্গত দুর্যোধন-পরাজয় বিষয়ক একশো তৃতীয় অধ্যায় সমাপ্ত।

Verse 203

नैनं गोप्स्यति दुर्बुद्धिमद्य बाणहतं मया । फिर देवराज इन्द्रने विधि एवं रहस्यसहित वह कवच मुझे प्रदान किया। यदि दुर्योधनका यह कवच देवताओंद्वारा निर्मित हो अथवा स्वयं ब्रह्माजीका बनाया हुआ हो तो भी आज मेरे बाणोंद्वारा मारे गये इस दुर्बुद्धि दुर्योधनको यह बचा नहीं सकेगा

অর্জুন বললেন— আজ আমার বাণে বিদ্ধ হয়ে এই দুর্বুদ্ধি দুর্যোধনকে কোনো রক্ষা করতে পারবে না। ইন্দ্র যদি গোপন বিধানে এই কবচ দান করে থাকেন, কিংবা দেবতারা নির্মাণ করে থাকেন, অথবা স্বয়ং ব্রহ্মা গড়ে থাকেন—তবু আজ আমার শরাঘাতে পতিত দুর্যোধনকে তা রক্ষা করতে সক্ষম হবে না।

Verse 226

तानस्यास्त्रेण चिच्छेद दौणि: सर्वास्त्रधातिना । धनुषके बीचमें रखकर अर्जुनके द्वारा खींचे जानेवाले उन बाणोंको अभ्वत्थामाने सर्वस्त्रधातक अस्त्रके द्वारा काट डाला

তখন দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা ‘সর্বাস্ত্রধাতিন’ অস্ত্র প্রয়োগ করে, ধনুকে স্থির রেখে অর্জুনের ছোড়া সেই তীরগুলিকে মাঝপথেই ছিন্ন করে দিল।

Verse 246

अस्त्र मामेव हन्याद्धि हन्याच्चापि बल॑ मम । “जनार्दन! इस अस्त्रका मैं दो बार प्रयोग नहीं कर सकता; क्योंकि ऐसा करनेपर यह मुझे ही मार डालेगा और मेरी सेनाका भी संहार कर देगा'

এই অস্ত্রটি আমাকেই আঘাত করবে এবং আমার বাহিনীকেও ধ্বংস করবে। অতএব, হে জনার্দন, আমি এটিকে দ্বিতীয়বার প্রয়োগ করতে পারি না; কারণ তা করলে এটি প্রত্যাঘাত হয়ে আমার পক্ষেরই সর্বনাশ ঘটাবে।

Verse 253

अविध्यत रणे राजन्‌ शरैराशीविषोपमै: । राजन्‌! इसी समय दुर्योधनने रणक्षेत्रमें विषधर सर्पके समान भयंकर नौ-नौ बाणोंसे श्रीकृष्ण और अर्जुनको घायल कर दिया

রাজন, রণক্ষেত্রে সে বিষধর সাপের মতো ভয়ংকর তীরে বিদ্ধ করল। সেই মুহূর্তে দুর্যোধন যুদ্ধে শ্রীকৃষ্ণ ও অর্জুনকে নয়-নয়টি ভয়াল শরে আহত করল।

Frequently Asked Questions

The dilemma is the conflict between reputation and responsibility: Duryodhana interprets breakthrough as Droṇa’s failure, while Droṇa argues that dharma in command requires triage—accepting partial losses to prevent a catastrophic objective (Jayadratha’s fall).

Under high uncertainty, ethical action often takes the form of disciplined prioritization: define the decisive stake, allocate roles, and act promptly, while recognizing that outcomes (jaya/ajaya) remain contingent.

No explicit phalaśruti appears here; the meta-commentary operates indirectly through Droṇa’s dice-wager analogy, emphasizing interpretive awareness of how prior actions and policies shape present consequences.

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