Mahabharata Adhyaya 116
Bhishma ParvaAdhyaya 11662 Versesभीम के प्रचण्ड प्रतिरोध और पाण्डव-भाइयों के एकत्र होने से कौरव-पक्ष की विजय-आशा डगमगाती; पलड़ा पाण्डवों की ओर झुकता है।

Adhyaya 116

भीष्मस्य जलप्रार्थना — अर्जुनस्य पर्जन्यास्त्रप्रयोगः — दुर्योधनं प्रति सन्ध्युपदेशः (Bhīṣma’s request for water; Arjuna’s Parjanya-astra; counsel to Duryodhana on reconciliation)

Upa-parva: Śaraśayyā-upāsanā (Bhīṣma on the arrow-bed) Episode

Sañjaya reports that, at dawn, rulers from both camps approach Bhīṣma lying on the vīra-śayana (arrow-bed). A large assembly forms, including women, elders, and performers, indicating a pause in direct hostilities and a shift to public witnessing of Bhīṣma’s condition. Bhīṣma, enduring pain with composure, asks for water, but declines ordinary refreshments, stating he awaits an appointed time and cannot partake in human enjoyments while on the arrow-bed. He calls Arjuna forward and requests a cooling stream, asserting Arjuna’s capability to provide water by proper means. Arjuna mounts his chariot, draws the Gāṇḍīva, and—before all—invokes the Parjanya-astra, striking the earth near Bhīṣma so that a pure, cool, fragrant stream rises; Bhīṣma is refreshed and the assembly expresses astonishment. Bhīṣma interprets the act as consistent with Arjuna’s known mastery (and the enabling support of Vāsudeva), then turns to Duryodhana: he states that counsel from multiple advisors had been ignored, warns of destructive outcomes, and urges a negotiated settlement while time remains. He recommends restoring a share of sovereignty to the Pāṇḍavas (including Indraprastha under Yudhiṣṭhira), abandoning anger, and prioritizing peace and kinship concord, concluding with a sober, archival tone as he restrains his own suffering and falls silent.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को बताता है कि कौरव-पक्ष के दस प्रमुख महारथी—विविध देशों से आई विशाल सेना के साथ—भीमसेन को घेरकर यश की कामना से रण में उतरते हैं। → चित्रसेन, विकर्ण, दुर्मर्षण आदि के साथ भगदत्त, कृपाचार्य, शल्य, कृतवर्मा और अन्य महारथी एक साथ भीम पर टूट पड़ते हैं; भीम अकेले ही उन ‘सर्वलोक-प्रवीर’ रथियों को पृथक्-पृथक् लक्ष्य कर काटने लगता है, जिससे कौरव-सेना में घबराहट फैलती है। → शल्य भीम के विक्रम को सह नहीं पाता और तीक्ष्ण बाणों से प्रहार बढ़ाता है; प्रत्युत्तर में भीम लोहे के बाणों से रथों को बेधता, अस्त्रों को छिन्न-भिन्न करता और भगदत्त की प्रेरित शक्ति/शक्ति-प्रहार को भी रण में सहसा काट देता है—भीम का प्रतिरोध कौरवों की संयुक्त धुरी को तोड़ देता है। → भीम शत्रुओं का संहार करते हुए आगे बढ़ता है; अंततः जब पाण्डव-पक्ष के दो महाबली भाई (भीम और उसका सहायक/अन्य पाण्डव बन्धु) एकत्र दिखाई देते हैं, कौरव-श्रेष्ठ पुरुष वहीं विजय की आशा छोड़ देते हैं और युद्ध का पलड़ा पाण्डवों की ओर झुकता है। → भीम के उभार से कौरव-पक्ष की पंक्तियाँ डगमगाती हैं—अब प्रश्न यह है कि भीष्म/कौरव-सेनापति इस टूटती आशा को कैसे संभालेंगे।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ ६ श्लोक मिलाकर कुल ४२ ६ “लोक हैं।] भीसस्न्प्नास्े | नी नत्च्ज्स त्रयोदशाधिकशततमो< ध्याय: कौरवपक्षके दस प्रमुख महारथियोंके साथ अकेले घोर युद्ध करते हुए भीमसेनका अद्भुत पराक्रम संजय उवाच भगदत्त: कृप: शल्य: कृतवर्मा तथैव च | विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्धवश्च जयद्रथ:

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! ভগদত্ত, কৃপ, শল্য, কৃতবর্মা; অবন্তীর রাজপুত্র বিন্দ ও অনুবিন্দ; এবং সিন্ধুর অধিপতি জয়দ্রথ—এই প্রধান মহারথীরা কৌরবপক্ষে সজ্জিত হয়ে রণক্ষেত্রে ভীমসেনকে চারদিক থেকে চেপে ধরেছিল।

Verse 2

चित्रसेनो विकर्णश्व तथा दुर्मर्षणादय: । दशैते तावका योधा भीमसेनमयोधयन्‌

চিত্রসেন, বিকর্ণ এবং দুর্মর্ষণ প্রমুখ—তোমাদের এই দশ যোদ্ধা ভীমসেনের সঙ্গে যুদ্ধ করছিল।

Verse 3

महत्या सेनया युक्ता नानादेशसमुत्थया । भीष्मस्य समरे राजन्‌ प्रार्थयाना महद्‌ यश:,नरेश्वर! इनके साथ अनेक देशोंसे आयी हुई विशाल सेना मौजूद थी। ये समरभूमिमें भीष्मके महान्‌ यशकी रक्षा करना चाहते थे

হে নরেশ্বর! তাদের সঙ্গে নানা দেশ থেকে আগত এক বিশাল সেনাবাহিনীও ছিল। হে রাজন, সেই সমরে তারা ভীষ্মের মহৎ যশ রক্ষা করতে চেয়েছিল।

Verse 4

शल्यस्तु नवभिर्बाणैर्भीमसेनमताडयत्‌ । कृतवर्मा त्रिभिर्बाणै: कृपश्च नवशभि: शरै:,शल्यने नौ बाणोंसे भीमसेनको गहरी चोट पहुँचायी। फिर कृतवर्मने तीन और कृपाचार्यने उन्हें नौ बाण मारे

শল্য নয়টি বাণে ভীমসেনকে আঘাত করল। তারপর কৃতবর্মা তিনটি বাণে এবং কৃপ নয়টি শর দিয়ে তাকে বিদ্ধ করল।

Verse 5

चित्रसेनो विकर्णश्षु भगदत्तक्ष मारिष | दशभिर्दशभिर्बाणैरभीमसेनमताडयन्‌

হে মারিষ! চিত্রসেন, বিকর্ণ এবং ভগদত্ত—এই তিনজনই ভীমসেনকে দশ-দশটি বাণে আঘাত করল।

Verse 6

आर्य! फिर लगे हाथ चित्रसेन, विकर्ण और भगदत्तने भी दस-दस बाण मारकर भीमसेनको घायल कर दिया ।। सैन्धवश्न त्रिभि्बाणिर्भीमसेनमताडयत्‌ | विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पञठ्चभि: पठ्चभि: शरै:

সঞ্জয় বললেন—সৈন্ধব (জয়দ্রথ) তিনটি শর দিয়ে ভীমসেনকে আঘাত করল। আর অবন্তির রাজপুত্র বিন্দ ও অনুবিন্দ ভীমকে পাঁচ-পাঁচটি শর দিয়ে বিদ্ধ করল॥

Verse 7

स तान्‌ सर्वान्‌ महाराज राजमानान्‌ पृथक्‌ पृथक्‌

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! তখন শত্রুবীর-সংহারী পাণ্ডুপুত্র মহাবলী ভীমসেন সেই সকল দীপ্তিমান রাজা, প্রধান যোদ্ধা এবং আপনার মহারথী পুত্রদের একে একে শর নিক্ষেপ করে রণক্ষেত্রে আহত করল॥

Verse 8

प्रवीरान्‌ सर्वलोकस्य धार्तराष्ट्रानू महारथान्‌ । जघान समरे वीर: पाण्डव: परवीरहा

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! পরবীরহা পাণ্ডব বীর ভীমসেন সমরে সর্বলোকের প্রধান বীরদের এবং আপনার ধৃতরাষ্ট্রীয় মহারথীদের শরাঘাতে আঘাত করল॥

Verse 9

सप्तभि: शल्यमाविध्यत्‌ कृतवर्माणमष्टभि: । कृपस्य सशरं चाप॑ मध्ये चिच्छेद भारत,भारत! भीमसेनने शल्यको सात और कृतवर्माको आठ बाणोंसे बींध डाला। फिर कृपाचार्यके बाणसहित धनुषको बीचसे ही काट दिया

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! ভীমসেন শল্যকে সাতটি এবং কৃতবর্মাকে আটটি শর দিয়ে বিদ্ধ করল। তারপর কৃপের ধনুককে—তাতে স্থাপিত শরসহ—মাঝখান থেকে কেটে দিল॥

Verse 10

अथैनं छिन्नथन्वानं पुनर्विव्याध सप्तभि: । विन्दानुविन्दौ च तथा त्रिभिस्त्रिेभिरताडयत्‌,धनुष कट जानेपर उन्होंने पुन: सात बाणोंसे कृपाचार्यको घायल किया। फिर विन्द और अनुविन्दको तीन-तीन बाण मारे

সঞ্জয় বললেন—ধনুক ছিন্ন হওয়ার পরও ভীমসেন কৃপকে আবার সাতটি শর দিয়ে বিদ্ধ করল। আর তদ্রূপ বিন্দ ও অনুবিন্দকে তিন-তিনটি শর দিয়ে আঘাত করল॥

Verse 11

दुर्मर्षणं च विंशत्या चित्रसेनं च पञठचभि: । विकर्ण दशभिर्बाणै: पञ्चभिश्न जयद्रथम्‌

সঞ্জয় বললেন—তিনি দুর্মর্ষণকে বিশটি বাণে, চিত্রসেনকে পাঁচটি বাণে, বিকর্ণকে দশটি বাণে এবং জয়দ্রথকে পাঁচটি বাণে বিদ্ধ করলেন।

Verse 12

अथान्यद्‌ धनुरादाय गौतमो रथिनां वर:

তখন রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ গৌতম আরেকটি ধনুক তুলে নিলেন।

Verse 13

स विद्धों दशभिरणिस्तोत्रैरिव महाद्विप:

দশটি বাণে বিদ্ধ হয়ে সেই বীর সমরে এমন গর্জে উঠল, যেন তীক্ষ্ণ অঙ্কুশে বিদ্ধ মহাগজ; আর রণমুখে সিংহের মতো নিনাদ করল।

Verse 14

ततः क्रुद्धो महाराज भीमसेन: प्रतापवान्‌ । गौतमं ताडयामास शरैरबहुभिराहवे,महाराज! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीमसेनने रणक्षेत्रमें कृपाचार्यको अनेक बाणोंद्वारा घायल किया

তখন, মহারাজ, ক্রোধে দগ্ধ প্রতাপী ভীমসেন রণক্ষেত্রে গৌতমকে বহু বাণে আঘাত করলেন।

Verse 15

सैन्धवस्य तथाश्रांश्व॒ सारथिं च त्रिभि: शरै: | प्राहिणोन्मृत्युलोकाय कालान्तकसमद्युति:

তারপর প্রলয়ান্তক যমের ন্যায় দীপ্তিমান ভীমসেন তিনটি বাণে সৈন্ধব জয়দ্রথের অশ্বসমূহ ও সারথিকে মৃত্যুলোকে প্রেরণ করলেন।

Verse 16

हताश्चात्‌ तु रथात्‌ तूर्णमवप्लुत्य महारथ: । शरांक्षिक्षेप निशितान्‌ भीमसेनस्य संयुगे,तब उस अश्वहीन रथसे तुरंत ही कूदकर महारथी जयद्रथने युद्धस्थलमें भीमसेनके ऊपर बहुत-से तीखे बाण चलाये

তখন হতাশ হয়ে সেই মহারথী রথ থেকে দ্রুত লাফিয়ে নেমে যুদ্ধে ভীমসেনের উপর বহু তীক্ষ্ণ শর নিক্ষেপ করল।

Verse 17

तस्य भीमो भधर्नुर्मध्ये द्वाभ्यां चिच्छेद मारिष । भल्लाभ्यां भरतश्रेष्ठ सैन्धवस्य महात्मन:,माननीय भरतश्रेष्ठ; उस समय भीमसेनने दो भल्ल मारकर महामना सिन्धुराजके धनुषको बीचसे ही काट दिया

তখন, হে শ্রদ্ধেয় ভারতশ্রেষ্ঠ, ভীম দুইটি ভল্লশরে মহাত্মা সৈন্ধবের ধনুকটি মাঝখান থেকে কেটে দিল।

Verse 18

स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथि: । चित्रसेनरथं राजन्नारुरोह त्वरान्वित:,राजन! धनुषके कटने तथा घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुआ जयद्रथ तुरंत ही चित्रसेनके रथपर जा बैठा

হে রাজন, ধনুক ছিন্ন, অশ্ব নিহত ও সারথি নিহত হওয়ায় রথহীন জয়দ্রথ তৎক্ষণাৎ ত্বরিত হয়ে চিত্রসেনের রথে উঠে বসল।

Verse 19

अत्यद्भुतं रणे कर्म कृतवांस्तत्र पाण्डव: | महारथा>शरैरविंद्ध्वा वारयित्वा च मारिष

হে মারিষ, সেখানে পাণ্ডব রণে এক অতিশয় আশ্চর্য কীর্তি করল; সে শর দ্বারা মহারথীদের বিদ্ধ করে তাদের অগ্রগতি রোধ করল।

Verse 20

तदा न ममृषे शल्यो भीमसेनस्य विक्रमम्‌,उस समय राजा शल्य भीमसेनके उस पराक्रमको न सह सके। उन्होंने लोहारके माँजे हुए पैने बाणोंका संधान करके समरभूमिमें भीमसेनको बींध डाला और कहा--'खड़ा रह, खड़ा रह”

তখন রাজা শল্য ভীমসেনের সেই বিক্রম সহ্য করতে পারলেন না। লোহারির মতো শান দেওয়া তীক্ষ্ণ শর সংধান করে তিনি রণক্ষেত্রে ভীমকে বিদ্ধ করলেন এবং চিৎকার করে বললেন—“দাঁড়া, দাঁড়া!”

Verse 21

स संधाय शरांस्तीक्ष्णान्‌ कर्मारपरिमार्जितान्‌ । भीम॑ विव्याध समरे तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्‌

ভীমের পরাক্রম সহ্য করতে না পেরে রাজা শল্য কামারের ঘষে-তোলা তীক্ষ্ণ শর সংযোজিত করে রণক্ষেত্রে ভীমকে বিদ্ধ করলেন। তারপর তিনি উচ্চারণ করলেন— “থাম, থাম!”

Verse 22

कृपश्च कृतवर्मा च भगदत्तश्न वीर्यवान्‌ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ चित्रसेनश्व॒ संयुगे

সেই যুদ্ধে কৃপ, কৃতবর্মা, পরাক্রমী ভাগদত্ত, অবন্তীর বিন্দ ও অনুবিন্দ এবং চিত্রসেন—এরা সকলে একত্র হয়ে শল্যের রক্ষার্থে তৎক্ষণাৎ ভীমের উপর শরবৃষ্টি করল।

Verse 23

दुर्मर्षणो विकर्णश्व॒ सिन्धुराजश्व वीर्यवान्‌ । भीम॑ ते विव्यधुस्तूर्ण शल्यहेतोररिंदमा:

তারপর দুর্মর্ষণ, বিকর্ণ এবং পরাক্রমী সিন্ধুরাজ (জয়দ্রথ)—এই শত্রুদমন বীরেরা শল্যের কারণে দ্রুত ভীমকে বিদ্ধ করল।

Verse 24

सच तान्‌ प्रतिविव्याध पठ्चभि: पज्चभि: शरै: । शल्यं विव्याध सप्तत्या पुनश्न दशभि: शरै:

তখন ভীমও তাদের প্রত্যেককে পাঁচটি করে শর দিয়ে প্রতিবিদ্ধ করল। এরপর সে শল্যকে সত্তরটি শর দিয়ে এবং আবার দশটি শর দিয়ে বিদ্ধ করল।

Verse 25

तं॑ शल्यो नवभिर्भित्त्वा पुनर्विव्याध पठ्चभि: । सारथिं चास्य भल्लेन गाढं विव्याध मर्मणि

এ দেখে শল্য ভীমকে প্রথমে নয়টি শর দিয়ে বিদীর্ণ করল, তারপর আবার পাঁচটি শর দিয়ে আঘাত করল। আর একটি ভল্ল-শর দিয়ে তার সারথিকে মর্মস্থানে গভীরভাবে বিদ্ধ করল।

Verse 26

विशोक प्रेक्ष्य निर्भिन्नं भीमसेन: प्रतापवान्‌ । मद्रराजं त्रिभिर्बाणैर्बाह्लोरुगसि चार्पयत्‌

সঞ্জয় বললেন—নিজ সারথি বিশোককে ভীষণভাবে আহত দেখে পরাক্রমী ভীমসেন ক্রোধে উদ্দীপ্ত হয়ে মদ্ররাজ শল্যের দিকে তিনটি বাণ নিক্ষেপ করলেন; সেগুলি তার বাহু ও বক্ষে গিয়ে বিদ্ধ হল।

Verse 27

(भगदत्तं तथा वीरं कृतवर्माणमाहवे ।) तथेतरान्‌ महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिद्दागै: । ताडयामास समरे सिंहवद्‌ विननाद च

তারপর তিনি রণক্ষেত্রে ভগদত্ত, বীর কৃতবর্মা এবং অন্যান্য মহাধনুর্ধরদের তিন-তিনটি সোজা ধাবমান বাণে আঘাত করলেন; আর সিংহের মতো গর্জে উঠলেন।

Verse 28

ते हि यत्ता महेष्वासा: पाण्डवं युद्धकोविदम्‌ | त्रिभिस्त्रिभिरकुण्ठाग्रैर्भृशं मर्मस्वताडयन्‌

লক্ষ্যে স্থির সেই মহাধনুর্ধররা যুদ্ধবিদ্যায় পারদর্শী পাণ্ডবকে তিন-তিনটি ধারালো অগ্রভাগের বাণে বারবার তার মর্মস্থানে প্রচণ্ডভাবে আঘাত করতে লাগল।

Verse 29

तब उन सभी महाथनुर्धरोंने एक साथ प्रयत्न करके तीखे अग्रभागवाले तीन-तीन बाणोंद्वारा युद्धकुशल पाण्डुपुत्र भीमके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ।।

তখন সেই সকল মহাধনুর্ধর একযোগে উদ্যোগ করে যুদ্ধকুশলী পাণ্ডুপুত্র ভীমকে তীক্ষ্ণ অগ্রভাগের তিন-তিনটি বাণে তার মর্মস্থানে গভীরভাবে বিদ্ধ করল। কিন্তু অতিশয় বিদ্ধ হয়েও মহাধনুর্ধর ভীমসেন বিচলিত হলেন না; বর্ষণকারী মেঘের জলধারায় যেমন পর্বত অচল থাকে, তেমনই তিনি স্থির রইলেন।

Verse 30

स तु क्रोधसमाविष्ट: पाण्डवानां महारथ: । मद्रेश्वरं त्रिभिर्बाणिर्भुशं विदूध्वा महायशा:

রাজন, তখন ক্রোধে আচ্ছন্ন পাণ্ডবদের মহারথী মহাযশস্বী ভীমসেন মদ্রেশ্বর শল্যকে তিনটি বাণে প্রচণ্ডভাবে বিদ্ধ করলেন।

Verse 31

कृपं च नवभिर्बाणैर्भृशं विद्ध्वा समन्तत: । प्राग्ज्योतिषं शतैराजी राजन्‌ विव्याध सायकै:

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! ক্রোধে উদ্দীপ্ত পাণ্ডবদের মহারথী মহাযশস্বী ভীমসেন কৃপাচার্যকে নয়টি বাণে চারদিক থেকে ভীষণভাবে বিদ্ধ করে, তারপর রণক্ষেত্রে প্রাগ্জ্যোতিষের অধিপতি ভগদত্তকে শত শত শর দ্বারা আঘাত করলেন।

Verse 32

ततस्तु सशरं चाप॑ सात्वतस्य महात्मन: । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन चिच्छेद कृतहस्तवत्‌,तत्पश्चात्‌ सिद्धहस्त पुरुषकी भाँति भीमसेनने अत्यन्त तीखे क्षुरप्रके द्वारा महामना कृतवर्माके बाणसहित धनुषको काट डाला

সঞ্জয় বললেন—তারপর ভীমসেন সিদ্ধহস্ত যোদ্ধার মতো অতিশয় তীক্ষ্ণ ক্ষুরপ্র অগ্রবাণে মহাত্মা সাত্বত কৃতবর্মার ধনুকটি বাণসহ কেটে ফেললেন।

Verse 33

तथान्यद्‌ धनुरादाय कृतवर्मा वृकोदरम्‌ | आजयपघान भ्रुवोर्मध्ये नाराचेन परंतप:,तब शत्रुओंको संताप देनेवाले कृतवर्माने दूसरा धनुष लेकर भीमसेनकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें नाराचके द्वारा प्रहार किया

সঞ্জয় বললেন—তখন পরন্তপ কৃতবর্মা আরেকটি ধনুক তুলে নিয়ে রণক্ষেত্রে বৃকোদর ভীমকে দুই ভ্রুর মধ্যস্থলে নারাচ বাণে আঘাত করলেন।

Verse 34

भीमस्तु समरे विद्ध्वा शल्यं नवभिरायसै: । भगदत्तं त्रिभिश्वैव कृतवर्माणमष्टभि:

সঞ্জয় বললেন—তারপর ভীমসেন রণক্ষেত্রে লৌহদণ্ডযুক্ত নয়টি বাণে রাজা শল্যকে বিদ্ধ করলেন; তিন বাণে ভগদত্তকে এবং আট বাণে কৃতবর্মাকে আঘাত করলেন; আর কৃপ প্রমুখ রথীদের প্রত্যেককে দুই দুই বাণে বিদ্ধ করলেন।

Verse 35

द्वाभ्यां द्वाभ्यां तु विव्याध गौतमप्रभृतीन्‌ रथान्‌ । तेडपि तं समरे राजन विव्यधुर्निशितै: शरै:

সঞ্জয় বললেন—ভীমসেন গৌতম প্রমুখ রথীদের প্রত্যেককে দুই দুই বাণে বিদ্ধ করলেন। হে রাজন, তারাও সেই যুদ্ধে তীক্ষ্ণ শর দিয়ে ভীমকে পাল্টা বিদ্ধ করল।

Verse 36

स तथा पीड्यमानोड<पि सर्वशस्त्रैर्महारथै: । मत्वा तृणेन तांस्तुल्यान्‌ विचचार गतव्यथ:

মহারথীদের নিক্ষিপ্ত নানাবিধ অস্ত্রশস্ত্রে পীড়িত হয়েও ভীমসেন তাদের তৃণসম জ্ঞান করে, ব্যথাহীন চিত্তে অবিচলভাবে বিচরণ করতে লাগলেন।

Verse 37

ते चापि रथिनां श्रेष्ठा भीमाय निशिताउ्छरान्‌ । प्रेषयामासुरव्यग्रा: शतशो5थ सहस्रश:,रथियोंमें श्रेष्ठ उन वीरोंने भी व्यग्रतारहित हो भीमसेनपर सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें तीखे बाण चलाये

রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সেই বীরেরাও অবিচল থেকে ভীমসেনের দিকে ধারালো শর নিক্ষেপ করতে লাগল—প্রথমে শত শত, তারপর সহস্র সহস্র।

Verse 38

तस्य शक्ति महावेगां भगदत्तो महारथ: । चिक्षेप समरे वीर: स्वर्णदण्डां महामते,महामते! उस समरभूमिमें वीर महारथी भगदत्तने भीमसेनपर स्वर्णमय दण्डसे विभूषित एक महावेगशालिनी शक्ति चलायी

হে মহামতে! সেই সমরে বীর মহারথী ভগদত্ত স্বর্ণদণ্ডে ভূষিত মহাবেগশালী শক্তি ভীমসেনের দিকে নিক্ষেপ করল।

Verse 39

तोमरं सैन्धवो राजा पट्टिशं च महाभुज: । शतघ्नीं च कृपो राजज्छरं शल्यश्व संयुगे

সিন্ধুরাজ মহাবাহু জয়দ্রথ তোমর ও পট্টিশ নিক্ষেপ করল। হে রাজন! কৃপ শতঘ্নী প্রয়োগ করলেন, আর রাজা শল্য যুদ্ধক্ষেত্রে একটি শর ছুঁড়লেন।

Verse 40

अथेतरे महेष्वासा: पठडच पञ्च शिलीमुखान्‌ | भीमसेनं समुद्दिश्य प्रेषयामासुरोजसा,इनके सिवा दूसरे धनुर्धर वीरोंने भी भीमसेनको लक्ष्य करके बलपूर्वक पाँच-पाँच बाण चलाये

এরপর অন্যান্য মহাধনুর্ধররাও ভীমসেনকে লক্ষ্য করে প্রবল বেগে প্রত্যেকে পাঁচটি করে শিলীমুখ নিক্ষেপ করল।

Verse 41

तोमरं च द्विधा चक्रे क्षुरप्रेणानिलात्मज: । पट्टिशं च त्रिभि्णिश्विच्छेद तिलकाण्डवत्‌

সঞ্জয় বললেন—বায়ুপুত্র ভীমসেন ক্ষুরপ্র-শরে তোমরটিকে দ্বিখণ্ডিত করলেন। তারপর তিনটি বাণে পট্টিশকে তিলক গাছের ডাঁটির মতো কেটে টুকরো টুকরো করে দিলেন॥

Verse 42

स बिभेद शतघ्नीं च नवभि: कड्कपत्रिभि: | मद्रराजप्रयुक्तं च शरं छित्त्वा महारथ:

সঞ্জয় বললেন—সেই মহারথী কঙ্কপক্ষযুক্ত নয়টি বাণে শতঘ্নীকেও ভেঙে দিলেন; আর মদ্ররাজের নিক্ষিপ্ত বাণ কেটে দিয়ে যুদ্ধক্ষেত্রে অটল রইলেন॥

Verse 43

तथेतराउछरान्‌ घोरान्‌ शरै: संनतपर्वभि:

সঞ্জয় বললেন—তখন অপর যোদ্ধা পাল্টা জবাবে ভয়ংকর বাণ নিক্ষেপ করল—সু-গাঁটযুক্ত তীর—এবং হিংসার জবাব হিংসায় দিল॥

Verse 44

भीमसेनो रणश्लाघी त्रिधैकैकं समाच्छिनत्‌ । तांश्व सर्वान्‌ महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिेभिरताडयत्‌

সঞ্জয় বললেন—রণগৌরবে গর্বিত ভীমসেন তাদের প্রত্যেকটিকে তিন ভাগে কেটে দিলেন। তারপর সেই সকল মহাধনুর্ধরকে বারংবার তিন-তিন বাণে আঘাত করলেন॥

Verse 45

तदनन्तर झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाणोंद्वारा अन्यान्य योद्धाओंके चलाये हुए भयंकर शरसमूहोंको भी युद्धकी श्लाघा रखनेवाले भीमसेनने काटकर एक-एकके तीन- तीन टुकड़े कर दिये। इस प्रकार शत्रुओंके अस्त्र-शस्त्रोंका निवारण करके भीमसेनने उन सभी महाधनुर्धर वीरोंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ।।

সঞ্জয় বললেন—তারপর বহু সু-গাঁটযুক্ত বাণে অন্যান্য যোদ্ধাদের নিক্ষিপ্ত ভয়ংকর তীরবৃষ্টি ভীমসেন—রণগৌরবে গর্বিত—কেটে কেটে প্রত্যেকটিকে তিন তিন খণ্ড করলেন। এভাবে শত্রুদের অস্ত্রশস্ত্র প্রতিহত করে তিনি সেই সকল মহাধনুর্ধর বীরকে তিন তিন বাণে বিদ্ধ করলেন। তখন মহাযুদ্ধ চলাকালেই ধনঞ্জয় (অর্জুন) রথে চড়ে রণক্ষেত্রে এসে পৌঁছালেন; মহারথী ভীমকে দেখে তিনি অগ্রসর হলেন॥

Verse 46

तौ तु तत्र महात्मानौ समेतौ वीक्ष्य पाण्डवी

সেখানে পাণ্ডবী সেই দুই মহাত্মা বীরকে একত্রিত দেখে, যুদ্ধধর্মের সেই অশুভ সন্ধিক্ষণে তীক্ষ্ণ দৃষ্টিতে তাদের পর্যবেক্ষণ করল—যেখানে মহাবীরদের মিলনই রণভূমিতে ভাগ্যের পরবর্তী মোড়ের ইঙ্গিত দেয়।

Verse 47

अथार्जुनो रणे भीम॑ योधयन्तं महारथान्‌,भरतनन्दन! उस रणक्षेत्रमें भीम जिनके साथ युद्ध कर रहे थे, आपके पक्षके उन दस महारथी वीरोंके सामने भीष्मके वधकी इच्छा रखनेवाले अर्जुन भी शिखण्डीको आगे किये आ पहुँचे

তারপর, হে ভরতনন্দন! রণে ভীম যাদের সঙ্গে যুদ্ধ করছিল, তোমার পক্ষের সেই দশ মহারথী বীরের সম্মুখে, ভীষ্মবধে উদ্যত অর্জুন শিখণ্ডীকে অগ্রে রেখে অগ্রসর হয়ে উপস্থিত হল।

Verse 48

भीष्मस्य निधनाकाडुश्षी पुरस्कृत्य शिखण्डिनम्‌ । आससाद रणे वीरांस्तावकान्‌ दश भारत

হে ভারত! ভীষ্মের নিধন কামনাকারী অর্জুন শিখণ্ডীকে অগ্রে রেখে রণে তোমার পক্ষের সেই দশ বীরের মুখোমুখি হল—যাদের সঙ্গে তখন ভীম যুদ্ধ করছিল।

Verse 49

ये सम भीम॑ रणे राजन्‌ योधयन्तो व्यवस्थिता: । बीभत्सुस्तानथाविध्यद्‌ भीमस्य प्रियकाम्यया

হে রাজন! রণক্ষেত্রে যারা ভীমসেনের সঙ্গে যুদ্ধ করতে স্থির হয়ে দাঁড়িয়েছিল, তাদের সকলকে বীভৎসু অর্জুন ভীমের প্রিয় সাধনের ইচ্ছায় যথাযথভাবে বিদ্ধ করে আহত করল।

Verse 50

ततो दुर्योधनो राजा सुशर्माणमचोदयत््‌ | अर्जुनस्य वधार्थाय भीमसेनस्य चो भयो:,तब राजा दुर्योधनने अर्जुन और भीमसेन दोनोंके वधके लिये सुशर्माको भेजा

তখন রাজা দুর্যোধন অর্জুন ও ভীমসেন—উভয়ের বধের উদ্দেশ্যে সুশর্মাকে প্রেরণা দিল।

Verse 51

सुशर्मन्‌ गच्छ शीघ्र त्वं बलौचै: परिवारित: । जहि पाण्डुसुतावेतोी धनंजयवृकोदरी,भेजते समय उसने कहा--'सुशर्मन्‌! तुम विशाल सेनाके साथ शीघ्र जाओ और अर्जुन तथा भीमसेन इन दोनों पाण्डुकुमारोंको मार डालो”

সঞ্জয় বললেন— “হে সুশর্মণ! মহাবলবাহিনী পরিবেষ্টিত হয়ে শীঘ্রই অগ্রসর হও; পাণ্ডুর এই দুই পুত্র—ধনঞ্জয় (অর্জুন) ও বৃকোদর (ভীম)—কে নিধন কর।”

Verse 52

तच्छुत्वा वचन तस्य त्रैगर्त: प्रस्थलाधिप: । अभिद्र॒ुत्य रणे भीममर्जुनं चैव धन्विनौ

সঞ্জয় বললেন— দুর্যোধনের কথা শুনে প্রস্থলার অধিপতি ত্রিগর্তরাজ সুশর্মা রণক্ষেত্রে ঝাঁপিয়ে পড়ে ধনুর্ধর বীর ভীম ও অর্জুনের দিকে ধাবিত হল।

Verse 53

रथैरनेकसाहसै: समन्तात्‌ पर्यवारयत्‌ | ततः प्रववृते युद्धमर्जुनस्य परै: सह

অসংখ্য সহস্র রথ দিয়ে তারা তাকে চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল; তারপর শত্রুদের সঙ্গে অর্জুনের ভয়ংকর যুদ্ধ শুরু হল।

Verse 66

दुर्मर्षणस्तु विंशत्या पाण्डवं निशितै: शरै: । फिर सिन्धुराज जयद्रथने तीन, अवन्तीके विन्द और अनुविन्दने पाँच-पाँच तथा दुर्मर्षणने बीस तीखे बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन भीमसेनको चोट पहुँचायी

তখন দুর্মর্ষণ বিশটি ধারালো তীর দিয়ে পাণ্ডুনন্দন মহাবলী ভীমসেনকে বিদ্ধ করল।

Verse 112

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्रोण और अश्वत्थामाका संवादविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय प्रा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের ভীষ্মপর্বের অন্তর্গত ভীষ্মবধপর্বে দ্রোণ ও অশ্বত্থামার সংলাপবিষয়ক একশো বারোতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 113

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीमपराक्रमे त्रयोदशाधिकशततमो<्ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের ভীষ্মপর্বে, ভীষ্মবধপর্বের অন্তর্গত, ভীমের পরাক্রমবর্ণনাকারী একশো তেরোতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 116

विद्ध्वा भीमो$नदद्धृष्ट: सैन्धवं च पुनस्त्रिभि: । तत्पश्चात्‌ दुर्मर्षणको बीस

সঞ্জয় বললেন—অচঞ্চল দৃষ্টিসম্পন্ন ভীমকে (শত্রু) বিদ্ধ করল; কিন্তু ভীমও সৈন্ধব জয়দ্রথকে পুনরায় তিনটি বাণে বিদ্ধ করল। তারপর ভীমসেন দুর্মর্ষণকে বিশটি, চিত্রসেনকে পাঁচটি, বিকর্ণকে দশটি এবং জয়দ্রথকে পাঁচটি বাণে আঘাত করল। মহাহর্ষে সিংহনাদ করে সে আবার জয়দ্রথকে তিনটি বাণে বিদ্ধ করল।

Verse 126

भीम॑ विव्याध संरब्धो दशभिरनर्निशितै: शरै: । तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने दूसरा धनुष लेकर क्रोधपूर्वक चलाये हुए दस तीखे बाणोंद्वारा भीमसेनको बींध डाला

সঞ্জয় বললেন—ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে সে ভীমকে দশটি অতিশয় তীক্ষ্ণ বাণে বিদ্ধ করল। তৎক্ষণাৎ রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ কৃপাচার্য দ্বিতীয় ধনুক তুলে নিয়ে, ক্রোধে নিক্ষিপ্ত দশটি ধারালো বাণে ভীমসেনকে আবার বিদ্ধ করলেন।

Verse 196

विरथ॑ सैन्धवं चक्रे सर्वलोकस्य पश्यत: । आर्य! वहाँ पाण्डुनन्दन भीमसेनने रणक्षेत्रमें यह अद्भुत कर्म किया कि सब महारथियोंको बाणोंसे घायल करके रोक दिया और सब लोगोंके देखते-देखते सिन्धुराजको रथहीन कर दिया

সঞ্জয় বললেন—সকলের চোখের সামনে পাণ্ডুনন্দন ভীমসেন রণক্ষেত্রে এক আশ্চর্য কীর্তি করল। সে মহারথীদের বাণে আহত করে থামিয়ে দিল এবং সবার দৃষ্টির সামনেই সৈন্ধবরাজ জয়দ্রথকে রথহীন করে দিল।

Verse 426

शक्ति चिच्छेद सहसा भगदत्तेरितां रणे । तत्पश्चात्‌ कंकपत्रयुक्त नौ बाणोंद्वारा शतघ्नीको छिन्न-भिन्न कर दिया। इसके बाद महारथी भीमसेनने मद्रराज शल्यके चलाये हुए बाणको काटकर रणक्षेत्रमें भगदत्तकी चलायी हुई शक्तिके भी सहसा टुकड़े-टुकड़े कर डाले

সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে ভগদত্ত নিক্ষিপ্ত শক্তি-অস্ত্রটি সে মুহূর্তে কেটে ফেলল। তারপর কঙ্কপত্রযুক্ত নয়টি বাণে সে শতঘ্নীকে চূর্ণ-বিচূর্ণ করে দিল। এরপর মহারথী ভীমসেন মদ্ররাজ শল্যের নিক্ষিপ্ত বাণ কেটে দিয়ে, রণক্ষেত্রে ভগদত্তের ছোড়া শক্তিকেও তৎক্ষণাৎ খণ্ড খণ্ড করে দিল।

Verse 456

निध्नन्तं समरे शत्रून्‌ योधयानं च सायकै: । तब उस महासमरमें महारथी भीमसेनको, जो समरभूमिमें सायकोंद्वारा शत्रुओंका संहार करते हुए उनके साथ युद्ध कर रहे थे, देखकर रथके द्वारा अर्जुन भी वहीं आ पहुँचे

সঞ্জয় বললেন—সেই মহাসমরে মহারথী ভীমসেনকে, যিনি রণক্ষেত্রে শরবৃষ্টিতে শত্রু নিধন করে তাদের সঙ্গে যুদ্ধ করছিলেন, দেখে অর্জুনও রথে চড়ে সেই একই স্থানে এসে উপস্থিত হলেন।

Verse 463

न शशंसुर्जयं तत्र तावका: पुरुषर्षभा: । उन दोनों महामनस्वी पाण्डव बन्धुओंको एकत्र हुआ देख आपकी सेनाके श्रेष्ठ पुरुषोंने वहाँ अपनी विजयकी आशा त्याग दी

সঞ্জয় বললেন—সেখানে তোমাদের পক্ষের শ্রেষ্ঠ বীরেরা আর জয়ের কথা ঘোষণা করল না। সেই দুই মহামনস্বী পাণ্ডব ভ্রাতাকে একত্রে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখে তারা জয়ের আশা ত্যাগ করল।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether continued escalation in pursuit of dominance can be justified when it predictably produces broad social harm; Bhīṣma frames reconciliation as the ethically safer policy given foreseeable consequences and kinship obligations.

Competence and power should be subordinated to restraint and stability: when outcomes are asymmetrical and losses compounding, prudent governance favors settlement, reputation-preservation, and the protection of the wider community.

No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is evidentiary—publicly demonstrating Arjuna’s extraordinary capability and using that demonstration as a rhetorical basis for policy advice advocating peace within the broader epic’s ethical architecture.

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