Adhyaya 84
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 8431 Versesअर्जुन के पक्ष में निर्णायक; शत्रु-सेना का दमन और नायक की पराजय, पर वध नहीं।

Adhyaya 84

अश्वमेधीयस्य हयस्य दक्षिणापश्चिमगमनम् — The Sacrificial Horse’s Southern and Western Circuit

Upa-parva: Aśvamedha-Haya-Cāraṇa (Horse-Wandering Campaign Episodes)

Vaiśaṃpāyana reports the Aśvamedha horse’s itinerary and the escorting enforcement undertaken by Arjuna (Kaunteya, Kirīṭin). The horse first moves south under royal authorization and is honored by Magadha. It returns and reaches Śukti, a Cedi city, where it is received with pre-battle honor by Śarabha, son of Śiśupāla. The horse then proceeds through multiple regions (including Kāśī, Andhra, Kosala, Kirāta, and Taṅgaṇa), after which Arjuna accepts due honors and reorients toward Daśārṇa. There, a ruler named Citrāṅgada offers resistance, leading to a severe contest that ends in Arjuna’s victory and subjugation of the opponent. Arjuna next enters the territory associated with the Niṣāda king Ekalavya; Ekalavya’s son confronts him with Niṣāda forces, framed as an attempt to obstruct the sacrifice, and is defeated. Continuing along the southern sea, Arjuna faces further engagements involving Draviḍa, Andhra, Raudra, Māhiṣaka, and Kollagireya groups. Following the horse’s direction, he traverses Saurāṣṭra, reaches Gokarṇa and Prabhāsa, and the horse arrives at Dvāravatī guarded by Vṛṣṇi warriors. Yādava youths attempt to seize the horse but are restrained by Ugrasena; the Vṛṣṇy-Andhaka leader (Kṛṣṇa) and Vasudeva meet Arjuna, honor him, and permit him to continue. The horse then moves west along the sea, reaches Pañcanada, and enters Gandhāra, where a formidable battle arises with the Gandhāra king—identified as Śakuni’s son—motivated by prior enmity.

Chapter Arc: अश्वमेध के अश्व का अनुसरण करते हुए अर्जुन के सामने शकुनि-पुत्र (गान्धारों का महारथ) विशाल सेना सहित प्रत्युद्यत होता है—ध्वज-पताकाओं से सजी हस्ति-अश्व-रथ-युक्त वाहिनी के साथ। → गान्धार-योद्धा अपने कुल-अपमान और शकुनि-वध की स्मृति से क्रुद्ध होकर युद्ध के लिए उकसते हैं; अर्जुन धर्मात्मा होकर भी रण-आवश्यकता से पीछे नहीं हटता और विरोधी को संयमित वाणी से समझाने का प्रयत्न करता है, पर सेना का आवेग बढ़ता जाता है। → अर्जुन अर्धचन्द्राकार बाण से शकुनि-पुत्र का शिरस्त्राण वैसे ही उड़ा देता है जैसे कभी जयद्रथ के प्रसंग में निर्णायक प्रहार किया था; तत्पश्चात गान्धारों के रोके जाने पर भी वह नाम ले-लेकर उनके मस्तक काट गिराता है—रण का चरम उन्माद यहीं फूटता है। → विजयी अर्जुन मामी (गान्धारी) का स्मरण कर शत्रु-पक्ष के प्रति मर्यादा रखता है; वह शकुनि-पुत्र को सान्त्वना देकर कहता है कि गान्धारी-माता और धृतराष्ट्र के सम्बन्ध के कारण ही वह जीवित छोड़ा जा रहा है—अर्थात् पराजय के साथ जीवनदान। → अश्वानुसरण का अभियान आगे बढ़ता है—अश्व के मार्ग में अगले राज्य/वीर का प्रतिरोध अभी शेष है।

Shlokas

Verse 1

अपर बक। ] अत काड< चतुरशीतितमो< ध्याय: शकुनिपुत्रकी पराजय वैशम्पायन उवाच शकुनेस्तनयो वीरो गान्धाराणां महारथ: । प्रत्युद्ययौ गुडाकेशं सैन्येन महता वृतः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शकुनिका पुत्र गान्धारोंमें सबसे बड़ा वीर और महारथी था। वह विशाल सेनासे घिरकर निद्राविजयी अर्जुनका सामना करनेके लिये चला

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! শকুনির পুত্র গন্ধারদের মধ্যে পরম বীর ও মহারথী। সে মহাসেনায় পরিবৃত হয়ে গুড়াকেশ (নিদ্রাজয়ী) অর্জুনের সম্মুখে অগ্রসর হল।

Verse 2

हस्त्यश्वरथयुक्तेन पताकाध्वजमालिना । अमृष्यमाणास्ते योधा तृपस्य शकुनेर्वधम्‌

হস্তী-অশ্ব-রথে সজ্জিত এবং পতাকা-ধ্বজে অলংকৃত সেই যোদ্ধারা, অসহ্য ক্রোধে দগ্ধ হয়ে, শকুনির বধে তৃপ্তি অনুভব করল।

Verse 3

स तानुवाच धर्मात्मा बीभत्सुरपराजित:

তখন ধর্মাত্মা, অপরাজিত বীভৎসু (অর্জুন) তাদের উদ্দেশে বললেন।

Verse 4

युधिष्ठिरस्यथ वचन न च ते जगृहुर्हितम्‌ । किसीसे परास्त न होनेवाले धर्मात्मा अर्जुनने उन्हें राजा युधिष्ठिरकी बात सुनायी; परंतु उस हितकर वचनको भी वे ग्रहण न कर सके ।। ३ $ ।। वार्यमाणा5पि पार्थेन सान्त्वपूर्वममर्षिता:

তারা যুধিষ্ঠিরের কথাও শুনল, কিন্তু যা কল্যাণকর তা গ্রহণ করল না। পার্থ সান্ত্বনাপূর্বক নিবৃত্ত করতে চাইলেও, তারা ক্রোধে অটল রইল।

Verse 5

ततः शिरांसि दीप्ताग्रैस्तेषां चिच्छेद पाण्डव:

তখন পাণ্ডব দীপ্ত-অগ্র অস্ত্রে তাদের মস্তক ছিন্ন করলেন।

Verse 6

ते वध्यमाना: पार्थेन हयमुत्सृज्य सम्भ्रमात्‌

পার্থ (অর্জুন)-এর আঘাতে তারা বিপর্যস্ত হয়ে পড়ল। আতঙ্কে অশ্বটি ত্যাগ করে তারা দিশাহারা হয়ে চারদিকে ছুটে পালাল।

Verse 7

निरुध्यमानस्तैश्लापि गान्धारै: पाण्डुनन्दन:

গান্ধারের যোদ্ধারা তাকে ঘিরে ধরে বাধা দিলেও পাণ্ডুনন্দন (অর্জুন) রণমাঝে অচল, দৃঢ়ভাবে দাঁড়িয়ে রইল।

Verse 8

वध्यमानेषु तेष्वाजौ गान्धारेषु समन्‍्तत:

যুদ্ধে চারদিকে গান্ধারের যোদ্ধারা নিহত হতে লাগল; রণক্ষেত্র সর্বত্র ভয়ংকর সংহারের রূপ নিল।

Verse 9

त॑ युध्यमान राजान क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम्‌,क्षत्रियधर्ममें स्थित होकर युद्ध करनेवाले उस राजासे अर्जुनने इस प्रकार कहा--“वीर! तुम्हें युद्ध करनेसे कोई लाभ नहीं है। महाराज युधिष्ठिरकी यह आज्ञा है कि मैं राजाओंका वध न करूँ। अतः तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ जिससे आज तुम्हारी पराजय न हो'

ক্ষত্রধর্মে স্থিত হয়ে যুদ্ধ করতে উদ্যত সেই রাজাকে দেখে অর্জুন ধর্মসম্মত ও মঙ্গলকর বাক্য বলল— “বীর, এই যুদ্ধে তোমার কোনো লাভ নেই। মহারাজ যুধিষ্ঠিরের আদেশ— আমি রাজাদের বধ করব না। অতএব যুদ্ধ থেকে সরে দাঁড়াও, যাতে আজ তোমার পরাজয় না ঘটে।”

Verse 10

पार्थोउब्रवीज्न मे वध्या राजानो राजशासनात्‌ | अलं युद्धेन ते वीर न ते5स्त्वद्य पराजय:,क्षत्रियधर्ममें स्थित होकर युद्ध करनेवाले उस राजासे अर्जुनने इस प्रकार कहा--“वीर! तुम्हें युद्ध करनेसे कोई लाभ नहीं है। महाराज युधिष्ठिरकी यह आज्ञा है कि मैं राजाओंका वध न करूँ। अतः तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ जिससे आज तुम्हारी पराजय न हो'

পার্থ (অর্জুন) বলল— “রাজার আদেশে এই রাজারা আমার দ্বারা বধ্য নয়। বীর, যুদ্ধ যথেষ্ট; আজ যেন তোমার পরাজয় না হয়।”

Verse 11

इत्युक्तस्तदनादृत्य वाक्यमज्ञानमोहित: । स शक्रसमकर्माणं समवाकिरदाशुगै:,उनके ऐसा कहनेपर भी वह अज्ञानसे मोहित होनेके कारण उनकी बातकी अवहेलना करके इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनपर शीघ्रगामी बाणोंकी वर्षा करने लगा

তারা এমন বললেও অজ্ঞানে মোহিত হয়ে সে তাদের কথা অগ্রাহ্য করল এবং ইন্দ্রসম পরাক্রমী অর্জুনের উপর দ্রুতগামী বাণের বর্ষণ করতে লাগল।

Verse 12

तस्य पार्थ: शिरस्त्राणमर्धचन्द्रेण पत्रिणा । अपाहरदमेयात्मा जयद्रथशिरो यथा,तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न अर्जुनने जिस प्रकार जयद्रथका सिर उड़ाया था, उसी प्रकार शकुनि-पुत्रके शिरस्त्राणः (टोप)-को एक अर्धचन्द्राकार बाणसे काट गिराया

তখন অপরিমেয় আত্মবলসম্পন্ন পার্থ (অর্জুন) যেমন একদা জয়দ্রথের মস্তক ছিন্ন করেছিলেন, তেমনি শকুনিপুত্রের শিরস্ত্রাণটি এক পালকযুক্ত অর্ধচন্দ্রাকৃতি বাণে কেটে ফেলে দিলেন।

Verse 13

त॑ दृष्टवा विस्मयं जम्मुर्गान्धारा: सर्व एव ते । इच्छता तेन न हतो राजेत्यसि च त॑ विदु:,यह देखकर समस्त गान्धारोंको बड़ा विस्मय हुआ और वे सब-के-सब यह समझ गये कि अर्जुनने जान-बूझकर गान्धारराजको जीवित छोड़ दिया

এ দৃশ্য দেখে সকল গন্ধারবাসী বিস্ময়ে অভিভূত হল; তারা বুঝল, অর্জুন ইচ্ছাকৃতভাবেই গন্ধাররাজকে বাঁচিয়ে রেখেছেন।

Verse 14

गान्धारराजपुत्रस्तु पलायनकृतक्षण: । ययौ तैरेव सहितत्त्रस्तै: क्षुद्रमूगैरिव,उस समय गान्धारराज शकुनिका पुत्र भागनेका अवसर देखने लगा। जैसे सिंहसे डरे हुए छोटे-छोटे मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार अर्जुनसे भयभीत हुए सैनिकोंके साथ वह स्वयं भी भाग निकला

তখন গন্ধাররাজের পুত্র (শকুনিপুত্র) পালাবার সুযোগ দেখে, সিংহভয়ে ক্ষুদ্র হরিণ যেমন ছুটে পালায়, তেমনি অর্জুনভীত সৈন্যদের সঙ্গে নিজেও পালিয়ে গেল।

Verse 15

तेषां तु तरसा पार्थस्तत्रैव परिधावताम्‌ | प्रजहारोत्तमाड़्ानि भल्‍्लै: संनतपर्वभि:,वहीं चक्कर काटनेवाले बहुत-से सैनिकोंके मस्तक अर्जुनने झुकी हुई गाँठवाले भल्‍लोंद्वारा वेगपूर्वक काट लिया

যুদ্ধক্ষেত্রে এদিক-ওদিক ঘুরে বেড়ানো সেই যোদ্ধাদের মধ্যে অনেকেরই মস্তক পার্থ (অর্জুন) তৎক্ষণাৎ প্রবল বেগে, বাঁকানো গাঁটযুক্ত ভল্লবাণে কেটে ফেললেন।

Verse 16

उच्छितांस्तु भुजान्‌ केचिन्नाबुध्यन्त शरैह्वतान्‌ । शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्ति: पृथुभि: पार्थचोदितै:,अर्जुनद्वारा चलाये और गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंसे कितने ही योद्धाओंकी ऊँची उठी हुई भुजाएँ कटकर गिर गयीं और उन्हें इस बातका पतातक न लगा

পার্থের প্রেরণায় গাণ্ডীব থেকে নির্গত প্রশস্ত অসংখ্য শরবৃষ্টিতে বহু যোদ্ধার উঁচু করে তোলা বাহু কেটে পড়ল; শরাহত হয়ে তারা বুঝতেও পারল না কী ঘটল।

Verse 17

सम्भ्रान्तनरनागाश्वमपतद्‌ विद्रुतं बलम्‌ । हतविध्वस्तभूयिष्ठमावर्तत मुहुर्मुहु:

মানুষ, হাতি ও ঘোড়া আতঙ্কে দিশেহারা হয়ে পড়ল; সেনা ভেঙে পালাতে লাগল। অধিকাংশ নিহত ও বিধ্বস্ত হয়ে তা বারবার ঘুরে ফিরে এল।

Verse 18

सम्पूर्ण सेनाके मनुष्य, हाथी और घोड़े घबराकर इधर-उधर भटकने लगे। सारी सेना गिरती-पड़ती भागने लगी। उनके अधिकांश सिपाही युद्धमें मारे गये या नष्ट हो गये और वह बार-बार युद्धभूमिमें ही चक्कर काटने लगी ।। नाभ्यदृश्यन्त वीरस्य केचिदग्रेग्रयकर्मण: । रिपव: पात्यमाना वै ये सहेयुर्धन॑जयम्‌,श्रेष्ठ कर्म करनेवाले वीर अर्जुनके सामने कोई भी शत्रु खड़े नहीं दिखायी देते थे, जो अर्जुनकी मार पड़नेपर उनका वेग सहन कर सके

সমগ্র সেনার মানুষ, হাতি ও ঘোড়া আতঙ্কে এদিক-ওদিক ছুটোছুটি করতে লাগল; সেনা হুড়মুড়িয়ে পালাল। অধিকাংশ সৈন্য নিহত বা বিনষ্ট হয়ে গেল, আর তারা বারবার রণক্ষেত্রেই ঘুরপাক খেতে লাগল। শ্রেষ্ঠ কর্মসাধক বীর অর্জুনের সম্মুখে এমন কোনো শত্রু দেখা গেল না, যে ধনঞ্জয়ের আঘাতের বেগ সহ্য করতে পারে।

Verse 19

ततो गान्धारराजस्यथ मन्त्रिवृद्धपुर:सरा । जननी निर्ययौ भीता पुरस्कृत्यार्घ्यमुत्तमम्‌,तदनन्तर गान्धारराजकी माता अत्यन्त भयभीत होकर बूढ़े मन्त्रियोंको आगे करके उत्तम अर्घ्य ले नगरसे बाहर निकली और रणभूमिमें उपस्थित हुई

তারপর গন্ধাররাজের জননী অন্তরে ভীত হয়ে, বৃদ্ধ মন্ত্রীদের অগ্রে রেখে এবং উৎকৃষ্ট অর্ঘ্য বহন করে নগর থেকে বেরিয়ে রণক্ষেত্রের দিকে অগ্রসর হলেন।

Verse 20

सा न्यवारयदव्यग्रं त॑ पुत्र युद्धदुर्मदम्‌ । प्रसादयामास च तं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम्‌,आते ही उसने अपने व्यग्रतारहित एवं रणोन्मत्त पुत्रको युद्ध करनेसे रोका और अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले विजयशील अर्जुनको प्रिय वचनोंद्वारा प्रसन्न किया

তিনি তাঁর অস্থিরতাহীন কিন্তু রণোন্মত্ত পুত্রকে যুদ্ধ থেকে নিবৃত্ত করলেন; আর মধুর বাক্যে অনায়াসে মহৎ কর্মসাধক, বিজয়ী অর্জুন—জিষ্ণুকে—প্রসন্ন করলেন।

Verse 21

तां पूजयित्वा बीभत्सु: प्रसादमकरोत्‌ प्रभु: । शकुनेश्चापि तनयं सान्त्वयन्निदमब्रवीत्‌,सामर्थ्यशाली अर्जुनने भी मामीका सम्मान करके उन्हें प्रसन्न किया और स्वयं उनपर कृपादृष्टि की। फिर शकुनिके पुत्रको भी सान्त्वना प्रदान करते हुए वे इस प्रकार बोले --

তাঁকে যথাযথ সম্মান করে পূজা করে পরাক্রমী বীভৎসু (অর্জুন) অনুগ্রহ প্রদর্শন করলেন। তারপর শকুনির পুত্রকেও সান্ত্বনা দিয়ে তিনি এই কথা বললেন—

Verse 22

न मे प्रियं महाबाहो यत्ते बुद्धिरियं कृता । प्रतियोद्धुममित्रघ्न भ्रातैव त्वं ममानघ,'शत्रुसूदन! महाबाहु वीर! तुमने जो मुझसे युद्ध करनेका विचार किया, यह मुझे प्रिय नहीं लगा; क्योंकि अनघ। तुम तो मेरे भाई ही हो

হে মহাবাহু! তুমি যে আমার সঙ্গে যুদ্ধ করতে মনস্থ করেছ, তা আমার প্রিয় নয়। হে শত্রুনাশক, হে নিষ্পাপ! তুমি তো আমার কাছে ভ্রাতারই সমান।

Verse 23

गान्धारीं मातरं स्मृत्वा धृतराष्ट्रकृतेन च । तेन जीवसि राजंस्त्वं निहतास्त्वनुगास्तव,“राजन! मैंने माता गान्धारीको याद करके पिता धृतराष्ट्रके सम्बन्धसे युद्धमें तुम्हारी उपेक्षा की है; इसीलिये तुम अभीतक जीवित हो। केवल तुम्हारे अनुगामी सैनिक ही मारे गये हैं

রাজন! মাতা গান্ধারীকে স্মরণ করে এবং ধৃতরাষ্ট্রের কারণে আমি যুদ্ধে তোমাকে উপেক্ষা করেছি; তাই তুমি এখনও জীবিত। তোমার অনুগামীরাই নিহত হয়েছে।

Verse 24

मैवं भू: शाम्यतां वैरं मा ते भूद्‌ बुद्धिरीदृशी । गच्छेथथास्त्वं परां चैत्रीमश्वमेधे नूपस्य न:,“अब हमलोगोंमें ऐसा बर्ताव नहीं होना चाहिये। आपसका वैर शान्त हो जाय। अब तुम कभी इस प्रकार हमलोगोंके विरुद्ध युद्ध ठाननेका विचार न करना। “आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको महाराज युधिष्ठिरका अश्वमेध यज्ञ होनेवाला है। उसमें तुम अवश्य आना”

এমন করো না। বৈর শান্ত হোক; ভবিষ্যতে আর কখনও আমাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধের এমন সংকল্প তোমার মনে না জাগুক। আসন্ন চৈত্র পূর্ণিমায় মহারাজ যুধিষ্ঠিরের অশ্বমেধ যজ্ঞ অনুষ্ঠিত হবে; তুমি অবশ্যই এসো।

Verse 46

परिवार्य हयं जग्मुस्ततश्लुक्रोध पाण्डव: । यद्यपि पार्थने सान्त्वनापूर्वक समझा-बुझाकर उन सबको युद्धसे रोका, तथापि वे अमर्षशील योद्धा उस घोड़ेको चारों ओरसे घेरकर उसे पकड़नेके लिये आगे बढ़े। यह देख पाण्जुपुत्र अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ

তখন তারা ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে ঘোড়াটিকে চারদিক থেকে ঘিরে এগিয়ে গেল; তা দেখে পাণ্ডুপুত্র অর্জুনের প্রবল ক্রোধ জাগল।

Verse 56

क्षुरैगाण्डीवनिर्मुक्ति्नातियत्नादिवार्जुन: । वे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए तेज धारवाले धुरोंसे बिना परिश्रमके ही उनके मस्तक काटने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন—গাণ্ডীব থেকে নিক্ষিপ্ত ক্ষুরধার বাণে অর্জুন প্রায় অনায়াসেই রণক্ষেত্রে তাদের মস্তক ছেদন করে একে একে ভূমিতে ফেলতে লাগলেন।

Verse 63

न्यवर्तन्त महाराज शरवर्षार्जिता भृशम्‌ | महाराज! अर्जुनकी मार खाकर उनके बाणोंकी वर्षसे पीड़ित हुए गान्धार सैनिक उस घोड़ेको छोड़कर बड़े वेगसे पीछे लौट गये

বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহারাজ, অর্জুনের আঘাতে জর্জরিত ও তীব্র বাণবৃষ্টিতে পীড়িত গান্ধার সৈন্যরা যজ্ঞাশ্ব ত্যাগ করে প্রবল বেগে পশ্চাদপসরণ করল।

Verse 76

आदिश्यादिश्य तेजस्वी शिरांस्येषां न्यपातयत्‌ | गान्धारोंके द्वारा रोके जानेपर भी तेजस्वी वीर पाण्डुनन्दन अर्जुन उनके नाम ले-लेकर मस्तक काटने और गिराने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন—উজ্জ্বল বীর অর্জুন একে একে তাদের চিহ্নিত করে তাদের মস্তক কেটে ফেলতে লাগলেন। গান্ধারদের দ্বারা বাধাপ্রাপ্ত হয়েও পাণ্ডুনন্দন অর্জুন নাম ধরে ধরে শিরচ্ছেদ করে ভূমিতে ফেলতে থাকলেন।

Verse 83

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वनें यज्ञसग्बन्धी अश्चका अनुसरणविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ,स राजा शकुने: पुत्र: पाण्डवं प्रत्यवारयत्‌ । जब चारों ओर युद्धमें गान्धारोंका संहार आरम्भ हो गया, तब राजा शकुनि-पुत्रने पाण्डुकुमार अर्जुनको रोका

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন রাজা, শকুনির পুত্র, পাণ্ডবকে নিবৃত্ত করল। যখন চারিদিকে যুদ্ধে গান্ধারদের নিধন শুরু হয়ে গেল, তখন শকুনিপুত্র পাণ্ডুনন্দন অর্জুনকে রোধ করল।

Verse 84

इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे शकुनिपुत्रपराजये चतुरशीतितमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের আশ্বমেধিক পর্বের অন্তর্গত অনুগীতা পর্বে যজ্ঞাশ্ব অনুসরণ ও শকুনিপুত্র-পরাজয় বিষয়ক চুরাশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 213

अभ्ययु: सहिता: पार्थ प्रगृहीतशरासना: । उसकी सेनामें हाथी, घोड़े और रथ सभी सम्मिलित थे। वह सेना ध्वजा-पताकाओंकी मालासे मण्डित थी। गान्धारदेशके योद्धा राजा शकुनिके वधका समाचार सुनकर अमर्षमें भरे हुए थे; अतः हाथमें धनुष-बाण ले उन्होंने एक साथ होकर अर्जुनपर धावा बोल दिया

বৈশম্পায়ন বললেন—হে পার্থ! ধনুক-বাণ প্রস্তুত করে তারা সকলে একত্র হয়ে অর্জুনের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল। তাদের সেনা হাতি, ঘোড়া ও রথে পরিপূর্ণ ছিল এবং ধ্বজা-পতাকার মালায় সুশোভিত ছিল। গন্ধারদেশের যোদ্ধারা রাজা শকুনির বধের সংবাদ শুনে ক্রোধে দগ্ধ হয়ে উঠেছিল; তাই অস্ত্র ধারণ করে একসঙ্গে গর্জে উঠে তারা অর্জুনকে আক্রমণ করল।

Frequently Asked Questions

The episode balances ritual authority with political autonomy: when local powers challenge the horse, Arjuna must decide how to uphold the sacrifice’s legitimacy while limiting escalation, treating resistance as a test of sovereignty rather than an occasion for indiscriminate violence.

Legitimate rule is depicted as a synthesis of honor and restraint: acceptance of pūjā and tribute is paired with disciplined enforcement when the yajña is threatened, implying that stability after catastrophe requires both recognition rituals and accountable power.

No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the chapter’s meta-function is archival and cartographic—documenting how the Aśvamedha’s progress converts contested spaces into ritually acknowledged order within the epic’s post-war reconstruction.