Adhyaya 73
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 7333 Verses

Adhyaya 73

Traigarta Attempt to Seize the Aśvamedha Horse; Arjuna’s Restraint and Tactical Victory

Upa-parva: Aśvamedha Horse Campaign Episodes (Traigarta Encounter Arc)

Vaiśaṃpāyana reports that the Trigartas—identified as descendants of warriors previously slain—learn the consecrated sacrificial horse has reached the edge of their territory and assemble in armed chariots to capture it. Arjuna (Kirīṭin/Jiṣṇu/Gūḍākeśa/Dhanaṃjaya) anticipates their intention and initially attempts to deter them with conciliatory speech, aligning with Yudhiṣṭhira’s injunction that bereaved kings should not be further harmed. The Trigartas disregard the warning and initiate a dense arrow exchange. Arjuna targets their leadership (notably Sūryavarmā) and counters volleys with superior archery. Ketuvarmā engages on behalf of his brother; Dhṛtavarmā displays remarkable speed and wounds Arjuna’s hand, causing the Gāṇḍīva to fall briefly—an emphasized moment of vulnerability. Arjuna regains composure, resumes the bow, and delivers decisive counterfire; the Traigarta forces break and flee. They then approach in submission, offering service. Arjuna instructs them to protect their lives and accept governance, converting battlefield superiority into regulated political compliance rather than continued punishment.

Chapter Arc: दीक्षा-काल आते ही महर्षि-ऋत्विज विधिवत् यज्ञ-क्रम आरम्भ कराते हैं; धर्मराज युधिष्ठिर पशुबन्ध-कर्म कर दीक्षित होकर तेज से दीप्त हो उठते हैं। → अश्वमेध हेतु व्यास के शास्त्र-विधान से छोड़ा गया घोड़ा दिशाओं में विचरने लगता है। उसके पीछे महाबाहु अर्जुन धनुष को स्पर्श करते हुए अनुगमन करता है; नगर-जन और पथिक उसकी कीर्ति, शस्त्र-तेज और यज्ञ-रक्षा की चर्चा करते हैं—पर साथ ही यह संकेत भी है कि घोड़े का मार्ग अनिश्चित है और कहीं भी विघ्न/प्रतिरोध उठ सकता है। → घोड़ा पृथ्वी की प्रदक्षिणा-सी करता हुआ उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ता है; भीड़ में लोग अर्जुन को प्रत्यक्ष न देख पाने पर भी उसके दिव्य धनुष-चिह्न से पहचानते हैं—यह क्षण अर्जुन की अदृश्य-सी, किंतु सर्वत्र अनुभूत उपस्थिति और यज्ञ-प्रतिष्ठा के विस्तार को चरम पर ले आता है। → अर्जुन स्त्री-पुरुषों की मधुर वाणी और शुभाशंसाएँ बार-बार सुनता हुआ आगे बढ़ता है। विघ्न-शान्ति के लिए याज्ञवल्क्य के एक वेदपारग, यज्ञकर्म-कुशल शिष्य को पार्थ के साथ प्रेषित किया जाता है, जिससे यात्रा और यज्ञ दोनों की रक्षा सुनिश्चित हो। → घोड़ा अभी भी दिशाओं में विचर रहा है—आगे किस देश/राजा के यहाँ प्रतिरोध होगा और अर्जुन को किस धर्म-संकट का सामना करना पड़ेगा, यह अनकहा रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-- माल छा अकाल त्रिसप्ततितमो<ध्याय: सेनासहित अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरण वैशम्पायन उवाच दीक्षाकाले तु सम्प्राप्ते ततस्ते सुमहर्त्विज: । विधिवद्‌ दीक्षयामासुरश्चवमेधाय पार्थिवम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जब दीक्षाका समय आया, तब उन व्यास आदि महान्‌ ऋत्विजोंने राजा युधिष्ठिरको विधिपूर्वक अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा दी

বৈশম্পায়ন বললেন— জনমেজয়! দীক্ষার সময় উপস্থিত হলে, ব্যাস প্রমুখ সেই মহার্ঋত্বিজেরা রাজাকে অশ্বমেধ যজ্ঞের জন্য বিধিপূর্বক দীক্ষিত করলেন।

Verse 2

कृत्वा स पशुबन्धांश्व दीक्षित: पाण्डुनन्दन: । धर्मराजो महातेजा: सहर्व्विम्भिव्यरोचत,पशुबन्ध-कर्म करके यज्ञकी दीक्षा लिये हुए महातेजस्वी पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्छिर ऋत्विजोंके साथ बड़ी शोभा पाने लगे

পশুবন্ধের বিধিবদ্ধ কর্ম সম্পন্ন করে এবং যজ্ঞ-দীক্ষা গ্রহণ করে পাণ্ডুনন্দন মহাতেজস্বী ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ঋত্বিজদের সহিত বিশেষভাবে দীপ্তিমান হয়ে উঠলেন।

Verse 3

अश्वमेधयज्ञके लिये छोड़े हुए घोड़ेका अर्जुनके द्वारा अनुगमन हयश्न हयमेधार्थ स्वयं स ब्रह्म॒वादिना । उत्सृष्ट: शास्त्रविधिना व्यासेनामिततेजसा,अमिततेजस्वी ब्रह्मवादी व्यासजीने अश्वमेधयज्ञके लिये चुने गये अश्वको स्वयं ही शास्त्रीय विधिके अनुसार छोड़ा

অশ্বমেধযজ্ঞের উদ্দেশ্যে নির্বাচিত অশ্বকে শাস্ত্রবিধি অনুসারে স্বয়ং অমিততেজস্বী ব্রহ্মবাদী ব্যাসই মুক্ত করলেন।

Verse 4

स राजा धर्मराड्‌ राजन्‌ दीक्षितो विबभौ तदा | हेममाली रुक्मकण्ठ: प्रदीप्त इव पावक:,राजन! यज्ञमें दीक्षित हुए धर्मराज राजा युधिष्ठिर सोनेकी माला और कण्ठमें सोनेकी कण्ठी धारण किये प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे

রাজন! সেই সময় যজ্ঞে দীক্ষিত ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির স্বর্ণমালা ও স্বর্ণকণ্ঠাভরণ ধারণ করে প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান ছিলেন।

Verse 5

कृष्णाजिनी दण्डपाणि: क्षौमवासा: स धर्मज: । विबभौ द्युतिमान्‌ भूय: प्रजापतिरिवाध्वरे,काला मृगचर्म, हाथमें दण्ड और रेशमी वस्त्र धारण किये धर्मपुत्र राजा युधिष्छिर अधिक कान्तिमान्‌ हो यज्ञमण्डपमें प्रजापतिकी भाँति शोभा पा रहे थे

কৃষ্ণাজিন ধারণ করে, হাতে দণ্ড নিয়ে এবং ক্ষৌমবস্ত্র পরিধান করে ধর্মপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির পুনরায় অধিক দীপ্তিমান হয়ে যজ্ঞমণ্ডপে প্রজাপতির ন্যায় শোভা পেলেন।

Verse 6

तथैवारस्यर्त्विज: सर्वे तुल्यवेषा विशाम्पते । बभूवुरर्जुनश्वापि प्रदीप्त इव पावक:,प्रजानाथ! उनके समस्त ऋत्विज्‌ भी उन्हींके समान वेश-भूषा धारण किये सुशोभित होते थे। अर्जुन भी प्रज्वलित अग्निके समान दीप्तिमान्‌ हो रहे थे

প্রজানাথ! তদ্রূপ তাঁর সকল ঋত্বিজও তাঁরই ন্যায় সমান বেশভূষা ধারণ করে শোভিত হচ্ছিলেন। অর্জুনও প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে উঠলেন।

Verse 7

श्वेताश्वः कृष्णसारं तं ससाराश्च धनंजय: । विधिवत्‌ पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात्‌,भूपाल जनमेजय! श्वेत घोड़ेवाले अर्जुनने धर्मराजकी आज्ञासे उस यज्ञसम्बन्धी अश्वका विधिपूर्वक अनुसरण किया

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভূपाल জনমেজয়! ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের আদেশে শ্বেত অশ্বারূঢ় ধনঞ্জয় অর্জুন বিধিপূর্বক সেই যজ্ঞাশ্বের অনুসরণে অগ্রসর হলেন।

Verse 8

विक्षिपन्‌ गाण्डिवं राजन्‌ बद्धगोधाडगुलित्रवान्‌ । तमश्वं पृथिवीपाल मुदा युक्त: ससार च,पृथिवीपाल! राजन! अर्जुनने अपने हाथोंमें गोधाके चमड़ेके बने दस्ताने पहन रखे थे। वे गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ अश्वके पीछे-पीछे जा रहे थे

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! গোধা-চর্মে বাঁধা অঙ্গুলিত্র ধারণ করে অর্জুন গাণ্ডীবের টংকার তুলতে তুলতে, আনন্দে উদ্দীপ্ত হয়ে, সেই অশ্বের পশ্চাতে অগ্রসর হলেন।

Verse 9

आकुमारं तदा राजन्नागमत्‌ तत्पुरं विभो । द्रष्टकामं कुरुश्रेष्ठ प्रयास्यन्तं धनंजयम्‌,जनमेजय! प्रभो! उस समय यात्रा करते हुए कुरुश्रेष्ठ अर्जुनको देखनेके लिये बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सारा हस्तिनापुर वहाँ उमड़ आया था

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, হে বিভো! সেই সময় যাত্রারত কুরুশ্রেষ্ঠ ধনঞ্জয়কে দেখতে ইচ্ছুক হয়ে, শিশু থেকে বৃদ্ধ পর্যন্ত সমগ্র নগরী বাইরে বেরিয়ে এল।

Verse 10

तेषामन्योन्यसम्मर्दादूष्मेपत समजायत । दिदृक्षूणां हयं तं च तं चैव हयसारिणम्‌,यज्ञके घोड़े और उसके पीछे जानेवाले अर्जुनको देखनेकी इच्छासे लोगोंकी इतनी भीड़ इकट्टी हो गयी थी कि आपसकी धक्का-मुक्कीसे सबके बदनमें पसीने निकल आये

বৈশম্পায়ন বললেন—যজ্ঞাশ্ব এবং তার অনুসারী অশ্বারোহী অর্জুনকে দেখার আগ্রহে জনসমুদ্র এমন ঘন হল যে পরস্পরের ধাক্কাধাক্কিতে সবার দেহে ঘাম ফুটে উঠল।

Verse 11

ततः शब्दो महाराज दिश: खं प्रति पूरयन्‌ । बभूव प्रेक्षतां नृणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम्‌,महाराज! उस समय कुन्तीपुत्र धनंजयका दर्शन करनेवाले लोगोंके मुखसे जो शब्द निकलता था, वह सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशगमें गूँज रहा था

বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহারাজ! কুন্তীপুত্র ধনঞ্জয়কে দেখামাত্র দর্শকদের মুখ থেকে যে জয়ধ্বনি উঠল, তা দিকদিগন্ত ভরে আকাশে প্রতিধ্বনিত হল।

Verse 12

एष गच्छति कौन्तेय तुरगश्चैव दीप्तिमान्‌ यमन्वेति महाबाहु: संस्पृशन्‌ धनुरुत्तमम्‌,(लोग कहते थे--) *ये कुन्तीकुमार अर्जुन जा रहे हैं और वह दीप्तिमान्‌ अश्व जा रहा है, जिसके पीछे महाबाहु अर्जुन उत्तम धनुष धारण किये जा रहे हैं!

লোকেরা বলত— “দেখো, কুন্তীপুত্র অর্জুন এগিয়ে যাচ্ছেন, আর সেই দীপ্তিমান অশ্বও যাচ্ছে; তার পশ্চাতে মহাবাহু অর্জুন শ্রেষ্ঠ ধনুকে হাত রেখে অনুসরণ করছেন।”

Verse 13

एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधी: । स्वस्ति ते<स्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत,उदारबुद्धि अर्जुनने परस्पर वार्तालाप करते हुए लोगोंकी बातें इस प्रकार सुनीं -- भारत! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सुखसे जाओ और पुनः कुशलपूर्वक लौट आओ"

এভাবে উদারবুদ্ধি, অজেয় অর্জুন জনতার কথাবার্তা শুনলেন— “হে ভারত, তোমার মঙ্গল হোক। তুমি নিরাপদে, অক্ষতভাবে যাত্রা করো এবং পরে সুস্থভাবে ফিরে এসো।”

Verse 14

अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमब्रुवन्‌ । नैनं पश्याम सम्मर्दे धनुरेतत्‌ प्रदृश्यते,निवृत्तमेनं द्रक्ष्याम: पुनरेष्यति च ध्रुवम्‌ । नरेन्द्र! दूसरे लोग ये बातें कहते थे--“इस भीड़में हम अर्जुनको तो नहीं देखते हैं; किंतु उनका यह धनुष दिखायी देता है। यही वह भयंकर टंकार करनेवाला विख्यात गाण्डीव धनुष है। अर्जुनकी यात्रा सकुशल हो। उन्हें मार्गमें कोई कष्ट न हो। ये निर्भय मार्गपर आगे बढ़ते रहें। ये निश्चय ही कुशलपूर्वक लौटेंगे और उस समय हम फिर इनका दर्शन करेंगे”

তারপর অন্য লোকেরা বলল— “হে নরেন্দ্র! এই ভিড়ে আমরা অর্জুনকে দেখতে পাচ্ছি না, কিন্তু তাঁর ধনুকটি দেখা যাচ্ছে। তিনি ফিরে এলে আমরা আবার তাঁকে দেখব; কারণ তিনি নিশ্চয়ই প্রত্যাবর্তন করবেন।”

Verse 15

एतद्धि भीमनिर्द विश्रुतं गाण्डिवं धनुः । स्वस्ति गच्छत्वरिष्टो वै पनथानमकुतो भयम्‌

এটাই সেই ভয়ংকর ধ্বনিসম্পন্ন, প্রসিদ্ধ গাণ্ডীব ধনুক। এটি মঙ্গলসহ, অক্ষতভাবে নিজের পথে যাক—কোনো দিক থেকেই যেন ভয় না থাকে।

Verse 16

एवमाद्या मनुष्याणां स्त्रीणां च भरतर्षभ

বৈশম্পায়ন বললেন— “হে ভরতশ্রেষ্ঠ! মানুষের মধ্যেও এবং নারীদের মধ্যেও আদিকাল থেকেই এমনই (উক্তি/আশীর্বাদ) প্রচলিত ছিল।”

Verse 17

याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्न कुशलो यज्ञकर्मणि

বৈশম্পায়ন বললেন—তিনি যাজ্ঞবল্ক্যের শিষ্য ছিলেন এবং যজ্ঞের ক্রিয়া ও বিধিবিধানে দক্ষ ছিলেন।

Verse 18

ब्राह्मणाश्ष महीपाल बहवो वेदपारगा:,महाराज! प्रजानाथ! उनके सिवा और भी बहुत-से वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणों और क्षत्रियोंने धर्मराजकी आज्ञासे विधिपूर्वक महात्मा अर्जुनका अनुसरण किया

বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহীপাল! বেদে পারদর্শী বহু ব্রাহ্মণ সঙ্গে চললেন। হে মহারাজ, প্রজানাথ! তাঁদের ছাড়াও বেদবিদ্যায় সুপণ্ডিত বহু ব্রাহ্মণ ও ক্ষত্রিয় ধর্মরাজের আদেশে বিধিপূর্বক মহাত্মা অর্জুনকে অনুসরণ করলেন।

Verse 19

अनुजममुर्महात्मान क्षत्रियाश्व विशाम्पते । विधिवत्‌ पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात्‌,महाराज! प्रजानाथ! उनके सिवा और भी बहुत-से वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणों और क्षत्रियोंने धर्मराजकी आज्ञासे विधिपूर्वक महात्मा अर्जुनका अनुसरण किया

বৈশম্পায়ন বললেন—হে প্রজানাথ! বহু ক্ষত্রিয় ও পৃথিবীপাল ধর্মরাজের আদেশে বিধিপূর্বক সেই মহাত্মা কনিষ্ঠ ভ্রাতা অর্জুনকে অনুসরণ করলেন। তাঁদের সঙ্গে বেদে পারদর্শী বহু ব্রাহ্মণও ধর্মরাজের নির্দেশ মান্য করে সহযাত্রী হলেন।

Verse 20

पाण्डवै: पृथिवीम श्वो निर्जितामस्त्रतेजसा । चचार स महाराज यथादेशं च सत्तम,महाराज! साधुशिरोमणे! पाण्डवोंने अपने अस्त्रके प्रतापसे जिस पृथ्वीको जीता था, उसके सभी देशोंमें वह अश्व क्रमश: विचरण करने लगा

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজশ্রেষ্ঠ! পাণ্ডবেরা অস্ত্রের তেজে যে পৃথিবী জয় করেছিলেন, সেই সকল দেশে আদেশমতো সেই যজ্ঞাশ্ব ক্রমে ক্রমে বিচরণ করতে লাগল।

Verse 21

तत्र युद्धानि वृत्तानि यान्यासन्‌ पाण्डवस्य ह । तानि वक्ष्यामि ते वीर विचित्राणि महान्ति च,वीर! उन देशोंमें अर्जुनको जो बड़े-बड़े अद्भुत युद्ध करने पड़े, उनकी कथा तुम्हें सुना रहा हूँ

বৈশম্পায়ন বললেন—হে বীর! সেখানে পাণ্ডব (অর্জুন)-এর যে বিচিত্র ও মহান যুদ্ধসমূহ সংঘটিত হয়েছিল, সেগুলি এখন আমি তোমাকে বলছি।

Verse 22

स हय: पृथिवीं राजन्‌ प्रदक्षिणमवर्तत । ससारोत्तरत: पूर्व तन्निबोध महीपते

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! সেই যজ্ঞীয় অশ্ব পৃথিবীকে প্রদক্ষিণ করতে লাগল। প্রথমে সে উত্তরদিকে গেল, তারপর পূর্বদিকে অগ্রসর হল। হে ভূমিপতি, এ কথা হৃদয়ে ধারণ করো।

Verse 23

अवमृदनन्‌ स राष्ट्राणि पार्थिवानां हयोत्तम: । शनैस्तदा परिययोौ श्वेताश्वक्ष महारथ:

বৈশম্পায়ন বললেন—শ্রেষ্ঠ অশ্বটি নানা পার্থিব নৃপতির রাজ্য পদদলিত করতে করতে ধীরে ধীরে অগ্রসর হল; আর মহারথী শ্বেতাশ্বকেতুও তার সঙ্গে সঙ্গে চলল।

Verse 24

पृथ्वीनाथ! वह घोड़ा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करने लगा। सबसे पहले वह उत्तर दिशाकी ओर गया। फिर राजाओंके अनेक राज्योंको रौंदता हुआ वह उत्तम अश्व॒ पूर्वकी ओर मुड़ गया। उस समय श्वेतवाहन महारथी अर्जुन धीरे-धीरे उसके पीछे-पीछे जा रहे थे ।। तत्र संगणना नास्ति राज्ञामयुतशस्तदा । येड्युध्यन्त महाराज क्षत्रिया हतबान्धवा:,महाराज! महाभारत-युद्धमें जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, ऐसे जिन-जिन क्षत्रियोंने उस समय अर्जुनके साथ युद्ध किया था, उन हजारों नरेशोंकी कोई गिनती नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—হে পৃথিবীনাথ! সেই যজ্ঞীয় অশ্ব পৃথিবীকে প্রদক্ষিণ করতে লাগল। প্রথমে সে উত্তরদিকে গেল; তারপর বহু রাজার নানা রাজ্য পদদলিত করতে করতে সেই শ্রেষ্ঠ অশ্ব পূর্বদিকে মোড় নিল। তখন শ্বেতবাহন মহারথী অর্জুন ধীরে ধীরে তার পিছু পিছু চলছিলেন। সে সময় রাজাদের সংখ্যা গণনা করা যায় না—অযুত অযুত; হে মহারাজ, মহাভারতযুদ্ধে যাদের স্বজন নিহত হয়েছিল, সেই সব ক্ষত্রিয়রা অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধ করতে উঠে দাঁড়াল।

Verse 25

किराता यवना राजन्‌ बहवो5सिथनुर्धरा: । म्लेच्छाश्षान्ये बहुविधा: पूर्व ये निकृता रणे,राजन्‌! तलवार और धनुष धारण करनेवाले बहुत-से किरात, यवन और म्लेच्छ, जो पहले महाभारत-युद्धमें पाण्डवोंद्वारा परास्त किये गये थे, अर्जुनका सामना करनेके लिये आये

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! তলোয়ার ও ধনুকধারী বহু কিরাত ও যবন, এবং নানা প্রকারের অন্যান্য ম্লেচ্ছ—যারা পূর্বে যুদ্ধে পরাজিত হয়েছিল—এবার অর্জুনের মোকাবিলায় এগিয়ে এল।

Verse 26

आर्याश्न पृथिवीपाला: प्रहृष्टनरवाहना: । समीयु: पाण्डुपुत्रेण बहवो युद्धदुर्मदा:

বৈশম্পায়ন বললেন—অনেক আর্য ভূ-পাল, আনন্দোচ্ছ্বাসে নিজেদের সৈন্য ও বাহনসহ, যুদ্ধের উন্মাদ গর্বে উদ্ধত হয়ে পাণ্ডুপুত্রের সঙ্গে এসে মিলিত হল।

Verse 27

हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों और वाहनोंसे युक्त बहुत-से रणदुर्मद आर्य नरेश भी पाण्डुपुत्र अर्जुनसे भिड़े थे ।। एवं वृत्तानि युद्धानि तत्र तत्र महीपते । अर्जुनस्य महीपालैर्नानादेशसमागतै:,पृथ्वीनाथ! इस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानोंमें नाना देशोंसे आये हुए राजाओंके साथ अर्जुनको अनेक बार युद्ध करने पड़े

বৈশম্পায়ন বললেন—আনন্দিত ও সুপুষ্ট সৈন্য-অশ্ব-রথে সমৃদ্ধ, যুদ্ধগর্বে উদ্ধত বহু আর্য নৃপতিও পাণ্ডুপুত্র অর্জুনের সঙ্গে সংঘর্ষে লিপ্ত হয়েছিল। হে পৃথিবীপতি, এভাবে স্থানে স্থানে নানা দেশ থেকে আগত রাজাদের সঙ্গে অর্জুনকে বারংবার যুদ্ধ করতে হয়েছে।

Verse 28

यानि तूभयतो राजन प्रतप्तानि महान्ति च | तानि युद्धानि वक्ष्यामि कौन्तेयस्य तवानघ,निष्पाप नरेश! जो युद्ध दोनों पक्षके योद्धाओंके लिये अधिक कष्टदायक और महान्‌ थे, अर्जुनके उन्हीं युद्धोंका मैं यहाँ तुमसे वर्णन करूँगा

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, যে যুদ্ধগুলি উভয় পক্ষের জন্যই অত্যন্ত দুঃসহ এবং মহত্তর ছিল, হে নিষ্পাপ নরপতি, কৌন্তেয় অর্জুনের সেই যুদ্ধগুলিই আমি এখন তোমাকে বর্ণনা করব।

Verse 72

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्वमेधिकपरववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वरमें यज्ञसामग्रीका सम्पादनविषयक बह्त्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের আশ্বমেধিক পর্বের অন্তর্গত অনুগীতা-পর্বে যজ্ঞসামগ্রী সংগ্রহ ও প্রস্তুতি-বিষয়ক বাহাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 73

इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे त्रिसप्ततितमो<5ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের আশ্বমেধিক পর্বে অনুগীতা-পর্বের অন্তর্গত অশ্বানুসরণ-প্রসঙ্গে তিয়াত্তরতম অধ্যায়।

Verse 153

निवृत्तमेनं द्रक्ष्याम: पुनरेष्यति च ध्रुवम्‌ । नरेन्द्र! दूसरे लोग ये बातें कहते थे--“इस भीड़में हम अर्जुनको तो नहीं देखते हैं; किंतु उनका यह धनुष दिखायी देता है। यही वह भयंकर टंकार करनेवाला विख्यात गाण्डीव धनुष है। अर्जुनकी यात्रा सकुशल हो। उन्हें मार्गमें कोई कष्ट न हो। ये निर्भय मार्गपर आगे बढ़ते रहें। ये निश्चय ही कुशलपूर्वक लौटेंगे और उस समय हम फिर इनका दर्शन करेंगे”

বৈশম্পায়ন বললেন—“তিনি ফিরে এলে আমরা তাঁকে আবার দেখব; তিনি নিশ্চয়ই প্রত্যাবর্তন করবেন।” হে নরেন্দ্র, লোকেরা পরস্পরে বলছিল—“এই ভিড়ের মধ্যে আমরা অর্জুনকে দেখি না, কিন্তু তাঁর ধনুক স্পষ্ট দেখা যাচ্ছে। এটাই সেই প্রসিদ্ধ গাণ্ডীব—ভয়ংকর টংকারধ্বনিতে গর্জনকারী। অর্জুনের যাত্রা মঙ্গলময় হোক; পথে তাঁর কোনো কষ্ট না আসুক। তিনি নির্ভয়ে পথ ধরে অগ্রসর হোন। তিনি নিশ্চয়ই কুশলে ফিরে আসবেন, তখন আমরা আবার তাঁর দর্শন পাব।”

Verse 166

शुश्राव मधुरा वाच: पुन: पुनरुदारधी: । भरतश्रेष्ठ) इस प्रकार उदारबुद्धि अर्जुन स्त्रियों और पुरुषोंकी कही हुई मीठी-मीठी बातें बारंबार सुनते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—ভারতশ্রেষ্ঠ উদারবুদ্ধি অর্জুন নারী-পুরুষের উচ্চারিত মধুর বাক্য বারংবার শ্রবণ করলেন।

Verse 176

प्रायात्‌ पार्थेन सहित: शान्त्यर्थ वेदपारग: । याज्ञवल्क्य मुनिके एक विद्वान्‌ शिष्य, जो यज्ञकर्ममें कुशल तथा वेदोंमें पारंगत थे, विघ्नकी शान्तिके लिये अर्जुनके साथ गये

বৈশম্পায়ন বললেন—বেদে পারদর্শী ও যজ্ঞকর্মে নিপুণ এক বিদ্বান শিষ্য বিঘ্নশান্তির উদ্দেশ্যে পার্থের (অর্জুনের) সঙ্গে যাত্রা করল।

Frequently Asked Questions

Arjuna must enforce sacrificial sovereignty through force while honoring Yudhiṣṭhira’s restraint toward bereaved rulers; the chapter stages the tension between necessary defense and the prohibition of vengeance-driven excess.

Legitimate power is demonstrated by controlled force: warn first, fight only when compelled, and end hostilities upon submission—transforming victory into stable order rather than prolonged punitive violence.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-significance is implicit, presenting restraint, protection of life after compliance, and disciplined kingship as ethically superior outcomes within the post-war framework.