
Mind as Charioteer; Kṣetrajña, Tapas, and Dhyāna-Yoga (Adhyātma-Upadeśa)
Upa-parva: Ādhyātmika-Upadeśa (Mind–Intellect–Kṣetrajña Discourse within Āśvamedhika Parva)
This chapter compiles an adhyātmika instruction attributed to Brahmā and relayed through a guru–disciple frame. It opens by defining mind (manas) as the governing principle over the five elements and as the constant superintendent of beings; intellect (buddhi) is presented as the indicator of sovereignty, while the kṣetrajña is named as the universal knower. A chariot allegory structures the psychology of agency: senses are yoked like horses by the mind, while the kṣetrajña continually yokes mind and intellect; the embodied complex is depicted as a ‘brahma-made chariot’ whose mastery prevents delusion. The discourse then sketches a cosmological tableau (from the unmanifest to particulars) and explains dissolution: beings resolve into qualities, and qualities into the five great elements, cyclically. Creation is linked to Prajāpati’s tapas, and tapas is praised as the root means for difficult attainments, purification, and ascent; meditative yoga with non-possessiveness and absence of ego is said to lead to an ‘unmanifest’ and ‘supreme’ state. The chapter distinguishes karmic generation of embodied beings from the knowledge-nature of the puruṣa, urging dispassion toward action and the abandonment of conceptual constructions. It defines marks of clarity (prasāda) and describes the ‘path of the liberated’ as equanimity, non-craving, and universal sameness of vision. The frame closes with Kṛṣṇa explaining to Arjuna that he is the guru and the mind is the disciple, urging disciplined practice; the narrative then turns to practical movement toward the capital and consultation with Yudhiṣṭhira.
Chapter Arc: ब्रह्मा-स्वर में उपदेश का आरम्भ होता है—सत्त्व और पुरुष की भिन्नता को समझो; अहिंसा को समस्त प्राणियों के प्रति परम कर्तव्य मानो; और जानो कि ‘ज्ञान’ ही निःश्रेयस का मार्ग है। → श्रोता के मन में सूक्ष्म जिज्ञासा तीव्र होती जाती है: यदि जगत पंचमहाभूतों के गुणों से बना है, तो भोगने वाला कौन है? सत्त्व (भोग्य प्रकृति) और पुरुष (भोक्ता चेतना) का संयोग कैसे बन्धन बनता है, और उससे छूटने का उपाय क्या है? → निर्णायक प्रतिपादन होता है—शुद्ध ज्ञान से ही समस्त किल्बिषों से मुक्ति है; पंचमहाभूतों के गुण-क्रम (आकाश-शब्द, वायु-शब्द/स्पर्श, तेज-शब्द/स्पर्श/रूप, आदि) का विश्लेषण कर यह दिखाया जाता है कि गुणों का यह विस्तार भोग्य क्षेत्र है, जबकि बुद्धिमानों की गति ध्यान-रथ के समान तीव्र होकर उसी परमात्मा की ओर जाती है। → उपदेश का निष्कर्ष स्थिर होता है: अहिंसा आचरण का शिखर है, और विवेक-जन्य ज्ञान साधना का शिखर; सत्त्व-पुरुष का भेद जानकर, गुणों के आकर्षण से ऊपर उठकर, साधक परम कल्याण की दिशा में अग्रसर होता है। → गुणों के सूक्ष्म भेद (रूप/स्पर्श आदि के अनेक प्रकार) का विस्तार आगे भी साधक को विवेक-मार्ग पर टिकाए रखने के लिए संकेतित रहता है।
Verse 1
ऑपन-माज बक। डे पजञ्चाशत्तमो<्ध्याय: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमानकी प्रशंसा, पज्चभूतोंके गुणोंका हे मजे परमात्माकी श्रेष्ठताका व ब्रह्मोवाच हन्त व: संप्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छथ सत्तमा: । गुरुणा शिष्यमासाद्य यदुक्त तन्निबोधत,ब्रह्माजी बोले--श्रेष्ठ महर्षियो! तुमलोगोंने जो विषय पूछा है, उसे अब मैं कहूँगा। गुरुने सुयोग्य शिष्यको पाकर जो उपदेश दिया है, उसे तुमलोग सुनो
ব্রহ্মা বললেন—হে শ্রেষ্ঠ ঋষিগণ! তোমরা যা আমাকে জিজ্ঞাসা করেছ, তা এখন আমি বলছি। গুরু যোগ্য শিষ্যকে পেয়ে যে উপদেশ দেন, তা মনোযোগ দিয়ে শোনো।
Verse 2
समस्तमिह तच्छुत्वा सम्यगेवावधार्यताम् | अहिंसा सर्वभूतानामेतत् कृत्यतमं मतम्
এখানে এই সমস্ত কথা শুনে তা যথাযথভাবে উপলব্ধি করে হৃদয়ে দৃঢ় করো—সকল জীবের প্রতি অহিংসাই সর্বোচ্চ কর্তব্য বলে মানা হয়।
Verse 3
ज्ञानं निःश्रेय इत्याहुर्वद्धा निश्चितदर्शिन:
বায়ু বললেন—যাঁদের দৃষ্টি স্থির ও নিশ্চিত, সেই জ্ঞানী বৃদ্ধগণ বলেন: সত্য জ্ঞানই নৈঃশ্রেয়স—পরম কল্যাণ ও মুক্তির পথ।
Verse 4
हिंसापराश्न ये केचिद् ये च नास्तिकवृत्तय: । लोभमोहसमायुक्तास्ते वै निरयगामिन:,जो लोग प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, नास्तिक-वृत्तिका आश्रय लेते हैं और लोभ तथा मोहमें फँसे हुए हैं, उन्हें नरकमें गिरना पड़ता है
বায়ু বললেন—যারা জীবহিংসায় আসক্ত, যারা নাস্তিক-প্রবৃত্তি অবলম্বন করে, এবং যারা লোভ ও মোহে আবদ্ধ—তারা নিঃসন্দেহে নরকগামী।
Verse 5
आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिता: । तेडस्मिल्लॉके प्रमोदन््ते जायमाना: पुन: पुन:,जो लोग सावधान होकर सकाम कर्मोका अनुष्ठान करते हैं, वे बार-बार इस लोकमें जन्म ग्रहण करके सुखी होते हैं
বায়ু বললেন—যারা সতর্ক ও অক্লান্ত হয়ে আশীর্বাদ-সহিত কাম্যকর্ম সম্পাদন করে, তারা বারংবার এই লোকেই জন্ম নিয়ে এখানে পুনঃপুনঃ সুখ ভোগ করে।
Verse 6
कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चित: । अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीरा: साधुदर्शिन:,जो विद्वान् समत्वयोगमें स्थित हो श्रद्धाके साथ कर्तव्य-कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और उनके फलमें आसक्त नहीं होते, वे धीर और उत्तम दृष्टिवाले माने गये हैं
বায়ু বললেন—যে জ্ঞানীরা শ্রদ্ধাসহ কর্তব্যকর্ম সম্পাদন করেন, যোগে সংযত থাকেন এবং ফলাকাঙ্ক্ষা থেকে মুক্ত—তাঁরা ধীর ও সদ্দর্শী বলে গণ্য হন।
Verse 7
अतः: पर प्रवक्ष्यामि सच्त्वक्षेत्रज्ञयोर्यथा । संयोगो विप्रयोगश्न तन्निबोधत सत्तमा:,श्रेष्ठ महर्षियो! अब मैं यह बता रहा हूँ कि सत्त्व और क्षेत्रज्षका परस्पर संयोग और वियोग कैसे होता है? इस विषयको ध्यान देकर सुनो
অতএব এখন আমি যথাক্রমে বলছি—সত্ত্ব ও ক্ষেত্রজ্ঞের সংযোগ ও বিযুক্তি কীভাবে ঘটে। হে সৎজনগণ, হে শ্রেষ্ঠ মহর্ষিগণ, মনোযোগ দিয়ে এই উপদেশ শ্রবণ করো।
Verse 8
विषयो विषयित्वं च सम्बन्धो5यमिहोच्यते । विषयी पुरुषो नित्यं सत्त्वं च विषय: स्मृत:,इन दोनोंमें यहाँ यह विषय-विषयिभाव सम्बन्ध माना गया है। इनमें पुरुष तो सदा विषयी और सत्त्व विषय माना जाता है
এখানে ‘বিষয়’ ও ‘বিষয়ী’-র সম্পর্কই বলা হয়েছে। এ যুগলে পুরুষ চিরকাল বিষয়ী, আর সত্ত্বকে বিষয় বলে গণ্য করা হয়।
Verse 9
व्याख्यातं पूर्वकल्पेन मशकोदुम्बरं यथा । भुज्यमानं न जानीते नित्यं सत्त्वमचेतनम् । यस्त्वेवं तं विजानीते यो भुड्धक्ते यश्व भुज्यते,पूर्व अध्यायमें मच्छर और गूलरके उदाहरणसे यह बात बतायी जा चुकी है कि भोगा जानेवाला अचेतन सत्त्व नित्य-स्वरूप क्षेत्रज्षको नहीं जानता, किंतु जो क्षेत्रज्ञ है वह इस प्रकार जानता है कि जो भोगता है वह आत्मा है और जो भोगा जाता है, वह सत्त्व है
পূর্বে মশা ও উদুম্বরের দৃষ্টান্তে যেমন ব্যাখ্যা করা হয়েছে, তেমনি ভোগ্য—অচেতন সত্ত্ব—নিত্য ক্ষেত্রজ্ঞকে জানে না। কিন্তু ক্ষেত্রজ্ঞ যথার্থ জানে—যে ভোগ করে সে আত্মা, আর যা ভোগ্য তা সত্ত্ব।
Verse 10
नित्यं द्वन्द्धसमायुक्तं सत्त्वमाहुर्मनीषिण: । निर्दचन्दो निष्कलो नित्य: क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मक:,मनीषी पुरुष सत्त्वको द्वन्धयुक्त कहते हैं और क्षेत्रज्ञ निर्दन्द्ध, निष्कल, नित्य और निर्मुणस्वरूप है
মনীষীরা বলেন, সত্ত্ব সর্বদা দ্বন্দ্বে আবদ্ধ; কিন্তু ক্ষেত্রজ্ঞ দ্বন্দ্বাতীত, নিষ্কল, নিত্য এবং নির্গুণস্বভাব।
Verse 11
सम॑ संज्ञानुगश्वचैव स सर्वत्र व्यवस्थित: । उपभुड्धक्ते सदा सत्त्वमप: पुष्करपर्णवत्,वह क्षेत्रज्ञ समभावसे सर्वत्र भलीभाँति स्थित हुआ ज्ञानका अनुसरण करता है। जैसे कमलका पत्ता निर्लिप्त रटरकर जलको धारण करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ सदा सत्त्वका उपभोग करता है
সেই ক্ষেত্রজ্ঞ সমভাব নিয়ে সর্বত্র প্রতিষ্ঠিত থেকে জ্ঞানের অনুসরণ করে। যেমন পদ্মপাতা অলিপ্ত থেকে জল ধারণ করে, তেমনি সে সর্বদা সত্ত্বকে উপভোগ করে।
Verse 12
सर्वैरपि गुणैरविंद्वान् व्यतिषक्तो न लिप्यते | जलबिन्दुर्यथा लोल: पद्मिनीपत्रसंस्थित:
বায়ুদেব বললেন—সকল প্রকার গুণ ও অবস্থার মধ্যে পরিবেষ্টিত হয়েও যে অনাসক্ত থাকে, সে তাতে লিপ্ত হয় না। যেমন পদ্মপাতায় স্থিত কম্পমান জলবিন্দু পাতায় আঁটে না, তেমনি জ্ঞানী সংসারে থেকেও সংসর্গে কলুষিত হয় না।
Verse 13
द्रव्यमात्रभूत् सत्त्वं पुरुषस्येति निश्चय:
বায়ু বললেন—নিশ্চিত সিদ্ধান্ত এই যে, পুরুষের ‘সত্ত্ব’ কেবল দ্ৰব্যমাত্র—বস্তুর মধ্যে আর-একটি বস্তু মাত্র।
Verse 14
यथा प्रदीपमादाय कश्चित् तमसि गच्छति । तथा सन्त्वप्रदीपेन गच्छन्ति परमैषिण:,जैसे कोई मनुष्य दीपक लेकर अन्धकारमें चलता है, वैसे ही परम तत्त्वको चाहनेवाले साधक सत्त्वरूप दीपकके प्रकाशमें साधनमार्गपर चलते हैं
যেমন কেউ প্রদীপ হাতে অন্ধকারে চলে, তেমনই পরম তত্ত্বের অন্বেষীরা সত্ত্বরূপ প্রদীপের আলোয় সাধনার পথে অগ্রসর হয়।
Verse 15
यावद् द्रव्यं गुणस्तावत् प्रदीप: सम्प्रकाशते । क्षीणे द्रव्ये गुणे ज्योतिरन्तर्धानाय गच्छति,जबतक दीपकमें द्रव्य और गुण रहते हैं, तभीतक वह प्रकाश फैलाता है। द्रव्य और गुणका क्षय हो जानेपर ज्योति भी अन्तर्धान हो जाती है
বায়ুদেব বললেন—যতক্ষণ প্রদীপে দ্ৰব্য ও তাকে ধারণকারী গুণ থাকে, ততক্ষণ সে আলো দেয়। দ্ৰব্য ও গুণ ক্ষয় হলে জ্যোতিও অন্তর্ধানে যায়।
Verse 16
व्यक्त: सत्त्वगुणस्त्वेवं पुरुषोडव्यक्त इष्यते । एतद् विप्रा विजानीत हन्त भूयो ब्रवीमि व:,ब्रह्माजीका ऋषियोंको उपदेश इस प्रकार सत्त्वगुण तो व्यक्त है और पुरुष अव्यक्त माना गया है। ब्रह्मर्षियो! इस तत्त्वको समझो। अब मैं तुमलोगोंसे आगेकी बात बताता हूँ
ব্রহ্মা ঋষিদের বললেন—এইরূপে সত্ত্বগুণ ‘ব্যক্ত’ এবং পুরুষ ‘অব্যক্ত’ বলে মানা হয়। হে বিপ্রগণ, এ কথা জেনে নাও; এখন আমি তোমাদের আরও বলছি।
Verse 17
सहस्नेणापि दुर्मेधा न बुद्धिमधिगच्छति । चतुर्थेनाप्यथांशेन बुद्धिमान् सुखमेधते,जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, उसे हजार उपाय करनेपर भी ज्ञान नहीं होता और जो बुद्धिमान् है वह चौथाई प्रयत्नसे भी ज्ञान पाकर सुखका अनुभव करता है
হাজার চেষ্টা করেও যার বোধ দুর্বল, সে সত্যবুদ্ধি লাভ করে না; কিন্তু যে বুদ্ধিমান, সে চতুর্থাংশ প্রচেষ্টাতেই জ্ঞান পেয়ে কল্যাণে বিকশিত হয়।
Verse 18
एवं धर्मस्य विज्ञेयं संसाधनमुपायत: । उपायज्ञो हि मेधावी सुखमत्यन्तमश्लुते,ऐसा विचारकर किसी उपायसे धर्मके साधनका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि उपायको जाननेवाला मेधावी पुरुष अत्यन्त सुखका भागी होता है
এভাবে বিচার করে উপায়ের দ্বারা ধর্মসাধনের জ্ঞান অর্জন করা উচিত; কারণ উপায়জ্ঞ মেধাবী পুরুষ পরম সুখ লাভ করে।
Verse 19
यथाध्वानमपाथेय: प्रपन्नो मनुज: क्वचित् । क्लेशेन याति महता विनश्येदन्तरापि च,जैसे कोई मनुष्य यदि राह-खर्चका प्रबन्ध किये बिना ही यात्रा करता है तो उसे मार्ममें बहुत क्लेश उठाना पड़ता है अथवा वह बीचहीमें मर भी सकता है
যেমন কোনো মানুষ পথের রসদ না নিয়ে যাত্রা করলে সে মহাকষ্টে এগোয় এবং মাঝপথেই বিনষ্টও হতে পারে।
Verse 20
तथा कर्मसु विज्ञेयं फलं भवति वा न वा । पुरुषस्यात्मनि:श्रेय: शुभाशुभनिदर्शनम्,ऐसे ही (पूर्वजन्मोंके पुण्योंसे हीन पुरुष) योगमार्गके साधनमें लगनेपर योगसिद्धिरूप फल कठिनतासे पाता है अथवा नहीं भी पाता। पुरुषका अपना कल्याण-साधन ही उसके पूर्वजन्मके शुभाशुभ-संस्कारोंको बतानेवाला है
তেমনি কর্মের ক্ষেত্রে বুঝতে হবে—ফল হতে পারে, নাও হতে পারে। মানুষের অন্তর্নিহিত পরম কল্যাণই পূর্বজন্মের শুভ-অশুভ সংস্কারের নির্দেশক।
Verse 21
यथा च दीर्घमध्वानं पद्भ्यामेव प्रपद्यते । अदृष्टपूर्व सहसा तत्त्वदर्शनवर्जित:,जैसे पहले न देखे हुए दूरके रास्तेपर जब मनुष्य सहसा पैदल ही चल पड़ता है (तो वह अपने गन्तव्य स्थानपर नहीं पहुँच पाता), यही दशा तत्त्वज्ञानसे रहित अज्ञानी पुरुषकी होती है
যেমন আগে না-দেখা দীর্ঘ পথে মানুষ হঠাৎ কেবল পায়ের ভরসায় বেরোলে গন্তব্যে পৌঁছায় না; তেমনি তত্ত্বদর্শনহীন অজ্ঞ ব্যক্তি সত্য লক্ষ্য লাভ করতে পারে না।
Verse 22
तमेव च यथाध्यानं रथेनेहाशुगामिना । गच्छत्यश्वप्रयुक्तेन तथा बुद्धिमतां गति:
বায়ু বললেন—যেমন একাগ্র ধ্যানের দ্বারা সেই অভীষ্ট লক্ষ্যেই পৌঁছানো যায়, তেমনই এই জগতে অশ্বযোজিত দ্রুতগামী রথে চড়ে মানুষ দ্রুত অগ্রসর হয়। তদ্রূপ জ্ঞানীদের গতি—সংযত ও সুপরিচালিত বুদ্ধি দিয়ে নির্দিষ্ট উদ্দেশ্যের দিকে এগিয়ে যাওয়া।
Verse 23
रथेन रथिनं पश्य क्लिश्यमानमचेतनम्,देखो, रथके द्वारा जानेवाला भी मूर्ख मनुष्य ऊँचे पर्वतके पास पहुँचकर कष्ट पाता रहता है, किंतु बुद्धिमान् मनुष्य जहाँतक रथ जानेका मार्ग है वहाँतक रथसे जाता है और जब रथका रास्ता समाप्त हो जाता है तब वह उसे छोड़कर पैदल यात्रा करता है
বায়ু বললেন—রথে বহন হয়েও সেই মূর্খকে দেখো, যে খাড়া পর্বতের কাছে পৌঁছে কষ্টই ভোগ করে। জ্ঞানী ব্যক্তি যতদূর রথপথ আছে ততদূর রথেই যায়; রথের পথ শেষ হলে সে রথ ত্যাগ করে পদব্রজে অগ্রসর হয়। উপায়-উপকরণ যথাযথভাবে ব্যবহার করতে হয়—সীমা ছাড়িয়ে আঁকড়ে ধরা নয়, আবার উপকারী হলে অকারণে ত্যাগও নয়।
Verse 24
यावद् रथपथस्तावदू रथेन स तु गच्छति । क्षीणे रथपदे विद्वान् रथमुत्सूज्य गच्छति,देखो, रथके द्वारा जानेवाला भी मूर्ख मनुष्य ऊँचे पर्वतके पास पहुँचकर कष्ट पाता रहता है, किंतु बुद्धिमान् मनुष्य जहाँतक रथ जानेका मार्ग है वहाँतक रथसे जाता है और जब रथका रास्ता समाप्त हो जाता है तब वह उसे छोड़कर पैदल यात्रा करता है
বায়ু বললেন—যতক্ষণ রথপথ আছে, ততক্ষণ সে রথেই যায়। রথের পথ ক্ষয় হলে জ্ঞানী রথ ত্যাগ করে অগ্রসর হয়। তেমনি মূর্খ একটিমাত্র উপায় আঁকড়ে ধরে ভূমির পরিবর্তনে কষ্ট পায়; কিন্তু ধীর ব্যক্তি পথের সীমা বুঝে উপায় বদলে নেয়।
Verse 25
एवं गच्छति मेधावी तत्त्वयोगविधानवित् । परिज्ञाय गुणज्ञश्न उत्तरादुत्तरोत्तरम्,इसी प्रकार तत्त्व और योगविधिको जाननेवाला बुद्धिमान एवं गुणज्ञ पुरुष अच्छी तरह समझ-बूझकर उत्तरोत्तर आगे बढ़ता जाता है
এইভাবে তত্ত্ব ও যোগবিধি-জ্ঞানসম্পন্ন মেধাবী ও গুণজ্ঞ ব্যক্তি গুণসমূহকে যথার্থভাবে বিচার করে, সুস্পষ্ট বোধ নিয়ে, ধাপে ধাপে উচ্চতর স্তরে অগ্রসর হয়।
Verse 26
एतत् पदमनुद्धिग्नं वरिष्ठ धर्मलक्षणम् । उस विषयको यहाँ पूर्णतया सुनकर अच्छी प्रकार धारण करो। सब प्राणियोंकी अहिंसा ही सर्वोत्तम कर्तव्य है--ऐसा माना गया है। यह साधन उद्देगरहित, सर्वश्रेष्ठ और धर्मको लक्षित करानेवाला है,यथार्णवं महाघोरमप्लव: सम्प्रगाहते । बाहुभ्यामेव सम्मोहाद् वर्ध वाउ्छत्यसंशयम् जैसे कोई पुरुष मोहवश बिना नावके ही भयंकर समुद्रमें प्रवेश करता है और दोनों भुजाओंसे ही तैरकर उसके पार होनेका भरोसा रखता है तो निश्चय ही वह अपनी मौत बुलाना चाहता है (उसी प्रकार ज्ञान-नौकाका सहारा लिये बिना मनुष्य भवसागरसे पार नहीं हो सकता)
বায়ু বললেন—এটাই উদ্বেগহীন পথ, ধর্মের সর্বোচ্চ লক্ষণ। এ কথা সম্পূর্ণ শুনে হৃদয়ে ধারণ করো। সকল প্রাণীর প্রতি অহিংসাই পরম ধর্ম বলে মানা হয়েছে। যেমন কেউ মোহবশত নৌকা ছাড়া ভয়ংকর মহাসমুদ্রে নেমে কেবল বাহুবলে সাঁতরে পার হবে বলে আশা করে—নিঃসন্দেহে সে ধ্বংসকেই আহ্বান করে; তেমনি সত্য জ্ঞানের নৌকার আশ্রয় ছাড়া কেউই সংসার-সমুদ্র পার হতে পারে না।
Verse 27
नावा चापि यथा प्राज्ञो विभागज्ञः स्वरित्रया । अश्रान्त: सलिले गच्छेच्छीघ्रं संतरते हृदम्,जिस तरह जलमार्गके विभागको जाननेवाला बुद्धिमान पुरुष सुन्दर डाँडवाली नावके द्वारा अनायास ही जलपर यात्रा करके शीघ्र समुद्रसे तर जाता है एवं पार पहुँच जानेपर नावकी ममता छोड़कर चल देता है; (उसी प्रकार संसार-सागरसे पार हो जानेपर बुद्धिमान् पुरुष पहलेके साधन-सामग्रीकी ममता छोड़ देता है।) यह बात रथपर चलनेवाले और पैदल चलनेवालेके दृष्टान्तसे पहले भी कही जा चुकी है
বায়ু বললেন—যেমন জলপথের শাখা-প্রশাখা জানে এমন প্রাজ্ঞ ব্যক্তি সুদৃঢ় দাঁড়ওয়ালা নৌকায় জলে ক্লান্তিহীনভাবে চলতে চলতে দ্রুত সেই বিস্তার পার হয়ে যায়, তেমনই বিবেকী জন সংসার-সমুদ্র অতিক্রম করে; আর দূর তীরে পৌঁছে যে উপায়ে পার হয়েছে, সেই উপায়ের প্রতিও আসক্তি ত্যাগ করে।
Verse 28
तीर्णो गच्छेत् परं पारं नावमुत्सृज्य निर्मम: । व्याख्यातं पूर्वकल्पेन यथा रथपदातिनो:,जिस तरह जलमार्गके विभागको जाननेवाला बुद्धिमान पुरुष सुन्दर डाँडवाली नावके द्वारा अनायास ही जलपर यात्रा करके शीघ्र समुद्रसे तर जाता है एवं पार पहुँच जानेपर नावकी ममता छोड़कर चल देता है; (उसी प्रकार संसार-सागरसे पार हो जानेपर बुद्धिमान् पुरुष पहलेके साधन-सामग्रीकी ममता छोड़ देता है।) यह बात रथपर चलनेवाले और पैदल चलनेवालेके दृष्टान्तसे पहले भी कही जा चुकी है
পার হয়ে গেলে মানুষকে পর তীরের দিকে এগিয়ে যেতে হবে—নৌকা ত্যাগ করে, মমতাহীন হয়ে। এ কথা পূর্বেই ব্যাখ্যাত হয়েছে—রথে চলা ও পদব্রজে চলার দৃষ্টান্তের মতো।
Verse 29
स्नेहात् सम्मोहमापन्नो नावि दाशो यथा तथा । ममत्वेनाभिभूत: संस्तत्रैव परिवर्तते,परंतु स्नेहवश मोहको प्राप्त हुआ मनुष्य ममतासे आबद्ध होकर नावपर सदा बैठे रहनेवाले मल्लाहकी भाँति वहीं चक्कर काटता रहता है
কিন্তু স্নেহের বশে মোহগ্রস্ত মানুষ ‘আমার’ বোধে পরাভূত হয়ে, নৌকায় বসে থাকা মাঝির মতো সেখানেই ঘুরপাক খেতে থাকে।
Verse 30
नावं न शक्यमारुह्ु स्थले विपरिवर्तितुम् । तथैव रथमारुहा नाप्सु चर्या विधीयते,नौकापर चढ़कर जिस प्रकार स्थलपर विचरण करना सम्भव नहीं है तथा रथपर चढ़कर जलमें विचरण करना सम्भव नहीं बताया गया है, इसी प्रकार किये हुए विचित्र कर्म अलग-अलग स्थानपर पहुँचानेवाले हैं। संसारमें जिनके द्वारा जैसा कर्म किया गया है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है
বায়ু বললেন—যেমন নৌকায় উঠে স্থলে চলা যায় না, আর যেমন রথে উঠে জলে চলা সম্ভব নয়, তেমনই জীবদের বিচিত্র কর্ম তাদের ভিন্ন ভিন্ন গন্তব্যে নিয়ে যায়।
Verse 31
एवं कर्म कृतं चित्र विषयस्थं पृथक् पृथक् । यथा कर्म कृतं लोके तथैतानुपपद्यते,नौकापर चढ़कर जिस प्रकार स्थलपर विचरण करना सम्भव नहीं है तथा रथपर चढ़कर जलमें विचरण करना सम्भव नहीं बताया गया है, इसी प्रकार किये हुए विचित्र कर्म अलग-अलग स्थानपर पहुँचानेवाले हैं। संसारमें जिनके द्वारा जैसा कर्म किया गया है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है
এইভাবে কর্ম নানাবিধ; প্রত্যেকটি নিজ নিজ ক্ষেত্রে পৃথক পৃথক ফল দেয়। এই জগতে যেমন কর্ম করা হয়, তেমনই ফল এসে পড়ে।
Verse 32
यन्नैव गन्धिनो रस्यं न रूपस्पर्शशब्दवत् । मन्यन्ते मुनयो बुद्धया तत् प्रधान प्रचक्षते,जो गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्दसे युक्त नहीं है तथा मुनिलोग बुद्धिके द्वारा जिसका मनन करते हैं, वह 'प्रधान” कहलाता है
যাহার গন্ধ ও রস নাই, এবং যাহা রূপ, স্পর্শ ও শব্দ-গুণে যুক্ত নহে—যাহাকে মুনিগণ বিবেকবুদ্ধিতে ধ্যান করেন—তাহাকেই তাঁহারা ‘প্রধান’ বলেন।
Verse 33
तत्र प्रधानमव्यक्तमव्यक्तस्य गुणो महान् । महत्प्रधानभूतस्य गुणो5हंकार एव च,प्रधानका दूसरा नाम अव्यक्त है। अव्यक्तका कार्य महत्तत्त्व है और प्रकृतिसे उत्पन्न महत्तत्त्वका कार्य अहंकार है
সেই ক্রমে প্রধানই ‘অব্যক্ত’। অব্যক্ত হইতে ‘মহৎতত্ত্ব’ উৎপন্ন হয়; আর প্রকৃতি-জাত সেই মহৎ হইতে ‘অহংকার’ই উদ্ভূত হয়।
Verse 34
अहंकारात् तु सम्भूतो महाभूतकृतो गुण: । पृथक्त्वेन हि भूतानां विषया वै गुणा: स्मृता:,अहंकारसे पञ्च महाभूतोंको प्रकट करनेवाले गुणकी उत्पत्ति हुई है। पठच महाभूतोंके कार्य हैं रूप, रस आदि विषय। वे पृथक्-पृथक् गुणोंके नामसे प्रसिद्ध हैं
অহংকার হইতে সেই গুণ-তত্ত্ব উৎপন্ন হয়, যাহা পঞ্চ মহাভূতকে প্রকাশ করে। আর ভূতসমূহের বিষয়—রূপ, রস প্রভৃতি—পৃথক্ পৃথক্ভাবেই ‘গুণ’ নামে স্মৃত।
Verse 35
बीजधर्म तथाव्यक्तं प्रसवात्मकमेव च । बीजधर्मा महानात्मा प्रसवश्चेति नः श्रुतम्,अव्यक्त प्रकृति कारणरूपा भी है और कार्यरूपा भी। इसी प्रकार महत्तत्त्वके भी कारण और कार्य दोनों ही स्वरूप सुने गये हैं
অব্যক্ত প্রকৃতি ‘বীজ-ধর্ম’যুক্তও বলা হয় এবং ‘প্রসব-ধর্ম’যুক্তও—অর্থাৎ কারণরূপও, সৃষ্টিপ্রবাহের উৎপাদকও। তদ্রূপ মহৎতত্ত্ব সম্বন্ধেও আমরা শুনিয়াছি যে তাহা বীজধর্মী এবং প্রসবধর্মী।
Verse 36
तस्माजउज्ञानेन शुद्धेन मुच्यते सर्वकिल्बिषै: । निश्चयको साक्षात् करनेवाले वृद्ध लोग कहते हैं कि "ज्ञान ही परम कल्याणका साधन है।” इसलिये परम शुद्ध ज्ञानके द्वारा ही मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है,बीजधर्मस्त्वहंकार: प्रसवश्च पुन: पुन: । बीजप्रसवधर्माणि महा भूतानि पञ्च वै अहंकार भी कारणरूप तो है ही, कार्यरूपमें भी बारम्बार परिणत होता रहता है। पठच महाभूतों (पञ्चतन्मात्राओं)-में भी कारणत्व और कार्यत्व दोनों धर्म हैं। वे शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं, इसलिये ऐसा कहा जाता है कि वे बीजधर्मी हैं
অতএব পরিশুদ্ধ জ্ঞানে মানুষ সর্ব কল্মষ হইতে মুক্ত হয়; যাঁহারা নিশ্চিত প্রত্যক্ষ উপলব্ধি লাভ করিয়াছেন, সেই বৃদ্ধজন বলেন—জ্ঞানই পরম কল্যাণের উপায়। অহংকার বীজধর্মী কারণও, আবার বারংবার কার্যরূপে পরিণতও হয়। তদ্রূপ পঞ্চ মহাভূতও বীজ ও প্রসব—উভয় ধর্মযুক্ত; শব্দ প্রভৃতি বিষয় উৎপন্ন করে বলিয়া তাহারা ‘বীজধর্মী’ নামে কথিত।
Verse 37
बीजधर्मिण इत्याहु: प्रसव॑ च प्रकुर्वते । विशेषा: पञ्चभूतानां तेषां चित्तं विशेषणम्,उन पाँचो भूतोंके विशेष कार्य शब्द आदि विषय हैं। उन विषयोंका प्रवर्तक चित्त है
বায়ু বললেন—এদের ‘বীজধর্মী’ বলা হয়, কারণ এরা সৃষ্টির প্রসব ঘটায়। পঞ্চ মহাভূতের বিশেষ কার্য হলো শব্দাদি বিষয়; আর সেই বিষয়গুলিকে প্রবৃত্ত করে ও নির্দিষ্ট রূপ দেয় চিত্ত।
Verse 38
तत्रैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते । त्रिगुणं ज्योतिरित्याहुरापश्चापि चतुर्गुणा:,पञ्चमहाभूतोंमेंसे आकाशमें एक ही गुण माना गया है। वायुके दो गुण बतलाये जाते हैं। तेज तीन गुणोंसे युक्त कहा गया है। जलके चार गुण हैं
বায়ুদেব বললেন—পঞ্চ মহাভূতের মধ্যে আকাশ একগুণবিশিষ্ট বলা হয়। বায়ু দ্বিগুণযুক্ত। তেজ ত্রিগুণসম্পন্ন বলা হয়েছে, আর জলও চতুর্গুণবিশিষ্ট বলে কথিত।
Verse 39
पृथ्वी पञ्चगुणा ज्ञेया चरस्थावरसंकुला । सर्वभूतकरी देवी शुभाशुभनिदर्शिनी,पृथ्वीके पाँच गुण समझने चाहिये। यह देवी स्थावर-जंगम प्राणियोंसे भरी हुई, समस्त जीवोंको जन्म देनेवाली तथा शुभ और अशुभका निर्देश करनेवाली है
বায়ু বললেন—পৃথিবীকে পঞ্চগুণসম্পন্ন বলে জেনো। তিনি দেবী, চল ও অচল প্রাণীতে পরিপূর্ণ; সকল জীবের জননী এবং শুভ-অশুভের লক্ষণ প্রকাশকারী।
Verse 40
शब्द: स्पर्शस्तथा रूप॑ रसो गन्धक्षु पञजचम: । एते पज्च गुणा भूमेवविज्ञेया द्विजसत्तमा:,विप्रवरो! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध--ये ही पृथ्वीके पाँच गुण जानने चाहिये
বায়ুদেব বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, হে ব্রাহ্মণবর! শব্দ, স্পর্শ, রূপ, রস এবং পঞ্চম গন্ধ—এই পাঁচই পৃথিবীর গুণ বলে জেনো।
Verse 41
पार्थिवश्च सदा गन्धो गन्धश्न बहुधा स्मृत: । तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून् गुणान्,इनमें भी गन्ध उसका खास गुण है। गन्ध अनेक प्रकारकी मानी गयी है। मैं उस गन्धके गुणोंका विस्तारके साथ वर्णन करूँगा
বায়ুদেব বললেন—পৃথিবীতে গন্ধই সর্বদা তার বিশেষ গুণ; আর গন্ধ নানাবিধ বলে স্মৃত। এখন আমি সেই গন্ধের বহু গুণ বিস্তারে বলব।
Verse 42
इष्टश्वानिष्टगन्धश्व मधुरो5म्ल: कटुस्तथा | निहरि संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च
বায়ু বললেন—প্রিয় ও অপ্রিয় গন্ধ আছে; মধুর, অম্ল ও কটু রসও আছে। তদুপরি স্বচ্ছতা, সংহতি, স্নিগ্ধতা, রুক্ষতা ও পবিত্রতা প্রভৃতি গুণও বিদ্যমান।
Verse 43
शब्द: स्पर्शस्तथा रूपं द्रवश्वाणां गुणा: स्मृता:
বায়ুদেব বললেন—শব্দ, স্পর্শ এবং রূপ—এগুলিই দ্ৰব (জলীয়) পদার্থের গুণ বলে স্মৃত।
Verse 44
रसज्ञानं तु वक्ष्यामि रसस्तु बहुधा स्मृतः । शब्द, स्पर्श, रूप, रस--ये जलके चार गुण माने गये हैं (इनमें रस ही जलका मुख्य गुण है)। अब मैं रस-विज्ञानका वर्णन करता हूँ। रसके बहुत-से भेद बताये गये हैं ।। ४३ $ई || मधुरो<म्ल: कटुस्तिक्त: कषायो लवणस्तथा
এখন আমি রস-বিদ্যার কথা বলি; রস বহু প্রকার বলে স্মৃত—মধুর, অম্ল, কটু, তিক্ত, কষায় ও লবণ।
Verse 45
शब्द: स्पर्शस्तथा रूपं त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते
বায়ুদেব বললেন—শব্দ, স্পর্শ ও রূপ—এই ত্রিগুণকেই ‘জ্যোতি’ বলা হয়।
Verse 46
शुक्लं कृष्णं तथा रक्त नील॑ पीतारुणं तथा,विज्ञेयं ब्राह्मणैर्वद्धेर्धर्मज्ै: सत्यवादिभि: । शुक्रल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, छोटा, बड़ा, मोटा, दुबला, चौकोना और गोल --इस प्रकार तैजस् रूपका बारह प्रकारसे विस्तार सत्यवादी धर्मज्ञ वृद्ध ब्राह्मणोंके द्वारा जानने योग्य कहा जाता है
বায়ুদেব বললেন—শ্বেত, কৃষ্ণ ও রক্ত; নীল, পীত এবং অরুণ—এ সকল ভেদ সত্যবাদী, ধর্মজ্ঞ বৃদ্ধ ব্রাহ্মণদের দ্বারা জ্ঞেয় বলে বলা হয়েছে।
Verse 47
हस्व॑ दीर्घ कृशं स्थूलं चतुरस््र तु वृत्तवत् । एवं द्वादशविस्तारं तेजसो रूपमुच्यते
বায়ু বললেন— তেজের রূপ দ্বাদশ প্রকার বিস্তারে বর্ণিত: তা কখনও হ্রস্ব বা দীর্ঘ, কখনও কৃশ বা স্থূল, কখনও চতুষ্কোণ, আবার কখনও বৃত্তাকার। এই নানাবিধ পরিমাপ ও আকারের দ্বারাই ‘তেজ’-এর স্বভাব কথিত হয়।
Verse 48
शब्दस्पर्शीं च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरुच्यते
বায়ুদেব বললেন— শব্দ ও স্পর্শ—এই দুটিই তার গুণ বলে জানতে হবে; অতএব বায়ুকে ‘দ্বিগুণ’ বলা হয়, কারণ সে এই দুই ইন্দ্রিয়গুণ ধারণ করে।
Verse 49
रूक्ष: शीतस्तथैवोष्ण: स्निग्धो विशद एव च,रूखा, ठंडा, गरम, स्निग्ध, विशद, कठिन, चिकना, श्लक्ष्ण (हलका), पिच्छिल, कठोर और कोमल--इन बारह प्रकारोंसे वायुके गुण स्पर्शका विस्तार तत्त्वदर्शी धर्मज्ञ सिद्ध ब्राह्मणोंद्वारा विधिवत् बतलाया गया है
বায়ুদেব বললেন— স্পর্শে উপলব্ধ গুণগুলি হলো রূক্ষ, শীত, উষ্ণ, স্নিগ্ধ এবং বিশদ। এভাবে তত্ত্বদর্শী, ধর্মজ্ঞ, সিদ্ধ ব্রাহ্মণগণ বিধিপূর্বক বায়ুর স্পর্শগুণের বিস্তৃত বিবরণ প্রদান করেছেন।
Verse 50
कठिनश्विक्कण: श्लक्ष्ण: पिच्छिलो दारुणो मृदुः । एवं द्वादशविस्तारो वायव्यो गुण उच्यते,रूखा, ठंडा, गरम, स्निग्ध, विशद, कठिन, चिकना, श्लक्ष्ण (हलका), पिच्छिल, कठोर और कोमल--इन बारह प्रकारोंसे वायुके गुण स्पर्शका विस्तार तत्त्वदर्शी धर्मज्ञ सिद्ध ब्राह्मणोंद्वारा विधिवत् बतलाया गया है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे पज्चाशत्तमोडथ्याय: इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वनें गुरु-शिष्यसंवादविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ
বায়ুদেব বললেন— কঠিন, চিক্কণ, শ্লক্ষ্ণ, পিচ্ছিল, দারুণ এবং মৃদু—এইভাবে বায়ুর গুণ, অর্থাৎ স্পর্শ, দ্বাদশ প্রকার বিস্তারে কথিত হয়।
Verse 51
विधिवद् ब्राह्मणै: सिद्धेर्धर्मज्ैस्तत्त्वदर्शिभि:,रूखा, ठंडा, गरम, स्निग्ध, विशद, कठिन, चिकना, श्लक्ष्ण (हलका), पिच्छिल, कठोर और कोमल--इन बारह प्रकारोंसे वायुके गुण स्पर्शका विस्तार तत्त्वदर्शी धर्मज्ञ सिद्ध ब्राह्मणोंद्वारा विधिवत् बतलाया गया है
বায়ুদেব বললেন— বিধিপূর্বক সিদ্ধ, ধর্মজ্ঞ ও তত্ত্বদর্শী ব্রাহ্মণগণ বায়ুর স্পর্শগুণের পূর্ণ বিস্তার ব্যাখ্যা করেছেন। এগুলি দ্বাদশ প্রকার: রূক্ষ, শীত, উষ্ণ, স্নিগ্ধ, বিশদ, কঠিন, চিক্কণ, শ্লক্ষ্ণ, পিচ্ছিল, দারুণ, কঠোর ও কোমল।
Verse 52
तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव च स्मृत: । आकाशका शब्दमात्र एक ही गुण माना गया है। उस शब्दके बहुत-से गुण हैं। उनका विस्तारके साथ वर्णन करता हूँ ।। ५१ है ।। तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून् गुणान्
এখানে আকাশের একমাত্র গুণ ‘শব্দ’ বলেই স্মৃত। এখন আমি সেই শব্দের বহু গুণ বিস্তারে বর্ণনা করব।
Verse 53
षडजर्षभ: स गान्धारो मध्यम: पञ्चमस्तथा । अतः परं तु विज्ञेयो निषादो धैवतस्तथा । इष्टश्ानिष्टशब्दश्न॒ संहतः प्रविभागवान्
ষড়্জ স্বর স্বরসমূহের মধ্যে প্রধান; তারপর গান্ধার, মধ্যম ও পঞ্চম। এর পরে নিষাদ ও ধৈবত জ্ঞেয়। শব্দ—ইষ্ট হোক বা অনিষ্ট—যথাযথ সংযোজনে সংহত হয়ে এবং অংশে অংশে বিভক্ত হয়ে অর্থবহ হয়।
Verse 54
एवं दशविधो ज्ञेयः शब्द आकाशसम्भव: । षड़्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, निषाद, धैवत, इष्ट (प्रिय), अनिष्ट (अप्रिय) और संहत (श्लिष्ट)--इस प्रकार विभागवाले आकाशजनित शब्दके दस भेद हैं ।। आकाशशमुत्तमं भूतमहंकारस्तत: पर:,आकाश सब भूतोंमें श्रेष्ठ है। उससे श्रेष्ठ अहंकार, अहंकारसे श्रेष्ठ बुद्धि, उस बुद्धिसे श्रेष्ठ आत्मा, उससे श्रेष्ठ अव्यक्त प्रकृति और प्रकृतिसे श्रेष्ठ पुरुष है
এইভাবে আকাশসম্ভূত শব্দ দশপ্রকার—ষড়্জ, ঋষভ, গান্ধার, মধ্যম, পঞ্চম, নিষাদ, ধৈবত, ইষ্ট (প্রিয়), অনিষ্ট (অপ্রিয়) এবং সংহত। এভাবেই আকাশজাত শব্দের দশ বিভাগ। আকাশ ভুতসমূহের মধ্যে শ্রেষ্ঠ; আকাশের ঊর্ধ্বে অহংকার, অহংকারের ঊর্ধ্বে বুদ্ধি, বুদ্ধির ঊর্ধ্বে আত্মা, আত্মার ঊর্ধ্বে পরম অব্যক্ত প্রকৃতি, আর প্রকৃতির ঊর্ধ্বে পুরুষ।
Verse 55
अहंकारात् परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा तत: पर: । तस्मात् तु परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुष: पर:,आकाश सब भूतोंमें श्रेष्ठ है। उससे श्रेष्ठ अहंकार, अहंकारसे श्रेष्ठ बुद्धि, उस बुद्धिसे श्रेष्ठ आत्मा, उससे श्रेष्ठ अव्यक्त प्रकृति और प्रकृतिसे श्रेष्ठ पुरुष है
অহংকারের ঊর্ধ্বে বুদ্ধি, বুদ্ধির ঊর্ধ্বে আত্মা; তারও ঊর্ধ্বে পরম অব্যক্ত, আর অব্যক্তের ঊর্ধ্বে পুরুষ।
Verse 56
परापरज्ञो भूतानां विधिज्ञ: सर्वकर्मणाम् । सर्वभूतात्मभूतात्मा गच्छत्यात्मानमव्ययम्,जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंकी श्रेष्ठठा और न्यूनताका ज्ञाता, समस्त कर्मोकी विधिका जानकार और सब प्राणियोंको आत्मभावसे देखनेवाला है, वह अविनाशी परमात्माको प्राप्त होता है
যে ব্যক্তি সকল ভূতের উৎকৃষ্টতা ও ন্যূনতাকে জানে, সকল কর্মের বিধি জানে এবং সকল প্রাণীতে আত্মভাব দেখে—সে অব্যয় পরমাত্মাকে প্রাপ্ত হয়।
Verse 123
एवमेवाप्यसंयुक्त: पुरुष: स्यान्न संशय: । जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी चंचल बूँद उसे भिगो नहीं पाती, उसी प्रकार विद्वान् पुरुष समस्त गुणोंसे सम्बन्ध रखते हुए भी किसीसे लिप्त नहीं होता। अतः क्षेत्रज्ञ पुरुष वास्तविकमें असंग है, इसमें संदेह नहीं है
বায়ুদেব বললেন—এইভাবেই পুরুষ আসক্তিহীন থাকতে পারে; এতে কোনো সন্দেহ নেই। যেমন পদ্মপাতায় পড়া জলের চঞ্চল বিন্দু তাকে ভিজিয়ে দিতে পারে না, তেমনি জ্ঞানী পুরুষ সকল গুণের সঙ্গে আচরণ করলেও তাদের দ্বারা লিপ্ত হন না। অতএব ক্ষেত্রজ্ঞ পুরুষ প্রকৃতপক্ষে অসঙ্গ—এ বিষয়ে সংশয় নেই।
Verse 133
यथा द्रव्यं च कर्ता च संयोगो5प्यनयोस्तथा । यह निश्चित बात है कि पुरुषके भोगनेयोग्य द्रव्यमात्रकी संज्ञा सत्त्व है तथा जैसे द्रव्य और कर्ताका सम्बन्ध है, वैसे ही इन दोनोंका सम्बन्ध है
বায়ু বললেন—যেমন দ্রব্য ও কর্তার মধ্যে সংযোগ ঘটে, তেমনি এই দুইয়ের মধ্যেও সংযোগ আছে। ভোগ্য (অভিজ্ঞতার বিষয়) ও ভোক্তা/কর্তা তত্ত্বত পৃথক, কিন্তু সংসর্গের ফলে আবদ্ধ বলে প্রতীয়মান হয়; এই বিবেকেই আসক্তি ক্ষয় হয়।
Verse 226
ऊर्ध्व॑ पर्वतमारुह्[ नान्ववेक्षेत भूतलम् । किंतु उसी मार्गपर घोड़े जुते हुए शीघ्रगामी रथके द्वारा यात्रा करनेवाला पुरुष जिस प्रकार शीघ्र ही अपने लक्ष्य स्थानपर पहुँच जाता है तथा वह ऊँचे पर्वतपर चढ़कर नीचे पृथ्वीकी ओर नहीं देखता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंकी गति होती है
বায়ুদেব বললেন—যে উচ্চ পর্বতে আরূঢ় হয়েছে, সে আর বারবার ভূমির দিকে চেয়ে থাকে না। আর যেমন অশ্বযোজিত দ্রুতগামী রথে পথে যাত্রাকারী ব্যক্তি অচিরেই লক্ষ্যে পৌঁছে যায়, তেমনি জ্ঞানীদের গতি—উচ্চ পথে স্থিত হয়ে তারা নিম্ন উদ্দেশ্যের দিকে মন ফেরায় না।
Verse 423
एवं दशविधो ज्ञेय: पार्थिवो गन्ध इत्युत । इष्ट (सुगन्ध), अनिष्ट (दुर्गन््ध), मधुर, अम्ल, कटु, निहारी (दुरतक फैलनेवाली), मिश्रित, स्निग्ध, रूक्ष और विशद--ये पार्थिव गन्धके दस भेद समझने चाहिये
বায়ুদেব বললেন—এইভাবে পার্থিব গন্ধ দশপ্রকার বলে জানতে হবে। ইষ্ট (সুগন্ধ) ও অনিষ্ট (দুর্গন্ধ), মধুর, অম্ল, কটু, নিহারী (দূর পর্যন্ত ছড়ায়), মিশ্রিত, স্নিগ্ধ, রূক্ষ ও বিশদ—এগুলোই পৃথিবীজাত গন্ধের দশ ভেদ।
Verse 446
एवं षड्विधविस्तारो रसो वारिमय: स्मृत: । मीठा, खट्टा, कड्आ, तीता, कसैला और नमकीन--इस प्रकार छ: भेदोंमें जलमय रसका विस्तार बताया गया है
বায়ুদেব বললেন—এইভাবে জলময় রস ছয় প্রকারে বিস্তৃত বলে স্মৃত। মধুর, অম্ল, কটু, তিক্ত, কষায় ও লবণ—এই ছয় রস।
Verse 456
ज्योतिषश्च गुणो रूप॑ं रूपं च बहुधा स्मृतम् शब्द, स्पर्श और रूप--ये तेजके तीन गुण कहे गये हैं। इनमें रूप ही तेजका मुख्य गुण है। रूपके भी कई भेद माने गये हैं
বায়ুদেব বললেন—তেজ (অগ্নিতত্ত্ব)-এর গুণ শব্দ, স্পর্শ ও রূপ। এদের মধ্যে রূপই তেজের প্রধান লক্ষণ; আর রূপেরও বহু প্রকারভেদ স্মৃতিতে বলা হয়েছে।
Verse 476
विज्ञेयं ब्राह्मणैर्वद्धेर्धर्मज्ै: सत्यवादिभि: । शुक्रल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, छोटा, बड़ा, मोटा, दुबला, चौकोना और गोल --इस प्रकार तैजस् रूपका बारह प्रकारसे विस्तार सत्यवादी धर्मज्ञ वृद्ध ब्राह्मणोंके द्वारा जानने योग्य कहा जाता है
এ কথা সত্যবাদী, ধর্মজ্ঞ বৃদ্ধ ব্রাহ্মণদের নিকট থেকে জানা উচিত। তেজোময় রূপের দ্বাদশ প্রকার বিস্তার বলা হয়েছে—শ্বেত, কৃষ্ণ, রক্ত, নীল, পীত, অরুণ; ক্ষুদ্র, বৃহৎ; স্থূল, কৃশ; চতুষ্কোণ ও বৃত্ত।
Verse 486
वायोश्वापि गुण: स्पर्श: स्पर्शश्व॒ बहुधा स्मृतः । शब्द और स्पर्श--ये वायुके दो गुण जानने योग्य कहे जाते हैं। इनमें भी स्पर्श ही वायुका प्रधान गुण है। स्पर्श भी कई प्रकारका माना गया है
বায়ুরও গুণ স্পর্শ; শব্দও তার গুণ বলে স্মৃত। এদের মধ্যে স্পর্শই বায়ুর প্রধান লক্ষণ; আর স্পর্শও বহু প্রকার বলে বিবেচিত।
The chapter foregrounds the choice between attachment to karmic performance as self-affirmation (ahaṃkāra, ‘mama’) and a discipline of non-possessiveness (‘na mama’), where action is subordinated to clarity, restraint, and knowledge of the self as kṣetrajña.
Agency should be architected inwardly: regulate senses through mind and intellect, abandon egoic appropriation, and cultivate tapas and dhyāna-yoga so that one realizes the kṣetrajña and attains equanimity, described as the stable path of the liberated.
While not a formal phalaśruti formula, the chapter provides explicit benefit-claims: one who understands the ‘brahma-made chariot’ does not fall into delusion; those purified by meditation and ego-abandonment are said to enter the unmanifest/supreme state, framing comprehension as mokṣa-relevant.