
Abhaya-Itihāsa: Karma, Indriyas, and the Non-sensory Brahman (Brāhmaṇī–Brāhmaṇa Saṃvāda)
Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Itihāsa of Abhaya (Pārtha-saṃvāda) episode
Vāsudeva introduces an ancient exemplum named “Abhaya,” presented as a dialogue. A brāhmaṇī approaches her brāhmaṇa husband, described as secluded and learned, and asks about her posthumous destination given dependence on her husband’s spiritual attainments (1–5). The brāhmaṇa replies by reframing common assumptions: people often fixate on “karma” as what is grasped, seen, and heard, yet action without knowledge tends to constrain understanding; non-action as a mere physical state is not straightforwardly available in embodied life (6–7). He then outlines a technical account of action through body, mind, and speech, and points to an inner ‘āyatana’ where a non-dual Brahman is contemplated—beyond sensory objects, reached by mind and disciplined insight (8–13). The discourse proceeds to prāṇic physiology (prāṇa, apāna, samāna, vyāna, udāna), their locations and functions in waking and sleep, and the role of udāna in restraint and ascetic discipline (14–17). A sacrificial-analytic metaphor follows: the inner Vaiśvānara fire is described with seven “fuel-sticks/offerings” mapped to sense faculties and cognitive functions, with corresponding objects and agents (18–22). Finally, seven “yonis” (earth, wind, space, water, light, mind, intellect) are named as matrices into which qualities enter, re-emerge, and are reabsorbed at dissolution; from these arise sensory qualities and cognitive states such as doubt and resolve, completing a sevenfold generative schema (23–27).
Chapter Arc: वायुदेव एक प्राचीन इतिहास का आह्वान करते हैं—एक ब्राह्मणी अपने एकान्त-निवासी, कर्म-त्यागी, ज्ञान-विज्ञान-पारगामी पति के पास जाकर अपने परलोक-गमन का प्रश्न उठाती है: ‘पत्नी को पति के कृत लोक मिलते हैं—तो मैं तुम्हारे आश्रय में किस गति को जाऊँ?’ → ब्राह्मणी कर्म के प्रत्यक्ष, ‘ग्रह्य-दृश्य-सत्य’ स्वरूप को सामने रखती है—दीक्षा, व्रत, यज्ञ, गृहस्थ-धर्म; और ‘कर्म ही कर्म’ कहकर कर्ममार्ग की प्रतिष्ठा करती है। पति का वैराग्य और पत्नी की आशंका टकराती है: क्या केवल संन्यास-भाव से, कर्म-त्याग से, पत्नी का भी कल्याण सुनिश्चित हो सकता है? → उपदेश का शिखर उस सूक्ष्म ब्रह्म-तत्त्व की ओर उठता है जहाँ द्वन्द्व-रहित परमात्मा का संकेत है—जहाँ सोम और अग्नि के साथ ‘धीर’ पुरुष नित्य संयम/योग-स्थित होकर भूतों को धारण करता है। फिर सृष्टि-तत्त्व का निर्णायक विवेचन आता है: पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, मन, बुद्धि—ये ‘सप्त-योनि’; प्रलय में उनका अन्तःकरण में निरोध; और सृष्टि में क्रमशः गन्ध-रस-रूप-स्पर्श-शब्द का उद्भव, संशय से निष्ठा तक का जन्म-क्रम—यही ‘ज्ञानयज्ञ’ का आन्तरिक यज्ञ बन जाता है। → पति का उत्तर कर्म-त्याग की जड़ता नहीं, बल्कि ज्ञान-यज्ञ की परिपक्वता सिद्ध करता है: बाह्य कर्म की सीमा दिखाकर वह अन्तःकरण-स्थित यज्ञ, तत्त्व-चिन्तन, और निष्ठा की स्थापना करता है—जिससे पत्नी का भय शान्त होता है और ‘पति-आश्रय’ का अर्थ केवल लौकिक कर्म नहीं, ब्रह्म-विद्या का साझा पथ बनता है। → पत्नी के भीतर उठे ‘कर्म बनाम ज्ञान’ के द्वन्द्व का अन्तिम निर्णय—क्या वह गृहस्थ-कर्म को ही परम मानेगी या ज्ञानयज्ञ को—अगले प्रसंग की ओर संकेत करता है।
Verse 1
भीकम (2 अमान विशो< ध्याय: ब्राह्मगणीता--एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना वायुदेव उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । दम्पत्यो: पार्थ संवादो यो5भवद् भरतर्षभ,श्रीकृष्ण कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! अर्जुन! इसी विषयमें पति-पत्नीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्रह्म॒गीतासु विंशो5ध्याय: ।। २० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २० ॥। ऑपन-माज बछ। जज :डिडि एकविशो< ध्याय: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । निबोध 3240 38 | विधानमथ यादृशम्
বায়ুদেব বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ পার্থ! এখানেও এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত বলা হয়—স্বামী-স্ত্রীর মধ্যে যে সংলাপ একদা ঘটেছিল।
Verse 2
ब्राह्मणी ब्राह्मणं कंचिज्ज्ञानविज्ञानपारगम् | दृष्टवा विविक्त आसीनं भार्या भर्तारमब्रवीत्,एक ब्राह्मण, जो ज्ञान-विज्ञानके पारगामी विद्वान् थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली--'प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं। आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप-जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी”
বায়ুদেব বললেন—এক ব্রাহ্মণী দেখল, এক ব্রাহ্মণ—যিনি জ্ঞান ও বিজ্ঞান উভয়েই পারদর্শী—নির্জনে একান্তে বসে আছেন। স্ত্রীটি স্বামীর কাছে গিয়ে বলল—“প্রাণনাথ! আমি শুনেছি, স্ত্রীলোকেরা স্বামীর কর্মফলে অর্জিত লোকসমূহ লাভ করে। কিন্তু আপনি তো কর্ম ত্যাগ করে একান্তে বসে আছেন এবং আমার প্রতি কঠোর আচরণ করছেন। আপনি কি জানেন না, আমি একনিষ্ঠভাবে কেবল আপনারই আশ্রিতা? এমন অবস্থায় আপনাকে স্বামী হিসেবে পেয়ে আমি কোন লোকেই বা যাব? আমার গতি কী হবে?”
Verse 3
क॑ नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता । न्यस्तकर्माणमासीनं कीनाशमविचक्षणम्,एक ब्राह्मण, जो ज्ञान-विज्ञानके पारगामी विद्वान् थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली--'प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं। आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप-जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी”
“আমি, যে আপনাকে স্বামী হিসেবে আশ্রয় করেছি, কোন লোকেই বা যাব? আপনি তো কর্ম ত্যাগ করে বসে আছেন—বিবেকহীন কৃষকের মতো।”
Verse 4
भार्या: पतिकृतॉल्लोकानाप्रुवन्तीति न: श्रुतम् त्वामहं पतिमासाद्य कां गमिष्यामि वै गतिम्,एक ब्राह्मण, जो ज्ञान-विज्ञानके पारगामी विद्वान् थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली--'प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं। आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप-जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी”
“আমরা শুনেছি, স্ত্রীরা স্বামীর কর্মফলে অর্জিত লোকসমূহ লাভ করে। তবে আপনাকে স্বামী হিসেবে পেয়ে আমি সত্যিই কোন গতি লাভ করব?”
Verse 5
एवमुक्त: स शान्तात्मा तामुवाच हसन्निव | सुभगे नाभ्यसूयामि वाक्यस्यास्य तवानघे,पत्नीके ऐसा कहनेपर वे शान्तचित्तवाले ब्राह्मण देवता हँसते हुए-से बोले --'सौभाग्यशालिनि! तुम पापसे सदा दूर रहती हो; अतः तुम्हारे इस कथनके लिये मैं बुरा नहीं मानता
এভাবে বলা হলে শান্তচিত্ত ব্রাহ্মণটি যেন মৃদু হাসি হেসে বললেন—“সুভাগে, অনঘে! তুমি সর্বদা পাপমুক্ত; তাই তোমার এই কথায় আমি অসন্তুষ্ট হই না।”
Verse 6
ग्राह्मं दृश्यं च सत्यं वा यदिदं कर्म विद्यते | एतदेव व्यवस्यन्ति कर्म कर्मेति कर्मिण:,'संसारमें जो ग्रहण करनेयोग्य दीक्षा और व्रत आदि हैं तथा इन आँखोंसे दिखायी देनेवाले जो स्थूल कर्म हैं, उन्हींको वस्तुतः कर्म माना जाता है। कर्मठ लोग ऐसे ही कर्मको कर्मके नामसे पुकारते हैं
এই সংসারে গ্রহণযোগ্য দীক্ষা, ব্রত প্রভৃতি এবং চোখে দেখা স্থূল কর্ম—লোকেরা এগুলোকেই প্রকৃত কর্ম বলে মানে। কর্মে আসক্তরা এটিকেই ‘কর্ম’ বলে স্থির করে, ‘কর্ম’ নামেই ডাকে।
Verse 7
मोहमेव नियच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिता: । नैष्कर्म्य न च लोकेउस्मिन् मुहूर्तमपि लभ्यते,'किंतु जिन्हें ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई है, वे लोग कर्मके द्वारा मोहका ही संग्रह करते हैं। इस लोकमें कोई दो घड़ी भी बिना कर्म किये रह सके, ऐसा सम्भाव नहीं है
যাদের সত্য জ্ঞান লাভ হয়নি, তারা কর্মের দ্বারা মোহই সঞ্চয় করে। এই লোকেতে এক মুহূর্তও সম্পূর্ণ নিষ্কর্ম্য লাভ হয় না; কেউই ক্ষণমাত্রও কিছু না করে থাকতে পারে না।
Verse 8
कर्मणा मनसा वाचा शुभं वा यदि वाशुभम् | जन्मादिमूर्ति भेदान्तं कर्म भूतेषु वर्तते,मनसे, वाणीसे तथा क्रियाद्वारा जो भी शुभ या अशुभ कार्य होता है, वह तथा जन्म, स्थिति, विनाश एवं शरीरभेद आदि कर्म प्राणियोंमें विद्यमान हैं
কর্মে, মনে ও বাক্যে যা কিছু শুভ বা অশুভ করা হয়—সেই কর্ম জীবদের মধ্যে জন্ম থেকে দেহরূপের নানা ভেদ এবং তার অন্ত পর্যন্ত প্রবাহিত থাকে।
Verse 9
रक्षोभिव॑ध्यमानेषु दृश्यद्रव्येषु वर्त्मसु । आत्मस्थमात्मना तेभ्यो दृष्टमायतनं मया,“जब राक्षसों--दुर्जनोंने जहाँ सोम और घृत आदि दृश्य द्रव्योंका उपयोग होता है, उन कर्म-मार्गोका विनाश आरम्भ कर दिया, तब मैंने उनसे विरक्त होकर स्वयं ही अपने भीतर स्थित हुए आत्माके स्थानको देखा
যখন রাক্ষসদের দ্বারা দৃশ্য দ্রব্যসম্বলিত কর্মপথগুলি ধ্বংস হতে লাগল, তখন আমি সেগুলি থেকে বিমুখ হলাম; এবং নিজের আত্মার দ্বারাই, অন্তরে অবস্থানকারী আত্মার আশ্রয়স্থান আমি দর্শন করলাম।
Verse 10
यत्र तद ब्रह्म निर्दधन्द्ध यत्र सोम: सहाग्निना । व्यवायं कुरुते नित्यं धीरो भूतानि धारयन्,“जहाँ द्वन्धोंसे रहित वह परब्रहद्म परमात्मा विराजमान है, जहाँ सोम अग्निके साथ नित्य समागम करता है तथा जहाँ सब भूतोंको धारण करनेवाला धीर समीर निरन्तर चलता रहता है
যেখানে দ্বন্দ্বহীন পরব্রহ্ম বিরাজমান, যেখানে সোম অগ্নির সঙ্গে নিত্য সংযোগ করে, এবং যেখানে সকল ভূতকে ধারণকারী ধীর সমীর অবিরত বিচরণ করে।
Verse 11
यत्र ब्रह्मादयो युक्तास्तदक्षरमुपासते | विद्वांस: सुव्रता यत्र शान्तात्मानो जितेन्द्रिया:,“जहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शान्तचित्त जितेन्द्रिय विद्वान् योगयुक्त होकर उस अविनाशी ब्रह्मकी उपासना करते हैं
যেখানে ব্রহ্মা প্রভৃতি দেবগণ যোগে সংযুক্ত হয়ে সেই অবিনশ্বর পরব্রহ্মের উপাসনা করেন; সেখানেই সৎব্রতধারী, শান্তচিত্ত, জিতেন্দ্রিয় জ্ঞানীরা বাস করেন।
Verse 12
प्राणेन न तदाप्रेयं नास्वाद्यं चैव जिह्नया । स्पर्शनेन तदस्पृश्यं मनसा त्ववगम्यते,“वह अविनाशी ब्रह्म प्राणेन्द्रियसे सूँघने और जिद्ठाद्वारा आस्वादन करनेयोग्य नहीं है। स्पर्शन्द्रिय--त्वचाद्वारा उसका स्पर्श भी नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिके द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है
সেই অবিনশ্বর ব্রহ্ম প্রাণেন্দ্রিয়ে (গন্ধরূপে) গ্রাহ্য নয়, জিহ্বায় আস্বাদ্যও নয়। স্পর্শেন্দ্রিয়ে তা অস্পৃশ্য; কেবল মন-বুদ্ধিতেই তার উপলব্ধি হয়।
Verse 13
चक्षुषामविषहां च यत् किंचिच्छुवणात् परम् । अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दलक्षणम्,“वह नेत्रोंका विषय नहीं हो सकता। वह अनिर्वचनीय परब्रह्म श्रवणेन्द्रियकी पहुँचसे सर्वथा परे है। गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द आदि कोई भी लक्षण उसमें उपलब्ध नहीं है
তা চক্ষুর বিষয় নয়; শ্রবণেন্দ্রিয়ের অধিগম্যতারও অতীত। তাতে গন্ধ নেই, রস নেই, স্পর্শ নেই, রূপ নেই; শব্দাদি কোনো লক্ষণও নেই।
Verse 14
यतः प्रवर्तते तन्त्र॑ यत्र च प्रतितिष्ठति । प्राणो5पान: समानक्ष व्यानक्षोदान एव च
যে থেকে এই দেহতন্ত্র প্রবৃত্ত হয় এবং যেতেই প্রতিষ্ঠিত থাকে—সেইই প্রাণ, অপান, সমান, ব্যান ও উদান রূপে প্রকাশিত।
Verse 15
तत एव प्रवर्तन्ते तदेव प्रविशन्ति च | “उसीसे सृष्टि आदिका विस्तार होता है और उसीमें उसकी स्थिति है। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान--से उसीसे प्रकट होते और फिर उसीमें प्रविष्ट हो जाते हैं ।। १४ न्् समानव्यानयोर्मध्ये प्राणापानौ विचेरतु:,“समान और व्यान--इन दोनोंके बीचमें प्राण और अपान विचरते हैं। उस अपानसहित प्राणके लीन होनेपर समान और व्यानका भी लय हो जाता है। अपान और प्राणके बीचमें उदान सबको व्याप्त करके स्थित होता है। इसीलिये सोये हुए पुरुषको प्राण और अपान नहीं छोड़ते हैं
সেই থেকেই তারা প্রবৃত্ত হয় এবং সেইতেই পুনরায় প্রবেশ করে। সমান ও ব্যানের মধ্যভাগে প্রাণ ও অপান বিচরণ করে।
Verse 16
तस्मिंल्लीने प्रलीयेत समानो व्यान एव च । अपानप्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति । तस्माच्छयान पुरुष प्राणापानौ न मुडचतः,“समान और व्यान--इन दोनोंके बीचमें प्राण और अपान विचरते हैं। उस अपानसहित प्राणके लीन होनेपर समान और व्यानका भी लय हो जाता है। अपान और प्राणके बीचमें उदान सबको व्याप्त करके स्थित होता है। इसीलिये सोये हुए पुरुषको प्राण और अपान नहीं छोड़ते हैं
যখন প্রाण অপানে লীন হয়, তখন তার সঙ্গে সমান ও ব্যানও প্রশমিত হয়। অপান ও প্রাণের মধ্যভাগে উদান সর্বত্র ব্যাপ্ত হয়ে অবস্থান করে। তাই নিদ্রিত পুরুষকেও প্রাণ ও অপান ত্যাগ করে না—ইন্দ্রিয় বিশ্রামে থাকলেও প্রাণবায়ুগণের সুশৃঙ্খল সহযোগিতায় জীবন ধারিত থাকে।
Verse 17
प्राणानामायतत्वेन तमुदान प्रचक्षते । तस्मात् तपो व्यवस्यन्ति मद्गतं ब्रह्म॒वादिन:,'प्राणांका आयतन (आधार) होनेके कारण उसे विद्वान् पुरुष उदान कहते हैं। इसलिये वेदवादी मुझमें स्थित तपका निश्चय करते हैं
প্রাণসমূহের আধার হওয়ার কারণে জ্ঞানীরা তাকে ‘উদান’ বলে অভিহিত করেন। তাই বেদজ্ঞ ব্রহ্মবাদীরা তপস্যার সংকল্প আমার মধ্যেই স্থাপন করেন—আমাতেই প্রতিষ্ঠিত করে।
Verse 18
तेषामन्योन्यभक्षाणां सर्वेषां देहचारिणाम् । अनिनिर्वेश्वानरो मध्ये सप्तधा दीव्यतेडन्तरा,“एक दूसरेके सहारे रहनेवाले तथा सबके शरीरोंमें संचार करनेवाले उन पाँचों प्राणवायुओंके मध्यभागमें जो समान वायुका स्थान नाभिमण्डल है, उसके बीचमें स्थित हुआ वैश्वानर अग्नि सात रूपोंमें प्रकाशमान है
পরস্পরকে ধারণ করে এবং সকলের দেহে বিচরণকারী সেই প্রাণবায়ুগণের মধ্যভাগে বৈশ্বানর অগ্নি অধিষ্ঠিত। নাভিমণ্ডল—সমানের আসন—এর অন্তরে স্থিত সেই অন্তরাগ্নি সাত রূপে দীপ্তিমান হয়।
Verse 19
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उन्नीयवाँ अध्याय पूरा हुआ,घ्राणं जिद्दा च चक्षुश्न त्वक् च श्रोत्रं च पठचमम् | मनो बुद्धिश्न सप्तैता जिद्दा वैश्वानराचिष: “प्राण (नासिका), जिद्ा, नेत्र, त्वचा और पाँचवाँ कान एवं मन तथा बुद्धि--ये उस वैश्वानर अग्निकी सात जिद्लाएँ हैं। सूँघनेयोग्य गन्ध, दर्शनीय रूप, पीनेयोग्य रस, स्पर्श करनेयोग्य वस्तु, सुननेयोग्य शब्द, मनके द्वारा मनन करने और बुद्धिके द्वारा समझने योग्य विषय--ये सात मुझ वैश्वानरकी समिधाएँ हैं
নাসিকা, জিহ্বা, চক্ষু, ত্বক এবং পঞ্চম কর্ণ—এবং মন ও বুদ্ধি—এই সাতটি বৈশ্বানর অগ্নির জিহ্বা (শিখা)।
Verse 20
घ्रेयं दृश्यं च पेयं च स्पृश्यं श्रव्यं तथैव च । मन्तव्यमथ बोद्धव्यं ता: सप्त समिधो मम,“प्राण (नासिका), जिद्ा, नेत्र, त्वचा और पाँचवाँ कान एवं मन तथा बुद्धि--ये उस वैश्वानर अग्निकी सात जिद्लाएँ हैं। सूँघनेयोग्य गन्ध, दर्शनीय रूप, पीनेयोग्य रस, स्पर्श करनेयोग्य वस्तु, सुननेयोग्य शब्द, मनके द्वारा मनन करने और बुद्धिके द्वारा समझने योग्य विषय--ये सात मुझ वैश्वानरकी समिधाएँ हैं
ঘ্রাণযোগ্য গন্ধ, দর্শনযোগ্য রূপ, পানযোগ্য রস, স্পর্শযোগ্য বস্তু, শ্রবণযোগ্য শব্দ—এবং যা মনে মননীয় ও বুদ্ধিতে বোধগম্য—এই সাতটি আমার সমিধা।
Verse 21
'सूँघनेवाला, खानेवाला, देखनेवाला, स्पर्श करने-वाला, पाँचवाँ श्रवण करनेवाला एवं मनन करनेवाला और समझनेवाला--ये सात श्रेष्ठ ऋत्विज् हैं
বায়ু-দেব বললেন— যে ঘ্রাণ গ্রহণ করে, যে ভক্ষণ করে, যে দেখে, যে স্পর্শ করে, পঞ্চম যে শোনে, আর যে মনন করে ও যে বোঝে— এই সাতজনই শ্রেষ্ঠ ঋত্বিজ।
Verse 22
घ्रेये पेये च दृश्ये च स्पृश्ये श्रव्ये तथैव च । मन्तव्येडप्यथ बोद्धव्ये सुभगे पश्य सर्वदा,“सुभगे! सूँघनेयोग्य, पीनेयोग्य, देखनेयोग्य, स्पर्श करनेयोग्य, सुनने, मनन करने तथा समझनेयोग्य विषय--इन सबके ऊपर तुम सदा दृष्टिपात करो (इनमें हविष्य-बुद्धि करो)
বায়ু বললেন— হে সুভাগে! ঘ্রাণযোগ্য, পানযোগ্য, দর্শনযোগ্য, স্পর্শযোগ্য, শ্রবণযোগ্য, এবং মনন ও বোধের যোগ্য— এই সকল বিষয়ের উপর তুমি সর্বদা দৃষ্টি রাখো।
Verse 23
घ्राता भक्षयिता द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता च पठडचम: । मन्ता बोद्धा च सप्तैते भवन्ति परमर्त्विज:,हवींष्यग्निषु होतार: सप्तथा सप्त सप्तसु । सम्यक् प्रक्षिप्य विद्वांसो जनयन्ति स्वयोनिषु 'पूर्वोक्त सात होता उक्त सात हविष्योंका सात रूपोंमें विभक्त हुए वैश्वानरमें भलीभाँति हवन करके (अर्थात् विषयोंकी ओरसे आसक्ति हटाकर) विद्वान् पुरुष अपने तन्मात्रा आदि योनियोंमें शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं
বায়ু বললেন— ঘ্রাতা, ভক্ষয়িতা, দ্রষ্টা, স্প্রষ্টা, শ্রোতা, গচ্ছম (বিষয়ের দিকে ধাবমান), মন্তা ও বোদ্ধা— এই সাতজন পরম ঋত্বিজ। এই সাত হোতা সাত প্রকার হব্যকে সাত অগ্নিতে যথাযথভাবে অর্পণ করে; আর জ্ঞানী পুরুষ সঠিকভাবে তা নিক্ষেপ করে নিজের নিজের যোনিতে শব্দাদি সূক্ষ্ম বিষয় উৎপন্ন করেন।
Verse 24
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्न पठचमम् । मनो बुद्धिश्व सप्तैता योनिरित्येव शब्दिता:,'पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, मन और बुद्धि--ये सात योनि कहलाते हैं
বায়ু বললেন— পৃথিবী, বায়ু, আকাশ, জল, পঞ্চম তেজ, এবং মন ও বুদ্ধি— এই সাতকে ‘যোনি’ (উৎপত্তিস্থান) বলা হয়।
Verse 25
हविर्भूता गुणा: सर्वे प्रविशन्त्यग्निजं गुणम् | अन्तर्वासमुषित्वा च जायन्ते स्वासु योनिषु,“इनके जो समस्त गुण हैं, वे हविष्यरूप हैं। जो अग्निजनित गुण (बुद्धिवृत्ति)-में प्रवेश करते हैं। वे अन्तःकरणमें संस्काररूपसे रहकर अपनी योनियोंमें जन्म लेते हैं
বায়ু বললেন— সকল গুণ হব্যরূপ হয়। তারা অগ্নিজ গুণে—অর্থাৎ বোধ থেকে উৎপন্ন মানসিক বৃত্তিতে—প্রবেশ করে; অন্তরে সংস্কাররূপে বাস করে, পরে নিজ নিজ যোনিতে পুনরায় জন্ম লাভ করে।
Verse 26
तत्रैव च निरुध्यन्ते प्रलये भूतभावने । ततः: संजायते गन्धस्तत: संजायते रस:,*वे प्रलयकालमें अन्त:करणमें ही अवरुद्ध रहते और भूतोंकी सृष्टिके समय वहींसे प्रकट होते हैं। वहींसे गन्ध और वहींसे रसकी उत्पत्ति होती है
হে ভূতভাবন, মহাপ্রলয়ের সময় সেগুলি সেখানেই অন্তঃকরণে সংযত থাকে। সেই অন্তর্নিহিত ভিত্তি থেকেই গন্ধের উৎপত্তি হয়, এবং সেইখান থেকেই রস প্রকাশ পায়।
Verse 27
ततः: संजायते रूप॑ ततः स्पर्शोडभिजायते । ततः संजायते शब्द: संशयस्तत्र जायते । ततः: संजायते निष्ठा जन्मैतत् सप्तथा विदु:,“वहींसे रूप, स्पर्श और शब्दका प्राकट्य होता है। संशयका जन्म भी वहीं होता है और निश्चयात्मिका बुद्धि भी वहीं पैदा होती है। यह सात प्रकारका जन्म माना गया है
সেই উৎস থেকেই রূপের উৎপত্তি হয়, সেখান থেকেই স্পর্শ জন্মায়। সেখান থেকেই শব্দ উদ্ভূত হয়, এবং সেখানেই সংশয়ও জন্ম নেয়। সেখান থেকেই দৃঢ় নিশ্চয় (নিষ্ঠা) উৎপন্ন হয়। একে জন্মের সাতপ্রকার ভেদ বলে জানে।
Verse 28
अनेनैव प्रकारेण प्रगृहीतं पुरातनै: । पूर्णाहुतिभिरापूर्णास्त्रिभि: पूर्यन्ति तेजसा,“इसी प्रकारसे पुरातन ऋषियोंने श्रुतिके अनुसार प्राण आदिका रूप ग्रहण किया है। ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय--इन तीन आहुतियोंसे समस्त लोक परिपूर्ण हैं। वे सभी लोक आत्मज्योतिसे परिपूर्ण होते हैं"
এইভাবেই প্রাচীন ঋষিগণ শ্রুতির অনুসারে প্রाण প্রভৃতি তত্ত্বের স্বরূপ গ্রহণ করে ব্যাখ্যা করেছেন। জ্ঞাতা, জ্ঞান ও জ্ঞেয়—এই তিন পূর্ণ আহুতিতে সমস্ত লোক পরিপূর্ণ হয়; এবং সেই লোকসমূহ আত্মজ্যোতিতে দীপ্তিমান থাকে।
The brāhmaṇī questions whether her spiritual destination is contingent on her husband’s attainments, reflecting anxiety about dependence, merit-transfer, and the ethical mechanics of posthumous outcomes within household life.
Embodied action is unavoidable, but its binding force depends on ignorance versus understanding; the chapter recommends moving from externalized “karma-only” fixation to a knowledge-guided interpretation that recognizes a non-sensory Brahman and the inner structure of agency.
No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-function is instructional mapping—using prāṇic and sacrificial schemas to situate ethical action within a liberation-oriented metaphysics.