Adhyaya 6
Anushasana ParvaAdhyaya 649 Verses

Adhyaya 6

दैव–पुरुषकार-प्रश्नः (Daiva–Puruṣakāra Inquiry: Fate and Human Effort)

Upa-parva: Daiva–Puruṣakāra-vicāra (Discourse on Fate and Human Effort)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma which is superior—daiva (destiny) or puruṣakāra (human effort). Bhīṣma responds by citing an ancient dialogue: Vasiṣṭha once questioned Brahmā on the same issue. Brahmā answers through a causality model using agricultural imagery: the ‘field’ is human effort and the ‘seed’ is daiva; only their conjunction yields fruition, yet without effort the seed cannot produce results. The chapter then develops a consistent karmic logic: the agent experiences the fruit of action; good action yields well-being, harmful action yields distress, and what is not done does not generate enjoyments. Multiple illustrations reinforce that prosperity, reputation, and even divine attainments are linked to exertion, discipline, and merit rather than inert reliance on fate. The discourse warns against fatalistic passivity, arguing that daiva ‘follows’ established effort and declines when action is depleted, like a lamp fading when oil is exhausted. The chapter closes by recommending purposeful initiative and regulated action as the practical route toward auspicious aims, including the ‘path to heaven’ as framed within epic ethics.

Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से तीखा, शाश्वत प्रश्न पूछते हैं—दैव (भाग्य) और पुरुषार्थ (स्वयं का प्रयत्न) में श्रेष्ठ कौन है? → भीष्म उत्तर को केवल मत-रूप में नहीं रखते; वे प्राचीन संवाद का आश्रय लेते हैं—वसिष्ठ द्वारा ब्रह्मा से पूछा गया वही प्रश्न। तर्क के साथ दृष्टान्त जुड़ते हैं: शुभ कर्म से सुख, पाप से दुःख; जो किया है वही फलता है, जो नहीं किया वह कहीं भोगा नहीं जाता। → संवाद का निर्णायक निष्कर्ष उभरता है—देवता भी किसी के कर्म का ‘व्यापार’ नहीं करते; विकर्म फलता नहीं, और दैव को सर्वशक्तिमान मानकर मनुष्य विमार्ग पर नहीं जा सकता। पुरुषार्थ ही संचित कर्म-शक्ति बनकर दैव-सा प्रतीत होता है और फल को वहाँ-वहाँ ले जाता है। → भीष्म वसिष्ठ-ब्रह्मा संवाद के सार को युधिष्ठिर के लिए स्थिर करते हैं—पुरुषार्थ का फल प्रत्यक्ष है; विधिपूर्वक आरम्भ किया गया कर्म स्वर्गमार्ग तक ले जा सकता है।

Shlokas

Verse 1

/ अपन ह< बक। है २ >> षष्ठो5 ध्याय: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन युधिछिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । दैवे पुरुषकारे च किंस्वित्‌ श्रेष्ठतरं भवेत्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—হে পিতামহ! আপনি মহাপ্রাজ্ঞ ও সর্বশাস্ত্রে বিশারদ; দैব ও পুরুষার্থ—এই দুয়ের মধ্যে প্রকৃতপক্ষে কোনটি শ্রেষ্ঠ?

Verse 2

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । वसिष्ठस्य च संवादं ब्रह्मणश्न॒ युधिष्ठिर,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें वसिष्ठ और ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहण दिया जाता है

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! এ বিষয়েও এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত বলা হয়—বসিষ্ঠ ও ব্রহ্মার সংলাপ।

Verse 3

दैवमानुषयो: किंस्वित्‌ कर्मणो: श्रेष्ठमित्युत । पुरा वसिष्ठो भगवान्‌ पितामहमपृच्छत,प्राचीन कालकी बात है, भगवान्‌ वसिष्ठने लोकपितामह ब्रह्माजीसे पूछा--'प्रभो! दैव और पुरुषार्थमें कौन श्रेष्ठ है?

ভীষ্ম বললেন—দৈব ও মানব-প্রচেষ্টা—এই দুই কর্মের মধ্যে কোনটি শ্রেষ্ঠ? প্রাচীন কালে ভগবান বসিষ্ঠ এই প্রশ্নই লোকপিতামহ ব্রহ্মাকে করেছিলেন।

Verse 4

ततः पद्मोद्भवो राजन्‌ देवदेव: पितामह: । उवाच मधुरं वाक्यमर्थवद्धेतुभूषितम्‌,राजन्‌! तब कमलजन्मा देवाधिदेव पितामहने मधुर स्वरमें युक्तियुक्त सार्थक वचन कहा--

তখন, হে রাজন, পদ্মজ ব্রহ্মা—দেবদেব, পিতামহ—মধুর স্বরে অর্থবহ ও যুক্তিসংবলিত বাক্য উচ্চারণ করলেন।

Verse 5

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुक और इन्द्रका संवादविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ,ब्रह्मोवाच (बीजतो हाड्कुरोत्पत्तिरड्कुरात्‌ पर्णसम्भव: । पर्णान्नाला: प्रसूयन्ते नालात्‌ स्कन्ध: प्रवर्तते ।।

ব্রহ্মা বললেন—হে মুনি! বীজ থেকে অঙ্কুর জন্মায়, অঙ্কুর থেকে পাতা হয়। পাতা থেকে ডাঁটা, ডাঁটা থেকে কাণ্ড বৃদ্ধি পায়। কাণ্ড থেকে ফুল ফোটে, ফুল থেকে ফল হয়, আর ফল থেকে আবার বীজ উৎপন্ন হয়—অতএব বীজকে কখনও নিষ্ফল বলা হয় না। বীজ ছাড়া কিছুই জন্মায় না, এবং বীজ ছাড়া ফলও হয় না। বীজ থেকেই বীজ জন্মায়, এবং বীজ থেকেই ফল উৎপন্ন হয় বলে স্মৃত।

Verse 6

यादृशं वपते बीज क्षेत्रमासाद्य कर्षक: । सुकृते दुष्कृते वापि तादृश॑ लभते फलम्‌

ভীষ্ম বললেন—যেমন কৃষক ক্ষেত্র লাভ করে যে বীজ বোনে, তদনুসারে ফসল পায়; তেমনি মানুষ পুণ্য হোক বা পাপ—যেমন কর্ম করে, তেমনই ফল লাভ করে।

Verse 7

यथा बीजं विना क्षेत्रमुप्तं भवति निष्फलम्‌ | तथा पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति,जैसे बीज खेतमें बोये बिना फल नहीं दे सकता, उसी प्रकार दैव (प्रारब्ध) भी पुरुषार्थके बिना नहीं सिद्ध होता

ভীষ্ম বললেন—যেমন বীজ ছাড়া ক্ষেত, যতই চাষ-যত্ন করা হোক, নিষ্ফল থাকে; তেমনি পুরুষকার (মানবপ্রয়াস) ছাড়া দৈবও সিদ্ধ হয় না।

Verse 8

क्षेत्र पुरुषकारस्तु दैवं बीजमुदाहतम्‌ । क्षेत्रत्रीणसमायोगात्‌ ततः सस्यं समृद्ध्यते,पुरुषार्थ खेत है और दैवको बीज बताया गया है। खेत और बीजके संयोगसे ही अनाज पैदा होता है

ভীষ্ম বললেন—পুরুষকারকে ক্ষেত্র বলা হয়েছে, আর দৈবকে বীজ বলা হয়েছে। ক্ষেত্র ও বীজের সংযোগেই শস্য সমৃদ্ধ হয়।

Verse 9

कर्मण: फलनिर्वत्ति स्वयमश्नाति कारक: । प्रत्यक्ष दृश्यते लोके कृतस्यापकृतस्य च,कर्म करनेवाला मनुष्य अपने भले या बुरे कर्मका फल स्वयं ही भोगता है। यह बात संसारमें प्रत्यक्ष दिखायी देती है

কর্মের ফলের পরিণতি কর্তা নিজেই ভোগ করে। জগতে তা প্রত্যক্ষ দেখা যায়—কৃত ও অকৃত, উভয়েরই ফলরূপে।

Verse 10

शुभेन कर्मणा सौख्यं दु:ःखं पापेन कर्मणा । कृतं फलति सर्वत्र नाकृतं भुज्यते क्वचित्‌

শুভ কর্মে সুখ, পাপকর্মে দুঃখ হয়। যা করা হয়েছে তা সর্বত্র ফল দেয়; যা করা হয়নি তার ফল কোথাও ভোগ করা যায় না।

Verse 11

कृती सर्वत्र लभते प्रतिष्ठां भाग्यसंयुताम्‌ । अकृती लभते भ्रष्ट: क्षते क्षारावसेचनम्‌

পরিশ্রমী ও সক্ষম ব্যক্তি সর্বত্র ভাগ্যসমর্থিত সম্মান লাভ করে; কিন্তু অকর্মণ্য ব্যক্তি সম্মানচ্যুত হয়ে ক্ষতে লবণ ছিটানোর মতো অসহ্য দুঃখ পায়।

Verse 12

तपसा रूपसौभाग्यं रत्नानि विविधानि च । प्राप्पते कर्मणा सर्व न दैवादकृतात्मना

তপস্যায় রূপ, সৌভাগ্য এবং নানা প্রকার রত্ন লাভ হয়। কর্মে সবই অর্জিত হয়; কিন্তু যে আত্মসংযমহীন হয়ে কেবল ভাগ্যের ভরসায় বসে থাকে, সে কিছুই পায় না।

Verse 13

तथा स्वर्गक्ष भोगश्न निष्ठा या च मनीषिता । सर्व पुरुषकारेण कृतेनेहोपलभ्यते,इस जगतमें पुरुषार्थ करनेसे स्वर्ग, भोग, धर्ममें निष्ठा और बुद्धिमत्ता--इन सबकी उपलब्धि होती है

তদ্রূপ স্বর্গ ও তার ভোগ, ধর্মে নিষ্ঠা এবং প্রশংসিত প্রজ্ঞা—এসবই এই লোকেই পুরুষার্থের দ্বারা লাভ হয়।

Verse 14

ज्योतींषि त्रिदशा नागा यक्षाश्षन्द्रार्कमारुता: । सर्व पुरुषकारेण मानुष्याद्‌ देवतां गता:,नक्षत्र, देवता, नाग, यक्ष, चन्द्रमा, सूर्य और वायु आदि सभी पुरुषार्थ करके ही मनुष्यलोकसे देवलोकको गये हैं

ভীষ্ম বললেন—নক্ষত্র, দেবতা, নাগ, যক্ষ এবং চন্দ্র, সূর্য ও বায়ু—এরা সকলেই পুরুষার্থের বলেই মানব-অবস্থা অতিক্রম করে দেবত্ব লাভ করেছে।

Verse 15

अर्थो वा मित्रवर्गो वा ऐश्वर्य वा कुलान्वितम्‌ । श्रीक्षापि दुर्लभा भोक्तुं तथैवाकृतकर्मभि:,जो पुरुषार्थ नहीं करते वे धन, मित्रवर्ग, ऐश्वर्य, उत्तम कुल तथा दुर्लभ लक्ष्मीका भी उपभोग नहीं कर सकते

ভীষ্ম বললেন—যারা পুরুষার্থ করে না, তারা ধন, বন্ধুসমাজ, ঐশ্বর্য, উত্তম কুল এবং দুর্লভ লক্ষ্মীকেও সত্যভাবে ভোগ করতে পারে না।

Verse 16

शौचेन लभते विे्र: क्षत्रियो विक्रमेण तु । वैश्य: पुरुषकारेण शूद्र: शुश्रूषया श्रियम्‌,ब्राह्मण शौचाचारसे, क्षत्रिय पराक्रमसे, वैश्य उद्योगसे तथा शूद्र तीनों वर्णोकी सेवासे सम्पत्ति पाता है

ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণ শৌচ ও সদাচারে, ক্ষত্রিয় পরাক্রমে, বৈশ্য উদ্যোগী পুরুষার্থে, আর শূদ্র সেবাভক্তিতে—এইভাবে প্রত্যেকে নিজ নিজ ধর্মপথে শ্রী-সমৃদ্ধি লাভ করে।

Verse 17

नादातांर भजन्त्यर्था न क्लीबं नापि निष्क्रियम्‌ नाकर्मशीलं नाशूरं तथा नैवातपस्विनम्‌

ভীষ্ম বললেন—ধন সেই কৃপণকে আসে না যে দান করে না; আসে না নপুংসককে, আসে না নিষ্ক্রিয়কে; কর্মবিমুখকে নয়, শৌর্যহীনকে নয়, তপস্যাহীনকেও নয়।

Verse 18

येन लोकास्त्रय: सृष्टा दैत्या: सर्वाश्व देवता: । स एष भगवान्‌ विष्णु: समुद्रे तप्पते तप:

যাঁর দ্বারা ত্রিলোক, দৈত্যগণ এবং সমস্ত দেবতাই সৃষ্ট—সেই ভগবান বিষ্ণুই সমুদ্রে অবস্থান করে তপস্যা করেন।

Verse 19

स्वं चेत्‌ कर्मफलं न स्यात्‌ सर्वमेवाफलं भवेत्‌ । लोको दैवं समालक्ष्य उदासीनो भवेन्ननु

যদি নিজের কর্মের যথার্থ ফল না মেলে, তবে সমস্ত কর্মই নিষ্ফল হয়ে যায়। তখন লোকেরা ভাগ্যকেই সর্বনির্ণায়ক দেখে নিশ্চয়ই উদাসীন হয়ে পড়ে এবং উদ্যোগ-পুরুষার্থ ত্যাগ করে।

Verse 20

अकृत्वा मानुषं कर्म यो दैवमनुवर्तते । वृथा श्राम्यति सम्प्राप्पय पतिं क्लीबमिवाड़ना

যে ব্যক্তি মানুষের উপযুক্ত কর্ম না করে কেবল দैবের অনুসরণ করে, সে ভাগ্যের আশ্রয়ে বৃথাই ক্লান্ত হয়। যেমন কোনো নারী স্বামী পেয়েও কেবল দুঃখই ভোগ করে—যদি সেই স্বামী নপুংসক হয়।

Verse 21

न तथा मानुषे लोके भयमस्ति शुभाशुभे । तथा त्रिदशलोके हि भयमल्पेन जायते,इस मनुष्यलोकमें शुभाशुभ कर्मोंसे उतना भय नहीं प्राप्त होता, जितना कि देवलोकमें थोड़े ही पापसे भय होता है

মানুষলোকে শুভ-অশুভ কর্মে ততটা ভয় জন্মায় না; কিন্তু দেবলোকে অল্প পাপেই ভয় দ্রুত উদ্ভব হয়।

Verse 22

कृत: पुरुषकारस्तु दैवमेवानुवर्तते । न दैवमकृते किंचित्‌ कस्यचिद्‌ दातुमहति,किया हुआ पुरुषार्थ ही दैवका अनुसरण करता है; परंतु पुरुषार्थ न करनेपर दैव किसीको कुछ नहीं दे सकता

কৃত পুরুষার্থই দैবকে অনুসরণ করায়; কিন্তু যেখানে পুরুষার্থ করা হয় না, সেখানে দैব কারওকে কিছু দেওয়ার যোগ্য নয়।

Verse 23

यथा स्थानान्यनित्यानि दूृश्यन्ते दैवतेष्वपि । कथं कर्म विना दैवं स्थास्यति स्थापयिष्यति

যেমন দেবতাদের মধ্যেও ইন্দ্র প্রভৃতির পদ অনিত্য বলে দেখা যায়, তেমনি কর্ম ছাড়া দैব কীভাবে স্থির থাকবে, আর অন্যকে কীভাবে স্থির রাখতে পারবে?

Verse 24

न दैवतानि लोके5स्मिन्‌ व्यापारं यान्ति कस्यचित्‌ । व्यासडूं जनयन्त्युग्रमात्माभिभवशड्कया

ভীষ্ম বললেন—এই জগতে দেবতারা কারও কাজে সরাসরি হস্তক্ষেপ করেন না। কিন্তু কোনো মহাপুণ্যবান ব্যক্তি তাঁদের অতিক্রম করে ফেলতে পারেন—এই আশঙ্কায় তাঁরা তার অন্তরে প্রবল আসক্তি জাগিয়ে দেন, যাতে তার ধর্মাচরণে বাধা উপস্থিত হয়।

Verse 25

ऋषीणां देवतानां च सदा भवति विग्रह: । कस्य वाचा हादैवं स्याद्‌ यतो दैवं प्रवर्तते,ऋषियों और देवताओंमें सदा कलह होता रहता है (देवता ऋषियोंकी तपस्यामें विघ्न डालते हैं तथा ऋषि अपने तपोबलसे देवताओंको स्थानभ्रष्ट कर देते हैं।।

ভীষ্ম বললেন—ঋষি ও দেবতাদের মধ্যে সর্বদাই বিরোধ থাকে। দैবের সহায়তা ছাড়া কেবল বাক্যই বা কার সুখ-দুঃখের কারণ হবে কীভাবে? কারণ ঘটনাপ্রবাহকে চালিত করে দैবই।

Verse 26

कथं तस्य समुत्पत्तिर्यतो दैवं प्रवर्तते । एवं त्रिदशलोके<पि प्राप्यन्ते बहवो गुणा:

ভীষ্ম বললেন—যখন কর্মপ্রবৃত্তিকে চালিত করে দैবই, তখন দैব থেকে স্বাধীন পুরুষার্থের উৎপত্তি কীভাবে হবে? তেমনি ত্রিদশলোকেও দैবের দ্বারা বহু গুণ ও উপকরণ লাভ হয়।

Verse 27

आत्मैव ह्ात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: । आत्मैव हाात्मन: साक्षी कृतस्याप्यकृतस्य च,आत्मा ही अपना बन्धु है, आत्मा ही अपना शत्रु है तथा आत्मा ही अपने कर्म और अकर्मका साक्षी है

ভীষ্ম বললেন—আত্মাই নিজের বন্ধু, আত্মাই নিজের শত্রু। আত্মাই নিজের কৃত ও অকৃত কর্মের সাক্ষী।

Verse 28

कृतं चाप्यकृतं किंचित्‌ कृते कर्मणि सिद्ध्यति | सुकृतं दुष्कृतं कर्म न यथार्थ प्रपद्यते

ভীষ্ম বললেন—যখন প্রবল পুরুষার্থ সাধিত হয়, তখন পূর্বে করা কর্মও কিছু পরিমাণে যেন অকৃত হয়ে যায়; আর সেই প্রবল কর্মই সিদ্ধ হয়ে ফল দেয়। তাই পুণ্য ও পাপ—উভয় কর্মই সর্বদা ঠিক তেমনভাবেই ফল দেয় না।

Verse 29

देवानां शरणं पुण्य॑ सर्व पुण्यैरवाप्यते । पुण्यशील नर प्राप्य कि दैवं प्रकरिष्यति,देवताओंका आश्रय पुण्य ही है। पुण्यसे ही सब कुछ प्राप्त होता है। पुण्यात्मा पुरुषको पाकर दैव क्‍या करेगा?

দেবতাদের প্রকৃত আশ্রয় পুণ্যই; পুণ্য দ্বারাই সকল পুণ্যফল ও সিদ্ধি লাভ হয়। পুণ্যশীল মানুষকে পেলে ভাগ্য আর তার কীই বা করতে পারে?

Verse 30

पुरा ययातिर्वि भ्रष्टक्ष्यावित: पतित: क्षितौ । पुनरारोपित: स्वर्ग दौहित्रै: पुण्यकर्मभि:

প্রাচীনকালে রাজা যযাতি, পুণ্য ক্ষয় হলে, স্বর্গ থেকে পতিত হয়ে পৃথিবীতে পড়েছিলেন। পরে তাঁর পুণ্যকর্মী দৌহিত্রগণ তাঁকে আবার তুলে স্বর্গলোকে প্রতিষ্ঠিত করেছিল।

Verse 31

पुरूरवाश्च राजर्षिद्विजैरभिहित: पुरा । ऐल इत्यभिविख्यात: स्वर्ग प्राप्तो महीपति:,इसी तरह पूर्वकालमें ऐल नामसे विख्यात राजर्षि पुरूरवा ब्राह्मणोंके आशीर्वाद देनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त हुए थे

এইভাবেই প্রাচীনকালে ‘ঐল’ নামে খ্যাত রাজর্ষি পুরূরবা, ব্রাহ্মণদের প্রশংসা ও আশীর্বাদ লাভ করে, পৃথিবীর অধিপতি হয়েও স্বর্গলোক প্রাপ্ত হয়েছিলেন।

Verse 32

अश्वमेधादिभिर्यज्ञै: सत्कृत: कोसलाधिप: । महर्षिशापात्‌ सौदास: पुरुषादत्वमागत:

(বিপরীত দৃষ্টান্ত) অশ্বমেধ প্রভৃতি যজ্ঞে সম্মানিত হয়েও কোসলাধিপ সৌদাস, মহর্ষির শাপে নরভক্ষী রাক্ষসত্বে পতিত হয়েছিল।

Verse 33

अश्व॒त्थामा च रामश्न मुनिपुत्रौ धनुर्थरौ । न गच्छत: स्वर्गलोक॑ सुकृतेनेह कर्मणा

এইভাবেই অশ্বত্থামা ও রাম (পরশুরাম)—উভয়েই মুনিপুত্র এবং ধনুর্ধর বীর। এ জগতে তারা পুণ্যকর্ম করলেও, কেবল সেই কর্মের জোরে স্বর্গলোকে গমন করেনি।

Verse 34

वसुर्यज्ञशतैरिष्टवा द्वितीय इव वासव: । मिथ्याभिधानेनैकेन रसातलतलं गत:,द्वितीय इन्द्रके समान सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी राजा वसु एक ही मिथ्या भाषणके दोषसे रसातलको चले गये

ভীষ্ম বললেন—রাজা বসু শত যজ্ঞ সম্পন্ন করে, যেন দ্বিতীয় ইন্দ্র হয়েও, একটিমাত্র মিথ্যা বাক্যের দোষে রসাতলের গভীরে পতিত হলেন।

Verse 35

बलिदवीैरोचनिर्बद्धों धर्मपाशेन दैवतै: । विष्णो: पुरुषकारेण पातालसदन: कृत:,विरोचनकुमार बलिको देवताओंने धर्मपाशसे बाँध लिया और भगवान्‌ विष्णुके पुरुषार्थसे वे पातालवासी बना दिये गये

ভীষ্ম বললেন—বিরোচনের পুত্র বলিকে দেবতারা ধর্ম-পাশে বেঁধে ফেলল; আর বিষ্ণুর দৃঢ় উদ্যোগে তাকে পাতালের অধিবাসী করা হল।

Verse 36

शक्रस्योद्गम्य चरणं प्रस्थितो जनमेजय: । द्विजस्त्रीणां वध कृत्वा कि दैवेन न वारित:

ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণদের স্ত্রীদের বধ করে রাজা জনমেজয় শক্রের চরণে আশ্রয় নিয়ে স্বর্গে যাত্রা করল; তখন দैব কেন এসে তাকে নিবৃত্ত করল না?

Verse 37

अज्ञानाद्‌ ब्राह्मणं हत्वा स्पृष्टोे बालवधेन च | वैशम्पायनविप्रर्षि: कि दैवेन न वारित:

ভীষ্ম বললেন—অজ্ঞতাবশত এক ব্রাহ্মণকে বধ করে এবং শিশুহত্যার পাপে কলুষিত হয়েও ব্রাহ্মণঋষি বৈশম্পায়নকে দैব কেন নিবৃত্ত করল না?

Verse 38

गोप्रदानेन मिथ्या च ब्राह्मणेभ्यो महामखे । पुरा नृगश्न राजर्षि: कूकलासत्वमागत:

ভীষ্ম বললেন—প্রাচীনকালে রাজর্ষি নৃগ মহাযজ্ঞে ব্রাহ্মণদের গোধন দান করতে গিয়ে এক ভুল দানে (মিথ্যা-প্রদান) পতিত হন; সেই কারণেই তিনি কূকলাস—গিরগিটির যোনি লাভ করেন।

Verse 39

धुन्धुमारश्न राजर्षि: सत्रेष्वेव जरां गत: । प्रीतिदायं परित्यज्य सुष्वाप स गिरिव्रजे

ভীষ্ম বললেন—রাজর্ষি ধুন্ধুমারশ্ন যজ্ঞ-সত্রে নিয়ত থাকিতে থাকিতে বার্ধক্যে উপনীত হলেন; অতঃপর প্রীতিদায়ক ও সুখকর বিষয় পরিত্যাগ করে তিনি গিরিব্রজের আশ্রমে শয়ন করিলেন।

Verse 40

राजर्षि धुन्धुमार यज्ञ करते-करते बूढ़े हो गये तथापि देवताओंके प्रसन्नतापूर्वक दिये हुए वरदानको त्यागकर गिरिवत्रजमें सो गये (यज्ञका फल नहीं पा सके) ।।

ভীষ্ম বললেন—রাজর্ষি ধুন্ধুমার যজ্ঞ করতে করতে বার্ধক্যে উপনীত হলেন; দেবতারা প্রসন্ন হয়ে যে বর দান করেছিলেন, তাও ত্যাগ করে তিনি গিরিব্রজে শয়ন করিলেন—ফলে যজ্ঞফল লাভ করিলেন না। তদ্রূপ, পাণ্ডবদের অর্জিত রাজ্য মহাবলী ধৃতরাষ্ট্রপুত্রেরা হরণ করেছিল; আর পাণ্ডবেরা তা পুনরায় দैবের ভরসায় নয়, নিজ বাহুবলের আশ্রয়ে উদ্ধার করেছিল।

Verse 41

तपोनियमसंयुक्ता मुनयः संशितव्रता: । कि ते दैवबलात्‌ शापमुत्सृजन्ते न कर्मणा,तप और नियममें संयुक्त रहकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि क्या दैवबलसे ही किसीको शाप देते हैं, पुरुषार्थके बलसे नहीं?

ভীষ্ম বললেন—তপস্যা ও নিয়মে সংযত, কঠোর ব্রতে প্রতিষ্ঠিত মুনিগণ কি কেবল দैববলে শাপ নিক্ষেপ করেন, নিজ কর্ম-প্রচেষ্টায় নয়?

Verse 42

पापमुत्सृजते लोके सर्व प्राप्य सुदुर्लभम्‌ । लोभमोहसमापन्न न दैवं त्रायते नरम्‌

এই জগতে অতি দুর্লভ সব কিছু লাভ করিয়াও মানুষ পাপে পতিত হয়। যে লোভ ও মোহে আচ্ছন্ন, তাকে দैবও রক্ষা করতে পারে না।

Verse 43

संसारमें समस्त सुदुर्लभ सुख-भोग किसी पापीको प्राप्त हो जाय तो भी वह उसके पास टिकता नहीं, शीघ्र ही उसे छोड़कर चल देता है। जो मनुष्य लोभ और मोहमें डूबा हुआ है उसे दैव भी संकटसे नहीं बचा सकता ।।

ভীষ্ম বললেন—সংসারে অতি দুর্লভ সুখ-ভোগ কোনো পাপীর ভাগ্যে জুটিলেও তা তার কাছে স্থির থাকে না; শীঘ্রই তাকে ত্যাগ করে চলে যায়। যে লোভ ও মোহে নিমজ্জিত, তাকে দैবও বিপদ থেকে উদ্ধার করতে পারে না। যেমন অতি ক্ষুদ্র অগ্নিও বায়ুর আশ্রয়ে মহাদাহে পরিণত হয়, তেমনি পুরুষার্থ ও সৎকর্মের সঙ্গে যুক্ত হলে দैবের বলও বিশেষভাবে বৃদ্ধি পায়।

Verse 44

यथा तैलक्षयाद्‌ दीप: प्रह्यासमुपगच्छति । तथा कर्मक्षयाद्‌ दैवं प्रहासमुपगच्छति,जैसे तेल समाप्त हो जानेसे दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार कर्मके क्षीण हो जानेपर दैव भी नष्ट हो जाता है

যেমন তেল ক্ষয় হলে প্রদীপ নিভে যায়, তেমনই কর্ম ক্ষয় হলে দैবও শক্তি হারিয়ে লুপ্ত হয়।

Verse 45

विपुलमपि धनौघं प्राप्य भोगान्‌ स्त्रियो वा पुरुष इह न शक्त: कर्महीनो हि भोक्तुम्‌ । सुनिहितमपि चार्थ दैवतै रक्ष्यमाणं पुरुष इह महात्मा प्राप्तुते नित्ययुक्त:

অঢেল ধনরাশি, নানা ভোগ এবং স্ত্রীলাভ হলেও, যে ব্যক্তি কর্ম-উদ্যোগহীন সে এ জগতে তা ভোগ করতে পারে না; কিন্তু যে মহাত্মা সদা সংযত ও নিরন্তর প্রচেষ্টায় রত, সে দেবতাদের দ্বারা রক্ষিত ও গোপনে পোঁতা ধনও লাভ করে।

Verse 46

व्ययगुणमपि साधु कर्मणा संश्रयन्ते भवति मनुजलोकाद्‌ देवलोको विशिष्ट: । बहुतरसुसमृद्ध्या मानुषाणां गृहाणि पितृवनभवनाभं दृश्यते चामराणाम्‌

দান করতে করতে যে সৎপুরুষ দরিদ্র হয়ে পড়ে, তার সৎকর্মের প্রভাবে দেবতারা পর্যন্ত তার আশ্রয়ে আসেন; ফলে তার গৃহ মানবলোকের তুলনায় শ্রেষ্ঠ দেবলোকসম হয়ে ওঠে। কিন্তু যেখানে দান নেই, সেখানে গৃহ যতই ঐশ্বর্যে পূর্ণ হোক, দেবতাদের দৃষ্টিতে তা শ্মশানেরই সমান।

Verse 47

न च फलति विकर्मा जीवलोके न दैवं व्यपनयति विमार्ग नास्ति दैवे प्रभुत्वम्‌ | गुरुमिव कृतमग्रयं कर्म संयाति दैवं नयति पुरुषकार: संचितस्तत्र तत्र

এই জীবজগতে যে ব্যক্তি উদ্যোগহীন, সে কখনও সত্যভাবে উন্নতি লাভ করে না। দैবের এমন স্বতন্ত্র ক্ষমতা নেই যে সে অলসকে কুপথ থেকে সরিয়ে সৎপথে স্থাপন করবে। শিষ্য যেমন গুরুকে সামনে রেখে চলে, তেমনই দैব মানুষের পুরুষার্থের পশ্চাতে চলে; সঞ্চিত প্রচেষ্টাই দैবকে যেখানে ইচ্ছা সেখানে নিয়ে যায়।

Verse 48

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं मया वै मुनिसत्तम | फलं पुरुषकारस्य सदा संदृश्य तत्त्वतः,मुनिश्रेष्ठ! मैंने सदा पुरुषार्थके ही फलको प्रत्यक्ष देखकर यथार्थरूपसे ये सारी बातें तुम्हें बतायी हैं

হে মুনিশ্রেষ্ঠ! এ সবই আমি তোমাকে সম্পূর্ণভাবে বললাম। পুরুষার্থের ফল আমি সর্বদা সত্যরূপে প্রত্যক্ষ করে তবেই এই কথা তোমাকে জানালাম।

Verse 49

अभ्युत्थानेन दैवस्य समारब्धेन कर्मणा । विधिना कर्मणा चैव स्वर्गमार्गमवाप्लुयात्‌,मनुष्य दैवके उत्थानसे आरम्भ किये हुए पुरुषार्थसे उत्तम विधि और शास्त्रोक्त सत्कर्मसे ही स्वर्गलोकका मार्ग पा सकता है

ভীষ্ম বললেন—উদ্যমে উঠে দাঁড়িয়ে, বিধির অনুকূলে কর্ম আরম্ভ করে, এবং বিধি ও শাস্ত্রবিধানমতে সৎকর্ম পালন করলেই মানুষ স্বর্গপথ লাভ করে।

Frequently Asked Questions

The tension is between moral responsibility and fatalism: whether one should attribute outcomes to daiva or treat oneself as accountable through puruṣakāra and karma, especially in contexts where consequences appear unequal or unpredictable.

It instructs that intentional, regulated action is causally primary for outcomes; daiva is portrayed as effective when aligned with effort, while passive reliance on fate is criticized as practically and ethically disabling.

Rather than a formal phalaśruti, it ends with a pragmatic prescription: by initiative (abhyutthāna), commenced and properly performed action (vidhinā karmaṇā), one attains auspicious goals, framed here as access to the ‘svarga-mārga’ (path to heaven).