
Ānṛśaṃsya–Bhakti: Śukaḥ Śakreṇa Parīkṣitaḥ (Compassion and Devotion—The Parrot Tested by Indra)
Upa-parva: Ānṛśaṃsya–Bhakti Upākhyāna (Śuka–Vṛkṣa Saṃvāda Episode)
Yudhiṣṭhira requests a comprehensive account of the qualities of ānṛśaṃsya-dharma and of devoted persons. Bhīṣma narrates an exemplum from Kāśī’s domain: a hunter, aiming at a deer with a poisoned arrow, strikes a great forest tree instead, causing it to wither and shed leaves and fruit. A parrot living in its hollow refuses to abandon the tree, remaining without food and movement, weakening alongside it out of gratitude and devotion. Indra (Śakra), astonished at such conduct in a bird, descends in the guise of a brāhmaṇa and questions why the śuka clings to a barren, unstable tree when the forest offers many better shelters. The śuka recognizes Indra through tapas-derived insight, replies that divine order is not to be transgressed, recounts being born and protected in that very tree, and frames compassion as a central mark of the virtuous, yielding enduring satisfaction. Indra, pleased by the bird’s steadfastness, grants a boon; the śuka asks for the tree’s restoration. Indra revives the tree with amṛta, and the narrative concludes by asserting that association with the devoted brings prosperity—like the tree prospering through the śuka—and that the śuka attains Indra’s world at life’s end through compassionate conduct.
Chapter Arc: युधिष्ठिर आनृशंस्य (करुणा) और स्वामिभक्ति के धर्म पर प्रश्न उठाते हैं—क्या सचमुच दया ही श्रेष्ठ आचरण है, और भक्ति से आश्रित का कल्याण कैसे होता है? → भीष्म एक पुरातन आख्यान सुनाते हैं: काशिराज के देश में एक लुब्धक विष-बुझा बाण लेकर मृग का शिकार करता है, पर निशाना चूककर बाण एक महान वन-वृक्ष में धँस जाता है। वृक्ष पीड़ा से कराहता है; उसी वृक्ष पर रहने वाला शुक (तोता) उसे छोड़कर नहीं जाता—वह अपने आश्रयदाता की सेवा में अडिग रहता है। इन्द्र (शक्र) यह देखकर चकित होते हैं कि तिर्यग्योनि का पक्षी ऐसी अलौकिक दया और निष्ठा कैसे धारण किए है। → इन्द्र ब्राह्मण-वेष में उतरकर शुक से प्रश्न करते हैं। शुक धर्म का सार बताता है—‘अनुक्रोश (दया) साधुओं का महान धर्म-लक्षण है’—और अपने आश्रय-वृक्ष के प्रति भक्ति/कृतज्ञता को त्यागने से इंकार करता है, चाहे स्वयं को कष्ट ही क्यों न हो। → शुक की दृढ़ भक्ति और आनृशंस्य से वृक्ष पुनः समृद्ध हो उठता है—नये पत्ते, फल, और मनोहर शाखाएँ प्रकट होती हैं। शुक अपने जीवनांत में इन्द्रलोक प्राप्त करता है; और भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि जैसे शुक के सहवास से वृक्ष को सर्वार्थ-सिद्धि मिली, वैसे ही भक्तिमान आश्रित को अपनाकर (और उस पर करुणा रखकर) दोनों का कल्याण होता है।
Verse 1
न२््च्य्निताय्स श्यु #ीीा्-ानत्तज्स पञठ्चमो<ध्याय: स्वामिभक्त एवं ३६३ किक रुषकी श्रेष्ठता बतानेके लिये इन्द्र और संवादका उल्लेख युधिछिर उवाच आनुृशंस्यस्य धर्मज्ञ गुणान् भक्तजनस्य च । श्रोतुमिच्छामि धर्मज्ञ तन्मे ब्रूहि पितामह
যুধিষ্ঠির বললেন—হে ধর্মজ্ঞ পিতামহ! আমি দয়া ও ধর্মনিষ্ঠ ভক্তজনের গুণাবলি শুনতে চাই। অতএব কৃপা করে আমাকে সেগুলি বলুন।
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । वासवस्य च संवादं शुकस्य च महात्मन:
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! এ বিষয়েও এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত দেওয়া হয়—বাসব (ইন্দ্র) ও মহাত্মা শুক (টিয়া) এর সংলাপ।
Verse 3
विषये काशिराजस्य ग्रामान्निष्क्रम्य लुब्धक: । सविषं काण्डमादाय मृगयामास वै मृगम्,काशिराजके राज्यकी बात है, एक व्याध विषमें बुझाया हुआ बाण लेकर गाँवसे निकला और शिकारके लिये किसी मृगको खोजने लगा
ভীষ্ম বললেন—কাশীরাজার রাজ্যে এক ব্যাধ গ্রাম থেকে বেরিয়ে এল। বিষমাখা তীর হাতে নিয়ে সে শিকারের জন্য হরিণ খুঁজতে লাগল।
Verse 4
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें विशज्वामित्रका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ
সেই মহাবনে অল্প দূর গিয়ে মাংসলোভী ব্যাধ কয়েকটি হরিণ দেখে লক্ষ্য স্থির করে তাদের দিকে তীর ছুড়ল।
Verse 5
तेन दुर्वारितास्त्रेण निमित्तचपलेषुणा । महान् वनतरुस्तत्र विद्धो मृगजिघांसया
ব্যাধের তীর ছিল অপ্রতিরোধ্য; কিন্তু আকস্মিক কারণে লক্ষ্যচ্যুত হলো। হরিণ মারার উদ্দেশ্যে ছোড়া সেই তীরই সেখানে এক বিশাল বনবৃক্ষকে বিদ্ধ করল।
Verse 6
स तीक3्षणविषदिग्धेन शरेणातिबलात् क्षतः । उत्सृज्य फलपत्राणि पादप: शोषमागत:
তীক্ষ্ণ বিষমাখা তীরের প্রবল আঘাতে সেই বৃক্ষটি গভীরভাবে ক্ষতবিক্ষত হল। তার ভিতরে বিষ ছড়িয়ে পড়ল; ফল ও পাতা ঝরে গেল, আর সে ধীরে ধীরে শুকিয়ে যেতে লাগল।
Verse 7
तस्मिन् वक्षे तथाभूते कोटरेषु चिरोषित: । न जहाति शुको वासं तस्य भक्त्या वनस्पते:
বৃক্ষটি এমন অবস্থায় পৌঁছালেও, তার কোটরে বহুদিন ধরে বাস করা টিয়াটি নিজের বাসস্থান ত্যাগ করল না। সেই বনস্পতির প্রতি ভক্তি ও অনুরাগে, গাছটি শুকিয়ে গেলেও সে সেখানেই রইল।
Verse 8
निष्प्रचारो निराहारो ग्लान: शिथिलवागपि । कृतज्ञः: सह वृक्षेण धर्मात्मा सो5प्यशुष्यत
সেই ধর্মাত্মা, কৃতজ্ঞ টিয়াটি আর কোথাও যেত না, আহারও গ্রহণ করত না। সে ক্লান্ত ও দুর্বল হয়ে পড়ল; তার বাক্যও ক্ষীণ হয়ে গেল। এভাবে সেই বৃক্ষের সঙ্গে সঙ্গে সেও শুকিয়ে যেতে লাগল।
Verse 9
तमुदारं महासत्त्वमतिमानुषचेष्टितम् । समदुःखसुखं दृष्टवा विस्मित: पाकशासन:
সেই উদার, মহাসত্ত্ববান, মানবসীমা অতিক্রম করা আচরণসম্পন্ন, এবং দুঃখ-সুখে সমভাবাপন্ন টিয়াটিকে দেখে পাকশাসন ইন্দ্র বিস্মিত হলেন।
Verse 10
ततश्चिन्तामुपगत: शक्र: कथमयं द्विज: । तिर्यग्योनावसम्भाव्यमानृशंस्थमवस्थित:,इन्द्र यह सोचने लगे कि यह पक्षी कैसे ऐसी अलौकिक दयाको अपनाये बैठा है, जो पक्षीकी योनिमें प्रायः असम्भव है
তখন শক্র ইন্দ্র চিন্তায় পড়লেন—“এই দ্বিজ, যে তির্যক্-যোনিতে জন্মেছে, কীভাবে এমন করুণায় স্থিত, যা এই যোনিতে প্রায় অসম্ভব বলে ধরা হয়?”
Verse 11
अथवा नात्र चित्र हि अभवद् वासवस्य तु । प्राणिनामपि सर्वेषां सर्व सर्वत्र दृश्यते
অথবা এতে বাসব (ইন্দ্র)-এর জন্য আশ্চর্যের কিছুই ছিল না; কারণ সকল প্রাণীর মধ্যে সর্বপ্রকার বিষয় সর্বত্রই দেখা যায়। এই ভাবনা মনে আসতেই ইন্দ্রের অস্থিরতা প্রশমিত হল এবং মন শান্ত হল।
Verse 12
ततो ब्राह्मणवेषेण मानुषं रूपमास्थित: । अवतीर्य महीं शक्रस्तं पक्षिणमुवाच ह,तदनन्तर वे ब्राह्मणके वेशमें मनुष्यका रूप धारण करके पृथ्वीपर उतरे और उस शुक पक्षीसे बोले--
তারপর শক্র (ইন্দ্র) ব্রাহ্মণের বেশ ধারণ করে মানব-রূপ অবলম্বন করলেন; পৃথিবীতে অবতরণ করে সেই পাখিটিকে সম্বোধন করলেন।
Verse 13
शुक भो पक्षिणां श्रेष्ठ दाक्षेयी सुप्रजा त्वया । पृच्छे त्वां शुकमेनं त्वं कस्मान्न त्यजसि द्रुमम्
“হে শুক, পক্ষীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! তোমার দ্বারা দক্ষের দৌহিত্রী শুকী উত্তম সন্তানসম্ভবা হয়েছে। আমি তোমাকে জিজ্ঞাসা করি—তুমি কেন এখনও এই বৃক্ষ ত্যাগ করছ না?”
Verse 14
अथ पृष्ट: शुकः प्राह मूर्धश्ना समभिवाद्य तम् | स्वागतं देवराज त्वं विज्ञातस्तपसा मया
তখন প্রশ্ন করা হলে শুক প্রথমে মস্তক নত করে যথোচিত প্রণাম জানিয়ে বলল—“দেবরাজ, স্বাগতম। তপস্যার বলেই আমি আপনাকে চিনেছি।”
Verse 15
उनके इस प्रकार पूछनेपर शुकने मस्तक नवाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा --देवराज! आपका स्वागत है। मैंने तपस्थाके बलसे आपको पहचान लिया है! ।।
তখন সহস্রনয়ন ইন্দ্র বললেন—“সাধু, সাধু!” এবং মনে মনে ভাবলেন—“আহা, কী আশ্চর্য জ্ঞান-বোধ!” এইভাবে তিনি অন্তরে অন্তরে তাকে সম্মান করলেন।
Verse 16
तमेवं शुभकर्माणं शुकं परमधार्मिकम् | विजानन्नपि तां प्रीतिं पप्रच्छ बलसूदन:
ভীষ্ম বললেন—শুভকর্মপরায়ণ, পরম ধার্মিক শুকের সেই গভীর অনুরাগ জেনেও বলসুদন ইন্দ্র তাকে জিজ্ঞাসা করলেন—“এই বৃক্ষের প্রতি তোমার প্রেম কতখানি?”
Verse 17
निष्पत्रमफलं शुष्कमशरण्यं पतत्रिणाम् | किमर्थ सेवसे वृक्ष यदा महदिदं वनम्
“এই বৃক্ষটি পত্রহীন, ফলহীন ও শুষ্ক; পাখিদের আশ্রয়ও দেয় না। চারদিকে যখন এই বিশাল বন রয়েছে, তখন তুমি কেন এই বৃক্ষটিকেই আঁকড়ে থাক?”
Verse 18
अन्येडपि बहवो वृक्षा: पत्रसंच्छन्नकोटरा: । शुभा: पर्याप्तसंचारा विद्यन्तेडस्मिन् महावने
“এই মহাবনে আরও বহু বৃক্ষ আছে, যাদের কোটর ঘন পত্রপল্লবে আচ্ছাদিত। তারা সুন্দর এবং পাখিদের বিচরণ ও বাসের জন্য যথেষ্ট স্থান দেয়।”
Verse 19
गतायुषमसामर्थ्य क्षीणसारं हतश्रियम् | विमृश्य प्रज्ञया धीर जहीम॑ स्थविरं द्रुमम्
“ধীর শুক! এই বৃক্ষের আয়ু শেষ; শক্তি নিঃশেষ। এর অন্তঃসার ক্ষীণ, শ্রীও লুপ্ত। প্রজ্ঞায় বিচার করে এখন এই বৃদ্ধ বৃক্ষকে ত্যাগ কর।”
Verse 20
भीष्म उवाच तदुपश्रुत्य धर्मात्मा शुक: शक्रेण भाषितम् । सुदीर्घमतिनि:श्व॒स्य दीनो वाक्यमुवाच ह,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! इन्द्रकी यह बात सुनकर धर्मात्मा शुकने लंबी साँस खींचकर दीनभावसे यह बात कही--
ভীষ্ম বললেন—রাজন! ইন্দ্রের কথা শুনে ধর্মাত্মা শুক দীর্ঘশ্বাস ফেলল এবং দীনভাবে এই বাক্য বলল।
Verse 21
अनतिक्रमणीयानि दैवतानि शचीपते । यत्राभवत् तव प्रश्नस्तन्निबोध सुराधिप,“शचीवल्लभ! दैवका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। देवराज! जिसके विषयमें आपने प्रश्न किया है, उसकी बात सुनिये
ভীষ্ম বললেন—হে শচীপতি! দৈব বিধান অতিক্রম করা যায় না। হে দেবাধিপতি! যে বিষয়ে তোমার প্রশ্ন উঠেছে, তা এখন শোনো ও উপলব্ধি করো।
Verse 22
अस्मिन्नहं टद्रुमे जात: साधुभिश्न गुणैर्युत: । बालभावेन संगुप्त: शत्रुभिश्षल न धर्षित:
ভীষ্ম বললেন—এই বৃক্ষেই আমার জন্ম, এখানেই আমি সজ্জনদের প্রিয় গুণে গুণান্বিত হয়ে বড় হয়েছি। শিশুকে যেমন রক্ষক আগলে রাখে, তেমনি এ বৃক্ষ আমাকে রক্ষা করেছে; শত্রুরা আমাকে পরাভূত বা লাঞ্ছিত করতে পারেনি।
Verse 23
किमनुक्रोश्य वैफल्यमुत्पादयसि मेडनघ । आनृशंस्याभियुक्तस्य भक्तस्यानन्यगस्य च
ভীষ্ম বললেন—হে নিষ্পাপ! করুণার অজুহাতে তুমি কেন আমার সংকল্পকে নিষ্ফল করতে চাও? আমি দয়া-ধর্মে নিয়োজিত এবং আমার আরাধ্যের প্রতি অনন্য ভক্ত; অতএব আমার সদিচ্ছাকে বৃথা করতে চেষ্টা কোরো না।
Verse 24
अनुक्रोशो हि साधूनां महद्धर्मस्य लक्षणम् | अनुक्रोशश्व साधूनां सदा प्रीति प्रयच्छति
ভীষ্ম বললেন—সজ্জনদের ক্ষেত্রে করুণাই মহাধর্মের লক্ষণ। আর সজ্জনদের করুণা সর্বদা অন্তরে প্রীতি ও তৃপ্তি দান করে।
Verse 25
त्वमेव दैवतै: सर्वे: पृच्छयसे धर्मसंशयात् । अतत्त्वं देवदेवानामाधिपत्ये प्रतिष्ठित:
ভীষ্ম বললেন—ধর্ম বিষয়ে সংশয় হলে সকল দেবতাই তোমাকেই জিজ্ঞাসা করে। তাই তুমি দেবদেরও দেবদের উপর অধিপতির আসনে প্রতিষ্ঠিত—যিনি সত্য ও অসত্যের বিচার জানেন।
Verse 26
नाहसे मां सहस्राक्ष ट्रुमं त्याजयितुं चिरात् समर्थमुपजीव्येमं त्यजेयं कथमद्य वै
ভীষ্ম বললেন—হে সহস্রাক্ষ! এই বৃক্ষটিকে আমার থেকে বিচ্ছিন্ন করতে চেষ্টা কোরো না। যখন এটি শক্তিমান ছিল, তখন দীর্ঘকাল আমি এর আশ্রয়ে জীবন ধারণ করেছি; আর আজ যখন এটি শক্তিহীন হয়েছে, তখন একে ত্যাগ করে চলে যাব—এ কীভাবে সম্ভব?
Verse 27
तस्य वाक्येन सौम्येन हर्षित: पाकशासन: । शुकं प्रोवाच धर्मात्मा आनृशंस्येन तोषित:,तोतेकी इस कोमल वाणीसे पाकशासन इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। धर्मात्मा देवेन्द्रने शुककी दयालुतासे संतुष्ट हो उससे कहा--
তার কোমল ও সদ্ভাবপূর্ণ বাক্যে পাকশাসন ইন্দ্র আনন্দিত হলেন। শূকের করুণা ও অক্রূরতায় তুষ্ট হয়ে ধর্মাত্মা দেবেন্দ্র তাকে সম্বোধন করলেন।
Verse 28
वरं वृणीष्वेति तदा स च वव्रे वरं शुक: । आनुृशंस्यपरो नित्यं तस्य वृक्षस्य सम्भवम्,'शुक! तुम मुझसे कोई वर माँगो।” तब दयापरायण शुकने यह वर माँगा कि “यह वृक्ष पहलेकी ही भाँति हरा-भरा हो जाय”
তখন তিনি বললেন—“বর চাও।” তখন সদা করুণাপরায়ণ শূক এই বরই চাইল—যেন সেই বৃক্ষটি পূর্বের মতোই পুনরায় সবুজ-সজীব ও ফল-ফুলে সমৃদ্ধ হয়ে ওঠে।
Verse 29
विदित्वा च दृढां भक्ति तां शुके शीलसम्पदम् | प्रीत: क्षिप्रमथो वृक्षममृतेनावसिक्तवान्
শূকের দৃঢ় ভক্তি ও শীলসম্পদ জেনে ইন্দ্র আরও প্রসন্ন হলেন। তিনি তৎক্ষণাৎ সেই বৃক্ষটিকে অমৃতধারায় সিঞ্চিত করলেন।
Verse 30
तत:ः फलानि पत्राणि शाखाश्षापि मनोहरा: । शुकस्य दृढ्भत्तित्वात् श्रीमत्तां प्राप स द्रुम:
তারপর তাতে নতুন নতুন পাতা, ফল এবং মনোহর শাখা গজিয়ে উঠল। শূকের দৃঢ় ভক্তির ফলে সেই বৃক্ষটি পূর্বের মতোই শ্রীসমৃদ্ধ হয়ে উঠল।
Verse 31
शुकश्न कर्मणा तेन आनृशंस्यकृतेन वै । आयुषो<न्न्ते महाराज प्राप शक्रसलोकताम्,महाराज! वह शुक भी आयु समाप्त होनेपर अपने उस दयापूर्ण बर्तावके कारण इन्द्रलोकको प्राप्त हुआ
ভীষ্ম বললেন—হে মহারাজ! সেই শুকও তার সেই দয়াময়, অনৃশংস কর্মের ফলে আয়ুর অন্তে শক্র (ইন্দ্র)-লোক লাভ করল।
Verse 32
एवमेव मनुष्येन्द्र भक्तिमन्तं समाश्रित: । सर्वार्थसिद्धि लभते शुकं प्राप्य यथा द्रुम:
হে নরেন্দ্র! যেমন ভক্তিময় শুকের সান্নিধ্য পেয়ে সেই বৃক্ষ সকল অভীষ্টের সিদ্ধি লাভ করেছিল, তেমনি ভক্তিসম্পন্ন পুরুষের আশ্রয় নিলে মানুষ তার সকল উদ্দেশ্য সিদ্ধ করে।
Whether one should abandon a non-beneficial, failing dependency (the withered tree) for personal survival and comfort, or remain loyal out of gratitude and compassion despite hardship.
Dharma is not reducible to utility: steadfast compassion and gratitude can constitute a higher ethical rationality, and devotion aligned with non-cruelty becomes a source of both relational restoration and personal merit.
Yes, the closing generalization functions as a results-statement: the supported entity (the tree) attains prosperity through contact with a devoted agent (the śuka), and the śuka’s compassionate act yields an elevated posthumous attainment (Śakra’s world).