
Strī-satkāra (On honoring women) — Mahābhārata 13.46
Upa-parva: Strī-satkāra–anuśāsana (Instruction on honoring women) — within Anuśāsana-parva
Bhīṣma cites traditional authority to argue that women are not to be treated as objects of transaction and that whatever is due should be returned or secured for a maiden. He prescribes reverence and gentle care for women by natal and affinal kin, presenting such conduct as a means to household auspiciousness. The discourse then asserts a causal linkage between marital concord and progeny: if a woman is not pleased, generative continuity is said to diminish. It further claims that where women are not honored, rites become fruitless and the family line declines; households ‘cursed’ by the sorrow of women are portrayed as losing prosperity. The chapter includes a generalizing catalog of human faults (jealousy, pride, harshness, lack of judgment) yet still insists that women merit honor, and it frames many everyday functions—service, food preparation, life-maintenance, childbearing and childrearing—as dependent on women. A cited verse attributed to a Videha princess presents a restrictive ideal of women’s independent ritual agency, and the chapter concludes by identifying women with śrī (prosperity), stating that when honored and properly restrained, they become the household’s fortune.
Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर को स्त्रियों की रक्षा और मर्यादा-विधान का उपदेश देने के लिए एक प्राचीन आख्यान का द्वार खोलते हैं—देवशर्मा और उसके शिष्य विपुल की कथा। → देवशर्मा अपने शिष्य विपुल से पूछते हैं कि महावन में उसने क्या देखा; विपुल संकेत देता है कि कुछ पुरुष उसे ‘तत्त्व से’ जानते थे—मानो गुरु के किसी छिपे दोष का भेद खुल गया हो। व्यभिचार-दोष का भय, गुरु की प्रतिष्ठा, और स्त्री-रक्षा की कठिनता—तीनों तनाव बनकर उभरते हैं। → विपुल का निर्णायक कर्म सामने आता है: वह एक स्त्री की रक्षा करता है—ऐसी रक्षा जिसे त्रिलोकी में अन्य कोई कर पाने में असमर्थ बताया गया है—और इसी प्रसंग से भीष्म का निष्कर्ष तीखा होकर निकलता है कि स्त्रियों में साधु-असाधु दोनों प्रवृत्तियाँ देखी जाती हैं, अतः उनकी रक्षा सदा आवश्यक है। → भीष्म युधिष्ठिर को स्पष्ट नीति देते हैं: पतिव्रता स्त्रियाँ जगत् की माता समान पूज्य हैं, पर दुराचारिणी कुल-नाश का कारण बनती हैं; इसलिए राजा का कर्तव्य है कि वह स्त्रियों की रक्षा, मर्यादा और सामाजिक संतुलन की व्यवस्था करे। देवशर्मा के संदर्भ में यह भी स्पष्ट होता है कि जिस स्थिति में ‘शरीर में प्रवेश किए बिना’ उन्मत्त युवती की रक्षा असंभव थी, वहाँ गुरु पर पापारोपण नहीं टिकता।
Verse 1
अपर त्रिचत्वारिशो<् ध्याय: देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना भीष्म उवाच तमागतमभिप्रेक्ष्य शिष्यं वाक्यमथाब्रवीत् | देवशर्मा महातेजा यत् तत् शृूणु जनाधिप
ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ! শিষ্য বিপুলকে আগমন করতে দেখে মহাতেজস্বী দেবশর্মা তখন এই বাক্য বললেন। হে জনাধিপ, তিনি যা বলেছিলেন তা শোনো।
Verse 2
देवशर्मोवाच कि ते विपुल दृष्टं वै तस्मिन् शिष्य महावने । ते त्वां जानन्ति विपुल आत्मा च रुचिरेव च
দেবশর্মা বললেন—প্রিয় শিষ্য বিপুল! সেই মহাবনে তুমি কী দেখেছিলে? তারা তোমাকে ভালোই চেনে, বিপুল; তোমার অন্তঃস্বভাব এবং রুচিরাকেও তারা জানে।
Verse 3
विपुल उवाच ब्रह्मर्षे मिथुनं कि तत् के च ते पुरुषा विभो । ये मां जानन्ति तत्त्वेन यन्मां त्वं परिपृच्छसि
বিপুল বলল—হে ব্রহ্মর্ষি! আমি যে নারী-পুরুষের যুগল দেখেছিলাম, তারা কারা? আর হে বিভো, সেই ছয় পুরুষই বা কারা, যারা আমাকে তত্ত্বত জানে—যাদের বিষয়ে আপনি আমাকে জিজ্ঞাসা করছেন?
Verse 4
देवशर्मोवाच यद् वै तन्मिथुन ब्रह्मन्नहोरात्र हि विद्धि तत् । चक्रवत् परिवर्तेत तत् ते जानाति दुष्कृतम्
দেবশর্মা বললেন—হে ব্রাহ্মণ! তুমি যে নারী-পুরুষের যুগল দেখেছিলে, তাকে দিন ও রাত্রি বলে জানো। তারা চক্রের ন্যায় আবর্তিত হয়; তাই তারা তোমার দুষ্কৃত্য জানে।
Verse 5
येच ते पुरुषा विप्र अक्षैर्दीव्यन्ति हृष्टवत् । ऋतुूंस्तानभिजानीहि ते ते जानन्ति दुष्कृतम्
দেবশর্মা বললেন—হে বিপ্র! যাদের তুমি পাশা নিয়ে আনন্দে জুয়া খেলতে দেখেছিলে, তাদের ছয় ঋতু বলে জানো। তারাও তোমার দুষ্কৃত্য জানে।
Verse 6
नमां कश्चिद् विजानीत इति कृत्वा न विश्वसेत् नरो रहसि पापात्मा पापकं कर्म वै द्विज,ब्रह्मन! पापात्मा मनुष्य एकान्तमें पापकर्म करके ऐसा विश्वास न करे कि कोई मुझे इस पापकर्ममें लिप्त नहीं जानता है
বিপুল বললেন—হে দ্বিজ ব্রাহ্মণ! ‘আমাকে কেউ জানবে না’—এই ভেবে পাপবুদ্ধি মানুষ যেন গোপনে পাপকর্ম করে নিশ্চিন্ত না হয়। একান্তে করা অধর্ম অজানা থাকে না; এই আত্মপ্রবঞ্চনাই পাপ ও তার ফলকে আরও ঘনীভূত করে।
Verse 7
कुर्वाणं हि नरं कर्म पापं रहसि सर्वदा | पश्यन्ति ऋतवश्वापि तथा दिननिशे<प्युत,एकान्तमें पापकर्म करते हुए पुरुषको ऋतुएँ तथा रात-दिन सदा देखते रहते हैं
বিপুল বললেন—মানুষ গোপনে পাপকর্ম করলেও সে কখনও অদৃশ্য থাকে না; ঋতুগণ এবং দিন-রাত্রিও সর্বদা তাকে দেখে। সময় ও জগতের নিয়মের সামনে লুকানো অধর্মও সাক্ষ্যহীন নয়।
Verse 8
तथैव हि भवेयुस्ते लोका: पापकृतो यथा । कृत्वा नाचक्षत: कर्म मम तच्च यथाकृतम्
বিপুল বললেন—তোমারও সেই লোকই প্রাপ্য হোক, যা পাপাচারীদের ভাগ্যে জোটে। কারণ আমার স্ত্রীর রক্ষা করতে গিয়ে তুমি যে কাজ করেছিলে, তা করে আমাকে জানাওনি; তাই তোমার গতি পাপীদের লোকের দিকেও হতে পারত।
Verse 9
ते त्वां हर्षस्मितं दृष्टवा गुरो: कर्मानिवेदकम् । स्मारयन्तस्तथा प्राहुस्ते यथा श्रुतवान् भवान्
তোমাকে আত্মতুষ্টির হাসিতে হাসতে এবং গুরুকে নিজের কর্ম না জানাতে দেখে, তারা তোমারই কাজ স্মরণ করিয়ে দিয়ে তেমন কথাই বলল—যেমন তুমি নিজ কানে শুনেছিলে। এতে বোঝা যায়, গোপন পাপ যখন অহংকারের সঙ্গে মেশে, তখন লোকনিন্দা অবধারিত হয়।
Verse 10
अहोरात्रं विजानाति ऋतवश्चापि नित्यश: । पुरुषे पापकं कर्म शुभं वा शुभकर्मिण:,पापीमें जो पापकर्म है और शुभकर्मी मनुष्यमें जो शुभकर्म है, उन सबको दिन, रात और ऋतुएँ सदा जानती रहती हैं
দিন-রাত্রি এবং ঋতুগণ নিত্য সাক্ষী; তারা পাপী মানুষের পাপকর্ম এবং শুভকর্মী মানুষের শুভকর্ম সর্বদা জানে। জগতের ছন্দই প্রমাণ—অশুভ বা শুভ, কোনো কর্মই অদেখা থাকে না।
Verse 11
ब्रह्मन! तुमने मुझसे अपना वह कर्म नहीं बताया जो व्यभिचार-दोषके कारण भयरूप था। वे जानते थे, इसलिये उन्होंने तुम्हें बता दिया
বিপুল বললেন— “হে ব্রাহ্মণ! ব্যভিচার-দোষে কলুষিত হয়ে যে কর্ম ভয়ের কারণ হয়েছিল, সে কর্মের কথা তুমি আমাকে বলোনি। তারা তা জানত; তাই তারা তোমাকে তা প্রকাশ করে দিয়েছে।”
Verse 12
तेनैव हि भवेयुस्ते लोका: पापकृतो यथा । कृत्वा नाचक्षत: कर्म मम यच्च त्वया कृतम्,पापकर्म करके न बतानेवाले पुरुषको, जैसा कि तुमने मेरे साथ किया है, वे ही पापाचारियोंके लोक प्राप्त होते हैं
ঐ কর্মের ফলেই তুমি পাপীদের জন্য নির্ধারিত লোকসমূহই লাভ করবে—যেমন তারা পায়, যারা পাপকর্ম করে তা প্রকাশ করে না। আমার সঙ্গে তুমি যা করেছ, তা পাপ গোপন রাখারই পরিণাম।
Verse 13
तत् त्वया मम यत् कर्म व्यभिचाराद् भयात्मकम् | नाख्यातमिति जानन्तस्ते त्वामाहुस्तथा द्विज,त्वयाशक्या च दुर्वृक्त्या रक्षितुं प्रमदा द्विज । नच त्वं कृतवान् किंचिदत: प्रीतो5स्मि तेन ते
বিপুল বললেন— “হে দ্বিজ! ব্যভিচারের ভয়ে জন্ম নেওয়া আমার যে কর্ম, তা তুমি প্রকাশ করোনি—এ কথা জেনে লোকেরা তোমার সম্বন্ধে তেমনই বলে। আর হে ব্রাহ্মণ! কঠোর বাক্যে কোনো নারীকে সত্যিই রক্ষা করা যায় না। তবু তুমি কোনো অনুচিত কাজ করোনি; তাই এ কারণে আমি তোমার প্রতি প্রসন্ন।”
Verse 14
द्विजश्रेष्ठ! यदि मैं इस कर्ममें तुम्हारा दुराचार देखता तो कुपित होकर तुम्हें शाप दे देता और ऐसा करके मेरे मनमें कोई अन्यथा विचार या पश्चात्ताप नहीं होता
“হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এই বিষয়ে যদি আমি তোমার কোনো দুরাচার দেখতাম, তবে ক্রুদ্ধ হয়ে তোমাকে শাপ দিতাম; আর তা করে আমার মনে না অন্য কোনো ভাবনা থাকত, না অনুতাপ।”
Verse 15
सज्जन्ति पुरुषे नार्य: पुंसां सो<्डर्थश्व॒ पुष्कल: । अन्यथारक्षत: शापो5भविष्यत् ते मतिश्न मे
বিপুল বললেন— “নারীরা পুরুষের প্রতি আসক্ত হয়, আর পুরুষদেরও তেমনই প্রবল অনুরাগ থাকে। যদি তোমার অভিপ্রায় তার রক্ষার বিপরীত হতো, তবে তোমার ওপর অবশ্যই শাপ পতিত হতো—এবং আমার মনও তোমাকে শাপ দিতে উদ্যত হতো।”
Verse 16
रक्षिता च त्वया पुत्र मम चापि निवेदिता । अहं ते प्रीतिमांस्तात स्वस्थ: स्वर्ग गमिष्यसि
বিপুল বললেন— “পুত্র! তুমি তাকে রক্ষা করেছ এবং যথাবিধি আমাকে ফিরিয়ে দিয়েছ। বৎস, আমি তোমার প্রতি অত্যন্ত প্রসন্ন। শান্তচিত্তে প্রস্থান করো; তুমি স্বর্গ লাভ করবে।”
Verse 17
बेटा! तुमने यथाशक्ति मेरी स्त्रीकी रक्षा की है और यह बात मुझे बतायी है, अतः मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तात! तुम स्वस्थ रहकर स्वर्गलोकमें जाओगे ।।
বিপুল বললেন— “বৎস! তুমি যথাশক্তি আমার স্ত্রীর রক্ষা করেছ এবং সে কথা আমাকে জানিয়েছ; তাই আমি তোমার প্রতি অত্যন্ত প্রসন্ন। তাত, সুস্থ থেকে তুমি স্বর্গলোকে যাবে।” এ কথা বলে মহর্ষি দেবশর্মা বিপুলের প্রতি আনন্দিত হলেন; তিনি স্ত্রী ও শিষ্যসহ স্বর্গে গিয়ে সেখানে দিব্য সুখ ভোগ করতে লাগলেন।
Verse 18
इदमाख्यातवांश्वापि ममाख्यानं महामुनि: । मार्कण्डेय: पुरा राजन् गड़ाकूले कथान्तरे,राजन! पूर्वकालमें गंगाके तटपर कथा-वार्तके बीचमें ही महामुनि मार्कण्डेयने मुझे यह आख्यान सुनाया था
বিপুল বললেন— “হে রাজন! পূর্বকালে গঙ্গাতীরে কথোপকথনের অবসরে মহামুনি মার্কণ্ডেয় আমাকে এই একই উপাখ্যান শুনিয়েছিলেন।”
Verse 19
तस्माद् ब्रवीमि पार्थ त्वां स्त्रियो रक्ष्या: सदैव च । उभयं दृश्यते तासु सततं साथ्वसाधु च
অতএব, হে পার্থ, আমি তোমাকে বলি— নারীদের সর্বদা রক্ষা করা উচিত; কারণ নারীদের মধ্যে সদ্গুণ ও অসদ্গুণ— উভয়ই সর্বক্ষণ দেখা যায়।
Verse 20
स्त्रिय: साध्व्यो महा भागा: सम्मता लोकमातर: । धारयन्ति महीं राजन्निमां सवनकाननाम्
বিপুল বললেন— “হে রাজন! যে নারীরা সাধ্বী ও মহাভাগ্যা, তারা লোকমাতা রূপে সম্মানিতা; তারাই এই পৃথিবীকে— তার পবিত্র উপবন ও অরণ্যসহ— ধারণ করে।”
Verse 21
राजन! यदि स्त्रियाँ साथ्वी एवं पतिव्रता हों तो बड़ी सौभाग्यशालिनी होती हैं। संसारमें उनका आदर होता है और वे सम्पूर्ण जगत्की माता समझी जाती हैं। इतना ही नहीं, वे अपने पातित्रत्यके प्रभावसे वन और काननोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीको धारण करती हैं ।।
Vipula said: “O King, when women are truly virtuous and devoted to their husbands, they become exceedingly fortunate. The world honors them and regards them as mothers of all beings. More than this, by the power of their chastity they uphold this entire earth together with its forests and groves. But women who are not virtuous—of corrupt conduct, destroyers of family welfare, and resolved upon sin—are to be recognized, O ruler, by the inborn marks of their own bodies and by the signs of their wickedness.”
Verse 22
किंतु दुराचारिणी असती स्त्रियाँ कुलका नाश करनेवाली होती हैं, उनके मनमें सदा पाप ही बसता है। नरेश्वर! फिर ऐसी स्त्रियोंको उनके शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए बुरे लक्षणोंसे पहचाना जा सकता है ।।
Vipula said: “But women who are corrupt in conduct and unchaste become destroyers of a family line; sin alone continually dwells in their minds. O lord of men, such women can be recognized by the evil marks that arise along with their very bodies. In this way, protection in regard to such women can indeed be undertaken by great-souled men; otherwise, O tiger among kings, it is not possible to safeguard women.”
Verse 23
एता हि मनुजव्याघ्र तीक्ष्णास्ती क्ष्णपराक्रमा: । नासामस्ति प्रियो नाम मैथुने सड़मेति यः
Verse 24
एताः कृत्याश्च कार्याश्च कृताश्च भरतर्षभ | न चैकस्मिन् रमन्त्येता: पुरुषे पाण्डुनन्दन
Vipula said: “O bull among the Bharatas, O son of Pāṇḍu: such women are like deadly sorceries—once ‘taken up’ by one man, they become fit to be taken up by another as well. They do not remain devoted to a single man; their attachment does not stay fixed in one place.”
Verse 25
नासां स्नेहो नरै: कार्यस्तथैवेष्ष्या जनेश्वर । खेदमास्थाय भुज्जीत धर्ममास्थाय चैव ह
Vipula said: “O lord of men, a man should neither become overly attached to women nor harbor jealousy toward them. Maintaining inner detachment and taking refuge in dharma, he should enjoy conjugal relations only in the proper season, after the prescribed purification, while avoiding faults such as intercourse on forbidden days and other transgressions.”
Verse 26
निहन्यादन्यथाकुर्वन् नर: कौरवनन्दन । सर्वथा राजशार्टूल मुक्ति: सर्वत्र पूज्यते
বিপুল বললেন—হে কৌরবনন্দন, যে ব্যক্তি ধর্মের বিপরীতে আচরণ করে, সে নিজেই বিনাশ ডেকে আনে। হে রাজশার্দূল, সর্বপ্রকারে ও সর্বত্র মোক্ষই সম্মানিত।
Verse 27
तेनैकेन तु रक्षा वै विपुलेन कृता स्त्रिया: । नान्य: शक्तस्त्रिलोकेडस्मिन् रक्षितुं नूप योषितम्
বিপুল বললেন—হে নরেশ্বর, একমাত্র বিপুলই নারীদের রক্ষা করেছিলেন। এই ত্রিলোকে আর কোনো পুরুষ নেই যে তরুণী নারীদের এভাবে রক্ষা করতে সক্ষম।
Verse 43
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने त्रिचत्वारिंशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ााभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका उपाख्यानविषयक तैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে বিপুলোপাখ্যান-বিষয়ক তেতাল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 214
ब्रह्म! यौवनमदसे उन्मत्त रहनेवाली उस स्त्रीकी (उसके शरीरमें प्रवेश किये बिना) रक्षा करना तुम्हारे वशकी बात नहीं थी। अतः तुमने अपनी ओरसे कोई पाप नहीं किया; इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ ।।
বিপুল বললেন—হে ব্রাহ্মণ, যৌবনের মদে উন্মত্ত সেই নারীর রক্ষা তার দেহে প্রবেশ না করে তোমার পক্ষে সম্ভব ছিল না। অতএব তোমার নিজের পক্ষ থেকে কোনো পাপ হয়নি; তাই আমি তোমার প্রতি প্রসন্ন। যাদের মনে দোষ নেই, তাদের দোষ লাগে না—তোমার ক্ষেত্রেও তাই। প্রিয় পত্নীকে একরকম স্নেহে আলিঙ্গন করা হয়, আর কন্যাকে অন্যরকম—অর্থাৎ বাৎসল্যস্নেহে। তোমার মনে রাগ নেই; তুমি সম্পূর্ণ বিশুদ্ধ, তাই রুচির দেহে প্রবেশ করেও কলুষিত হওনি। কিন্তু যদি আমি তোমাকে দুষ্কর্মে লিপ্ত দেখতাম, হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, তবে ক্রোধে তোমাকে অভিশাপ দিতাম; আমার কোনো দ্বিধা থাকত না।
The chapter advances the claim that honoring and caring for women is a foundational household ethic, associated (within the text’s normative logic) with prosperity, ritual fruitfulness, and the continuity of family life.
It primarily uses authoritative citation and proverbial framing (ancient tradition, named attributions such as a Videha princess) rather than a full narrative episode, presenting the guidance as inherited normative knowledge.
Yes in functional form: it repeatedly attaches outcomes to conduct—honor brings auspiciousness and success in rites, while the sorrow or dishonor of women is said to correlate with the decline of household prosperity and efficacy.