
ब्राह्मणपूजा-राजधर्मः | Royal Duty of Honoring Learned Brahmins
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (Kingship and Governance Instructions)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma what is the foremost duty of an anointed king and what conduct enables attainment of welfare in both worlds. Bhīṣma answers that the king’s highest recurring obligation is the continual honoring and protection of reputable, learned, and senior brāhmaṇas—especially śrotriyas—through respectful attention, material support, and formal salutations. He frames this as a practical instrument of state stability: when such figures are at peace, the realm “shines,” and the public’s functioning is sustained through them. The chapter then expands into a cautionary register: brāhmaṇas are depicted as difficult to oppose, capable (when angered) of overwhelming consequences; their capacities are described as varied and sometimes concealed, with diverse livelihoods and conduct in society. The discourse warns against listening to or participating in disparagement of dvijas; the advised protocol is silent withdrawal. Finally, it asserts that antagonism toward brāhmaṇas is incompatible with secure prosperity, using analogies to emphasize their social and moral “invincibility” within the chapter’s normative worldview.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह से पूछते हैं—यदि ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है, तो विश्वामित्र जैसे क्षत्रिय ने उसी देह से ब्राह्मण्य कैसे पाया? इसी जिज्ञासा के उत्तर में वंश-गाथा और रूपान्तरण की कथा खुलती है। → भीष्म हैहय-वंश और शर्याति-वंश की कड़ियाँ जोड़ते हुए वीतहव्य के पुत्रों और काशी-नरेशों के बीच घोर वैर का वर्णन करते हैं। युद्ध देवासुर-संग्राम-सा उग्र होता है; हैहय राजकुमार विविध शस्त्रों से राजा पर वर्षा करते हैं, मानो हिमालय पर मेघ जल बरसा रहे हों। → प्रतर्दन कवच धारण कर धनुष उठाता है; स्तुतियों के बीच उदित सूर्य-सा दीप्त होकर रण में प्रवेश करता है और निर्णायक पराक्रम से काशी-नरेशों का संहार कर देता है। इसके बाद वीतहव्य का भाग्य-परिवर्तन आता है—भृगुवंशी महर्षि के वचन मात्र से वह क्षत्रिय-जाति का त्याग कर ब्रह्मर्षि/ब्रह्मवादी हो जाता है। → महर्षि भृगु (भृगुवंशी) अपने तप-प्रभाव से ‘जाति’ और ‘अधिकार’ के प्रश्न को वचन-बल द्वारा सुलझाते हैं—वीतहव्य ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है; प्रतर्दन महर्षि की आज्ञा लेकर यथावत लौटता है, जैसे सर्प विष छोड़ दे। कथा आगे गृत्समद आदि वंश-प्रसंगों की ओर संकेत करती है। → वीतहव्य से आगे की संतति-परम्परा (गृत्समद आदि) और ‘ब्राह्मणत्व’ के दुर्लभ होने पर उठे प्रश्न का व्यापक निष्कर्ष अगले प्रसंगों में फैलता है।
Verse 1
ऑपनआक्राा बछ। अकाल त्रिशो&्थ्याय: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध
যুধিষ্ঠির বললেন—হে কুরুকুল-শ্রেষ্ঠ, হে বক্তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ পিতামহ, আপনার মুখে আমি এই মহৎ উপাখ্যান শুনেছি। কিন্তু আপনি যে বলেন—অন্য বর্ণের পক্ষে এই দেহেই ব্রাহ্মণ্য লাভ অতি দুষ্প্রাপ্য—এ কথা কীভাবে বুঝব?
Verse 2
विश्वामित्रेण च पुरा ब्राह्म॒ण्यं प्राप्तमित्युत । श्रूयते वदसे तच्च दुष्प्रापमिति सत्तम
যুধিষ্ঠির বললেন—শোনা যায়, প্রাচীন কালে বিশ্বামিত্র ব্রাহ্মণ্য লাভ করেছিলেন। তবু আপনি বলেন তা দুষ্প্রাপ্য, হে সৎজনশ্রেষ্ঠ—এটি কীভাবে মেলাব?
Verse 3
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! परंतु सुना जाता है कि पूर्वकालमें विश्वामित्रजीने इसी शरीरसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था और आप जो उसे सर्वथा दुर्लभ बता रहे हैं (ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध-सी जान पड़ती हैं) ।।
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ, সৎপুরুষদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! কিন্তু শোনা যায়, প্রাচীনকালে বিশ্বামিত্র এই দেহেই ব্রাহ্মণ্য লাভ করেছিলেন; আর আপনি আবার বলেন, তা অত্যন্ত দুর্লভ—এই দুই কথা যেন পরস্পর বিরোধী মনে হয়। আমি আরও শুনেছি, ক্ষত্রিয় হয়েও রাজা বীতহব্য ব্রাহ্মণ হয়েছিলেন। গাধি-বংশজাত মহাবীর, প্রথমে সেই বৃত্তান্তই আমি শুনতে চাই।
Verse 4
स केन कर्मणा प्राप्तो ब्राह्म॒ण्यं राजसत्तम: । वरेण तपसा वापि तन््मे व्याख्यातुमरहसि
যুধিষ্ঠির বললেন—হে রাজশ্রেষ্ঠ! কোন কর্মের দ্বারা আপনি ব্রাহ্মণ্য লাভ করেছিলেন? তা কি কোনো বর দ্বারা, না তপস্যার দ্বারা? হে নৃপশিরোমণি, দয়া করে আমাকে বিস্তারে ব্যাখ্যা করুন।
Verse 5
भीष्म उवाच शृणु राजन् यथा राजा वीतहव्यो महायशा: । राजर्षिर्दिलभ प्राप्तो ब्राह्मण्यं लोकसत्कृतम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, শোনো। মহাযশস্বী রাজর্ষি রাজা বীতহব্য যেভাবে লোকসম্মানিত, দুর্লভ ব্রাহ্মণ্য লাভ করেছিলেন, আমি তা বর্ণনা করছি।
Verse 6
मनोर्महात्मनस्तात प्रजा धर्मेण शासत: । बभूव पुत्रो धर्मात्मा शर्यातिरिति विश्रुत:
ভীষ্ম বললেন—হে তাত! ধর্মের দ্বারা প্রজাকে শাসনকারী মহাত্মা মনুর এক ধর্মাত্মা পুত্র জন্মালেন, যিনি শর্যাটি নামে প্রসিদ্ধ।
Verse 7
तस्यान्ववाये द्वौ राजन् राजानौ सम्बभूवतु: । हैहयस्तालजंघश्न वत्सस्य जयतां वर
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! তাঁর বংশে দুইজন রাজা প্রসিদ্ধ হলেন—হৈহয় ও তালজঙ্ঘ। হে বিজয়ীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! এই দুজনই বৎসের পুত্র।
Verse 8
हैहयस्य तु राजेन्द्र दशसु स्त्रीषु भारत । शतं बभूव पुत्राणां शूराणामनिवर्तिनाम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজেন্দ্র, হে ভারতবংশীয়! হৈহয় নৃপতির দশ পত্নী ছিলেন। তাঁদের গর্ভে শত পুত্র জন্মাল—যোদ্ধা বীর, যারা যুদ্ধে কখনও পিছু হটত না।
Verse 9
तुल्यरूपप्रभावाणां बलिनां युद्धशालिनाम् । धनुर्वेदे च वेदे च सर्वत्रैव कृतश्रमा:
তাঁদের সকলেরই রূপ ও প্রতাপ এক; তারা বলবান এবং যুদ্ধকলায় পারদর্শী। ধনুর্বিদ্যা ও বেদসহ সর্ববিদ্যায় তারা কঠোর সাধনা করেছিল।
Verse 10
उन सबके रूप और प्रभाव एक समान थे, वे सभी बलवान् तथा युद्धमें शोभा पानेवाले थे। उन्होंने धनुर्वेद और वेदके सभी विषयोंमें परिश्रम किया था ।।
তারা সকলেই রূপে ও প্রতাপে সমান; সবাই বলবান এবং রণাঙ্গনে দীপ্তিমান। ধনুর্বিদ্যা ও বেদের সকল শাখায় তারা পরিশ্রম করেছিল। সেই সময়ে, হে রাজন, কাশীতে হর্যশ্ব নামে এক রাজা রাজত্ব করতেন—দিবোদাসের পিতামহ; বিজয়ী বীরদের মধ্যে তিনি শ্রেষ্ঠ বলে গণ্য ছিলেন।
Verse 11
स वीतहव्यदायादैरागत्य पुरुषर्षभ । गड्भायमुनयोर्मध्ये संग्रामे विनिपातित:,पुरुषप्रवर! वीतहव्यके पुत्रोंने हर्यश्वके राज्यपर चढ़ाई की उन्हें गंगा-यमुनाके बीच युद्धमें मार गिराया
হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! বীতহব্যের উত্তরাধিকারীরা আক্রমণ করে তাকে যুদ্ধে টেনে আনে, আর গঙ্গা-যমুনার মধ্যবর্তী স্থানে সংঘটিত যুদ্ধে তাকে নিপাতিত করে।
Verse 12
त॑ तु हत्वा नरपतिं हैहयास्ते महारथा: । प्रतिजग्मु: पुरी रम्यां वत्सानामकुतो भया:,राजा हर्यश्वको मारकर वे महारथी हैहय-राजकुमार निर्भय हो वत्सवंशी राजाओंकी सुरम्य पुरीको लौट गये
সেই নৃপতিকে বধ করে হৈহয় বংশের মহারথীরা, নির্ভয়ে, বৎসরাজাদের মনোরম নগরীতে প্রত্যাবর্তন করল।
Verse 13
हर्यश्व॒स्य च दायाद: काशिराजो< भ्यषिच्यत । सुदेवो देवसंकाश: साक्षाद् धर्म इवापर:
ভীষ্ম বললেন—হর্যশ্বের উত্তরাধিকারী কাশীরাজের যথাবিধি অভিষেক সম্পন্ন হল। সেই সুদেব দেবসম দীপ্তিমান; যেন ধর্মই অন্য রূপে স্বয়ং প্রকাশিত।
Verse 14
हर्यश्वके पुत्र सुदेव जो देवताके तुल्य तेजस्वी और साक्षात् दूसरे धर्मराजके समान न्यायशील थे, पिताके बाद काशिराजके पदपर अभिषिक्त किये गये ।।
ভীষ্ম বললেন—ধর্মাত্মা কাশীনন্দন সুদেব ধর্মানুযায়ী পৃথিবী শাসন করলেন। কিন্তু তখন বীতহব্যের পুত্রেরা এসে আক্রমণ করল, এবং যুদ্ধে তারা সকলে মিলিত হয়ে তাঁকে পরাজিত করল।
Verse 15
तमथाजोौ विनिर्जित्य प्रतिजग्मुर्यथागतम् । सौदेवस्त्वथ काशीशो दिवोदासो5भ्यषिच्यत
ভীষ্ম বললেন—যুদ্ধে অজকে পরাজিত করে তারা যেমন এসেছিল তেমনই ফিরে গেল। তারপর সৌদেবের পুত্র দিবোদাস কাশীরাজ হিসেবে অভিষিক্ত হল।
Verse 16
दिवोदासस्तु विज्ञाय वीर्य तेषां यतात्मनाम् । वाराणसीं महातेजा निर्ममे शक्रशासनात्
ভীষ্ম বললেন—মহাতেজস্বী রাজা দিবোদাস আত্মসংযমী সেই হৈহয় রাজপুত্রদের বীর্য বুঝে, শক্র (ইন্দ্র)-এর আদেশে বারাণসী নগরী প্রতিষ্ঠা করলেন।
Verse 17
विप्रक्षत्रियसम्बाधां वैश्यशूद्रसमाकुलाम् । नैकद्रव्योच्चयवर्ती समृद्धविपणापणाम्
ভীষ্ম বললেন—সেই নগরী ব্রাহ্মণ ও ক্ষত্রিয়দের ভিড়ে ঘন ছিল, এবং বৈশ্য ও শূদ্রদের দ্বারাও পরিপূর্ণ ছিল। নানাবিধ দ্রব্যসঞ্চয়ে তা সমৃদ্ধ; তার বিপণি, হাট-বাজার ও দোকানপাট ধনসম্পদে পরিপুষ্ট হয়ে বিকশিত ছিল।
Verse 18
गड्जाया उत्तरे कूले वप्रान्ते राजसत्तम । गोमत्या दक्षिणे कूले शक्रस्येवामरावतीम्
হে রাজশ্রেষ্ঠ! সেই নগরী গঙ্গার উত্তর তীরে প্রাচীর-প্রান্ত পর্যন্ত বিস্তৃত ছিল এবং গোमती নদীর দক্ষিণ তীর পর্যন্ত প্রসারিত ছিল। ঐশ্বর্যে তা যেন ইন্দ্রের অমরাবতীই।
Verse 19
तत्र तं राजशार्दूलं निवसन्तं महीपतिम् । आगत्य हैहया भूय: पर्यधावन्त भारत
হে ভারত! সেখানে সেই রাজশার্দূল নৃপতি যখন বাস করছিলেন, তখন হৈহয়রা আবার এসে তাঁকে চারিদিক থেকে ঘিরে ধরল।
Verse 20
भारत! उस नगरीमें निवास करते हुए राजसिंह भूपाल दिवोदासपर पुनः हैहयराजकुमारोंने धावा किया ।। स निष्क्रम्य ददौ युद्ध तेभ्यो राजा महाबल: । देवासुरसमं घोरं दिवोदासो महाद्युति:
হে ভারত! সেই নগরীতে বাস করতে করতে রাজসিংহ দিবোদাসের উপর হৈহয় রাজপুত্ররা আবার আক্রমণ করল। তখন মহাবলী, মহাদ্যুতি দিবোদাস নগর থেকে বেরিয়ে তাদের সঙ্গে যুদ্ধ করলেন—সে যুদ্ধ দেবাসুর-সংগ্রামের মতো ভয়ংকর ছিল।
Verse 21
महातेजस्वी महाबली राजा दिवोदासने पुरीसे बाहर निकलकर उन राजकुमारोंके साथ युद्ध किया। उनका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर था ।।
হে মহারাজ! তিনি যুদ্ধে দশ-দশ দিনের দশ দশক—অর্থাৎ দীর্ঘকাল—অবিচল লড়লেন; কিন্তু অধিকাংশ বাহন নষ্ট হয়ে গেলে তিনি শেষে দুর্দশায় পতিত হলেন।
Verse 22
हतयोधस्ततो राजन् क्षीणकोशश्व भूमिप: । दिवोदास: पुरी त्यक्त्वा पलायनपरो5भवत्
তখন, হে রাজন! যোদ্ধারা নিহত ও কোষ ক্ষয়প্রাপ্ত হলে সেই ভূপতি দিবোদাস নগরী ত্যাগ করে পলায়নে মন দিলেন।
Verse 23
गत्वा55श्रमपदं रम्यं भरद्वाजस्य धीमत: । जगाम शरणं राजा कृताञज्जलिररिंदम,शत्रुदमन नरेश! बुद्धिमान् भरद्वाजके रमणीय आश्रमपर जाकर राजा दिवोदास हाथ जोड़े हुए वहाँ मुनिकी शरणमें गये
প্রাজ্ঞ ভরদ্বাজের মনোরম আশ্রমধামে গিয়ে শত্রুদমনকারী রাজা করজোড়ে বিনীতভাবে তাঁর শরণ নিলেন।
Verse 24
तमुवाच भरद्वाजो ज्येष्ठ: पुत्रो बृहस्पते: । पुरोधा: शीलसम्पन्नो दिवोदासं महीपतिम्
বৃহস্পতির জ্যেষ্ঠ পুত্র, শীলসম্পন্ন ও দিবোদাসের পুরোহিত ভরদ্বাজ রাজাকে দেখে বললেন—“নরেশ! কী কারণে এখানে এসেছেন? আপনার সমস্ত সংবাদ আমাকে বলুন; আপনার মঙ্গলার্থে যা প্রিয় কর্ম, আমি নিষ্কপটভাবে তা করব।”
Verse 25
किमागमनकृत्य ते सर्व प्रब्रूहि मे नूप । यत् ते प्रियं तत् करिष्ये न मे5त्रास्ति विचारणा
হে নৃপ! কোন উদ্দেশ্যে তুমি এখানে এসেছ—সবই আমাকে বিস্তারিত বলো। যা তোমার প্রিয়, তাই আমি করব; এ বিষয়ে আমার মনে কোনো দ্বিধা নেই।
Verse 26
राजोवाच भगवन् वैतहत्यैमें युद्धे वंश: प्रणाशित: । अहमेकः: परिद्यूनो भवन्तं शरणं गत:
রাজা বললেন—“ভগবন! এই যুদ্ধে বীতহব্যের পুত্রেরা আমার বংশ ধ্বংস করেছে। আমি একাই, গভীর শোকে দগ্ধ হয়ে আপনার শরণে এসেছি।”
Verse 27
शिष्यस्नेहेन भगवंस्त्वं मां रक्षितुमर्हसि । एकशेष: कृतो वंशो मम तै: पापकर्मभि:
ভগবন! আমি আপনার শিষ্য; শিষ্যের প্রতি গুরুর স্বাভাবিক স্নেহে আপনি আমাকে রক্ষা করুন। ঐ পাপকর্মীরা আমার বংশে কেবল আমাকে একাই অবশিষ্ট রেখেছে।
Verse 28
तमुवाच महाभागो भरद्वाज: प्रतापवान् । न भेतव्यं न भेतव्यं सौदेव व्येतु ते भयम्,यह सुनकर प्रतापी महर्षि महाभाग भरद्वाजने कहा--'सुदेवनन्दन! तुम न डरो, न डरो। तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये
এ কথা শুনে প্রতাপশালী মহাভাগ ঋষি ভরদ্বাজ বললেন— “সুদেব-নন্দন! ভয় কোরো না, ভয় কোরো না; তোমার ভয় দূর হোক।”
Verse 29
इस प्रकार श्रीमह्ा भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और मतज्ञका संवादविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ইন্দ্র বললেন— “হে প্রজানাথ! তোমার পুত্রলাভের জন্য আমি এক ইষ্টিযজ্ঞ করব; তার শক্তিতে তুমি বীতহব্যের পুত্রদের হাজার হাজারকে সংহার করতে পারবে।”
Verse 30
तत इष्टिं चकारर्षिस्तस्य वै पुत्रकामिकीम् । अथास्य तनयो जज्ञे प्रतर्दन इति श्रुतः,तब ऋषिने राजासे पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। इससे उनके प्रतर्दन नामसे विख्यात पुत्र हुआ महाराज! इसी तरह मैंने गृत्समदके वंशका भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। अब और क्या पूछ रहे हो? ।।
তখন ঋষি তাঁর জন্য পুত্রকামনায় পুত্রেষ্টি যজ্ঞ সম্পন্ন করলেন। তার ফলে ‘প্রতর্দন’ নামে খ্যাত এক পুত্র জন্মাল। ভীষ্ম বললেন—“এভাবে আমি গৃত্সমদের বংশবিস্তারের বিবরণ দিয়েছি; এখন আর কী জানতে চাও?”
Verse 31
स जातमात्रो ववृधे समा: सद्यस्त्रयोदश । वेदं चापि जगौ कृत्स्नं धनुर्वेदे च भारत
ভীষ্ম বললেন—“হে ভারত! সে জন্মমাত্রই বেড়ে উঠল, যেন তৎক্ষণাৎ তেরো বছরের। সেই মুহূর্তেই সে সম্পূর্ণ বেদ এবং ধনুর্বেদও আবৃত্তি করল।”
Verse 32
योगेन च समाविष्टो भरद्वाजेन धीमता । तेजो लोक्यं स संगृहा तस्मिन् देशे समाविशत्,बुद्धिमान् भरद्वाजमुनिने उसे योगशक्तिसे सम्पन्न कर दिया और उसके शरीरमें सम्पूर्ण जगत्का तेज भर दिया
ভীষ্ম বললেন—“বুদ্ধিমান ভরদ্বাজ যোগশক্তিতে তাকে সমাবিষ্ট করলেন। সে লোকব্যাপী তেজ সঞ্চয় করে সেই স্থানে প্রবেশ করল—যেন তার দেহে সমগ্র জগতের দীপ্তি পূর্ণ হলো।”
Verse 33
ततः स कवची धन््वी स्तूयमान: सुरभि: । वन्दिभिर्वन्द्यमानश्न बभौ सूर्य इवोदित:
তখন সেই রাজপুত্র বর্ম পরিধান করে ও ধনুক ধারণ করে প্রশংসার মধ্যে অগ্রসর হল। দেবর্ষিগণ তার যশ গান করতে লাগলেন এবং বন্দিগণ তাকে বন্দনা করল; সে নবোদিত সূর্যের ন্যায় দীপ্ত হয়ে উঠল।
Verse 34
स रथी बद्धनिस्त्रिंशो बभौ दीप्त इवानल: । प्रययौ स धनुर्धुन्चन् खड्गी चर्मी शरासनी
সে রথে আরোহণ করল এবং কোমরে তরবারি বেঁধে প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় দীপ্ত হতে লাগল। ঢাল-তরবারি ও ধনুকসহ, ধনুকের টংকার তুলতে তুলতে সে অগ্রসর হল।
Verse 35
त॑ दृष्टवा परमं हर्ष सुदेवतनयो ययौ । मेने च मनसा दग्धान् वैतहव्यान् स पार्थिव:
তাকে দেখে সुदেব-পুত্র রাজা দিবোদাস পরম আনন্দ পেলেন। মনে মনে তিনি বিতহব্যের পুত্রদেরকে নিজের পুত্রের তেজে দগ্ধ হয়েছে বলেই গণ্য করলেন।
Verse 36
ततो5सौ यौवराज्ये च स्थापयित्वा प्रतर्दनम् कृतकृत्यं तदा55त्मानं स राजा अभ्यनन्दत,तत्पश्चात् राजा दिवोदासने प्रतर्दनको युवराजके पदपर स्थापित करके अपने आपको कृतकृत्य माना और बड़े आनन्दका अनुभव किया
তারপর রাজা দিবোদাস প্রতর্দনকে যুবরাজ পদে প্রতিষ্ঠিত করলেন। তখন তিনি নিজেকে কৃতকৃত্য মনে করে অন্তরে গভীর আনন্দ অনুভব করলেন।
Verse 37
ततस्तु वैतहव्यानां वधाय स महीपति: । पुत्र प्रस्थापयामास प्रतर्दनमरिंदमम्,इसके बाद राजाने अपने पुत्र शत्रुदमन प्रतर्दनको वीतहव्यके पुत्रोंका वध करनेके लिये भेजा
এরপর রাজা বৈতহব্যদের বধের উদ্দেশ্যে শত্রুদমন পুত্র প্রতর্দনকে প্রেরণ করলেন।
Verse 38
सरथ: स तु संतीर्य गज्जामाशु पराक्रमी । प्रययौ वीतहव्यानां पुरी परपुरज्जय:
সেই পরাক্রমী, শত্রুপুর-বিজয়ী বীর রথসহ দ্রুত গজ্জা নদী পার হয়ে বীতহব্যদের নগরীর দিকে যাত্রা করল।
Verse 39
पिताकी आज्ञा पाकर वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला पराक्रमी वीर शीघ्र ही रथसहित गंगापार करके वीतहतव्यपुत्रोंकी राजधानीकी ओर चल दिया ।।
তার রথের ভয়ংকর গর্জন শুনে বৈতহব্য রাজপুত্রেরা—পুরুষসিংহ, বিচিত্র যুদ্ধকৌশলে পারদর্শী—কবচ পরিধান করে, শত্রুর রথ ভাঙতে সক্ষম নগরসদৃশ বিশাল রথে চড়ে নগর থেকে বেরিয়ে এল। ধনুক তুলে তারা প্রতর্দনের দিকে অগ্রসর হয়ে বাণবর্ষণ করতে লাগল।
Verse 40
निष्क्रम्य ते नरव्याप्रा दंशिताश्रित्रयोधिन: । प्रतर्दन॑ समाजग्मु: शरवर्षैरुदायुधा:
নগর থেকে বেরিয়ে সেই নরব্যাঘ্রেরা—কবচধারী রথযোদ্ধা—অস্ত্র তুলে প্রতর্দনের কাছে এসে বাণবর্ষণে তাকে আঘাত করতে লাগল।
Verse 41
शस्त्रैश्न विविधाकारै रथौचैश्व युधिष्ठिर । अभ्यवर्षन्त राजानं हिमवन्तमिवाम्बुदा:
হে যুধিষ্ঠির! যেমন মেঘ হিমবানের উপর জল বর্ষণ করে, তেমনি তারা নানা প্রকার অস্ত্র ও রথসমূহ নিয়ে রাজার উপর বাণবর্ষণ করল।
Verse 42
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां राजा प्रतर्दन: । जघान तान् महातेजा वज्जानलसमै: शरै:
তখন মহাতেজস্বী রাজা প্রতর্দন নিজের অস্ত্র দিয়ে তাদের অস্ত্র প্রতিহত করে, বজ্র ও অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান বাণে তাদের সকলকে নিপাত করল।
Verse 43
कृत्तोत्तमाड़ास्ते राजन् भल्लै: शतसहस्रशः । अपततन् रुधिरार्द्राज़ा निकृत्ता इव किंशुका:
Bhishma said: “O King, struck by broad-headed arrows, their heads were hewn into hundreds and thousands of pieces. With limbs drenched in blood, they fell to the earth like kiṃśuka (palāśa) trees cut down.”
Verse 44
हतेषु तेषु सर्वेषु वीतहव्य: सुतेष्वथ । प्राद्रवन्नगरं हित्वा भूगोराश्रममप्युत,उन सब पुत्रोंके मारे जानेपर राजा वीतहव्य अपना नगर छोड़कर महर्षि भृगुके आश्रममें भाग गये
Bhishma said: When all those sons had been slain, King Vītahavya—overwhelmed by the destruction of his lineage—abandoned his city and fled to the hermitage of the sage Bhṛgu. The episode underscores how the collapse of worldly supports drives a ruler to seek refuge in ascetic sanctuaries, turning from royal power toward spiritual protection and counsel.
Verse 45
ययौ भृगुं च शरणं वीतहव्यो नराधिप: । अभयं च ददौ तस्मै राजे राजन् भगुस्तदा,राजन! वहाँ नरेश्वर वीतहव्यने महर्षि भूगुकी शरण ली। तब भूगुने राजाको अभयदान दे दिया
Bhīṣma said: King Vītahavya sought refuge with the sage Bhṛgu. Then Bhṛgu granted the king fearlessness (protection), O King—affirming the ethical duty to shelter one who has surrendered, even when he is a ruler in distress.
Verse 46
अथानुपदमेवाशु तत्रागच्छत् प्रतर्दन: । स प्राप्य चाश्रमपदं दिवोदासात्मजो<ब्रवीत्,इतनेहीमें उनके पीछे लगा हुआ दिवोदासकुमार प्रतर्दन भी शीघ्र ही वहाँ पहुँचा। आश्रममें पहुँचकर उसने इस प्रकार कहा--
Bhishma said: Then, close on their heels, Pratardana quickly arrived there. Reaching the hermitage, the son of Divodasa spoke as follows—setting the stage for the next exchange in which conduct, restraint, and right action are to be clarified.
Verse 47
भो भो: केजत्राश्रमे सन्ति भूगो: शिष्या महात्मन: । द्रष्टमिच्छे मुनिमहं तस्याचक्षत मामिति
Bhishma said: “Ho there, ho there! Who among you are the disciples of the great-souled Bhrigu in this hermitage? I wish to see the sage. Please inform him of my arrival.”
Verse 48
सतं विदित्वा तु भगुर्निश्चक्रामाश्रमात् तदा । पूजयामास च ततो विधिना नृपसत्तमम्
তাঁকে সত্যসাধু জেনে তখন ভৃগু ঋষি আশ্রম থেকে বেরিয়ে এলেন। পরে বিধি-নিয়ম অনুসারে তিনি নৃপশ্রেষ্ঠকে যথাযথভাবে পূজা-সম্মান করলেন।
Verse 49
प्रतर्दनको आया जान भृगुजी आश्रमसे निकले। उन्होंने नृपश्रेष्ठ प्रतर्दनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया ।।
প্রতর্দন রাজার আগমনের সংবাদ পেয়ে ভৃগু ঋষি আশ্রম থেকে বেরিয়ে এলেন। তিনি নৃপশ্রেষ্ঠ প্রতর্দনকে বিধিপূর্বক অভ্যর্থনা ও সম্মান করলেন। তারপর ভৃগু বললেন—“হে রাজেন্দ্র, হে পৃথিবীনাথ, বলুন—কোন উদ্দেশ্যে আপনি এসেছেন?” তখন রাজা তাঁর আগমনের কারণ এভাবে জানালেন।
Verse 50
राजोवाच अयं ब्रह्मन्नितो राजा वीतहव्यो विसर्ज्यताम् । तस्य पुन्रैहि मे कृत्स्नो ब्रह्मन् वंश: प्रणाशित:
রাজা বললেন—“হে ব্রাহ্মণ! এই রাজা বীতহব্যকে এখান থেকে বিদায় করুন। হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এর পুত্রগণ আমার সমগ্র বংশকে বিনষ্ট করেছে।”
Verse 51
उत्सादितश्न विषय: काशीनां रत्नसंचय: । एतस्य वीर्यदृप्तस्य हतं पुत्रशतं मया
আমি কাশীদের রাজ্য ধ্বংস করে তাদের সঞ্চিত রত্নভাণ্ডার অধিকার করেছি। আর নিজের বীর্যে গর্বিত এই ব্যক্তির শত পুত্রকে আমি বধ করেছি।
Verse 52
तमुवाच कृपाविष्टो भृगुर्थर्मभूतां वर:
তখন করুণায় অভিভূত, ধর্মনিষ্ঠদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ভৃগু তাঁকে বললেন।
Verse 53
एतत् तु वचन श्रुत्वा भगोस्तथ्यं प्रतर्दन:
এই সত্যবচন শুনে প্রতর্দন অত্যন্ত আনন্দিত হল। সে ভক্তিভরে ধীরে ধীরে মহর্ষির চরণ স্পর্শ করে বলল— “ভগবন্! যদি সত্যিই এমনই হয়, তবে আমি কৃতকৃত্য; এতে কোনো সন্দেহ নেই।”
Verse 54
पादावुपस्मृश्य शनै: प्रह्ृष्टो वाक््यमब्रवीत् | एवमप्यस्मि भगवन् कृतकृत्यो न संशय:
ধীরে ধীরে চরণ স্পর্শ করে, আনন্দে পরিপূর্ণ হয়ে সে বলল— “ভগবন্! যদি সত্যিই এমন হয়, তবে আমি কৃতকৃত্য; এতে সন্দেহ নেই।”
Verse 55
य एष राजा वीर्येण स्वजातिं त्याजितो मया । अनुजानीहि मां ब्रह्मन् ध्यायस्व च शिवेन माम्
“এই রাজাকে আমি আমার পরাক্রমে তার স্বজাতি-অবস্থা ত্যাগ করতে বাধ্য করেছি। হে ব্রাহ্মণ, আমাকে বিদায়ের অনুমতি দিন, আর আমার মঙ্গল কামনা করে স্মরণ করুন।”
Verse 56
त्याजितो हि मया जातिमेष राजा भृगूद्धह | ततस्तेनाभ्यनुज्ञातो ययौ राजा प्रतर्दन:
“হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ! এই রাজাকে আমি সত্যিই তার জাতি-স্থিতি ত্যাগ করতে বাধ্য করেছিলাম। তারপর তাঁর অনুমতি পেয়ে রাজা প্রতর্দন প্রস্থান করল।”
Verse 57
भूगोर्वचनमात्रेण स च ब्रह्मर्षितां गत:
“ভৃগুর বচনমাত্র পালন করেই সেও ব্রহ্মর্ষিত্ব লাভ করল।”
Verse 58
तस्य गृत्समद: पुत्रो रूपेणेन्द्र इवापर:
তাঁর পুত্র গৃত্সমদ রূপে যেন আর-এক ইন্দ্র—দীপ্তিমান ও শোভাময়।
Verse 59
ऋग्गवेदे वर्तते चाग्रया श्रुतिर्यस्थ महात्मन:
ঋগ্বেদে সেই মহাত্মার সঙ্গে যুক্ত এক শ্রেষ্ঠ ও অগ্রগণ্য শ্রুতি প্রসিদ্ধ। রাজন, সেখানে ব্রাহ্মণগণ ঋষি গৃত্সমদকে মহাসম্মানে মান্য করেন; ব্রহ্মর্ষি গৃত্সমদ তেজস্বী এবং ব্রহ্মচর্য-নিষ্ঠ ছিলেন।
Verse 60
यत्र गृत्समदो राजन ब्राह्मणैः स महीयते । स ब्रह्मचारी विप्रर्षि: श्रीमान् गृत्समदो5भवत्
রাজন, যেখানে ব্রাহ্মণদের দ্বারা গৃত্সমদ মহিমাপ্রাপ্ত হন, সেই শ্রীমান গৃত্সমদ ছিলেন ব্রহ্মচারী ও বিপ্রর্ষি।
Verse 61
पुत्रो गृत्समदस्यापि सुचेता अभवद् द्विज: । वर्चा: सुचेतस: पुत्रो विहव्यस्तस्य चात्मज:,गृत्समदके पुत्र सुचेता नामके ब्राह्मण हुए। सुचेताके पुत्र वर्चा और वचकि पुत्र विह॒व्य हुए
গৃত্সমদেরও এক পুত্র ছিলেন—দ্বিজ সুচেতা। সুচেতার পুত্র ছিলেন বর্চা, আর বর্চার পুত্র ছিলেন বিহব্য।
Verse 62
विहव्यस्य तु पुत्रस्तु वितत्यस्तस्य चात्मज: । वितत्यस्य सुतः सत्य: संतः सत्यस्य चात्मज:,विहव्यके पुत्रका नाम वितत्य था। वितत्यके पुत्र सत्य और सत्यके पुत्र सन्त हुए
বিহব্যের পুত্র ছিলেন বিতত্য। বিতত্যের পুত্র সত্য, আর সত্যের পুত্র সন্ত।
Verse 63
श्रवास्तस्य सुतश्चर्षि: श्रवसश्चा भवत् तम: । तमसश्न प्रकाशो5भूत् तनयो द्विजसत्तम: । प्रकाशस्य च वागिन्द्रो बभूव जयतां वर:
তাঁর পুত্র মহর্ষি শ্রবা জন্মালেন; শ্রবা থেকে তম জন্মালেন। তম থেকে দ্বিজশ্রেষ্ঠ প্রকাশ জন্মালেন। আর প্রকাশের পুত্র, বিজয়ীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, বাগিন্দ্র হলেন।
Verse 64
तस्यात्मजश्न प्रमितिर्वेदवेदाड़पारग: । घृताच्यां तस्य पुत्रस्तु रुरुर्नामोदपद्यत,वागिन्द्रके पुत्र प्रमेति हुए जो वेदों और वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे। प्रमितिके घृताची अप्सरासे रुरुनामक पुत्र हुआ
তাঁর পুত্র ছিলেন প্রমিতি—যিনি বেদ ও বেদাঙ্গে পারদর্শী পণ্ডিত। প্রমিতি ও অপ্সরা ঘৃতাচীর গর্ভে রুরু নামে এক পুত্র জন্মাল।
Verse 65
प्रमद्वरायां तु रुरो: पुत्र: समुदपद्यत । शुनको नाम विदप्रर्षियस्य पुत्रो5थ शौनक:,रुससे प्रमद्वराके गर्भसे ब्रह्मर्षि शुनकका जन्म हुआ, जिनके पुत्र शौनक मुनि हैं
প্রমদ্বরার গর্ভে রুরু থেকে শুনক নামে এক ব্রহ্মর্ষি জন্মালেন; আর সেই মুনি শুনকের পুত্র হলেন শৌনক।
Verse 66
एवं विप्रत्वमगमद् वीतहव्यो नराधिप: । भृगो: प्रसादादू राजेन्द्र क्षत्रिय: क्षत्रियर्षभ,राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! इस प्रकार राजा वीतहव्य क्षत्रिय होकर भी भृगुके प्रसादसे ब्राह्मण हो गये
হে রাজেন্দ্র! এইভাবে নরাধিপ বীতহব্য—যিনি ক্ষত্রিয়দের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—ভৃগুর প্রসাদে ব্রাহ্মণত্ব লাভ করলেন।
Verse 67
तथैव कथितो वंशो मया गार्त्समदस्तव | विस्तरेण महाराज किमन्यदनुपृच्छसि
হে গার্ত্সমদের বংশধর, মহারাজ! এইভাবেই আমি তোমার বংশ বিস্তারে বললাম। আর কী জানতে চাও?
Verse 513
अस्येदानीं वधादद्य भविष्याम्यनृण: पितु: । इतना ही नहीं
ভীষ্ম বললেন— “আজ একে বধ করলে আমি অবশেষে পিতৃঋণ থেকে মুক্ত হব। শুধু তাই নয়—এর পুত্রেরা কাশী-প্রদেশের সমগ্র রাজ্য উজাড় করে দিয়েছে এবং সঞ্চিত রত্নভাণ্ডার লুণ্ঠন করেছে। অহংকারে মত্ত সেই রাজার শত পুত্রকে আমি ইতিমধ্যেই সংহার করেছি; কেবল এরা-ই অবশিষ্ট। এখন এদেরও বধ করলে কি আমি পিতার ঋণ থেকে নিষ্কৃত হব?”
Verse 523
नेहास्ति क्षत्रिय: कश्रित् सर्वे हीमे द्विजातय: । तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भूगुने दयासे द्रवित होकर उनसे कहा--'राजन्! यहाँ कोई क्षत्रिय नहीं है। ये सब-के-सब ब्राह्मण हैं
ভীষ্ম বললেন— “হে রাজন, এখানে কোনো ক্ষত্রিয় নেই; উপস্থিত সকলেই দ্বিজ—অর্থাৎ ব্রাহ্মণ।” এই কথায় ভীষ্ম ধর্মসংযমের সীমা নির্দেশ করলেন—ব্রাহ্মণদের সামনে বৈরিতা বা দমন নয়, শ্রদ্ধা ও রক্ষা-ই কর্তব্য।
Verse 563
यथागतं महाराज मुक््त्वा विषमिवोरग: । भृगुवंशी महर्षे! मैंने इन राजासे अपनी जातिका त्याग करवा दिया।” महाराज! तदनन्तर महर्षिकी आज्ञा लेकर राजा प्रतर्दन जैसे साँप अपने विषको त्याग देता है
ভীষ্ম বললেন— “মহারাজ, ঋষির অনুমতি পেয়ে রাজা প্রতর্দন যেমন সাপ বিষ ত্যাগ করে, তেমনই ক্রোধ ত্যাগ করে—যেমন এসেছিল তেমনই ফিরে গেল। হে ভৃগুবংশীয় মহর্ষে, আমি এই রাজাকে তার জাত্যভিমান ত্যাগ করিয়েছি।”
Verse 573
वीतहव्यो महाराज ब्रह्म॒वादित्वमेव च । नरेश्वर! इस प्रकार राजा वीतहव्य भृूगुजीके कथनमात्रसे ब्रह्मर्षि एवं ब्रह्मवादी हो गये
ভীষ্ম বললেন— “মহারাজ, নরেশ্বর! এইভাবে রাজা বীতহব্য ভৃগুমুনির বাক্যমাত্রে ব্রহ্মর্ষি হলেন এবং ব্রহ্মের উপদেশদাতা ব্রহ্মবাদীও হলেন।”
Verse 586
शक्रस्त्वमिति यो दैत्यैर्निंगृहीत: किलाभवत् | उनके पुत्रो गृत्समद हुए जो रूपमें दूसरे इन्द्रके समान थे। कहते हैं, किसी समय दैत्योंने उन्हें यह कहते हुए पकड़ लिया था कि “तुम इन्द्र हो"
ভীষ্ম বললেন— “কথিত আছে, এক সময় দৈত্যরা তাকে এই বলে ধরে ফেলেছিল—‘তুমি শক্র (ইন্দ্র)।’ তার পুত্র গৃত্সমদ ছিলেন, যাঁর রূপ ছিল যেন দ্বিতীয় ইন্দ্রের মতো।”
He asks which royal duty is greatest among all obligations and what conduct allows a king to secure welfare in both this world and the next.
To regularly honor reputable and senior learned brāhmaṇas—especially śrotriyas—through respectful engagement, appropriate material support, salutations, and protective governance, treating their well-being as integral to the realm’s stability.
Yes. It advises that disparagement of dvijas should not be listened to; one should remain silent and withdraw, emphasizing disciplined speech and avoidance of factional hostility as part of ethical state maintenance.