Adhyaya 163
Anushasana ParvaAdhyaya 16329 Verses

Adhyaya 163

Chapter Arc: स्वर्ग पर ‘कप’ नामक दानवों का अधिकार जम जाना और देवताओं का मद/अहंकार के कारण संकट में पड़ जाना—एक ऐसा उलटफेर जहाँ अमर भी असहाय दिखते हैं। → देवता अपने दोनों लोक (स्वर्ग और पृथ्वी/अधिकार) हरण हुए जानकर शोकाकुल होकर ब्रह्मा की शरण लेते हैं; उधर ‘कप’ ब्राह्मणों के प्रति वैर/अवज्ञा की ओर बढ़ते हैं, जिससे धर्म-रक्षा का प्रश्न तीखा होता जाता है। → ब्राह्मण-तेज के अपमान का परिणाम—ब्राह्मणों द्वारा ‘कप’ दानवों का भस्म किया जाना; उसी निर्णायक क्षण में देवताओं का संकट कटता है और उनका तेज-वीर्य पुनः जाग्रत होता है। → नारद के वचन से देवता प्रसन्न होकर ब्राह्मणों की महिमा का स्तवन करते हैं; देवताओं का तेज बढ़ता है और वे त्रिलोकी में पुनः पूजित/स्थापित होते हैं। वायु, युधिष्ठिर को उपदेश-रूप में ब्राह्मण-रक्षा और इन्द्रिय-निग्रह का क्षात्रधर्म बताता है। → वायु का संकेत कि ‘भृगुओं से घोर भय’ कालान्तर में प्रकट होगा—भविष्य के दण्ड/परिणाम की छाया अध्याय के अंत में छोड़ दी जाती है।

Shlokas

Verse 1

अपना छा | अ:-फक्राछ सप्तपञ्चाशर्दाधिकशततमोब् ध्याय: कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्म॒णोंका कपोंको भस्म कर देना

ভীষ্ম বললেন— “যুধিষ্ঠির! এত বলার পরেও কার্তবীর্য অর্জুন নীরবই রইল। তখন পবনদেব আবার বললেন— ‘হে নরাধিপ! ব্রাহ্মণদের যে প্রধান কর্তব্য ও শ্রেষ্ঠ আদর্শকর্ম, তা আমার কাছ থেকে শোনো।’”

Verse 2

मदस्यास्यमनुप्राप्ता यदा सेन्द्रा दिवौकस: । तदैव च्यवनेनेह हृता तेषां वसुन्धरा

যখন ইন্দ্রসহ সমস্ত দেবতা মদ (অহংকার/উন্মত্ততা)-এর মুখে পতিত হয়েছিল, ঠিক সেই সময়েই ঋষি চ্যবন এখানে তাদের পৃথিবীর অধিকার কেড়ে নিয়েছিলেন।

Verse 3

उभौ लोकौ हृतौ मत्वा ते देवा दु:खिता5भवन्‌ । शोकार्ताश्चि महात्मानं ब्रह्माणं शरणं ययु:,अपने दोनों लोकोंका अपहरण हुआ जान वे देवता बहुत दुःखी हो गये और शोकसे आतुर हो महात्मा ब्रह्माजीकी शरणमें गये

দুই লোকই হরণ হয়েছে—এ কথা জেনে দেবতারা গভীর দুঃখে নিমগ্ন হলেন। শোকে ব্যাকুল হয়ে তাঁরা মহাত্মা ব্রহ্মার শরণ নিলেন।

Verse 4

देवा ऊचु मदास्यव्यतिषक्तानामस्माकं लोकपूजित । च्यवनेन हता भूमि: कपैश्नैव दिवं प्रभो

দেবতারা বললেন— “হে লোকপূজিত প্রভু! আমরা যখন মদ-এর মুখে জড়িয়ে পড়েছিলাম, তখন চ্যবন আমাদের ভূমি কেড়ে নিয়েছিলেন; আর প্রভু, ‘কপ’ নামক দানবেরা স্বর্গ দখল করেছে।”

Verse 5

ब्रह्मोवाच गच्छध्वं शरणं विप्रानाशु सेन्द्रा दिवौकस: । प्रसाद्य तानुभी लोकाववाप्स्यथ यथा पुरा

ব্রহ্মা বললেন— “ইন্দ্রসহ দেবগণ! তোমরা শীঘ্রই ব্রাহ্মণদের শরণ নাও। তাঁদের প্রসন্ন করতে পারলে পূর্বের মতোই তোমরা দুই লোক পুনরায় লাভ করবে।”

Verse 6

ते ययु: शरणं विप्रानूचुस्ते कान्‌ जयामहे । इत्युक्तास्ते द्विजान्‌ प्राहुर्जयतेह कपानिति

ভীষ্ম বললেন—দেবতারা ব্রাহ্মণদের শরণ নিলেন এবং জিজ্ঞাসা করলেন—“আমরা কাদের জয় করব?” ব্রাহ্মণরা এভাবে বললে দেবতারা উত্তর দিলেন—“এখানে ‘কপ’ নামে দানবদের জয় করো।”

Verse 7

भूगतान्‌ हि विजेतारो वयमित्यब्रुवन्‌ द्विजा: । ततः कर्म समारब्धं ब्राह्मणै:ः कपनाशनम्‌,तब ब्राह्मणोंने कहा--“हम उन दानवोंको पृथ्वीपर लाकर परास्त करेंगे।” तदनन्तर ब्राह्मणोंने कपविनाशक कर्म आरम्भ किया

দ্বিজেরা বললেন—“তাদের ভূমিতে নামিয়ে এনে আমরা জয় করব।” তারপর ব্রাহ্মণরা কপ-বিনাশের কর্ম আরম্ভ করলেন।

Verse 8

तच्छुत्वा प्रेषितो दूतो ब्राह्मणेभ्यो धनी कपै: । सच तान्‌ ब्राह्मणानाह धनी कपवचो यथा,इसका समाचार सुनकर कपोंने ब्राह्मणोंक पास अपना धनी नामक दूत भेजा, उसने उन ब्राह्मणोंसे कपोंका संदेश इस प्रकार कहा--

এ সংবাদ শুনে কপরা ‘ধনী’ নামে এক দূতকে ব্রাহ্মণদের কাছে পাঠাল। সে ব্রাহ্মণদের কাছে গিয়ে কপদের বাণী যথাযথভাবে জানাল।

Verse 9

भवद्धिः सदृशा: सर्वे कपा: किमिह वर्तते । सर्वे वेदविद: प्राज्ञा: सर्वे च क्रतुयाजिन:

সে বলল—“হে ব্রাহ্মণগণ! এই সকল কপ তোমাদেরই সদৃশ; তবে তাদের বিরুদ্ধে এখানে এ কী ঘটছে? তারা সকলেই বেদজ্ঞ, প্রজ্ঞাবান, এবং সকলেই যজ্ঞ-অনুষ্ঠানকারী।”

Verse 10

सर्वे सत्यव्रताश्वैव सर्वे तुल्या महर्षिभि: | श्रीक्षेव रमते तेषु धारयन्ति श्रियं च ते

তারা সকলেই সত্যব্রতধারী এবং সকলেই মহর্ষিদের তুল্য। শ্রী তাদের মধ্যে আনন্দে বাস করেন, আর তারাও শ্রীকে ধারণ করে।

Verse 11

वृथादारान्‌ न गच्छन्ति वृथामांसं न भुञ्जते । दीप्तमन्निं जुह्बते च गुरूणां वचने स्थिता:

ভীষ্ম বললেন—তারা বৈধ বিবাহের বাইরে অন্য নারীর সঙ্গে সংসর্গ করে না; অর্থহীন জেনে মাংস ভক্ষণ করে না। প্রজ্বলিত পবিত্র অগ্নিতে আহুতি দেয় এবং গুরুজন ও আচার্যের আদেশে অবিচল থাকে।

Verse 12

सर्वे च नियतात्मानो बालानां संविभागिन: । उपेत्य शनकैर्यान्ति न सेवन्ति रजस्वलाम्‌ | स्वर्गतिं चैव गच्छन्ति तथैव शुभकर्मिण:

ভীষ্ম বললেন—তারা সকলেই মনসংযমী এবং শিশুদের প্রাপ্য অংশ বণ্টন করে দেয়। কারও নিকটে গিয়েও তারা ধীরে, সংযতভাবে চলে। ঋতুমতী নারীর সঙ্গে তারা সংসর্গ করে না। এভাবে শুভ ও ধর্মময় কর্ম করে তারা স্বর্গগতি লাভ করে।

Verse 13

अभुक्तवत्सु नाश्नन्ति गर्भिणीवृद्धकादिषु । पूर्वल्निषु न दीव्यन्ति दिवा चैव न शेरते

ভীষ্ম বললেন—গর্ভবতী নারী, বৃদ্ধ প্রভৃতি যাঁরা এখনও আহার করেননি, তাঁদের থাকতে তারা নিজে আহার করে না। তারা পূর্বাহ্নে জুয়া খেলে না এবং দিনে ঘুমায় না।

Verse 14

एतैश्वान्यैश्व बहुभिग्ुणैर्युक्तान्‌ कर्थं कपान्‌ | विजेष्यथ निवर्तथ्व॑ निवृत्तानां सुखं हि व:

ভীষ্ম বললেন—এদের সঙ্গে আরও বহু গুণে সমৃদ্ধ ‘কপ’ নামক দানবদের তোমরা কীভাবে পরাজিত করবে? এই অনভিপ্রেত উদ্যোগ থেকে ফিরে এসো; কারণ সংযম ও নিবৃত্তিতেই তোমাদের প্রকৃত মঙ্গল ও সুখ।

Verse 15

ब्राह्मणा ऊचु कपान्वयं विजेष्यामो ये देवास्ते वयं स्मृता: । तस्माद्‌ वध्या: कपा<स्माकं धनिन्‌ याहि यथा55गतम्‌

ব্রাহ্মণরা বললেন—আমরা কপদের পরাজিত করব; যাদের ‘দেবতা’ বলা হয়, প্রকৃতপক্ষে তারা আমরাই। অতএব দেবদ্রোহী কপরা আমাদের দ্বারা বধ্য। সুতরাং আমরা কপকুলকে দমন করব। হে ধনী, যেমন এসেছ তেমনই ফিরে যাও।

Verse 16

धनी गत्वा कपानाह न वो विदप्रा: प्रियंकरा: । गहीत्वास्त्राण्यतो विप्रान्‌ कपा: सर्वे समाद्रवन्‌

ধনী ব্যক্তি কপাদের কাছে গিয়ে বলল—“ব্রাহ্মণরা তোমাদের প্রিয় সাধনে উদ্যত নয়।” এ কথা শুনে সকল কপা অস্ত্রশস্ত্র ধারণ করে একযোগে ধাবিত হয়ে ব্রাহ্মণদের উপর আক্রমণ করল।

Verse 17

समुदग्रध्वजान्‌ दृष्टवा कपान्‌ सर्वे द्विजातय: । व्यसृजन्‌ ज्वलितानग्नीन्‌ कपानां प्राणनाशनान्‌

উচ্চ ধ্বজা উড়িয়ে আক্রমণরত কপাদের দেখে সকল দ্বিজ (ব্রাহ্মণ) কপাদের প্রাণনাশক প্রজ্বলিত অগ্নি নিক্ষেপ করতে লাগল।

Verse 18

ब्रह्मसृष्टा हव्यभुज: कपान्‌ हत्वा सनातना: | नभसीव यथाभ्राणि व्यराजन्त नराधिप,नरेश्वर! ब्राह्मणोंके छोड़े हुए सनातन अग्निदेव उन कपोंका संहार करके आकाशमें बादलोंके समान प्रकाशित होने लगे

হে নরাধিপ! ব্রহ্মা-সৃষ্ট, হব্যভোজী সেই সনাতন অগ্নিদেব কপাদের বিনাশ করে আকাশে মেঘের ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে উঠলেন।

Verse 19

हत्वा वै दानवान्‌ देवा: सर्वे सम्भूय संयुगे | तेनाभ्यजानन्‌ हि तदा ब्राह्मुणै्निहतान्‌ कपान्‌

সে সময় সকল দেবতা যুদ্ধে একত্র হয়ে দানবদের সংহার করল; কিন্তু তখনও তারা জানতে পারল না যে ব্রাহ্মণরা কপাদের বিনাশ করে ফেলেছে।

Verse 20

अथागम्य महातेजा नारदोडकथयद्‌ विभो | यथा हता महाभागैस्तेजसा ब्राह्मणै: कपा:,प्रभो! तदनन्तर महातेजस्वी नारदजीने आकर यह बात बतायी कि किस प्रकार महाभाग ब्राह्मणोंने अपने तेजसे कपोंका नाश किया है

হে প্রভো! তারপর মহাতেজস্বী নারদ এসে জানালেন—কীভাবে মহাভাগ ব্রাহ্মণরা নিজেদের তেজে কপাদের বিনাশ করেছেন।

Verse 21

नारदस्य वच: श्रुत्वा प्रीता: सर्वे दिवौकस: । प्रशशंसुर्द्धिजांश्चापि ब्राह्मुणांश्व॒ यशस्विन:,नारदजीकी बात सुनकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने द्विजों और यशस्वी ब्राह्मणोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की

নারদের বাক্য শুনে স্বর্গবাসী সকল দেবতা পরম আনন্দিত হলেন। তারপর তাঁরা দ্বিজদের—বিশেষত যশস্বী ব্রাহ্মণদের—অত্যন্ত প্রশংসা করলেন।

Verse 22

तेषां तेजस्तथा वीर्य देवानां ववृधे ततः । अवाप्ुवंश्वामरत्वं त्रिषु लोकेषु पूजितम्‌,तदनन्तर देवताओंके तेज और पराक्रमकी वृद्धि होने लगी। उन्होंने तीनों लोकोंमें सम्मानित होकर अमरत्व प्राप्त कर लिया

তারপর দেবতাদের তেজ ও পরাক্রম বৃদ্ধি পেতে লাগল। তিন লোকেই পূজিত হয়ে তাঁরা অমরত্বের সম্মানিত অবস্থায় উপনীত হলেন।

Verse 23

इत्युक्तवचन वायुमर्जुन: प्रत्युवाच ह | प्रतिपूज्य महाबाहो यत्‌ तच्छृणु युधिष्ठिर

মহাবাহু যুধিষ্ঠির! বায়ু এভাবে (ব্রাহ্মণদের) মাহাত্ম্য বলার পর, যথোচিত সম্মান জানিয়ে অর্জুন যে উত্তর দিল, তা শোনো।

Verse 24

अजुन उवाच जीवाम्यहं ब्राह्मणार्थ सर्वथा सततं प्रभो | ब्रह्माण्यो ब्राह्मणेभ्यश्ष प्रणणमामि च नित्यश:

অর্জুন বলল—প্রভু! আমি সর্বতোভাবে ও সর্বদা ব্রাহ্মণদের কল্যাণের জন্যই জীবন ধারণ করি। আমি ব্রাহ্মণ্যধর্মে অনুরক্ত, এবং প্রতিদিন ব্রাহ্মণদের প্রণাম করি।

Verse 25

दत्तात्रेयप्रसादाच्च मया प्राप्तमिदं बलम्‌ | लोके च परमा कीर्तिर्धर्मक्षाचरितो महान्‌,विप्रवर दत्तात्रेयजीकी कृपासे मुझे इस लोकमें महान्‌ बल, उत्तम कीर्ति और महान्‌ धर्मकी प्राप्ति हुई है

মুনিবর দত্তাত্রেয়ের প্রসাদে আমি এই বল লাভ করেছি। এই লোকেই আমি পরম খ্যাতি অর্জন করেছি এবং মহান ধর্মের আচরণ করেছি।

Verse 26

अहो ब्राह्मणकर्माणि मया मारुत तत्त्वतः । त्वया प्रोक्तानि कार्त्स्न्येन श्रुतानि प्रयतेन च

অর্জুন বললেন—হে বায়ুদেব! ব্রাহ্মণদের কর্ম কতই না বিস্ময়কর। আপনি তা আমাকে সত্যভাবে ও সম্পূর্ণরূপে বলেছেন, আর আমি মনোযোগসহকারে সবই শ্রবণ করেছি।

Verse 27

वायुरुवाच ब्राह्मणान्‌ क्षात्रधर्मेण पालयस्वेन्द्रियाणि च । भगुभ्यस्ते भयं घोरं तत्‌ तु कालाद भविष्यति

বায়ু বললেন—রাজন! ক্ষত্রিয়ধর্ম অনুসারে ব্রাহ্মণদের রক্ষা করো এবং ইন্দ্রিয়সংযমও পালন করো। ভৃগুবংশীয় ব্রাহ্মণদের থেকে তোমার প্রতি ভয়ংকর আশঙ্কা আসবে; তবে তা বহু কাল পরে ঘটবে।

Verse 156

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपवके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता और अर्जुनका संवादविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে বায়ুদেব ও অর্জুনের সংলাপবিষয়ক একশ ছাপ্পান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 157

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे सप्तपञ्चाशदधिकशततमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে বায়ুদেব ও অর্জুনের সংলাপবিষয়ক একশ সাতান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।