
Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न उठता है—कौन पूज्य हैं, किसे नमस्कार करना चाहिए, और मनुष्य को किनके प्रति कैसा आचरण रखना चाहिए? → भीष्म ब्राह्मण-तेज की सीमा रेखांकित करते हैं—ब्राह्मणों का परिभव देवताओं तक को पीड़ा दे सकता है; उनके शाप और क्रोध की अग्नि लोक-व्यवस्था को हिला देती है। साथ ही यह कठिन प्रश्न उभरता है कि यदि ब्राह्मण अनिष्ट कर्मों में भी प्रवृत्त हो, तब भी समाज का व्यवहार क्या हो? → निर्णायक वचन आता है—‘सर्वथा ब्राह्मणो मान्यः; दैवतं विद्धि तत्परम्’—अर्थात् ब्राह्मण को हर स्थिति में मान देना चाहिए, उसे दैवत-तुल्य जानना चाहिए; क्योंकि वे आदि-मध्य-अन्त के ज्ञाता, संशयरहित, परावर-विशेषज्ञ और लोक-धारण करने वाले मनीषी हैं। → भीष्म युधिष्ठिर को व्यवहार-नीति देते हैं—ब्राह्मणों की पूजा और नमस्कार करो, उनके प्रति पुत्रवत् विनय रखो; उनके तेज को अग्नि की तरह समझो जो श्मशान में भी दूषित नहीं होता, और यज्ञ में विधिपूर्वक शोभित होता है।
Verse 1
ऑपनआ का बा 2 एकपज्चाशर्दाधकशततमो< ध्याय: ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन युधिषछ्िर उवाच के पूज्या: के नमस्कार्या: कथं वर्तेत केषु च । किमाचार: कीदृशेषु पितामह न रिष्यते
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! এই জগতে কারা সত্যই পূজ্য? কাদের প্রণাম করা উচিত? কীভাবে আচরণ করা উচিত, এবং কোন কোন ধরনের মানুষের প্রতি? কোন ধরনের লোকের সঙ্গে কোন আচরণ করলে ক্ষতি বা দোষ হয় না?
Verse 2
भीष्म उवाच ब्राह्मणानां परिभव सादयेदपि देवता: । ब्राह्मणांस्तु नमस्कृत्य युधिष्ठिर न रिष्यते
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! ব্রাহ্মণদের অপমান দেবতাদেরও দুঃখ ও বিপর্যয়ে ফেলতে পারে। কিন্তু যে ব্রাহ্মণদের প্রণাম করে বিনয় ও শ্রদ্ধায় আচরণ করে, তার কখনও অনিষ্ট হয় না।
Verse 3
ते पूज्यास्ते नमस्कार्या वर्तेथास्तेषु पुत्रवत् । ते हि लोकानिमान् सर्वान् धारयन्ति मनीषिण:
তাঁরাই পূজ্য, তাঁরাই প্রণামের যোগ্য। তাঁদের প্রতি এমন আচরণ করো যেমন সৎ পুত্র পিতার প্রতি করে; কারণ মনীষী ব্রাহ্মণগণ এই সকল লোককে ধারণ ও রক্ষা করেন।
Verse 4
ब्राह्मणा: सर्वलोकानां महान्तो धर्मसेतव: । धनत्यागाभिरामाक्ष वाक्संयमरताक्षू ये
ব্রাহ্মণগণ সকল লোকের জন্য ধর্মের সীমা রক্ষাকারী মহান সেতুর ন্যায়। তাঁরা ধনত্যাগে আনন্দ পান এবং বাক্সংযমে নিবিষ্ট থাকেন।
Verse 5
रमणीयाश्व भूतानां निधानं च धृतव्रता: । प्रणेतारशक्षु लोकानां शास्त्राणां च यशस्विन:
ভীষ্ম বললেন—তাঁরা সকল জীবের কাছে মনোরম ও প্রিয়; তাঁরা এক মহৎ ধনভাণ্ডার। ব্রতে অটল থেকে তাঁরা সমাজের পথপ্রদর্শক—শাস্ত্রের প্রবর্তক ও রক্ষক—এবং মহাযশস্বী।
Verse 6
तपो येषां धन नित्यं वाक् चैव विपुलं बलम् | प्रभवश्वैव धर्माणां धर्मज्ञा: सूक्ष्मदर्शिन:,सदा तपस्या उनका धन और वाणी उनका महान् बल है। वे धर्मोंकी उत्पत्तिके कारण, धर्मके ज्ञाता और सूक्ष्मदर्शी हैं
ভীষ্ম বললেন—যাঁদের নিত্য ধন তপস্যা, আর যাঁদের বাক্যই তাঁদের মহৎ বল, তাঁরাই ধর্মের উৎসস্বরূপ হন। তাঁরা ধর্মজ্ঞ এবং সূক্ষ্মদর্শী।
Verse 7
धर्मकामा: स्थिता धर्मे सुकृतैर्धर्मसेतव: । यान् समाश्रित्य जीवन्ति प्रजा: सर्वाश्चितुर्विधा: ७ ।।
তাঁরা ধর্মই কামনা করেন, পুণ্যকর্মের দ্বারা ধর্মে প্রতিষ্ঠিত থাকেন এবং ধর্মের সেতুস্বরূপ। তাঁদের আশ্রয় নিয়েই চার প্রকারের সমগ্র প্রজা জীবনধারণ করে।
Verse 8
पन्थान: सर्वनेतारो यज्ञवाहा: सनातना: । पितृपैतामहीं गुर्वीमुद्गहन्ति धुरं सदा
ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণরাই সকলের পথপ্রদর্শক, নেতা এবং সনাতন যজ্ঞ-পরম্পরার বাহক। পিতা-পিতামহদের থেকে প্রাপ্ত গুরুতর ধর্ম-মর্যাদার ভার তাঁরা সদা বহন করেন।
Verse 9
धुरि ये नावसीदन्ति विषये सदगवा इव । पितृदेवातिथिमुखा हव्यकव्याग्रभोजिन:
ভীষ্ম বললেন—যেমন উত্তম বলদ বোঝা বহনে শৈথিল্য দেখায় না, তেমনই তারা সংসার-ব্যবহারে দায়িত্বের জোয়ালে না ডোবে, না টলে; ধর্মের ভার বহনে তারা কষ্ট বোধ করে না। তারাই দেবতা, পিতৃগণ ও অতিথিদের ‘মুখ’স্বরূপ; হব্য ও কব্য—উভয় অর্ঘ্যে প্রথম ভাগের অধিকারী তারাই।
Verse 10
भोजनादेव लोकांस्त्रींस्त्रायन्ते महतो भयात् | दीप: सर्वस्य लोकस्य चक्षुश्क्षुष्मतामपि
ভীষ্ম বললেন—শুধু অন্নদান করেই ব্রাহ্মণেরা মহাভয় থেকে ত্রিলোককে রক্ষা করেন। তাঁরা সমগ্র জগতের জন্য প্রদীপস্বরূপ আলোকদাতা, এবং যাদের চোখ আছে তাদেরও চোখস্বরূপ।
Verse 11
सर्वशिक्षा श्रुतिधना निपुणा मोक्षदर्शिन: । गतिज्ञा: सर्वभूतानामध्यात्मगतिचिन्तका:
ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণেরা সকলকে শিক্ষা দেন; বেদই তাঁদের ধন। তাঁরা শাস্ত্রবিদ্যায় নিপুণ, মোক্ষকে লক্ষ্য করে চলেন; সকল জীবের গতি-পরিণতি জানেন এবং আত্মপথের চিন্তায় সদা নিমগ্ন থাকেন।
Verse 12
आदिमध्यावसानानां ज्ञातारश्छिन्नसंशया: । परावरविशेषज्ञा गन्तार: परमां गतिम्,ब्राह्मण आदि, मध्य और अन्तके ज्ञाता, संशयरहित, भूत-भविष्यका विशेष ज्ञान रखनेवाले तथा परम गतिको जानने और पानेवाले हैं
ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণেরা আদ্য, মধ্য ও অন্তের জ্ঞানী; তাঁদের সংশয় ছিন্ন হয়েছে। তাঁরা পর ও অপরের ভেদবোধ করেন এবং পরম গতি জানেন ও লাভ করেন।
Verse 13
विमुक्ता धूतपाप्मानो निर्द्धन्द्धा निष्परिग्रहा: । मानार्हा मानिता नित्य ज्ञानविद्धिर्महात्मभि:
ভীষ্ম বললেন—শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণেরা সকল বন্ধন থেকে মুক্ত ও পাপমুক্ত। দ্বন্দ্ব তাঁদের চিত্তকে টলাতে পারে না। তাঁরা সর্বপ্রকার পরিগ্রহ ত্যাগী এবং সম্মানের যোগ্য; জ্ঞানী মহাত্মারা তাঁদের সর্বদা শ্রদ্ধা করেন।
Verse 14
चन्दने मलपड़्के च भोजने5भोजने समा: । सम॑ येषां दुकूलं च तथा क्षौमाजिनानि च,वे चन्दन और मलकी कीचड़में, भोजन और उपवासमें समान दृष्टि रखते हैं। उनके लिये साधारण वस्त्र, रेशमी वस्त्र और मृगछाला समान हैं
ভীষ্ম বললেন—যাঁরা চন্দনলেপ ও মল-কাদায়, আহার ও উপবাসে সমদৃষ্টি রাখেন; যাঁদের কাছে মোটা কাপড় ও রেশম, তেমনি মসৃণ ক্ষৌমবস্ত্র ও মৃগচর্ম—সবই সমান।
Verse 15
तिष्ठेयुरप्यभुज्जाना बहूनि दिवसान्यपि । शोषयेयुश्च गात्राणि स्वाध्यायै: संयतेन्द्रिया:,वे बहुत दिनोंतक बिना खाये रह सकते हैं और अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर स्वाध्याय करते हुए शरीरको सुखा सकते हैं
তাঁরা বহু দিন আহার না করেও অবিচল থাকতে পারেন; আর ইন্দ্রিয়সংযমে স্বাধ্যায়ে রত থেকে দেহকেও শুষ্ক করে তুলতে পারেন।
Verse 16
अदैवं दैवतं कुर्युर्दवतं चाप्पदैवतम् । लोकानन्यान् सृजेयुस्ते लोकपालांश्ष कोपिता:
তপোবলে ব্রাহ্মণরা যা দেব নয় তাকেও দেব করে তুলতে পারেন; আর ক্রুদ্ধ হলে দেবতাদেরও দেবত্বচ্যুত করতে পারেন। ক্রোধে তারা অন্য-অন্য লোক এবং লোকপালও সৃষ্টি করতে সক্ষম।
Verse 17
अपेय: सागरो येषामपि शापान्महात्मनाम् | येषां कोपाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति,उन्हीं महात्माओंके शापसे समुद्रका पानी पीनेयोग्य नहीं रहा। उनकी क्रोधाग्नि दण्डकारण्यमें आजतक शान्त नहीं हुई
সেই মহাত্মাদের শাপে সাগরের জলও পানযোগ্য রইল না; আর তাঁদের ক্রোধাগ্নি দণ্ডকারণ্যে আজও নিবৃত্ত হয়নি।
Verse 18
देवानामपि ये देवा: कारणं कारणस्य च । प्रमाणस्य प्रमाणं च कस्तानभिभवेद् बुध:
তাঁরাই দেবতাদেরও দেবতা, কারণেরও কারণ, আর প্রমাণেরও প্রমাণ; তবে কোন বুদ্ধিমান ব্যক্তি তাঁদের পরাভূত করতে বা অপমান করতে চাইবে?
Verse 19
येषां वृद्धश्न बालश्न सर्व: सम्मानमरहति । तपोविद्याविशेषात्तु मानयन्ति परस्परम्
ব্রাহ্মণদের মধ্যে বৃদ্ধ হোক বা শিশু—সকলেই সম্মানের যোগ্য; তবে তপস্যা ও বিদ্যার উৎকর্ষ অনুসারে তাঁরা পরস্পরকে বিশেষভাবে মান্য করেন।
Verse 20
अविद्वान ब्राह्माणो देव: पात्र वै पावनं महत् । विद्वान् भूयस्तरो देव: पूर्णमसागरसंनिभ:
ভীষ্ম বললেন—অবিদ্বান ব্রাহ্মণও দেবতুল্য এবং মহাপবিত্রকারী পাত্ররূপে শ্রদ্ধেয়। তবে বিদ্বান ব্রাহ্মণের কথা আর কী বলব? তিনি আরও মহাদেবতুল্য—পূর্ণ ও মহাসাগরের ন্যায়, সদ্গুণে পরিপূর্ণ।
Verse 21
अदिद्वांश्चैव दिद्वांश्न ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्नाप्रणीतश्न॒ यथानि्निर्देवतं महत्
ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণ বিদ্বান হোক বা অবিদ্বান, তিনি এই পৃথিবীতে মহাদেবতা। যেমন অগ্নি সংস্কারসহ প্রতিষ্ঠিত হোক বা না হোক, তবু সে মহাদেবতাই—তেমনি ব্রাহ্মণও শ্রদ্ধেয়।
Verse 22
श्मशाने हापि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति । हविर्यज्ञे च विधिवद् गृह एवातिशोभते
ভীষ্ম বললেন—তেজস্বী অগ্নি শ্মশানেও দুষিত হয় না। বিধিপূর্বক হবি অর্পিত যজ্ঞে এবং গৃহে সেই অগ্নিই আরও অধিক দীপ্তিময় হয়ে ওঠে।
Verse 23
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तते सर्वकर्मसु । सर्वथा ब्राह्मुणो मान्यो दैवतं विद्धि तत्परम्,इस प्रकार यद्यपि ब्राह्मण सब प्रकारके अनिष्ट कर्मोमें लगा हो तो भी वह सर्वथा माननीय है। उसे परम देवता समझो
ভীষ্ম বললেন—এইরূপ, ব্রাহ্মণ যদি সর্বপ্রকার অনিষ্ট কর্মেও প্রবৃত্ত থাকে, তবু সর্বতোভাবে তিনি মান্য। তাঁকে পরম দেবতা বলে জানো।
Verse 150
इस प्रकार श्रीमह्ाा भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सावित्रीमन्त्रकी महिमाविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে সাবিত্রীমন্ত্রের মহিমা-বিষয়ক একশো পঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 151
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंशायामेकपञ्चाशदधिकशततमो< ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে ব্রাহ্মণ-প্রশংসা-বিষয়ক একশ একান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।