Adhyaya 154
Anushasana ParvaAdhyaya 15468 Verses

Adhyaya 154

Bhīṣma’s Yogic Departure, Royal Cremation, and Gaṅgā’s Lament (भीष्मस्य योगयुक्त्या देहत्यागः, पितृमेधः, गङ्गाविलापः)

Upa-parva: Bhīṣma-svargārohaṇa (Bhīṣma’s ascent and funerary rites episode)

Vaiśaṃpāyana reports that after addressing the Kurus, Bhīṣma Śāṃtanava becomes silent and enters progressive dhāraṇā, restraining the prāṇas. Observers witness a marked transformation: as he releases the embedded shafts from his body, each wound becomes viśalya (free of pain/affliction), signaling yogic control over bodily conditions. His self, fully restrained across the sense-bases, exits by cleaving through the crown of the head and rises to the heavens like a great meteor, disappearing into the sky. The Pāṇḍavas, Vidura, and Yuyutsu organize the cremation: they gather woods and fragrances, prepare the pyre, adorn Bhīṣma with cloth and garlands, and perform royal honors (umbrella, fans, attendants). Priests conduct pitṛmedha with fire-offerings while Sāmagas chant Sāmans; fragrant woods (including sandal and other aromatics) are used. After cremation, the assembly proceeds to the Bhāgīrathī for udaka offerings. Gaṅgā emerges grieving, recounting Bhīṣma’s virtues, filial steadfastness, and unmatched martial prowess, expressing astonishment at his fall by Śikhaṇḍin’s instrumentality. Kṛṣṇa consoles her with a doctrinal reading: Bhīṣma attained the highest siddhi by choice, is essentially a Vasu under a curse-born human condition, and his end aligns with kṣatra-dharma; thus grief should subside. Pacified by Kṛṣṇa and Vyāsa, Gaṅgā returns to her waters, and the kings, honored and permitted, depart.

Chapter Arc: नारद के वचन से दृश्य देवगिरि पर खुलता है—वर्षाकाल-सा घनघोर अन्धकार, मेघों की निर्मल वर्षा, दिशाएँ बुझी-बुझी; और उसी रहस्यमय वातावरण में ऋषियों की दृष्टि किसी अलौकिक प्रसंग की ओर खिंचती है। → ऋषि-समूह देवगिरि पर जो देखते हैं, वह साधारण नहीं—वे ‘कारण’ पूछते हैं: प्रभो, यह मानव-देह में जन्म, यह अवतार-लीला, और इसके पीछे का रहस्य क्या है? अपनी अल्पबुद्धि, परतन्त्रता और मृत्यु-मार्ग की व्याकुलता स्वीकार कर वे ज्ञानपूर्वक शरणागति करते हैं और कृष्ण से बुद्धि-पुष्टि की याचना करते हैं। → महापुरुष-प्रस्ताव में भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा का उत्कर्ष—मानव-रूप में प्रकट होकर भी सर्वज्ञ, दिवि-भुवि में सर्वविदित; और उसी आलोक में भीष्म का युधिष्ठिर को राज्य-धर्म के लिए दृढ़ आदेश: दान, नीति और शासन का भार अब तुम्हें धर्मपूर्वक उठाना है। → कृष्ण-स्तुति और शरणागति के बाद प्रसंग ‘पुराण-रहस्य’ की ओर स्थिर होता है—शंकर द्वारा हिमालय-शिखर पर मुनियों को कहे गए प्राचीन उपदेश का संकेत देकर कथा-धारा को धर्म-ज्ञान की परम्परा में बाँधा जाता है; उधर युधिष्ठिर, विश्रान्त भीष्म से पुनः प्रश्न कर शासन-धर्म को सुनने हेतु प्रस्तुत होते हैं। → वृषभध्वज शंकर द्वारा हिमवत्पृष्ठ पर मुनियों को कहे गए ‘पुराण’ का रहस्य अब विस्तार से कहा जाएगा—उस उपदेश में महापुरुष-तत्त्व और दान-धर्म का कौन-सा निर्णायक सूत्र छिपा है?

Shlokas

Verse 1

अफ--रू+ >> अष्टचत्वारिशंर्दाधिकशततमो< ध्याय: भगवान्‌ श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना नारद उवाच अथ व्योम्नि महान्‌ शब्द: सविद्युत्स्तनयित्नुमान्‌ मेघैश्व गगनं नील॑ संरुद्धमभवद्‌ घनै:

নারদ বললেন—তারপর আকাশে বিদ্যুৎসহ ও গম্ভীর মেঘগর্জনাসহ এক মহাশব্দ উঠল। ঘন মেঘপুঞ্জে আচ্ছন্ন হয়ে সমগ্র আকাশ নীলাভ হয়ে ঢেকে গেল।

Verse 2

प्रावषीव च पर्जन्यो ववृषे निर्मल पय: । तमश्वैवाभवद्‌ घोरं दिशश्व॒ न चकाशिरे,वर्षाकालकी भाँति मेघसमूह निर्मल जलकी वर्षा करने लगा। सब ओर घोर अन्धकार छा गया। दिशाएँ नहीं सूझती थीं

নারদ বললেন—বর্ষাকালের ন্যায় মেঘপুঞ্জ নির্মল জল বর্ষণ করল; কিন্তু সর্বত্র ভয়ংকর অন্ধকার নেমে এল, দিকগুলিও আর দীপ্ত হল না—কোনো দিক নির্ণয় করা গেল না।

Verse 3

ततो देवगिरौ तस्मिन्‌ रम्ये पुण्ये सनातने । न शर्व भूतसंघं वा ददृशुर्मुन॒यस्तदा

তখন সেই মনোরম, পবিত্র ও সনাতন দেবগিরিতে দৃষ্টি দিলে মুনিগণ না শর্ব (শিব)কে দেখলেন, না তাঁর ভূতগণের সমাবেশ।

Verse 4

व्यभ्रं च गगनं सद्यः क्षणेन समपद्यत । तीर्थयात्रां ततो विप्रा जग्मुश्नान्ये यथागतम्‌

তৎক্ষণাৎ এক নিমেষে আকাশ মেঘমুক্ত হয়ে নির্মল হল। তখন ব্রাহ্মণগণ সেখান থেকে তীর্থযাত্রায় বেরিয়ে পড়লেন, আর অন্যরা যেমন এসেছিল তেমনই ফিরে গেল।

Verse 5

तददभुतमचिन्त्यं च दृष्टवा ते विस्मिता5भवन्‌ | शड्करस्योमया सार्ध संवादं त्वत्कथाश्रयम्‌

সে আশ্চর্য ও অচিন্ত্য ঘটনাটি দেখে তারা বিস্ময়ে অভিভূত হল। আর উমার সঙ্গে শঙ্করের যে সংলাপ তোমাকে অবলম্বন করে হয়েছিল, তা শুনে আমরা দৃঢ় সিদ্ধান্তে পৌঁছেছি—তুমিই সেই সনাতন পুরুষ, ব্রহ্মস্বরূপ।

Verse 6

स भवान्‌ पुरुषव्याप्र ब्रह्मभूत:ः सनातन: । यदर्थमनुशिष्टा: स्मो गिरिपृष्ठे महात्मना

হে পুরুষব্যাঘ্র! তুমিই ব্রহ্মভূত সনাতন পুরুষ; যাঁর নিমিত্ত মহাত্মা (মহাদেব) পর্বতশিখরে আমাদের উপদেশ দিয়েছিলেন।

Verse 7

द्वितीयं त्वद्भुतमिदं त्वत्तेज: कृतमद्य वै दृष्टवा च विस्मिता: कृष्ण सा च न: स्मृतिरागता

নারদ বললেন—হে কৃষ্ণ! আজ তোমার তেজের প্রভাবে দ্বিতীয় এক আশ্চর্য ঘটনা ঘটল। তা দেখে আমরা বিস্মিত হয়েছি, আর শঙ্কর (শিব)-সম্পর্কিত সেই পূর্বকালের ঘটনাও আমাদের মনে আবার জেগে উঠেছে।

Verse 8

एतत्‌ ते देवदेवस्य माहात्म्यं कथितं प्रभो । कपर्दिनो गिरीशस्य महाबाहो जनार्दन,प्रभो! महाबाहु जनार्दन! यह मैंने आपके समक्ष जटाजूटधारी देवाधिदेव गिरीशके माहात्म्यका वर्णन किया है

নারদ বললেন—প্রভু! দেবদেব, জটাধারী গিরীশ (শিব)-এর মাহাত্ম্য আমি আপনার কাছে বর্ণনা করেছি। মহাবাহু জনার্দন! তাঁর মহিমার এই পবিত্র কাহিনি আপনার সম্মুখে নিবেদন করলাম।

Verse 9

इत्युक्त: स तदा कृष्णस्तपोवननिवासिभि: । मानयामास तान्‌ सवनिषीन्‌ देवकिनन्दन:,तपोवन-निवासी मुनियोंके ऐसा कहनेपर देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने उस समय उन सबका विशेष सत्कार किया

তপোবনে নিবাসকারী ঋষিরা এভাবে বললে, দেবকীনন্দন শ্রীকৃষ্ণ তখন সমবেত হয়ে বসে থাকা তাঁদের সকলকে বিশেষ সম্মানে আদর-সত্কার করলেন।

Verse 10

अथर्षय: सम्प्रहृष्टा: पुनस्ते कृष्णमब्रुवन्‌ । पुन: पुन: दर्शयास्मान्‌ सदैव मधुसूदन,तदनन्तर वे महर्षि पुनः हर्षमें भरकर श्रीकृष्णसे बोले--“मधुसूदन! आप सदा ही हमें बारंबार दर्शन देते रहें

তারপর সেই মহর্ষিরা আনন্দে পরিপূর্ণ হয়ে আবার কৃষ্ণকে বললেন—“হে মধুসূদন! আমাদেরকে বারবার দর্শন দাও; সর্বদা তোমার সান্নিধ্য লাভ হোক।”

Verse 11

नहि नः सा रति: स्वर्गे या च त्वद्दर्शने विभो । तदृतं च महाबाहो यदाह भगवान्‌ भव:

হে বিভো! তোমার দর্শনে যে আনন্দ-ভক্তি আমাদের হয়, তা স্বর্গেও আমাদের হয় না। হে মহাবাহু! ভগবান ভব (শিব) যা বলেছিলেন, তা সম্পূর্ণ সত্য প্রমাণিত হয়েছে।

Verse 12

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं रहस्यमरिकर्शन । त्वमेव हार्थतत्त्वज्ञ: पृष्टोडस्मान्‌ पृच्छसे यदा

নারদ বললেন—হে শত্রুদমন! এই সমগ্র গূঢ় রহস্য আমি তোমাকে প্রকাশ করলাম। তুমি নিজেই অর্থ-তত্ত্বের জ্ঞাতা। তুমি আমাদের জিজ্ঞাসা করেছিলে; কিন্তু যখন তুমি উল্টে আমাদেরই প্রশ্ন করতে লাগলে, তখন তোমার প্রীতির জন্যই আমরা এই রক্ষিত রহস্য বর্ণনা করলাম। তিন লোকের মধ্যে এমন কিছু নেই যা তোমার অজানা।

Verse 13

तदस्माभिरिदं गुहां त्वत्प्रियार्थमुदाहतम्‌ । न च ते<विदितं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते

অতএব তোমার প্রিয়ার্থে আমরা এই গূঢ় রহস্য উচ্চারণ করেছি। হে শত্রুসূদন, তিন লোকের মধ্যে এমন কিছুই নেই যা তোমার অজানা।

Verse 14

जन्म चैव प्रसूतिश्व॒ यच्चान्यत्‌ कारणं विभो । वयं तु बहुचापल्यादशक्ता गुह्मधारणे

হে প্রভু! মানবদেহে তোমার জন্ম, তার গোপন কারণ এবং অন্য কোনো বিষয়ই তোমার কাছে গোপন নয়। কিন্তু আমরা অতিশয় চঞ্চল স্বভাবের জন্য এই গভীর বিষয়টি অন্তরে গোপন রাখতে অক্ষম হয়েছি।

Verse 15

ततः स्थिते त्वयि विभो लघुत्वात्‌ प्रलपामहे । न हि किंचित्‌ तदाश्चर्य यज्ञ वेज्षि भवानिह

হে বিভু! তুমি এখানে উপস্থিত থাকায় পরিচয়ের বশে আমরা অবাধে কথা বলছি। কিন্তু হে যজ্ঞস্বরূপ! এতে আশ্চর্য কী—এখানে তো তুমি সবই জানো।

Verse 16

साधयाम वयं कृष्ण बुद्धि पुष्टिमवाप्रुहि,“श्रीकृष्ण! अब आप हमें जानेकी आज्ञा दें, जिससे हम अपना कार्य साधन करें। आपको उत्तम बुद्धि और पुष्टि प्राप्त हो

হে শ্রীকৃষ্ণ! এখন আমাদের বিদায়ের অনুমতি দাও, যাতে আমরা আমাদের কার্য সাধন করতে পারি। তোমার হোক উৎকৃষ্ট বুদ্ধি ও বলবৃদ্ধি।

Verse 17

पुत्रस्ते सदृशस्तात विशिष्टो वा भविष्यति । महाप्रभावसंयुक्तो दीप्तिकीर्तिकर: प्रभु:

হে তাত! তোমার সদৃশ অথবা তোমার থেকেও শ্রেষ্ঠ এক পুত্র তোমার হবে। তিনি মহাপ্রভাবসম্পন্ন, তেজোময়, কীর্তি-বিস্তারে সক্ষম এবং সর্বকর্মে সমর্থ হবেন।

Verse 18

भीष्म उवाच तत:ः प्रणम्य देवेशं यादवं पुरुषोत्तमम्‌ | प्रदक्षिणमुपावृत्य प्रजग्मुस्ते महर्षय:

ভীষ্ম বললেন—তারপর সেই মহর্ষিগণ যাদবকুল-রত্ন দেবেশ্বর পুরুষোত্তম শ্রীকৃষ্ণকে প্রণাম করে এবং তাঁর প্রদক্ষিণা করে প্রস্থান করলেন।

Verse 19

सो<यं नारायण: श्रीमान्‌ दीप्त्या परमया युत: । व्रतं यथावत्‌ तच्चीरत्त्वा द्वारकां पुनरागमत्‌

এরপর পরম কান্তিতে বিভূষিত সেই শ্রীমান্ নারায়ণ যথাবিধি তাঁর ব্রত সম্পন্ন করে পুনরায় দ্বারকাপুরীতে প্রত্যাবর্তন করলেন।

Verse 20

पूर्णे च दशमे मासि पुत्रो5स्य परमादभुत: । रुक्मिण्यां सम्मतो जज्ञे शूरो वंशधर: प्रभो

হে প্রভু! দশম মাস পূর্ণ হলে রুক্মিণীর গর্ভে তাঁর এক পরম আশ্চর্য পুত্র জন্ম নিল—যিনি সকলের প্রীতিপাত্র ও সম্মত, বীর এবং বংশধারক ছিলেন।

Verse 21

स काम: सर्वभूतानां सर्वभावगतो नृप । असुराणां सुराणां च चरत्यन्तर्गतः सदा

হে নৃপ! যে কাম সকল প্রাণীর সকল ভাবের মধ্যে ব্যাপ্ত, এবং দেবতা ও অসুরদেরও অন্তঃকরণে সদা বিচরণ করে—সেই কামদেবকেই ভগবান শ্রীকৃষ্ণের বংশধর বলা হয়েছে।

Verse 22

सो<यं पुरुषशार्दूलो मेघवर्णश्षतुर्भुज: । संश्रित:पाण्डवान्‌ प्रेम्णा भवन्तश्वैनमाश्रिता:

ভীষ্ম বললেন—এই মেঘশ্যাম, চতুর্ভুজ পুরুষসিংহ শ্রীকৃষ্ণ প্রেমবশে পাণ্ডবদের আশ্রয় নিয়েছেন; আর তোমরাও তাঁরই শরণাগত। অতএব কৃষ্ণ ও পাণ্ডবদের বন্ধন প্রেমপূর্ণ পারস্পরিক আশ্রয়ের।

Verse 23

कीर्तिलिक्ष्मीर्धतिश्वैव स्वर्गमार्गस्तथैव च । यत्रैष संस्थितस्तत्र देवो विष्णुस्त्रिविक्रम:,ये त्रिविक्रम विष्णुदेव जहाँ विद्यमान हैं, वहीं कीर्ति, लक्ष्मी, धृति तथा स्वर्गका मार्ग है

ভীষ্ম বললেন—যেখানে ত্রিবিক্রম বিষ্ণুদেব সুপ্রতিষ্ঠিত, সেখানেই কীর্তি, লক্ষ্মী, ধৃতি এবং স্বর্গগমনের পথ বিদ্যমান।

Verse 24

सेन्द्रा देवास्त्रयस्त्रिंशदेष नात्र विचारणा । आदिदेवो महादेव: सर्वभूतप्रतिश्रय:

ভীষ্ম বললেন—ইন্দ্রসহ তেত্রিশ দেবতাই আসলে এঁরই স্বরূপ; এতে কোনো সন্দেহ নেই। তিনিই আদিদেব মহাদেব, সকল প্রাণীর আশ্রয় ও অবলম্বন।

Verse 25

अनादिनिधनोडव्यक्तो महात्मा मधुसूदन: । अयं जातो महातेजा: सुराणामर्थसिद्धये,इनका न आदि है न अन्त। ये अव्यक्तस्वरूप, महातेजस्वी महात्मा मधुसूदन देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये यदुकुलमें उत्पन्न हुए हैं

ভীষ্ম বললেন—মহাত্মা মধুসূদন অনাদি-অনন্ত, অব্যক্ত স্বরূপ। সেই মহাতেজস্বী প্রভু দেবতাদের উদ্দেশ্য সিদ্ধ করতে (ধর্ম প্রতিষ্ঠার জন্য) অবতীর্ণ হয়েছেন।

Verse 26

सुदुस्तरार्थतत्त्वस्य वक्ता कर्ता च माधव: । तव पार्थ जय: कृत्स्नस्तव कीर्तिस्तथातुला

ভীষ্ম বললেন—মাধবই সেই দুরতিক্রম তত্ত্বের বক্তা এবং কর্তা। হে পার্থ! তোমার সম্পূর্ণ বিজয় ও অতুল কীর্তি তাঁরই আশ্রয়ে লাভ হয়েছে।

Verse 27

तवेयं पृथिवी देवी कृत्स्ना नारायणाश्रयात्‌ | अयं नाथस्तवाचिन्त्यो यस्य नारायणो गति:

ভীষ্ম বললেন—কুন্তীনন্দন! নারায়ণের আশ্রয় গ্রহণ করার ফলে এই সমগ্র দিব্য পৃথিবী তোমার অধিকারভুক্ত হয়েছে। তিনি অচিন্ত্য প্রভু—তোমার নাথ ও রক্ষক; যিনি তাঁর আশ্রয় নেয়, তার পরম গতি ও শেষ আশ্রয় নারায়ণই।

Verse 28

स भवांस्त्वमुपाध्वर्यू रणाग्नौ हुतवान्‌ नृपान्‌ । कृष्णख्रुवेण महता युगान्ताग्निसमेन वै

ভীষ্ম বললেন—তুমি যেন যজ্ঞের উপাধ্বর্যু হয়ে যুদ্ধরূপ অগ্নিতে রাজাদের আহুতি দিয়েছ। যুগান্তের দাহের মতো প্রজ্বলিত, শ্রীকৃষ্ণরূপ মহা খুন্তি (লাডল) দিয়ে তুমি তাদের হব্যরূপে সেই অগ্নিতে ঢেলে দিয়েছ।

Verse 29

दुर्योधनश्व शोच्चो5सौ सपुत्र भ्रातृबान्धव: । कृतवान्‌ यो<बुद्धि: क्रोधाद्धरिगाण्डीविविग्रहम्‌

ভীষ্ম বললেন—আজ দুর্যোধন পুত্র, ভ্রাতা ও স্বজনসহ শোকের পাত্র হয়েছে; কারণ সেই নির্বোধ ক্রোধে অন্ধ হয়ে শ্রীকৃষ্ণ ও গাণ্ডীবধারী অর্জুনের সঙ্গে বৈর স্থির করেছিল।

Verse 30

दैतेया दानवेन्द्राश्ष महाकाया महाबला: । चक्राग्नौ क्षयमापन्ना दावाग्नौ शलभा इव

ভীষ্ম বললেন—অসংখ্য মহাকায়, মহাবল দৈত্য ও দানবশ্রেষ্ঠ শ্রীকৃষ্ণের চক্রাগ্নিতে ধ্বংসপ্রাপ্ত হয়েছে, যেমন বনদাহে পতঙ্গ দগ্ধ হয়ে যায়।

Verse 31

प्रतियोद्धुं न शक्‍्यो हि मानुषैरेष संयुगे । विहीनै: पुरुषव्याप्र सत्त्वशक्तिबलादिभि:,पुरुषसिंह! सत्त्व (धैर्य) शक्ति और बल आदिसे स्वभावतः हीन मनुष्य युद्धमें इन श्रीकृष्णका सामना नहीं कर सकते

ভীষ্ম বললেন—হে পুরুষব্যাঘ্র! এই যুদ্ধে সাধারণ মানুষ—বিশেষত যারা স্বভাবতই ধৈর্য, শক্তি, বল প্রভৃতিতে হীন—শ্রীকৃষ্ণের প্রতিরোধ করতে পারে না।

Verse 32

जयो योगी युगान्ताभ: सव्यसाची रणाग्रग: । तेजसा हतवान्‌ सर्व सुयोधनबलं नूप

ভীষ্ম বললেন— অর্জুন বিজয়ী। তিনি যোগসিদ্ধিতে সমৃদ্ধ, যুগান্তের অগ্নির মতো দীপ্তিমান। তিনি সব্যসাচী—বাম হাতেও তীর ছুঁড়তে সক্ষম—এবং রণক্ষেত্রে সর্বাগ্রে অবস্থান করেন। হে রাজন! নিজের তেজ ও পরাক্রমের বলেই তিনি সুয়োধন (দুর্যোধন)-এর সমগ্র সেনাবাহিনীকে বিনাশ করেছেন।

Verse 33

यत्‌ तु गोवृषभांकेन मुनिभ्य: समुदाह्नतम्‌ पुराणं हिमवत्पृष्ठे तन्मे निगदत: शूणु,वृषभध्वज भगवान्‌ शंकरने हिमालयके शिखरपर मुनियोंसे जो पुरातन रहस्य बताया था, वह मेरे मुँहसे सुनो

ভীষ্ম বললেন— বৃষভধ্বজ ভগবান শঙ্কর হিমালয়ের শিখরে ঋষিদের কাছে যে প্রাচীন পবিত্র আখ্য্যান উচ্চারণ করেছিলেন, তা এখন আমার মুখ থেকে শোনো; আমি যেমন শেখানো হয়েছিল তেমনই বলছি।

Verse 34

यावत्‌ तस्य भवेत्‌ पुष्टिस्तेजो दीप्ति: पराक्रम: । प्रभाव: सन्नतिर्जन्म कृष्णे तन्त्रिगुणं विभो

ভীষ্ম বললেন— হে বিভো! অর্জুনের মধ্যে যতটা পুষ্টি, তেজ, দীপ্তি, পরাক্রম, প্রভাব, বিনয় এবং জন্মের মহত্ত্ব আছে—সেই সবই শ্রীকৃষ্ণের মধ্যে তার ত্রিগুণ বিদ্যমান।

Verse 35

कः शक्नोत्यन्यथाकर्तु तद्‌ यदि स्यात्‌ तथा शृणु । यत्र कृष्णो हि भगवांस्तत्र पुष्टिरनुत्तमा

ভীষ্ম বললেন— সংসারে কে আছে যে আমার এই কথাকে অন্যথা প্রমাণ করতে পারে? তবু যদি কেউ তা মনে করে, তবে শোনো— যেখানে ভগবান শ্রীকৃষ্ণ আছেন, সেখানেই সর্বোত্তম পুষ্টি (বল ও সমৃদ্ধি) বিরাজ করে।

Verse 36

वयं त्विहाल्पमतय: परतन्त्रा: सुविक्लवा: । ज्ञानपूर्व प्रपन्ना: स्मो मृत्यो: पन्थानमव्ययम्‌,हम इस जगतमें मन्दबुद्धि, परतन्त्र और व्याकुलचित्त मनुष्य हैं। हमने जान-बूझकर मृत्युके अटल मार्गपर पैर रखा है

ভীষ্ম বললেন— আমরা এ জগতে অল্পবুদ্ধি, পরাধীন এবং অস্থিরচিত্ত। তবু জেনেশুনেই আমরা মৃত্যুর অচ্যুত, অপরিবর্তনীয় পথে আত্মসমর্পণ করেছি।

Verse 37

भवांक्षाप्यार्जवपर: पूर्व कृत्वा प्रतिश्रयम्‌ । राजवृत्तं न लभते प्रतिज्ञापालने रत:

ভীষ্ম বললেন— যুধিষ্ঠির! তুমি অতিশয় সরল ও ঋজু-ধর্মপরায়ণ; তাই পূর্বেই তুমি ভগবান বাসুদেবের শরণ নিয়েছিলে। আর এখন প্রতিজ্ঞা পালনেই নিবিষ্ট হয়ে রাজধর্মসঙ্গত যে নীতি-উপায় ও আচরণ, তা গ্রহণ করছ না।

Verse 38

अप्येवात्मवध॑ लोके राजंस्त्वं बहु मन्यसे । न हि प्रतिज्ञा या दत्ता तां प्रहातुमरिंदम

ভীষ্ম বললেন— রাজন! তুমি কি সত্যিই এই জগতে আত্মবধকেই শ্রেষ্ঠ পথ বলে মানছ? হে শত্রুদমন! যে প্রতিজ্ঞা তুমি দিয়েছ, তা ত্যাগ করা তোমার পক্ষে শোভন নয়। শত্রু জয় করে ন্যায়ে প্রজাপালনের যে ব্রত তুমি নিয়েছ, শোকে আত্মহত্যার ভাবনা সেই ধর্মসঙ্কল্প থেকে বিচ্যুতি।

Verse 39

कालेनायं जन: सर्वो निहतो रणमूर्धनि । वयं च कालेन हता: कालो हि परमेश्वर:,ये सब राजालोग युद्धके मुहानेपर कालके द्वारा मारे गये हैं, हम भी कालसे ही मारे गये हैं; क्योंकि काल ही परमेश्वर है

ভীষ্ম বললেন— যুদ্ধের সম্মুখভাগে এই সমগ্র জনসমষ্টি কালের দ্বারাই নিহত হয়েছে। আমরাও কালের দ্বারাই নিহত; কারণ কালই পরমেশ্বর।

Verse 40

न हि कालेन कालज्ञ: स्पृष्ट: शोचितुमर्हसि । कालो लोहितरक्ताक्ष: कृष्णो दण्डी सनातन:

ভীষ্ম বললেন— যে কালের স্বরূপ জানে, সে কালের আঘাতে স্পৃষ্ট হলেও শোক করে না। কাল তো রক্তলাল নয়নবিশিষ্ট দণ্ডধারী সনাতন কৃষ্ণই।

Verse 41

तस्मात्‌ कुन्तीसुत ज्ञातीन्‌ नेह शोचितुमर्हसि । व्यपेतमन्युर्नित्यं त्वं भव कौरवनन्दन

ভীষ্ম বললেন— অতএব, কুন্তীপুত্র! এখানে আত্মীয়স্বজন ও কুটুম্বদের জন্য তোমার শোক করা উচিত নয়। কুরুবংশের আনন্দবর্ধন! তুমি সর্বদা ক্রোধমুক্ত হয়ে শান্ত থাকো।

Verse 42

माधवस्यास्य माहात्म्यं श्रुतं यत्‌ कथितं मया । तदेव तावत्‌ पर्याप्तं सज्जनस्य निदर्शनम्‌

ভীষ্ম বললেন—আমি যেমন শুনেছিলাম, তেমনই এই মাধব (শ্রীকৃষ্ণ)-এর মাহাত্ম্য তোমাকে বললাম। সজ্জনের জন্য এতটুকুই নির্দেশ-স্বরূপ যথেষ্ট। অতএব, কুন্তীনন্দন! এখানে ভাই, বান্ধব ও স্বজনদের জন্য শোক করা তোমার উচিত নয়। কুরুবংশের আনন্দবর্ধক যুধিষ্ঠির! সর্বদা ক্রোধহীন হয়ে শান্তিতে স্থিত থাকো। মাধবের মহিমা সম্বন্ধে আমি যা বলেছি, তা বোধ জাগাবার জন্য যথেষ্ট; সৎজনের কাছে তো সামান্য ইঙ্গিতও পথনির্দেশ হয়ে ওঠে।

Verse 43

व्यासस्य वचन श्रुत्वा नारदस्य च धीमत: । स्वयं चैव महाराज कृष्णस्याहतमस्य वै

ভীষ্ম বললেন—ব্যাসদেবের বাণী এবং প্রজ্ঞাবান নারদের বাক্য শুনে, আর নিজে শ্রীকৃষ্ণের অতুল বৈভব প্রত্যক্ষ করে, হে মহারাজ, আমি ভগবানের ও মহর্ষিদের অসাধারণ প্রভাব বর্ণনা করেছি। হে ভারত! পর্বতরাজের কন্যা উমা ও মহেশ্বরের মধ্যে যে সংলাপ হয়েছিল, তাও আমি স্মরণ করেছি।

Verse 44

प्रभावश्चर्षिपूगस्य कथित: सुमहान्‌ मया । महेश्वरस्य संवादं शैलपुत्र्याश्न भारत

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! আমি ঋষিসমূহের সমষ্টির অতি মহান প্রভাব বর্ণনা করেছি। আর মহেশ্বর ও শৈলপুত্রী (উমা)-র সেই পবিত্র সংলাপও বলেছি—যা ধর্ম ও ভক্তির আদর্শ উপদেশ।

Verse 45

धारयिष्यति यश्चैनं महापुरुषसम्भवम्‌ | शृणुयात्‌ कथयेद्‌ वा यः स श्रेयो लभते परम्‌,जो महापुरुष श्रीकृष्णके इस प्रभावको सुनेगा, कहेगा और याद रखेगा, उसको परम कल्याणकी प्राप्ति होगी

ভীষ্ম বললেন—যে এই মহাপুরুষ (শ্রীকৃষ্ণ)-সম্বন্ধীয় বর্ণনা হৃদয়ে ধারণ করবে, যে তা শুনবে বা অন্যকে শোনাবে, সে পরম কল্যাণ লাভ করবে।

Verse 46

भवितारश्न तस्याथ सर्वे कामा यथेप्सिता: । प्रेत्य स्वर्ग च लभते नरो नास्त्यत्र संशय:,उसके सारे अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होंगे और वह मनुष्य मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गलोक पाता है, इसमें संशय नहीं है

ভীষ্ম বললেন—তখন তার সকল ন্যায্যভাবে কাম্য বাসনা পূর্ণ হবে, এবং মৃত্যুর পরে সে স্বর্গলোক লাভ করবে—এ বিষয়ে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 47

न्याय्यं श्रेयोडभिकामेन प्रतिपत्तुं जनार्दन: । एष एवाक्षयो विप्रै: स्तुतो राजन्‌ जनार्दन:

ভীষ্ম বললেন—যে পরম কল্যাণ কামনা করে, তার পক্ষে জনার্দনের শরণ নেওয়াই ন্যায়সঙ্গত ও যথোচিত। হে রাজন! এই অবিনশ্বর জনার্দনকেই ব্রাহ্মণগণ স্তব করেছেন।

Verse 48

महेश्वरमुखोत्सृष्टा ये च धर्मगुणा: स्मृता: । ते त्वया मनसा धार्या: कुरुराज दिवानिशम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে কুরু-রাজ! মহেশ্বর (শঙ্কর)-এর মুখ থেকে যে ধর্মগুণসমূহ উচ্চারিত ও স্মৃত হয়েছে, সেগুলি তোমাকে দিন-রাত মনে ধারণ করে রাখতে হবে।

Verse 49

एवं ते वर्तमानस्य सम्यग्दण्डधरस्य च | प्रजापालनदक्षस्य स्वर्गलोको भविष्यति

ভীষ্ম বললেন—এইরূপ আচরণ করে যদি তুমি ন্যায়সঙ্গতভাবে দণ্ড ধারণ করো এবং প্রজাপালনে দক্ষ থাকো, তবে তোমার জন্য স্বর্গলোক প্রাপ্ত হবে।

Verse 50

धर्मेणापि सदा राजन्‌ प्रजा रक्षितुमरहसि । यस्तस्य विपुलो दण्ड: सम्यग्धर्म: स कीर्त्यते

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! তোমাকে সর্বদা ধর্ম অনুসারে প্রজাদের রক্ষা করতে হবে। প্রজাপালনের জন্য দণ্ডের যে যথাযথ ও কার্যকর প্রয়োগ, সেটিই সম্যক্ ধর্ম বলে কীর্তিত।

Verse 51

य एष कथितो राजन्‌ मया सज्जनसंनिधौ । शड्करस्योमया सार्ध संवादो धर्मसंहित:,नरेश्वर! भगवान्‌ शंकरका पार्वतीजीके साथ जो धर्मविषयक संवाद हुआ था, उसे इन सत्पुरुषोंके निकट मैंने तुम्हें सुना दिया

ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ্বর! এই সজ্জনদের উপস্থিতিতে আমি তোমাকে সেই ধর্মসংহিত সংলাপ শুনিয়ে দিলাম, যা ভগবান শঙ্কর ও উমার মধ্যে হয়েছিল।

Verse 52

श्र॒त्वा वा श्रोतुकामो वाप्यर्चयेद्‌ वृषभभध्वजम्‌ । विशुद्धेनेह भावेन य इच्छेद्‌ भूतिमात्मन:

যে নিজের কল্যাণ ও সমৃদ্ধি কামনা করে, সে এই উপদেশ শুনে অথবা শুনতে আগ্রহী হয়ে, এই লোকেই নির্মল ও আন্তরিক চিত্তে বৃষধ্বজ শিবের পূজা করুক।

Verse 53

एष तस्यानवद्यस्य नारदस्य महात्मन: । संदेशो देवपूजार्थ तं तथा कुरु पाण्डव,पाण्डुनन्दन! उन अनिन्द्य महात्मा देवर्षि नारदजीका ही यह संदेश है कि महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये। इसलिये तुम भी ऐसा ही करो

হে পাণ্ডব! দেবপূজার উদ্দেশ্যে অনিন্দ্য মহাত্মা দেবর্ষি নারদের এই বার্তাই; অতএব, হে পাণ্ডুনন্দন, তুমিও তেমনই করো।

Verse 54

एतदत्यदभुतं वृत्तं पुण्ये हि भवति प्रभो । वासुदेवस्य कौन्तेय स्थाणोश्वैव स्वभावजम्‌

প্রভু! কুন্তীনন্দন! এ এক অতিশয় আশ্চর্য বৃত্তান্ত, যা প্রাচীন কালে এক পুণ্যস্থানে ঘটেছিল; এটি বাসুদেব ও স্থাণু (মহাদেব)-এর স্বাভাবিক মহিমারই কথা বলে।

Verse 55

दशवर्षसहसत्राणि बदर्यामेष शाश्वत: । तपश्चचार विपुलं सह गाण्डीवधन्चना,इन सनातन श्रीकृष्णने गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ (नर-नारायणरूपमें रहकर) बदरिकाश्रममें दस हजार वर्षोतक बड़ी भारी तपस्या की थी

এই চিরন্তন প্রভু বদরীর শাশ্বত আশ্রমে গাণ্ডীবধারী অর্জুনের সঙ্গে দশ হাজার বছর মহাতপস্যা করেছিলেন।

Verse 56

त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनञज्जयौ । विदितौ नारदादेतौ मम व्यासाच्च पार्थिव

হে পৃথিবীনাথ! পদ্মনয়ন বাসুদেব ও ধনঞ্জয়—এই দুইজন ‘ত্রিযুগ’ নামে খ্যাত; এদের স্বরূপ দেবর্ষি নারদ ও আমার পিতা ব্যাসের দ্বারা পরিচিত হয়েছে।

Verse 57

बाल एव महाबाहुश्चकार कदनं महत्‌ । कंसस्य पुण्डरीकाक्षो ज्ञातित्राणार्थकारणात्‌,महाबाहु कमलनयन श्रीकृष्णने बचपनमें ही अपने बन्धु-बान्धवोंकी रक्षाके लिये कंसका बड़ा भारी संहार किया था

মহাবাহু পদ্মনয়ন শ্রীকৃষ্ণ শৈশবেই স্বজনদের রক্ষার্থে কংসকে মহাবিনাশে নিপাত করেছিলেন।

Verse 58

कर्मणामस्य कौन्तेय नानन्‍्तं संख्यातुमुत्सहे । शाश्व॒तस्य पुराणस्य पुरुषस्य युधिष्ठिर,कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! इन सनातन पुराणपुरुष श्रीकृष्णके चरित्रोंकी कोई सीमा या संख्या नहीं बतायी जा सकती

কৌন্তেয় যুধিষ্ঠির! সেই শাশ্বত পুরাণপুরুষ শ্রীকৃষ্ণের অসংখ্য কর্ম গণনা করতে আমি সাহস করি না; তাঁর কীর্তির সীমা নেই।

Verse 59

ध्रुवं श्रेयः परं तात भविष्यति तवोत्तमम्‌ | यस्य ते पुरुषव्याप्र: सखा चायं जनार्दन:,तात! तुम्हारा तो अवश्य ही परम उत्तम कल्याण होगा; क्योंकि ये पुरुषसिंह जनार्दन तुम्हारे मित्र हैं

বৎস! তোমার পরম কল্যাণ নিশ্চয়ই হবে; কারণ পুরুষসিংহ জনার্দন তোমার বন্ধু।

Verse 60

दुर्योधन तु शोचामि प्रेत्य लोके5पि दुर्मतिम्‌ । यत्कृते पृथिवी सर्वा विनष्टा सहयद्विपा

দুর্মতি দুর্যোধনের জন্য আমি শোক করি—যদিও সে পরলোকে গিয়েছে—কারণ তারই কারণে হাতি-ঘোড়া-সহ সমগ্র পৃথিবী ধ্বংসপ্রাপ্ত হয়েছে।

Verse 61

दुर्योधनापराधेन कर्णस्य शकुनेस्तथा । दुःशासनचतुर्थानां कुरवो निधनं गता:,दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि--इन्हीं चारोंके अपराधसे सारे कौरव मारे गये हैं

দুর্যোধন, দুঃশাসন, কর্ণ ও শকুনি—এই চারজনের অপরাধেই সমগ্র কৌরব বংশ বিনাশপ্রাপ্ত হয়েছে।

Verse 62

वैशम्पायन उवाच एवं सम्भाषमाणे तु गाड़्ेये पुरुषर्षभे । तूष्णीं बभूव कौरव्यो मध्ये तेषां महात्मनाम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! পুরুষশ্রেষ্ঠ গঙ্গানন্দন ভীষ্ম এ কথা বললে, সেই মহাত্মাদের মধ্যেখানে বসে থাকা কৌরবকুলপুত্র যুধিষ্ঠির নীরব হয়ে গেলেন।

Verse 63

तच्छुत्वा विस्मयं जम्मुर्धृतराष्ट्रादयो नूपा: । सम्पूज्य मनसा कृष्णं सर्वे प्राजजलयो5भवन्‌

এ কথা শুনে ধৃতরাষ্ট্র প্রমুখ রাজারা বিস্ময়ে অভিভূত হলেন। মনে মনে শ্রীকৃষ্ণকে পূজা করে সকলেই করজোড়ে দাঁড়ালেন।

Verse 64

ऋषयश्नचापि ते सर्वे नारदप्रमुखास्तदा । प्रतिगृह्माभ्यनन्दन्त तद्वाक्‍्यं प्रतिपूज्य च,नारद आदि सम्पूर्ण महर्षि भी भीष्मजीके वचन सुनकर उनकी प्रशंसा करते हुए बहुत प्रसन्न हुए

তখন নারদ প্রমুখ সকল ঋষিও ভীষ্মের বাণী শ্রদ্ধায় গ্রহণ করলেন; সেই বাক্যকে সম্মান করে প্রশংসা করতে করতে তাঁরা পরম আনন্দিত হলেন।

Verse 65

इत्येतदखिलं सर्वे: पाण्डवो भ्रातृभि: सह । श्रुतवान्‌ सुमहाश्चर्य पुण्यं भीष्मानुशासनम्‌

এইভাবে পাণ্ডব যুধিষ্ঠির তাঁর সকল ভ্রাতার সঙ্গে ভীষ্মের এই সমগ্র পবিত্র অনুশাসন শুনলেন—যা ছিল অতিশয় বিস্ময়কর।

Verse 66

युधिष्ठिरस्तु गाड़ेय॑ं विश्रान्तं भूरिदक्षिणम्‌ । पुनरेव महाबुद्धि: पर्यपृच्छन्‍्महीपति:

তারপর, বহু দক্ষিণাদাতা গঙ্গানন্দন ভীষ্ম বিশ্রাম নিলে, মহাবুদ্ধিমান রাজা যুধিষ্ঠির তাঁকে পুনরায় প্রশ্ন করলেন।

Verse 148

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महापुरुषप्रस्तावे अष्टचत्वारिंशदाधिकशततमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে মহাপুরুষ শ্রীকৃষ্ণের প্রশংসা-প্রসঙ্গে একশো আটচল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 156

दिवि वा भुवि वा देव सर्व हि विदितं तव । “भगवन्‌! इसीलिये आपके रहते हुए भी हम अपने ओछेपनके कारण प्रलाप करते हैं ->छोटे मुँह बड़ी बात कर रहे हैं। देव! पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई भी ऐसी आश्वर्यकी बात नहीं है

হে দেব! স্বর্গে হোক বা পৃথিবীতে—সবই আপনার জানা। পৃথিবীতে কিংবা দিব্যলোকসমূহে এমন কোনো আশ্চর্য নেই যা আপনার জ্ঞানের অতীত; আপনার কাছে সর্বজ্ঞাত।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to reconcile profound grief with dharmic meaning: Gaṅgā’s lament emphasizes loss and perceived injustice, while Kṛṣṇa reframes the event as voluntary yogic departure and cosmic identity (Vasu), redirecting emotion toward normative acceptance.

The chapter teaches that disciplined inner control (yoga) and correct ritual action can coexist: bodily conditions and death are portrayed as governable within dharma, and communal stability is maintained through rites and doctrinal interpretation.

While not a formal phalaśruti, the narrative implicitly valorizes understanding yogic restraint, righteous death, and funerary dharma as spiritually stabilizing knowledge that transforms grief into a structured, tradition-consistent response.