Adhyaya 150
Anushasana ParvaAdhyaya 15068 Verses

Adhyaya 150

कालयुक्तधर्मविवेकः (Discerning Dharma in Accord with Time)

Upa-parva: Dharma–Kāla-anuśāsana (Instruction on Dharma and the Governance of Time/Timing)

Bhīṣma articulates a technical ethic of reliability in action. He distinguishes deeds done rightly (sat-kṛta) from those done wrongly (asat-kṛta), advising composure after righteous action while warning against trusting outcomes rooted in improper means. Kāla (time) is described as the operative regulator that dispenses restraint and favor, entering the intellect of beings and directing them toward dharma and artha. When one’s बुद्धि becomes dhārmic and meaning-disclosing, one may be steady; yet even with firm intellect, one should not be credulous about morally compromised courses. The chapter defines practical wisdom as pursuing aims with awareness of time and avoiding the ‘double error’ of neglecting either ethical integrity or situational fit. It observes that humans honor others when prosperity is present, but the dhārmika are portrayed as honoring the self through self-discipline. Finally, it asserts that time does not grant dharma through adharma; adharma cannot touch dharma protected by time, and dharma—when timely enacted—becomes victory-bringing and illuminative across the three worlds, while the wise guide conduct through dharma even amid fear and uncertainty.

Chapter Arc: धर्म के सूक्ष्म द्वार पर प्रश्न खड़ा होता है—मनुष्य मन, वाणी और कर्म से बँधता भी है और मुक्त भी होता है; वही त्रिविध साधन स्वर्ग-नरक का द्वार बन जाता है। → श्रोता (देवि/प्रभो संबोधन के साथ) पूछता है—किस शील, किस वृत्त, किन कर्मों और किन सदाचारों से मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है? उत्तर में आचरण के अनेक मानदंड खुलते जाते हैं: स्वदार-निष्ठा, ऋतुकाल-धर्म, इन्द्रिय-जय, अहिंसा, और राग-द्वेष-क्षय का मार्ग। → निर्णायक उद्घोष होता है—हिंसात्मा नरक को जाता है, अहिंसक स्वर्ग को; निर्दयता (कीट-पिपीलिका तक पर) नरक का सुनिश्चित पथ है, जबकि ऐसा संयम कि वन में पड़े पराये धन को देखकर भी मन से हिंसा/अपहरण का विचार न उठे—स्वर्गगामिता का शिखर है। → अध्याय स्वर्गमार्ग को ‘देवकृत’ और ‘अकषाय’ (राग-द्वेष रहित) बताकर साधक के लिए स्पष्ट दिशा देता है: त्रिविध साधनों (मन-वाणी-कर्म) को शुद्ध कर, इन्द्रियों को जीतकर, स्वधर्म-पालन और अहिंसा में स्थित होकर बन्धन कटते हैं।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्रात छा अर: चतुश्नत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: बन्धन-मुक्ति

উমা বললেন—“ভগবান! সর্বভূতেশ্বর, দেবাসুর-নমস্কৃত, বিভো! মানুষের ধর্ম ও অধর্মের স্বরূপ আমাকে বলুন, যাতে আমার সংশয় দূর হয়। আর বলুন—কেমন শীল ও কেমন আচরণে, কোন কর্মে মানুষ স্বর্গ লাভ করে? এবং কোন প্রকার দানে সেই লাভ নিশ্চিত হয়?”

Verse 2

कर्मणा मनसा वाचा त्रिविधं हि नर: सदा । बध्यते बन्धनै: पाशैर्मुव्यते5प्पयथवा पुन:,मनुष्य मन, वाणी और क्रिया--इन तीन प्रकारके बन्धनोंसे सदा बँधता है और फिर उन बन्धनोंसे मुक्त होता है

মহেশ্বর বললেন—“কর্ম, মন এবং বাক্য—এই ত্রিবিধ বন্ধনে মানুষ সর্বদা আবদ্ধ হয়; আবার এই একই উপায়ে সে বন্ধন থেকে মুক্তও হতে পারে।”

Verse 3

केन शीलेन वृत्तेन कर्मणा कीदृशेन वा । समाचारैर्गुणै: कैर्वा स्वर्ग यान्तीह मानवा:

“প্রভো! কোন শীল-স্বভাব, কোন জীবনাচরণ, কেমন কর্ম, এবং কোন সদাচার ও গুণের দ্বারা মানুষ এই লোকেই স্বর্গপ্রাপ্তি করে?”

Verse 4

श्रीमहेश्वर उवाच देवि धर्मार्थतत्त्वज्ञे धर्मनित्ये दमे रते । सर्वप्राणिहित: प्रश्न: श्रूयतां बुद्धिवर्धन:

শ্রী মহেশ্বর বললেন—“দেবি! তুমি ধর্ম ও অর্থের তত্ত্বজ্ঞ, ধর্মে সদা স্থিত এবং দমে রত। এই প্রশ্ন সর্বপ্রাণীর কল্যাণার্থে, বুদ্ধিবর্ধক—শোনো।”

Verse 5

श्रीमहेश्वरने कहा--धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाली, सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली, इन्द्रियसंयम-परायणे देवि! तुम्हारा प्रश्न समस्त प्राणियोंके लिये हितकर तथा बुद्धिको बढ़ानेवाला है, इसका उत्तर सुनो ।।

শ্রীমহেশ্বর বললেন—হে দেবি! তুমি ধর্ম ও অর্থের তত্ত্বজ্ঞ, সদা ধর্মে নিবিষ্ট এবং ইন্দ্রিয়সংযমে পরায়ণা। তোমার প্রশ্ন সর্বপ্রাণীর হিতকর ও বুদ্ধিবর্ধক; তার উত্তর শোনো। যারা সত্য ও ধর্মে রত সজ্জন, যারা আশ্রম-চিহ্নাদি বাহ্য লক্ষণ থেকে মুক্ত থেকেও ধর্মে অর্জিত ধন ভোগ করে—সেই নরগণ স্বর্গগামী হয়।

Verse 6

नाधर्मेण न धर्मेण बध्यन्ते छिन्नसंशया: । प्रलयोत्पत्तितत्त्वज्ञा: सर्वज्ञा: सर्वदर्शिन:

যাদের সকল প্রকার সংশয় ছিন্ন হয়েছে, যারা প্রলয় ও সৃষ্টির তত্ত্বজ্ঞ, সর্বজ্ঞ ও সর্বদর্শী—সেই মহাত্মারা না অধর্মে বাঁধা পড়েন, না ধর্মে।

Verse 7

वीतरागा विमुच्यन्ते पुरुषा: कर्मबन्धनै: । कर्मणा मनसा वाचा ये न हिंसन्ति किंचन

যাদের আসক্তি সম্পূর্ণ দূর হয়েছে, সেই পুরুষেরা কর্মবন্ধন থেকে মুক্ত হয়। যারা কর্মে, মনে ও বাক্যে কারও প্রতি কোনো হিংসা করে না—তারা কর্মজাত বন্ধন থেকে মুক্ত হয়।

Verse 8

ये न सज्जन्ति कम्मिंश्चित्‌ ते न बद्ध्यन्ति कर्मभि: । प्राणातिपाताद विरता: शीलवन्तो दयान्विता:

যারা কোনো কর্মেই আসক্ত হয় না, তারা কর্মের দ্বারা বাঁধা পড়ে না। তারা প্রাণহত্যা থেকে বিরত, শীলবান এবং দয়াসম্পন্ন।

Verse 9

सर्वभूतदयावन्तो विश्वास्या: सर्वजन्तुषु

যারা সকল ভূতের প্রতি দয়াবান, তারা সকল প্রকার জীবের মধ্যে বিশ্বাসযোগ্য হয়।

Verse 10

परस्वे निर्ममा नित्यं परदारविवर्जका:

মহেশ্বর বললেন—তাঁরা সর্বদা পরের ধনের প্রতি মমতাহীন থাকেন এবং পরস্ত্রী-সংসর্গ সম্পূর্ণ বর্জন করেন।

Verse 11

मातृवत्‌ स्वसृवच्चैव नित्यं दुहितृवच्च ये

মহেশ্বর বললেন—যাঁরা (নারীদের) সর্বদা মায়ের মতো, বোনের মতো এবং কন্যার মতো জ্ঞান করেন।

Verse 12

परदारेषु वर्तन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन: । जो मानव परायी स्त्रीको माता, बहिन और पुत्रीके समान समझकर तदनुरूप बर्ताव करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं || ११ $ ।।

মহেশ্বর বললেন—যে পুরুষেরা পরস্ত্রীর ক্ষেত্রে মাতা, ভগিনী ও কন্যার ন্যায় শ্রদ্ধাভরে সংযমী আচরণ করে, তারা স্বর্গগামী হয়। তারা চৌর্য থেকে সর্বদা নিবৃত্ত থাকে এবং নিজের ন্যায়সঙ্গত ধনেই সদা সন্তুষ্ট থাকে।

Verse 13

स्वदारनिरता ये च ऋतुकालाभिगामिन:

যাঁরা নিজ পত্নীতেই অনুরক্ত থাকেন এবং ঋতুকালেই (ধর্মানুযায়ী) তাঁর নিকট গমন করেন।

Verse 14

परदारेषु ये नित्यं चरित्रावृतलोचना:

মহেশ্বর বললেন—যাঁদের দৃষ্টি দুষ্কর্মে আচ্ছন্ন, তারা সর্বদা পরস্ত্রীর দিকে চেয়ে থাকে…

Verse 15

एष देवकृतो मार्ग: सेवितव्य: सदा नरै:

মহেশ্বর বললেন—“এটি দেবতাদের প্রতিষ্ঠিত পথ; মানুষের উচিত সর্বদা এই পথ অনুসরণ ও অনুশীলন করা।”

Verse 16

दानधर्मतपोयुक्त: शीलशौचदयात्मक:

মহাদেব বললেন—“যে দান, ধর্ম ও তপস্যায় যুক্ত—যার স্বভাব শীল, শৌচ ও দয়ায় গঠিত।”

Verse 17

वृत्त्यर्थ धर्महेतोर्वा सेवितव्य: सदा नरै: ।। स्वर्गवासमभीप्सद्/िर्न सेव्यस्त्वत उत्तर:

শ্রী মহেশ্বর বললেন—“জীবিকার জন্য অথবা ধর্মের জন্য মানুষকে সর্বদা সেবা-কর্ম গ্রহণ করা উচিত। কিন্তু যারা স্বর্গবাস কামনা করে, তাদের ‘উত্তর’ (অর্থাৎ নৈতিকভাবে নীচ/আধ্যাত্মিক উন্নতিতে বাধক) প্রকারের সেবা গ্রহণ করা উচিত নয়।”

Verse 18

यह दान, धर्म और तपस्यासे युक्त तथा शील, शौच और दयामय मार्ग है। मनुष्यको जीविका एवं धर्मके लिये सदा ही इस मार्गका सेवन करना चाहिये। जो स्वर्गलोकमें निवास करना चाहता हो, उनके लिये सेवन करनेयोग्य इससे बढ़कर उत्कृष्ट मार्ग नहीं है ।।

মহেশ্বর বললেন—“এটি দান, ধর্ম ও তপস্যায় যুক্ত, শীল, শৌচ ও দয়ায় চিহ্নিত পথ। জীবিকা ও ধর্ম—উভয়ের জন্যই মানুষের উচিত সর্বদা এই পথ অবলম্বন করা। যে স্বর্গলোকে বাস কামনা করে, তার জন্য এর চেয়ে শ্রেষ্ঠতর কোনো পথ নেই।” উমা বললেন—“হে দেব! কী ধরনের বাক্যে প্রাণী বন্ধনে আবদ্ধ হয়, আর কী ধরনের বাক্যে মুক্ত হয়? হে নিষ্পাপ ভূতপতে! সেই কর্মসমূহ আমাকে বলুন।”

Verse 19

उमाने पूछा--निष्पाप भूतनाथ! महादेव! कैसी वाणी बोलने अथवा उस वाणीद्वधारा कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य बन्धनमें पड़ता या उस बन्धनसे छुटकारा पा जाता है? उन वाचिक कर्मोंका मुझसे वर्णन कीजिये ।।

শ্রী মহেশ্বর বললেন—“নিজের লাভের জন্য বা পরের মঙ্গলের জন্য, হাসি-পরিহাসের আশ্রয় নিয়েও যারা এখানে কখনও মিথ্যা বলে না, সেই মানুষ স্বর্গগামী হয়।”

Verse 20

वृत्त्यर्थ धर्महेतोर्वा कामकारात्‌ तथैव च । अनृतं ये न भाषन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो आजीविका अथवा धर्मके लिये तथा स्वेच्छाचारसे भी कभी असत्य भाषण नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं

যাঁরা জীবিকার জন্য, ধর্মের অজুহাতে, কিংবা স্বেচ্ছাচারবশেও কখনও মিথ্যা বলেন না—তাঁরাই স্বর্গগামী হন।

Verse 21

श्लक्ष्णां वाणी निराबाधां मधुरां पापवर्जिताम्‌ । स्वागतेनाभिभाषणन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन:

যাঁরা স্নিগ্ধ, মধুর, অবাধ ও অনাহতিকর, পাপশূন্য এবং স্বাগত-সম্মানের ভাবযুক্ত বাক্য বলেন—তাঁরাই স্বর্গলোকে গমন করেন।

Verse 22

परुषं ये न भाषन्ते कटुक॑ निष्ठुरं तथा । अपैशुन्यरता: सनन्‍्तस्ते नरा: स्वर्गगामिन:

যাঁরা রূঢ়, তিক্ত ও নিষ্ঠুর কথা বলেন না, এবং পরনিন্দা-চর্চা ত্যাগ করে অপৈশুন্যে রত সজ্জন থাকেন—তাঁরাই স্বর্গগামী হন।

Verse 23

पिशुनां न प्रभाषन्ते मित्रभेदकरीं गिरम्‌ । ऋतं मैत्रं तु भाषन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन:

যাঁরা দুই বন্ধুর মধ্যে ভেদ ঘটায় এমন পিশুন বাক্য বলেন না, বরং সত্য ও মৈত্রীভাবযুক্ত কথা বলেন—তাঁরাই স্বর্গগামী হন।

Verse 24

ये वर्जयन्ति परुषं परद्रोहं च मानवा: । सर्वभूतसमा दान्तास्ते नरा: स्वर्गगामिन:

যাঁরা কঠোরতা ও পরদ্রোহ বর্জন করেন, সংযত থেকে সকল প্রাণীর প্রতি সমদৃষ্টি রাখেন—তাঁরাই স্বর্গগামী হন।

Verse 25

जो मानव दूसरोंसे तीखी बातें बोलना और द्रोह करना छोड़ देते हैं, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखने-वाले और जितेन्द्रिय होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।

যারা ছলপূর্ণ ও কঠোর বাক্য ত্যাগ করে, বিদ্বেষ পরিহার করে, বিরোধ-কলহ এড়িয়ে চলে, সর্বপ্রাণীর প্রতি সমভাব রাখে এবং ইন্দ্রিয়সংযমী হয়ে সদা মৃদু ভাষায় কথা বলে—তারা স্বর্গলোক প্রাপ্ত হয়।

Verse 26

जिनके मुँहसे कभी शठतापूर्ण बात नहीं निकलती, जो विरोधयुक्त वाणीका त्याग करते हैं और सदा सौम्य (कोमल) वाणी बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।

যারা ক্রুদ্ধ হলেও হৃদয় বিদীর্ণকারী কথা মুখে আনে না, আর রোষের মধ্যেও সান্ত্বনাময়, মিলনসাধক বাক্যই বলে—তারা স্বর্গগামী বলে গণ্য হয়।

Verse 27

एष वाणीकृतो देवि धर्म: सेव्य: सदा नरै: । शुभ: सत्यगुणो नित्यं वर्जनीयो मृषा बुचै:

দেবি! এটাই বাক্যজাত ধর্ম; মানুষের উচিত সর্বদা এর অনুশীলন করা। জ্ঞানীরা নিত্য শুভ ও সত্য বাক্য বলবে এবং মিথ্যা পরিত্যাগ করবে।

Verse 28

उमोवाच मनसा बद्ध्यते येन कर्मणा पुरुष: सदा । तन्मे ब्रूहि महाभाग देवदेव पिनाकधृत्‌,उमाने पूछा--महाभाग! पिनाकधारी देवदेव! जिस मानसिक कर्मसे मनुष्य सदा बन्धनमें पड़ता है, उसको मुझे बताइये

উমা বললেন—হে মহাভাগ, হে দেবদেব, পিনাকধারী! যে মানস কর্মে মানুষ সদা বন্ধনে আবদ্ধ হয়, তা আমাকে বলুন।

Verse 29

श्रीमहेश्वर उवाच मानसेनेह धर्मेण संयुक्ता: पुरुषा: सदा | स्वर्ग गच्छन्ति कल्याणि तन्मे कीर्तयत: शृणु

শ্রী মহেশ্বর বললেন—কল্যাণী! যারা এখানে সদা মানস ধর্মে যুক্ত থাকে, অর্থাৎ মনে ধর্মই চিন্তা ও আচরণ করে, তারা স্বর্গে যায়। আমি যা বলছি, তা শোনো।

Verse 30

दुष्प्रणितेन मनसा दुष्प्रणीततरा कृति: । मनो बद्ध्यति येनेह शृणु वाक्यं शुभानने

দুর্নিয়ন্ত্রিত মনে কর্ম আরও অধিক বিভ্রান্ত ও কলুষিত হয়; সেই আচরণেই এই লোকেই মন বন্ধনে আবদ্ধ হয়। অতএব, হে শুভাননে, এ বিষয়ে আমার বাক্য শোনো।

Verse 32

जब दूसरेका धन निर्जन वनमें पड़ा हुआ दिखायी दे, उस समय भी जो उसकी ओर मन ललचाकर किसीकी हिंसा नहीं करते, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।।

গ্রামে বা গৃহে নির্জন স্থানে পড়ে থাকা পরধন দেখেও যারা মনে লোভ জাগায় না, গ্রহণের আনন্দ মানে না, তারাই স্বর্গগামী।

Verse 33

तथैव परदारान्‌ ये कामवृत्तान्‌ रहोगतान्‌ | मनसापि न हिंसन्ति ते नरा: स्वर्गगामिन:

তদ্রূপ, কামবৃত্তিতে প্রবৃত্ত এবং গোপনে সম্মুখে আসা পরস্ত্রীদের প্রতিও যারা মনে পর্যন্ত অন্যায় বা লঙ্ঘনের চিন্তা করে না, তারাই স্বর্গগামী।

Verse 34

शत्रुं मित्र च ये नित्यं तुल्येन मनसा नरा: । भजन्ति मैत्रा: संगम्य ते नसः स्वर्गगामिन:

যারা সর্বদা শত্রু ও মিত্রকে সমান মনে গ্রহণ করে এবং মৈত্রীভাব নিয়ে সকলের সঙ্গে মিশে চলে, তারাই স্বর্গলোকে গমন করে।

Verse 35

श्रुतवन्तो दयावन्त: शुचय: सत्यसंगरा: । स्वैरर्थ: परिसंतुष्टास्ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो शास्त्रज्ञ, दयालु पवित्र, सत्यप्रतिज्ञ और अपने ही धनसे संतुष्ट होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं

যারা শ্রবণ-অধ্যয়নে বিদ্বান, আচরণে দয়ালু, জীবনে শুচি, সত্যে প্রতিজ্ঞাবদ্ধ, এবং নিজের ন্যায়সঙ্গত উপায়ে প্রাপ্ত সম্পদে সন্তুষ্ট—তারাই স্বর্গলোকে গমন করে।

Verse 36

अवैरा ये त्वनायासा मैत्रीचित्तरता: सदा । सर्वभूतदयावन्‍न्तस्ते नरा: स्वर्गगामिन:

যাঁদের মনে কারও প্রতি বৈর নেই, যাঁরা ক্লেশহীন, সদা মৈত্রীভাবপূর্ণ এবং সর্বপ্রাণীর প্রতি করুণাশীল—তাঁরাই স্বর্গগামী হন।

Verse 37

श्रद्धावन्तो दयावन्तश्रोक्षाश्षो क्षजनप्रिया: । धर्माधर्मविदो नित्यं ते नरा: स्वर्गगामिन:

যাঁরা শ্রদ্ধাবান, দয়াবান ও ক্ষমাশীল, যাঁরা সজ্জনসঙ্গ প্রিয় করেন এবং নিত্য ধর্ম-অধর্মের বিচার জানেন—তাঁরাই স্বর্গগামী হন।

Verse 38

जो श्रद्धालु, दयालु, शुद्ध, शुद्धजनोंके प्रेमी तथा धर्म और अधर्मके ज्ञाता हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।

যাঁরা শ্রদ্ধাবান, দয়াবান, শুচি, শুচিজনের সঙ্গপ্রিয় এবং ধর্ম-অধর্মের জ্ঞানী—তাঁরাই স্বর্গগামী হন। হে দেবী! যাঁরা শুভ ও অশুভ কর্মের ফলসঞ্চয় এবং তার পরিণাম (বিপাক) জানেন—তাঁরাও স্বর্গলোক লাভ করেন।

Verse 39

न्यायोपेता गुणोपेता देवद्विजपरा: सदा । समुत्थानमनुप्राप्तास्ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो न्यायशील, गुणवान्‌, देवताओं और द्विजोंके भक्त तथा उत्थानको प्राप्त हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं

যাঁরা ন্যায়ে প্রতিষ্ঠিত, গুণে সমৃদ্ধ, দেবতা ও দ্বিজদের প্রতি সদা ভক্ত, এবং যথার্থ উন্নতি লাভ করেছেন—তাঁরাই স্বর্গগামী হন।

Verse 40

शुभे: कर्मफलैदेवि मयैते परिकीर्तिता: । स्वर्गमार्गपरा भूय: किं त्वं श्रोतुमिहेच्छसि

হে দেবী! শুভ কর্মের ফল দ্বারা যাঁরা স্বর্গপথে প্রতিষ্ঠিত, তাঁদের বর্ণনা আমি এখানে করেছি। এখন এ বিষয়ে তুমি আর কী শুনতে চাও?

Verse 41

उमोवाच महान्‌ मे संशय: कक्रिन्मर्त्यान्‌ प्रति महेश्वर । तस्मात्‌ त्वं नैपुणेनाद्य मम व्याख्यातुमहसि,उमाने पूछा-महेश्वर! मुझे मनुष्योंके विषयमें एक महान्‌ संशय है। आप अच्छी तरह उस संशयका समाधान करें

উমা বললেন—হে মহেশ্বর! মানুষের বিষয়ে আমার মনে এক মহা সংশয় জেগেছে। অতএব আজ আপনি আপনার পূর্ণ বিবেচনা-বুদ্ধি দিয়ে তা স্পষ্ট করে ব্যাখ্যা করুন এবং আমার সংশয় দূর করুন।

Verse 42

केनायुर्लभते दीर्घ कर्मणा पुरुष: प्रभो । तपसा वापि देवेश केनायुर्लभते महत्‌,प्रभो! मनुष्य किस कर्मसे दीर्घायु प्राप्त करता है? तथा देवेश्वर! किस तपस्यासे मनुष्यको बड़ी आयु प्राप्त होती है?

হে প্রভু! কোন কর্মের দ্বারা মানুষ দীর্ঘায়ু লাভ করে? আর হে দেবেশ্বর! কোন তপস্যার দ্বারা মানুষ মহৎ আয়ুষ্কাল অর্জন করে?

Verse 43

क्षीणायु: केन भवति कर्मणा भुवि मानव: । विपाकं कर्मणां देव वक्तुमर्हस्थनिन्दित,अनिन्द्य महादेव! इस भूतलपर कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण हो जाती है? आप मुझसे कर्म-विपाकका वर्णन करें

হে অনিন্দ্য মহাদেব! এই পৃথিবীতে কোন কর্মের ফলে মানুষের আয়ু ক্ষীণ হয়? হে দেব! কর্মের বিপাক—অর্থাৎ ফল-পরিণাম—আমাকে বর্ণনা করে বলুন।

Verse 44

अपरे च महाभाग्या मन्दभाग्यास्तथापरे । अकुलीनास्तथा चान्ये कुलीनाश्न तथापरे,इस जगत्‌में कुछ लोग महान्‌ भाग्यशाली हैं तो कुछ लोग मन्दभाग्य हैं, कुछ लोग निन्दित कुलमें उत्पन्न हैं तो दूसरे लोग उच्चकुलमें

এই জগতে কেউ মহাভাগ্যবান, আবার কেউ স্বল্পভাগ্য। কেউ নিন্দিত বা নীচ বংশে জন্মায়, আর কেউ মহৎ ও কুলীন বংশে জন্মগ্রহণ করে।

Verse 45

दुर्दर्शा: केचिदा भान्ति नरा: काष्ठमया इव । प्रियदर्शास्तथा चान्ये दर्शनादेव मानवा:

কিছু মানুষ দুর্দশায় পীড়িত হয়ে যেন কাঠের মতো—জড় ও নির্জীব—দেখায়; তাদের দিকে তাকানোও কঠিন মনে হয়। কিন্তু অন্য কিছু মানুষ প্রিয়দর্শন; কেবল দর্শনমাত্রেই মন আনন্দিত হয়ে ওঠে।

Verse 46

दुष्प्रज्ञा: केचिदाभान्ति केचिदाभान्ति पण्डिता: । महाप्राज्ञास्तथैवान्ये ज्ञानविज्ञानभाविन:,कुछ लोग दुर्बुद्धि जान पड़ते हैं और कुछ विद्वान्‌ तथा कितने ही ज्ञान-विज्ञानशाली महाप्राज्ञ प्रतीत होते हैं

কেউ অল্পবুদ্ধি বলে প্রতীয়মান হয়, কেউ পণ্ডিত বলে দেখা যায়, আর কেউ জ্ঞান ও বিজ্ঞান—উভয়েই সমৃদ্ধ মহাপ্রাজ্ঞ মুনিরূপে প্রকাশ পায়। এইভাবে জগতে মানুষের বুদ্ধি ও অন্তর্দৃষ্টির নানা স্তর দেখা যায়।

Verse 47

अल्पाबाधास्तथा केचिन्महाबाधास्तथापरे । दृश्यन्ते पुरुषा देव तन्मे व्याख्यातुमहसि

হে দেব! কেউ সামান্য বাধায় পীড়িত হয়, আর কেউ মহাবিপদে আচ্ছন্ন থাকে। মানুষকে এভাবে নানা অসম অবস্থায় দেখা যায়—এই বৈষম্যের কারণ কী? দয়া করে আমাকে বিস্তারে ব্যাখ্যা করুন।

Verse 48

श्रीमहेश्वर उवाच हन्त ते<हं प्रवक्ष्यामि देवि कर्मफलोदयम्‌ । मर्त्यलोके नर: सर्वो येन स्वफलमश्षुते

শ্রীমহেশ্বর বললেন—দেবি! এসো, আমি তোমাকে বলছি কর্মফলের উদয় কীভাবে হয়। মর্ত্যলোকে প্রত্যেক মানুষ সেই বিধান অনুসারে নিজের নিজের কর্মের ফল ভোগ করে।

Verse 49

प्राणातिपाते यो रौद्रो दण्डहस्तोद्यतः सदा । नित्यमुद्यतशस्त्रश्न हन्ति भूतगणान्‌ नर:

দেবি! যে মানুষ প্রাণহরণে নিষ্ঠুর, হাতে দণ্ড নিয়ে সদা উদ্যত থাকে, নিত্য অস্ত্র তুলে জীবসমূহকে হত্যা করে—এমন মানুষ, দেবি, নরকে পতিত হয়।

Verse 50

निर्दय: सर्वभूतानां नित्यमुद्रेगकारक: । अपि कीटपिपीलानामशरण्य: सुनिर्घण:

দেবি! যে মানুষ সকল প্রাণীর প্রতি নির্দয়, নিত্য ভয় ও অস্থিরতা সৃষ্টি করে, এবং এতটাই নিষ্ঠুর যে কীট-পিপীলিকাও তার কাছে আশ্রয় পায় না—এমন মানুষ, দেবি, নরকে পতিত হয়।

Verse 51

।। विपरीतस्तु धर्मात्मा रूपवानभिजायते

মহেশ্বর বললেন—যার স্বভাব হিংসার বিপরীত, সে ধর্মাত্মা ও রূপবান হয়ে জন্মায়। দেবী! যে মানুষ হিংসায় আনন্দ পায়, সে নিজের পাপকর্মের ফলে অন্যের দ্বারা বধ্য হয়, সকল প্রাণীর অপ্রিয় হয় এবং অল্পায়ু হয়।

Verse 52

पापेन कर्मणा देवि वध्यो हिंसारतिर्नर: । अप्रिय: सर्वभूतानां हीनायुरुपजायते

দেবী! পাপকর্মের ফলে হিংসায় রত মানুষ বধ্য হয়; সে সকল প্রাণীর অপ্রিয় হয় এবং অল্পায়ু হয়ে জন্মায়।

Verse 53

निरयं याति हिंसात्मा याति स्वर्गमहिंसक: । यातनां निरये रौद्रां स कृच्छां लभते नर:

হিংসাত্মা মানুষ নরকে যায়, আর অহিংসক স্বর্গে গমন করে। নরকে সে মানুষ ভয়ংকর ও অত্যন্ত কষ্টদায়ক যন্ত্রণা ভোগ করে।

Verse 54

यः वक्षिन्निरयात्‌ तस्मात्‌ समुत्तरति कर्हिचित्‌ । मानुष्यं लभते चापि हीनायुस्तत्र जायते,यदि कभी कोई उस नरकसे छुटकारा पाता है तो मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है, किंतु वहाँ उसकी आयु बहुत थोड़ी होती है

যে কেউ কোনো এক সময় সেই নরক থেকে উঠে মুক্ত হয়, সে মানবজন্ম লাভ করে; কিন্তু সেখানেও সে অল্পায়ু হয়ে জন্মায়।

Verse 55

पापेन कर्मणा देवि बद्धो हिंसारतिर्नर: । अप्रिय: सर्वभूतानां हीनायुरुपजायते,देवि! पापकर्मसे बँधा हुआ हिंसापरायण मनुष्य समस्त प्राणियोंका अप्रिय होनेके कारण अल्पायु हो जाता है

দেবী! পাপকর্মে আবদ্ধ হিংসাপরায়ণ মানুষ সকল প্রাণীর অপ্রিয় হয়; আর সকলের অপ্রিয় হওয়ার ফলে সে অল্পায়ু হয়।

Verse 56

यस्तु शुक्लाभिजातीय: प्राणिघातविवर्जक: । निक्षिप्तशस्त्रो निर्दण्डो न हिंसति कदाचन

মহাদেব বললেন—যে শুদ্ধ কুলে জন্মেছে, প্রাণিহিংসা থেকে বিরত, অস্ত্র ত্যাগ করেছে এবং দণ্ড পরিত্যাগ করেছে—সে কখনও কোনো কালে হিংসা করে না।

Verse 57

न घातयति नो हन्ति घ्नन्तं नैवानुमोदते । सर्वभूतेषु सस्नेही यथा55त्मनि तथापरे

সে কাউকে হত্যা করায় না, নিজেও হত্যা করে না, আর যে হত্যা করে তাকে অনুমোদনও করে না। সে সকল ভূতের প্রতি স্নেহশীল এবং অন্যকে নিজের মতোই গণ্য করে।

Verse 58

ईदृश: पुरुषोत्कर्षो देवि देवत्वमश्रुते । उपपन्नान्‌ सुखान्‌ भोगानुपाश्चाति मुदा युतः:

দেবি! এমন উৎকৃষ্ট পুরুষ দেবত্ব লাভ করে; আনন্দে পরিপূর্ণ হয়ে দেবলোকে স্বতঃপ্রাপ্ত, যথাযথ সুখভোগ উপভোগ করে।

Verse 59

अथ चेन्मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते । तत्र दीर्घायुरुत्पन्न: स नर: सुखमेधते,अथवा यदि कदाचित्‌ वह मनुष्यलोकमें जन्म लेता है तो वह मनुष्य दीर्घायु और सुखी होता है

আর যদি কখনও সে মানবলোকে জন্মায়, তবে সে দীর্ঘায়ু হয়ে জন্মায় এবং সুখে সমৃদ্ধ হয়।

Verse 60

एष दीर्घायुषां मार्ग: सुवृत्तानां सुकर्मिणाम्‌ । प्राणिहिंसाविमोक्षेण ब्रह्मणा समुदीरित:

এটাই দীর্ঘায়ুদের—সুশীল ও সৎকর্মীদের—পথ। ব্রহ্মা নিজে এই পথ ঘোষণা করেছেন; সকল প্রাণীর প্রতি হিংসা ত্যাগ করলেই তা লাভ হয়।

Verse 83

तुल्यद्वेष्यप्रिया दान्ता मुच्यन्ते कर्मबन्धनै: । जो कहीं आसक्त नहीं होते

মহেশ্বর বলেন—যারা অপ্রিয় ও প্রিয় উভয়ের প্রতিই সমদৃষ্টি রাখে, ইন্দ্রিয়সংযমী, আসক্তিহীন এবং প্রাণিহিংসা থেকে দূরে থাকে, তারা নিজের কর্মজাত বন্ধন থেকে মুক্ত হয়।

Verse 96

त्यक्तहिंसासमाचारास्ते नरा: स्वर्गगामिन: । जो सब प्राणियोंपर दया करनेवाले, सब जीवोंके विश्वासपात्र तथा हिंसामय आचरणोंको त्याग देनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं

মহাদেব বললেন—যারা হিংসাময় আচরণ ও পরপীড়ার পথ ত্যাগ করে, সকল প্রাণীর প্রতি দয়া করে এবং সকল জীবের বিশ্বাসভাজন হয়, তারা স্বর্গগামী হয়।

Verse 106

धर्मलब्धान्नभोक्तारस्ते नरा: स्वर्गगामिन: । जो दूसरोंके धनपर ममता नहीं रखते, परायी स्त्रीसे सदा दूर रहते और धर्मके द्वारा प्राप्त किये अन्नका ही भोजन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं

মহাদেব বলেন—যারা পরের ধনে লোভ করে না, পরস্ত্রী থেকে সর্বদা দূরে থাকে এবং ধর্মসম্মত উপায়ে প্রাপ্ত অন্নই ভোজন করে, তারা স্বর্গলোকে গমন করে।

Verse 126

स्वभाग्यान्युपजीवन्ति ते नरा: स्वर्गगामिन: । जो सदा अपने ही धनसे संतुष्ट रहकर चोरी-चमारीसे अलग रहते हैं तथा जो अपने भाग्यपर ही भरोसा रखकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं

মহেশ্বর বললেন—যারা নিজের ধনেই সন্তুষ্ট থাকে, চুরি-ডাকাতি থেকে দূরে থাকে এবং ভাগ্যে প্রাপ্ত ন্যায্য অংশের উপর নির্ভর করে জীবিকা নির্বাহ করে, তারা স্বর্গগামী হয়।

Verse 133

अग्राम्यसुख भोगाश्च ते नरा: स्वर्गगामिन: । जो अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहकर ऋतुकालमें ही उसके साथ समागम करते हैं और ग्राम्य सुख-भोगोंमें आसक्त नहीं होते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं

শ্রী মহেশ্বর বলেন—যারা নিজের স্ত্রীর প্রতিই অনুরক্ত থেকে কেবল ঋতুকালেই তার সঙ্গে মিলিত হয় এবং গ্রাম্য, স্থূল বিষয়সুখে আসক্ত হয় না, তারা স্বর্গলোকে গমন করে।

Verse 144

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्व॒रसंवादे चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে উমা–মহেশ্বর সংলাপের একশো পঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 146

जितेन्द्रिया: शीलपरास्ते नरा: स्वर्गगामिन: । जो अपने सदाचारके द्वारा सदा ही परायी स्त्रियोंकी ओरसे अपनी आँखें बंद किये रहते हैं, वे जितेन्द्रिय और शीलपरायण मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं

যে পুরুষ ইন্দ্রিয়জয়ী ও সদাচারপরায়ণ, এবং পরস্ত্রীর দিকে দৃষ্টি পর্যন্ত সংযত রাখে—সে সকল নর স্বর্গগামী হয়।

Verse 156

अकषायकृतश्रैव मार्ग: सेव्य: सदा बुध: । यह देवताओंका बनाया हुआ मार्ग है। राग और द्वेषको दूर करनेके लिये इस मार्गकी प्रवृति हुई है। अतः साधारण मनुष्यों तथा विद्वान्‌ पुरुषोंको भी सदा ही इसका सेवन करना चाहिये

এটি কলুষহীন কল্যাণমার্গ; জ্ঞানীরা সর্বদা এর অনুশীলন করবে। দেবতারা এই পথ প্রতিষ্ঠা করেছেন রাগ ও দ্বেষ দূর করার জন্য; অতএব সাধারণ মানুষ ও বিদ্বান—উভয়েরই নিত্য এ পথ অবলম্বনীয়।

Verse 331

अरण्ये विजने न्यस्तं परस्व॑ दृश्यते यदा । मनसापि न हिंसन्ति ते नरा: स्वर्गगामिन:

নির্জন অরণ্যে পরের ধন পড়ে থাকতে দেখলেও যারা মনে পর্যন্ত তার অনিষ্ট করে না—সেই নরসকল স্বর্গগামী।

Frequently Asked Questions

Whether one should rely on success produced by questionable means: the chapter advises steadiness after righteous action, but distrust of results rooted in asat (improper/adharmic) conduct.

Kāla regulates conditions and influences intellect, but does not convert adharma into dharma; ethical agency remains responsible for choosing timely, discerning, and purified action.

Rather than an explicit phalaśruti, the chapter embeds a consequential claim: dharma, when aligned with kāla, is ‘vijayāvaha’ (conducive to success) and ‘āloka-karaṇa’ (illuminative), indicating the pragmatic and civilizational value of understanding this instruction.