
Adhyāya 119: Vyāsa–Kīṭa-saṃvāda (Tapas-bala and karmic ascent across yoni)
Upa-parva: Dharma–Karma–Gati Upākhyāna (Didactic episode on karmic ascent across yoni)
Vyāsa addresses a being in a low birth (kīṭa), asserting that non-delusion in an animal/low yoni is itself linked to prior śubha-karma, while also emphasizing the unique efficacy of tapas-bala as a force capable of deliverance by mere encounter. He states awareness that the kīṭa’s present condition arose from self-made pāpa, yet proposes the possibility of attaining higher dharma if the being aligns with dharma. The discourse outlines that beings—devas and animals alike—experience the results of karma, and that human embodiment is distinguished by capacities of speech, intellect, and action, enabling worship and the recitation of meritorious narratives. The kīṭa subsequently follows a path of successive births across multiple species and social stations, repeatedly seeking the sage. Eventually, now a royal prince, he describes his elevated worldly condition and attributes it to Vyāsa’s favor, requesting further instruction. Vyāsa replies that while remembrance of the kīṭa-state has arisen, the earlier accumulated pāpa does not vanish; yet prior merit and reverence toward the sage contributed to the present rise. Vyāsa then projects a future ascent: from princely status to brāhmaṇya through a decisive duty-act (offering one’s life in battle for the protection of cows and brāhmaṇas), followed by heavenly enjoyment and a brahma-like state. The chapter closes with a schematic ladder of movement from lower yoni upward through śūdra, vaiśya, kṣatriya, and brāhmaṇa, with conduct praised as the differentiator and heaven as the meritorious outcome for the well-conducted brāhmaṇa.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से एक सनातन धर्म का तत्त्वतः निर्णय चाहता है—मद्य और मांस-भक्षण में दोष क्या है, और त्याग का विधान क्या है। → भीष्म मांस-भक्षण के पाप-चक्र को क्रमशः खोलते हैं—जो स्वयं पशु-वध कर खाता है, जो दूसरे के लिए वध कराता है, जो खरीदा हुआ या परोसा हुआ मांस खाता है—सब किसी न किसी रूप में हिंसा के भागी बनते हैं। युधिष्ठिर का आग्रह ‘निश्चयेन चिकीर्षामि’ इस उपदेश को केवल सुनने नहीं, जीवन में उतारने की तीव्रता देता है। → भीष्म मांस-त्याग के फल को अत्युच्च लोक-प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं—प्राचीन राजर्षि (हर्यश्व, क्षुप, भरत आदि) मांस न खाने से ब्रह्मलोक में तेजस्वी होकर विराजते हैं; और जो इस ‘अमांस’ धर्म का आचरण करता या दूसरों को सुनाता है, वह अत्यन्त दुराचार होने पर भी नरक को नहीं जाता—यह वचन अध्याय का निर्णायक शिखर बनता है। → भीष्म ‘प्रवृत्ति’ और ‘निवृत्ति’—दोनों मार्गों के संदर्भ में ऋषि-निर्मित विधान बताकर उपदेश को पूर्ण करते हैं: मांस-परित्याग का नियम, उसका नैतिक आधार, और उसका फल स्पष्ट कर दिया जाता है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं) अपन बक। ] अति्शशाएड पञ्चदशाधिकशततमो< ध्याय: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष
যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! আপনি বহুবার বলেছেন যে অহিংসাই পরম ধর্ম। তাই মাংস-পরিত্যাগরূপ ধর্ম সম্বন্ধে আমার মনে সংশয় জেগেছে। অতএব বলুন— মাংস ভক্ষণকারীর কী দোষ হয়, আর যে মাংস খায় না তার কী পুণ্য লাভ হয়?
Verse 2
हत्वा भक्षयतो वापि परेणोपह्ृतस्य वा | हन्याद् वा यः परस्यार्थे क्रीत्वा वा भक्षयेन्नर:
যে নিজে পশু হত্যা করে তার মাংস খায়, অথবা অন্যের দেওয়া মাংস ভক্ষণ করে, কিংবা অন্যের আহারের জন্য পশু হত্যা করে, অথবা কিনে এনে মাংস খায়— এমন মানুষের উপর কী দণ্ড পতিত হয়?
Verse 3
एतदिच्छामि तत्त्वेन कथ्यमानं त्वयानघ । निश्चयेन चिकीर्षामि धर्ममेतं सनातनम्
নিষ্পাপ পিতামহ! আমি চাই আপনি এ বিষয়ে তত্ত্বত ব্যাখ্যা করুন। আমি দৃঢ় সংকল্পে এই সনাতন ধর্ম পালন করতে ইচ্ছুক।
Verse 4
कथमायुरवाप्रोति कथं भवति सत्त्ववान् | कथमव्यंगतामेति लक्षण्यो जायते कथम्
মানুষ কীভাবে দীর্ঘায়ু লাভ করে? কীভাবে সে বলবান ও তেজস্বী হয়? কোন উপায়ে সে অঙ্গহীনতা-রহিত পূর্ণতা লাভ করে? আর কীভাবে সে শুভ লক্ষণসমন্বিত হয়ে জন্মায়?
Verse 5
भीष्म उवाच मांसस्याभक्षणाद् राजन् यो धर्म: कुरुनन्दन । तन्मे शूणु यथातत्त्वं यथास्य विधिरुत्तम:
ভীষ্ম বললেন— হে রাজন, কুরু-নন্দন! মাংস না খাওয়ার দ্বারা যে ধর্ম প্রতিষ্ঠিত হয়, তার তত্ত্ব এবং তা পালনের উত্তম বিধি আমার কাছ থেকে শোনো।
Verse 6
भीष्मजीने कहा--राजन्! कुरुनन्दन! मांस न खानेसे जो धर्म होता है, उसका मुझसे यथार्थ वर्णन सुनो तथा उस धर्मकी जो उत्तम विधि है, वह भी जान लो ।।
ভীষ্ম বললেন—রাজন, কুরু-নন্দন! মাংস-পরিত্যাগ থেকে যে ধর্ম জন্মায়, তার যথার্থ বিবরণ আমার কাছ থেকে শোনো, এবং সেই ধর্ম পালনের শ্রেষ্ঠ বিধিও জেনে নাও। যারা রূপ, অঙ্গ-সম্পূর্ণতা, দীর্ঘায়ু, বুদ্ধি, অন্তঃস্থ সত্ত্ব, বল ও দৃঢ় স্মৃতি লাভ করতে চায়, তারা হিংসা ত্যাগ করে; মহাত্মারা সর্বদা প্রাণীহিংসা থেকে বিরত থাকেন।
Verse 7
जो सुन्दर रूप, पूर्णांगता, पूर्ण आयु, उत्तम बुद्धि, सत्त्व, बल और स्मरणशक्ति प्राप्त करना चाहते थे, उन महात्मा पुरुषोंने हिंसाका सर्वथा त्याग कर दिया था ।।
যারা সুন্দর রূপ, অঙ্গ-সম্পূর্ণতা, পূর্ণ আয়ু, উৎকৃষ্ট বুদ্ধি, সত্ত্ব, বল ও স্মরণশক্তি লাভ করতে চেয়েছিল, সেই মহাত্মা পুরুষেরা সম্পূর্ণরূপে হিংসা ত্যাগ করেছিল। কুরু-নন্দন! এ বিষয়ে ঋষিদের মধ্যে বহুবার আলোচনা হয়েছে; যুধিষ্ঠির, এখন তাদের সকলের সম্মতিতে যে সিদ্ধান্ত স্থির হয়েছে, তা শোনো।
Verse 8
यो यजेताश्वमेधेन मासि मासि यतव्रतः । वर्जयेन्मधु मांसं च सममेतद् युधिष्ठिर
যুধিষ্ঠির! যে ব্যক্তি নিয়মবদ্ধ ব্রত পালন করে মাসে মাসে অশ্বমেধ যজ্ঞ সম্পাদন করে, আর যে ব্যক্তি কেবল মদ্য ও মাংস ত্যাগ করে—উভয়েই সমান ফল লাভ করে।
Verse 9
सप्तर्षयो वालखिल्यास्तथैव च मरीचिपा: । अमांसभक्षणं राजन् प्रशंसन्ति मनीषिण:,राजन! सप्तर्षि, वालखिल्य तथा सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले अन्यान्य मनीषी महर्षि मांस न खानेकी ही प्रशंसा करते हैं
রাজন! সপ্তর্ষি, বালখিল্য ঋষিগণ এবং সূর্যকিরণ-আহারী অন্যান্য মনীষী মহর্ষিরা—সকলেই মাংস না খাওয়ার সাধনাকেই প্রশংসা করেন।
Verse 10
न भक्षयति यो मांसं न च हन्यान्न घातयेत् । तम्मित्रं सर्वभूतानां मनु: स्वायम्भुवोडब्रवीत्
স্বায়ম্ভুব মনু বলেছেন—যে মানুষ মাংস খায় না, নিজে হত্যা করে না এবং অন্যকে হত্যা করায়ও না, সে-ই সকল প্রাণীর বন্ধু।
Verse 11
अधृष्य: सर्वभूतानां विश्वास्य: सर्वजन्तुषु । साधूनां सम्मतो नित्यं भवेन्मांसं विवर्जयन्
যে ব্যক্তি মাংস ত্যাগ করে, কোনো প্রাণীই তাকে তুচ্ছ করে না; সে সকল জীবের কাছে বিশ্বাসভাজন হয়, আর সাধুজন সর্বদা তাকে সম্মান করেন।
Verse 12
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति । नारद: प्राह धर्मात्मा नियतं सोडवसीदति,धर्मात्मा नारदजी कहते हैं--जो दूसरेके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह निश्चय ही दुःख उठाता है
ধর্মাত্মা নারদ বলেছেন—যে অন্যের মাংস দিয়ে নিজের দেহপুষ্টি বাড়াতে চায়, সে নিশ্চিতই দুঃখ ভোগ করে এবং অধঃপতিত হয়।
Verse 13
ददाति यजते चापि तपस्वी च भवत्यपि । मधुमांसनिवृत्त्येति प्राह चैवं बृहस्पति:
বৃহস্পতির বচন—যে মদ্য ও মাংস ত্যাগ করে, সে দান করে, যজ্ঞ করে এবং তপস্যাও করে; অর্থাৎ দান-যজ্ঞ-তপস্যার ফল সে লাভ করে।
Verse 14
मासि मास्यश्वमेधेन यो यजेत शतं समा: । न खादति च यो मांसं सममेतन्मतं मम,जो सौ वर्षोतक प्रतिमास अश्वमेध यज्ञ करता है और जो कभी मांस नहीं खाता है-- इन दोनोंका समान फल माना गया है
যে ব্যক্তি শত বছর ধরে প্রতি মাসে অশ্বমেধ যজ্ঞ করে, আর যে কখনও মাংস ভক্ষণ করে না—আমার মতে উভয়েরই ফল সমান।
Verse 15
सदा यजति सत्रेण सदा दान प्रयच्छति । सदा तपस्वी भवति मधुमांसविवर्जनात्,मद्य और मांसका परित्याग करनेसे मनुष्य सदा यज्ञ करनेवाला, सदा दान देनेवाला और सदा तप करनेवाला होता है
মদ্য ও মাংস ত্যাগ করলে মানুষ সর্বদা যজ্ঞকারী, সর্বদা দানকারী এবং সর্বদা তপস্বী হয়ে ওঠে।
Verse 16
सर्वे वेदा न तत् कुर्यु: सर्वे यज्ञाश्न भारत | यो भक्षयित्वा मांसानि पश्चादपि निवर्तते
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! যে ব্যক্তি আগে মাংস ভক্ষণ করেছে, পরে তা থেকে সম্পূর্ণভাবে ফিরে এসে পরিত্যাগ করে, সে যে পুণ্য লাভ করে, তা সকল বেদ ও সকল যজ্ঞও দিতে পারে না।
Verse 17
दुष्करं च रसज्ञाने मांसस्य परिवर्जनम् | चर्तु व्रतमिदं श्रेष्ठ सर्वप्राण्यभयप्रदम्
ভীষ্ম বললেন—যে মাংসের স্বাদ জেনে আস্বাদন করেছে, তার পক্ষে মাংস ত্যাগ করা সত্যিই দুরূহ। তবু এই চতুর্বিধ ব্রতই শ্রেষ্ঠ, কারণ তা সকল প্রাণীকে অভয় দান করে।
Verse 18
सर्वभूतेषु यो विद्वान् ददात्यभयदक्षिणाम् । दाता भवति लोके स प्राणानां नात्र संशय:,जो विद्वान सब जीवोंको अभयदान कर देता है, वह इस संसारमें निःसंदेह प्राणदाता माना जाता है
ভীষ্ম বললেন—যে জ্ঞানী ব্যক্তি সকল জীবকে অভয়-দক্ষিণা, অর্থাৎ অভয়দান করে, সে এই জগতে নিঃসন্দেহে প্রাণদাতা বলে গণ্য হয়।
Verse 19
एवं वै परम धर्म प्रशंसन्ति मनीषिण: । प्राणा यथा55त्मनो5भीष्टा भूतानामपि वै तथा
ভীষ্ম বললেন—এইভাবেই মনীষীরা অহিংসারূপ পরম ধর্মের প্রশংসা করেন। যেমন নিজের প্রাণ নিজের কাছে প্রিয়, তেমনই সকল প্রাণীর কাছেও তাদের নিজ নিজ প্রাণ প্রিয়।
Verse 20
आत्मौपम्येन मन्तव्यं बुद्धिमद्धिः कृतात्मभि: । मृत्युतो भयमस्तीति विदुषां भूतिमिच्छताम्
ভীষ্ম বললেন—বুদ্ধিমান ও সংযতচিত্ত ব্যক্তিদের উচিত আত্মোপম্য দ্বারা বিচার করা, অর্থাৎ সকল প্রাণীকে নিজের মতোই গণ্য করা। কল্যাণকামী বিদ্বানদেরও মৃত্যুভয় থাকে; তবে যারা নিরপরাধ ও সুস্থ, বাঁচতে চায়—তাদেরকে যখন পাপী মাংসজীবী লোকেরা বলপূর্বক হত্যা করে, তখন তারা ভীত হবে না কেন?
Verse 21
कि पुनर्हन्यमानानां तरसा जीवितार्थिनाम् | अरोगाणामपापानां पापैर्मासोपजीविभि:
তবে যারা বাঁচতে চায়, যারা সুস্থ ও নিরপরাধ—তাদের তো মাংসজীবী পাপী লোকেরা বলপূর্বক বধ করে; তাদের মনে ভয় আরও কত বেশি জাগবে! অতএব যে বুদ্ধিমান ও পুণ্যবান, তার উচিত সকল প্রাণীকে নিজের সমান জ্ঞান করা এবং তাদের কল্যাণে প্রবৃত্ত হওয়া। যখন আত্মকল্যাণকামী বিদ্বানদেরও মৃত্যুভয় থাকে, তখন বলপূর্বক নিহত নির্দোষ প্রাণীদের ভয় না হওয়াই বা কী করে সম্ভব?
Verse 22
तस्माद् विद्धि महाराज मांसस्य परिवर्जनम् | धर्मस्यायतन श्रेष्ठ स्वर्गस्य च सुखस्य च,इसलिये महाराज! तुम्हें यह विदित होना चाहिये कि मांसका परित्याग ही धर्म, स्वर्ग और सुखका सर्वोत्तम आधार है
অতএব, হে মহারাজ, নিশ্চিত জেনে রাখো—মাংস পরিত্যাগই ধর্মের, স্বর্গের এবং সুখের সর্বোত্তম ভিত্তি।
Verse 23
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तप: । अहिंसा परम सत्यं यतो धर्म: प्रवर्तते,अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है और अहिंसा परम सत्य है; क्योंकि उसीसे धर्मकी प्रवृत्ति होती है
অহিংসাই পরম ধর্ম; অহিংসাই পরম তপস্যা। অহিংসাই পরম সত্য—কারণ অহিংসা থেকেই ধর্মের প্রবাহ ও বিকাশ ঘটে।
Verse 24
न हि मांसं तृणात् काष्ठादुपलाद् वापि जायते । हत्वा जन्तुं ततो मांसं तस्माद् दोषस्तु भक्षणे
মাংস ঘাস থেকে জন্মায় না, কাঠ থেকে নয়, পাথর থেকেও নয়। প্রাণীকে হত্যা করলেই মাংস মেলে; অতএব তা ভক্ষণে নিশ্চিতই মহাদোষ আছে।
Verse 25
स्वाहास्वधामृतभुजो देवा: सत्यार्जवप्रिया: । क्रव्यादान् राक्षसान् विद्धि जिह्मानृतपरायणान्
যারা স্বাহা (দেবযজ্ঞ) ও স্বধা (পিতৃযজ্ঞ) সম্পাদন করে, যজ্ঞশিষ্ট অমৃতসম ভোজন করে, এবং সত্য ও সরলতাকে ভালোবাসে—আচরণে তারা দেবতুল্য। কিন্তু যারা মাংসভক্ষণে আসক্ত, কুটিলতা ও মিথ্যাভাষণে নিবিষ্ট—তাদের রাক্ষস বলে জেনো।
Verse 26
कान्तारेष्वथ घोरेषु दुर्गेषु गहनेषु च । रात्रावहनि संध्यासु चत्वरेषु सभासु च
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, যে মানুষ মাংস ভক্ষণ করে না, সে ভয়ংকর কাননে, দুর্গম দুর্গে ও ঘন অরণ্যে; রাত্রি-দিনে, উভয় সন্ধ্যায়, চৌমাথায় এবং সভাতেও অন্যের কাছ থেকে ভয় পায় না। তার বিরুদ্ধে অস্ত্র উঠলেও, কিংবা হিংস্র পশু ও সাপের ভয় সামনে এলেও, সে কারও ভয়ে বিচলিত হয় না।
Verse 27
उद्यतेषु च शस्त्रेषु मृग॒व्यालभयेषु च । अमांसभक्षणे राजन् भयमन्यैर्न गच्छति
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, অস্ত্র উত্থিত থাকলেও এবং হরিণ ও হিংস্র পশুদের ভয় উপস্থিত হলেও, যে মাংস ভক্ষণ করে না, সে অন্যের কাছ থেকে ভয় পায় না।
Verse 28
शरण्य: सर्वभूतानां विश्वास्य: सर्वजन्तुषु । अनुद्वेगकरो लोके न चाप्युद्धिजते सदा
ভীষ্ম বললেন—সে সকল প্রাণীর আশ্রয় এবং সকল জীবের কাছে বিশ্বাসযোগ্য। জগতে সে অন্যকে অস্থির করে না, আর নিজেও কারও দ্বারা কখনও বিচলিত হয় না।
Verse 29
यदि चेत् खादको न स्यान्न तदा घातको भवेत् | घातक: खादकार्थाय तद् घातयति वै नरः
ভীষ্ম বললেন—যদি মাংস ভক্ষণকারী কেউ না থাকে, তবে হত্যাকারীও থাকবে না। কারণ মাংসখাদকদের জন্যই হত্যাকারী মানুষ প্রাণীদের বধ করায়।
Verse 30
अभक्ष्यमेतदिति वै इति हिंसा निवर्तते । खादकार्थमतो हिंसा मृगादीनां प्रवर्तते
ভীষ্ম বললেন—যখন মানুষ দৃঢ়ভাবে বুঝে নেয়, ‘এটি ভক্ষণযোগ্য নয়’, তখন হিংসা নিবৃত্ত হয়। কারণ মৃগাদি প্রাণীদের হত্যা কেবল মাংসখাদকদের জন্যই চলতে থাকে।
Verse 31
यस्माद् ग्रसति चैवायुरहिसकानां महाद्युते । तस्माद् विवर्जयेन्मांसं य इच्छेद् भूतिमात्मन:
ভীষ্ম বললেন—হে মহাতেজস্বী রাজন! হিংসাকারীদের আয়ু তাদের নিজের পাপেই গ্রাসিত হয়। অতএব যে নিজের কল্যাণ ও সত্য সমৃদ্ধি কামনা করে, সে সম্পূর্ণরূপে মাংসাহার ত্যাগ করুক।
Verse 32
त्रातारं नाधिगच्छन्ति रौद्रा: प्राणिविहिंसका: । उद्वेजनीया भूतानां यथा व्यालमृगास्तथा
ভীষ্ম বললেন—যে নিষ্ঠুর মানুষ প্রাণীদের হিংসা করে, সে কোনো রক্ষক পায় না। যেমন হিংস্র বন্য পশু সকল জীবের ভয়ের কারণ হয়, তেমনি প্রাণিহিংসাকারীরাও পরলোকে সকল সত্তার আতঙ্কের কারণ হয় এবং নিজেরাও কোনো আশ্রয় বা অভিভাবক পায় না।
Verse 33
लोभाद् वा बुद्धिमोहाद् वा बलवीर्यार्थमेव च । संसर्गादथ पापानामधर्मरुचिता नृणाम्,लोभसे, बुद्धिके मोहसे, बल-वीर्यकी प्राप्तिके लिये अथवा पापियोंके संसर्गमें आनेसे मनुष्योंकी अधर्ममें रुचि हो जाती है
ভীষ্ম বললেন—লোভ থেকে, বুদ্ধিভ্রম থেকে, শক্তি ও পরাক্রম লাভের বাসনা থেকে, কিংবা পাপীদের সঙ্গ থেকে মানুষের মধ্যে অধর্মের প্রতি আসক্তি জন্মায়; অন্তরের দুর্বলতা ও দুষিত সঙ্গ মিলেই মনকে অন্যায় পথে টেনে নিয়ে যায়।
Verse 34
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति । उद्विग्नवासो वसति यत्र यत्राभिजायते,जो दूसरोंके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ कहीं भी जन्म लेता है, चैनसे नहीं रहने पाता है
ভীষ্ম বললেন—যে অন্যের মাংস দিয়ে নিজের মাংস বাড়াতে চায়, সে যেখানে-যেখানেই জন্ম নিক, সেখানেই অস্থিরতায় বাস করে; তার শান্তি হয় না।
Verse 35
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्य स्वस्त्ययनं महत् | मांसस्याभक्षणं प्राहुर्नियता: परमर्षय:
ভীষ্ম বললেন—নিয়মপরায়ণ পরমর্ষিগণ ঘোষণা করেছেন যে মাংসাহার বর্জনই ধন্যতা, যশ, দীর্ঘায়ু, স্বর্গলাভ এবং মহাকল্যাণের শ্রেষ্ঠ উপায়।
Verse 36
इदं तु खलु कौन्तेय श्रुतमासीत् पुरा मया । मार्कण्डेयस्य वदतो ये दोषा मांसभक्षणे,कुन्तीनन्दन! मांसभक्षणमें जो दोष हैं, उन्हें बतलाते हुए मार्कण्डेयजीके मुखसे मैंने पूर्वकालमें ऐसा सुन रखा है--
ভীষ্ম বললেন—হে কৌন্তেয়! বহু পূর্বে আমি এ কথা শুনেছিলাম—মার্কণ্ডেয় যখন মাংসাহারের দোষসমূহ ব্যাখ্যা করছিলেন।
Verse 37
यो हि खादति मांसानि प्राणिनां जीवितैषिणाम् । हतानां वा मृतानां वा यथा हन्ता तथैव सः:
যে ব্যক্তি জীবনপ্রিয় প্রাণীদের—হত্যা করে কিংবা তারা নিজে মরলেও—মাংস ভক্ষণ করে, সে-ও হত্যাকারীরই সমান গণ্য।
Verse 38
धनेन क्रयिको हन्ति खादकश्नोपभोगत: । घातको वधबन्धाभ्यामित्येष त्रिविधो वध:
ক্রেতা ধনের দ্বারা হত্যা করে, ভক্ষক ভোগের দ্বারা, আর ঘাতক হত্যা ও বন্ধনের দ্বারা—এইরূপে বধ তিন প্রকার।
Verse 39
खरीदनेवाला धनके द्वारा, खानेवाला उपभोगके द्वारा और घातक वध एवं बन्धनके द्वारा पशुओंकी हिंसा करता है। इस प्रकार यह तीन तरहसे प्राणियोंका वध होता है ।।
যে নিজে মাংস খায় না, কিন্তু মাংসভোজীকে সমর্থন করে, সে-ও ভাবদোষে পাপে লিপ্ত হয়। তদ্রূপ, যে হত্যাকারীকে অনুমোদন করে, সেও হিংসাদোষে কলুষিত হয়।
Verse 40
अधृष्य: सर्वभूतानामायुष्मान् नीरुज: सदा । भवत्यभक्षयन् मांसं दयावान् प्राणिनामिह
যে মাংস ভক্ষণ করে না এবং এই জগতে প্রাণীদের প্রতি দয়া রাখে, সে সকল জীবের কাছে অদম্য হয়; সে দীর্ঘায়ু ও সদা নিরোগ থাকে।
Verse 41
हिरण्यदानैगोंदानैर्भूमिदानैश्न सर्वश: । मांसस्याभक्षणे धर्मो विशिष्ट इति न: श्रुति:
ভীষ্ম বললেন—সুবর্ণদান, গোদান ও ভূমিদান প্রভৃতি সকল দানে নিঃসন্দেহে পুণ্য লাভ হয়; তবু শ্রুতি অনুসারে মাংস না খাওয়ার ধর্ম তাদের চেয়েও অধিক বিশিষ্ট।
Verse 42
खादकस्य कृते जन्तून् यो हन्यात् पुरुषाधम: । महादोषतरस्तत्र घातको न तु खादक:
ভীষ্ম বললেন—অন্যের ভোজনের জন্য যে জীব হত্যা করে, সে মানুষের মধ্যে অধম। এ বিষয়ে হত্যাকারীর দোষ অতি গুরু; মাংসভোজীর দোষ তত সমান নয়।
Verse 43
इज्यायज्ञश्रुतिकृतैर्यो मार्गरबुधो5धम: । हन्याज्जन्तून् मांसगृध्नु: स वै नरकभाड्नर:,“जो मांसलोभी मूर्ख एवं अधम मनुष्य यज्ञ-याग आदि वैदिक मार्गोंके नामपर प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह नरकगामी होता है
ভীষ্ম বললেন—যে মাংসলোভী, মূঢ় ও অধম ব্যক্তি যজ্ঞ-যাগ ও শ্রুতির পথের অজুহাতে জীবহিংসা করে, সে নরকের ভাগী হয়।
Verse 44
भक्षयित्वापि यो मांसं पश्चादपि निवर्तते । तस्यापि सुमहान् धर्मो यः पापाद् विनिवर्तते
ভীষ্ম বললেন—যে আগে মাংস খেয়েও পরে তা ত্যাগ করে, সেও অতি মহান ধর্মফল লাভ করে; কারণ সে পাপ থেকে ফিরে এসেছে।
Verse 45
आहर्ता चानुमन्ता च विशस्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्ता चोपभोक्ता च खादका: सर्व एव ते
ভীষ্ম বললেন—যে বধের জন্য পশু আনে, যে অনুমতি দেয়, যে বধ করে, যে কেনে-বেচে, যে রান্না করে এবং যে খায়—এরা সকলেই ‘ভোজক’ বলে গণ্য; এবং পাপের অংশীদার।
Verse 46
इदमन्यत्तु वक्ष्यामि प्रमाणं विधिनिर्मितम् । पुराणमृषिभिर्जुष्टं वेदेषु परिनिष्ठितम्
এখন আমি এই বিষয়ে আর-একটি প্রামাণ্য প্রমাণ বলছি—যা বিধি অনুসারে স্বয়ং ব্রহ্মা কর্তৃক প্রতিষ্ঠিত, প্রাচীন, ঋষিদের দ্বারা সমাদৃত এবং বেদে সুদৃঢ়ভাবে প্রতিষ্ঠিত।
Verse 47
प्रवृत्तिलक्षणो धर्म: प्रजार्थिभिरुदाह्ृत: । यथोक्तं राजशार्दूल न तु तन्मोक्षकाड्क्षिणाम्
রাজশার্দূল, নৃপশ্রেষ্ঠ! প্রজা ও সংসার-প্রবাহ কামনাকারীরা প্রবৃত্তিলক্ষণ ধর্মের উপদেশ দিয়েছে; যেমন আমি বলেছি, কিন্তু মোক্ষকামী বৈরাগ্যবানদের কাছে সে পথ অভীষ্ট নয়।
Verse 48
य इच्छेत् पुरुषो5त्यन्तमात्मानं निरुपद्रवम् | स वर्जयेत मांसानि प्राणिनामिह सर्वश:,जो मनुष्य अपने आपको अत्यन्त उपद्रवरहित बनाये रखना चाहता हो, वह इस जगतमें प्राणियोंके मांसका सर्वथा परित्याग कर दे
যে ব্যক্তি নিজেকে সম্পূর্ণরূপে উপদ্রবহীন রাখতে চায়, সে এই জগতে সর্বপ্রকার প্রাণীর মাংস সর্বতোভাবে পরিত্যাগ করুক।
Verse 49
श्रूयते हि पुरा कल्पे नृणां ब्रीहिमय: पशु: । येनायजन्त यज्वान: पुण्यलोकपरायणा:
শোনা যায়, প্রাচীন কল্পে মানুষের যজ্ঞে ‘পশু’ ছিল ধান্য—বিশেষত চাল—দিয়ে নির্মিত। পুণ্যলোকপ্রাপ্তিতে নিবিষ্ট যজমানেরা সেই নিবেদন দিয়েই যজ্ঞ সম্পন্ন করতেন।
Verse 50
ऋषिभि: संशयं पृष्टो वसुश्नेदिपति: पुरा । अभक्ष्यमपि मांसं य: प्राह भक्ष्यमिति प्रभो
প্রভো! প্রাচীন কালে ঋষিরা চেদিরাজ বসুকে সন্দেহ জিজ্ঞাসা করেছিলেন; তখন বসু মাংসকে—যা সর্বতোভাবে অভক্ষ্য—ভক্ষ্য বলে ঘোষণা করেছিল।
Verse 51
आकाशाददवरनिं प्राप्तस्ततः स पृथिवीपति: । एतदेव पुनश्नोक्त्वा विवेश धरणीतलम्
তখন সেই পৃথিবীপতি রাজা বসু আকাশ থেকে পতিত হয়ে ভূমিতে এসে পড়লেন। পরে সেই একই অন্যায় বিচার পুনরায় উচ্চারণ করে তিনি ভূমির মধ্যে তলিয়ে পাতালে প্রবেশ করলেন।
Verse 52
इदं तु शृणु राजेन्द्र कीर्त्यमानं मयानघ । अभक्षणे सर्वसुखं मांसस्य मनुजाधिप,निष्पाप राजेन्द्र! मनुजेश्वर! मेरी कही हुई यह बात भी सुनो--मांस-भक्षण न करनेसे सब प्रकारका सुख मिलता है
হে রাজেন্দ্র, হে নিষ্পাপ! আমার ঘোষিত এই কথাটিও শোনো। হে মনুষ্যাধিপ! মাংস না ভক্ষণ করলে সর্বপ্রকার সুখ লাভ হয়।
Verse 53
यस्तु वर्षशतं पूर्ण तपस्तप्येत् सुदारुणम् । यश्चैव वर्जयेन्मांसं सममेतन्मतं मम,जो मनुष्य सौ वर्षोतक कठोर तपस्या करता है तथा जो केवल मांसका परित्याग कर देता है--ये दोनों मेरी दृष्टिमें एक समान हैं
যে ব্যক্তি পূর্ণ একশ বছর অত্যন্ত কঠোর তপস্যা করে এবং যে ব্যক্তি কেবল মাংস ত্যাগ করে—আমার মতে এ দু’জন সমান।
Verse 54
कौमुदे तु विशेषेण शुक्लपक्षे नराधिप । वर्जयेन्मधुमांसानि धर्मों ह्वात्र विधीयते,नरेश्वर! विशेषतः शरदऋतु, शुक्लपक्षमें मद्य और मांसका सर्वथा त्याग कर दे; क्योंकि ऐसा करनेमें धर्म होता है
হে নরাধিপ! বিশেষত শরৎঋতুর শুক্লপক্ষে মদ্য ও মাংস সম্পূর্ণ বর্জন করো; কারণ এই আচরণেই ধর্ম বিধেয়।
Verse 55
चतुरो वार्षिकान् मासान् यो मांसं परिवर्जयेत् । चत्वारि भद्राण्यवाप्रोति कीर्तिमायुर्यशोबलम्
যে ব্যক্তি বর্ষাকালের চার মাস মাংস বর্জন করে, সে চারটি মঙ্গল লাভ করে—কীর্তি, আয়ু, যশ ও বল।
Verse 56
अथवा मासमेकं वै सर्वमांसान्य भक्षयन् । अतीत्य सर्वदुःखानि सुखं जीवेन्निरामय:,अथवा एक महीनेतक सब प्रकारके मांसोंका त्याग करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो सुखी एवं नीरोग जीवन व्यतीत करता है
ভীষ্ম বললেন— অথবা যে ব্যক্তি এক পূর্ণ মাস সকল প্রকার মাংস ভক্ষণ ত্যাগ করে, সে সর্ব দুঃখ অতিক্রম করে সুখে ও নিরাময়ে জীবন যাপন করে।
Verse 57
वर्जयन्ति हि मांसानि मासश: पक्षशो5पि वा । तेषां हिंसानिवृत्तानां ब्रह्मतोको विधीयते
যারা মাসে মাসে কিংবা পক্ষকালেও মাংস ত্যাগ করে, হিংসা থেকে নিবৃত্ত সেই মানুষদের জন্য ব্রহ্মলোক প্রাপ্তি বিধিত হয়।
Verse 58
मांसं तु कौमुद पक्ष वर्जितं पार्थ राजभि: । सर्वभूतात्मभूतस्थैरविदितार्थपरावरै:
কুন্তীনন্দন! যে রাজারা কৌমুদ ঋতুর পক্ষকালে মাংস ভক্ষণ নিষিদ্ধ করেছিলেন, তাঁরা সকল জীবের আত্মারূপে প্রতিষ্ঠিত হলেন এবং পর-অপর তত্ত্বের জ্ঞান লাভ করলেন।
Verse 59
नाभागेनाम्बरीषेण गयेन च महात्मना । आयुनाथानरण्येन दिलीपरघुपूरुभि:
নাভাগ, অম্বरीষ, মহাত্মা গয়, আয়ু, অনরণ্য, দিলীপ, রঘু ও পুরুর মতো রাজারা (আশ্বিন মাসের পক্ষকালে) মাংস ভক্ষণ ত্যাগ করেছিলেন।
Verse 60
कार्तवीर्यानिरुद्धा भ्यां नहुषेण यतातिना । नृगेण विष्वगश्लेन तथैव शशबिन्दुना
কার্তবীর্য, অনিরুদ্ধ, নহুষ, যযাতি, নৃগ, বিশ্বগশ্ব এবং শশবিন্দুও— এঁরাও (সেই ব্রতে) অন্তর্ভুক্ত ছিলেন।
Verse 61
युवनाश्वेन च तथा शिबिनौशीनरेण च । मुचुकुन्देन मान्धात्रा हरिश्वन्द्रेण वा विभो
ভীষ্ম বললেন—হে কুন্তীনন্দন মহাবাহু! যুবনাশ্ব, উশীনরবংশীয় শিবি, মুচুকুন্দ, মান্ধাতা এবং হরিশ্চন্দ্র—এরাও এই ব্রত পালন করেছিলেন।
Verse 62
सत्यं वदत मासत्यं सत्यं धर्म: सनातन: । हरिश्न्द्रश्नरति वै दिवि सत्येन चन्द्रवत्,सत्य बोलो, असत्य न बोलो, सत्य ही सनातन धर्म है। राजा हरिश्वन्द्र सत्यके प्रभावसे आकाशमें चन्द्रमाके समान विचरते हैं
ভীষ্ম বললেন—সত্য বলো, অসত্য বলো না; সত্যই সনাতন ধর্ম। সত্যের প্রভাবে রাজা হরিশ্চন্দ্র আকাশে চন্দ্রের ন্যায় বিচরণ করেন।
Verse 63
श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च | रैवते रन्तिदेवेन वसुना सृज्जयेन च
ভীষ্ম বললেন—হে রাজেন্দ্র! শ্যেনচিত্র, সোমক ও বৃক; তদ্রূপ রৈবত, রন্তিদেব, বসু এবং সৃঞ্জয়—এদের দ্বারাও (এই ধর্ম) উদাহৃত হয়েছে।
Verse 64
एतैश्नान्यैश्व राजेन्द्र कृपेण भरतेन च । दुष्पन्तेन करूषेण रामालर्कनरैस्तथा
ভীষ্ম বললেন—হে রাজেন্দ্র! এদের সঙ্গে আরও কৃপ, ভরত, দুষ্যন্ত, করূষ; তদ্রূপ রাম, অলর্ক ও নর—এরাও (ধর্মের) প্রসিদ্ধ আদর্শ।
Verse 65
विरूपाश्वेन निमिना जनकेन च धीमता । ऐलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह
ভীষ্ম বললেন—বিরূপাশ্ব, নিমি, প্রজ্ঞাবান জনক, ঐল, পৃথু এবং বীরসেন—এদের দ্বারাও এই (ধর্ম/উপদেশ) ধারণ ও প্রতিষ্ঠিত হয়েছে।
Verse 66
इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च | अजेन धुन्धुना चैव तथैव च सुबाहुना
ভীষ্ম বললেন—এই পরম্পরা ইক্ষ্বাকু, শম্ভু, শ্বেত, সগর; তদ্রূপ অজ, ধুন্ধু এবং সুবাহু দ্বারাও রক্ষিত হয়েছিল।
Verse 67
हर्यश्वेन च राजेन्द्र क्षुपेण भरतेन च । एतैश्नान्यैश्व राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজেন্দ্র! প্রাচীনকালে হর্যশ্ব, ক্ষুপ ও ভরত—এদের দ্বারা এবং অন্যান্য রাজাদের দ্বারাও মাংস ভক্ষণ করা হয়নি।
Verse 68
राजेन्द्र! श्येनचित्र
ভীষ্ম বললেন—হে রাজেন্দ্র! শ্যেনচিত্র, সোমক, বৃক, রৈবত, রন্তিদেব, বসু, সূঞ্জয় এবং আরও বহু নৃপ—কৃপ, ভরত, দুষ্যন্ত, করূষ, রাম, অলর্ক, নর, বিরূপাশ্ব, নিমি, প্রজ্ঞাবান জনক, পুরূরবা, পৃথু, বীরসেন, ইক্ষ্বাকু, শম্ভু, শ্বেতসাগর, অজ, ধুন্ধু, সুবাহু, হর্যশ্ব, ক্ষুপ, ভরত—এরা এবং অন্যান্য রাজাগণ কখনও মাংস ভক্ষণ করেননি। তাঁরা ব্রহ্মলোকে দীপ্তিমান ও শ্রীসমন্বিত হয়ে অবস্থান করেন; গন্ধর্বেরা তাঁদের উপাসনা করে, এবং সহস্র সহস্র দিব্য নারীগণ তাঁদের পরিবেষ্টন করে।
Verse 69
वे सब नरेश अपनी कान्तिसे प्रज्वलित होते हुए वहाँ ब्रह्मलोकमें विराज रहे हैं, गन्धर्व उनकी उपासना करते हैं और सहसौरों दिव्यांगनाएँ उन्हें घेरे रहती हैं ।।
ভীষ্ম বললেন—সেই সব রাজা নিজেদের কান্তিতে জ্বলে উঠে ব্রহ্মলোকে বিরাজ করেন; গন্ধর্বেরা তাঁদের সেবা-উপাসনা করে, আর সহস্র সহস্র দিব্য নারীগণ তাঁদের পরিবেষ্টন করে। এটাই সর্বোত্তম ধর্ম—অহিংসা-লক্ষণ ধর্ম। যে মহাত্মারা এর আচরণ করেন, তাঁরা স্বর্গের শিখরে বাস করেন।
Verse 70
मधु मांसं च ये नित्यं वर्जयन्तीह धार्मिका: | जन्मप्रभृति मद्यं च सर्वे ते मुन॒य: स्मृता:
ভীষ্ম বললেন—যে ধার্মিকেরা এই জগতে সর্বদা মধু ও মাংস বর্জন করে, এবং জন্ম থেকেই মদ্য থেকে বিরত থাকে—তাঁরা সকলেই ‘মুনি’ বলে গণ্য।
Verse 71
इमं धर्मममांसादं यश्चरेच्छावयीत वा । अपि चेत् सुदुराचारो न जातु निरयं व्रजेत्
ভীষ্ম বললেন—যে মাংসাহার-ত্যাগরূপ এই ধর্ম নিজে পালন করে, অথবা অন্যকে তা শোনায় ও শোনাতে উদ্যোগী হয়, সে যতই দুরাচারী হোক না কেন, কখনও নরকে পতিত হয় না।
Verse 72
पठेद् वा य इदं राजन् शृणुयाद् वाप्यभीक्षणश: । अमांसभक्षणविर्धि पवित्रमृषिपूजितम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যে ঋষিদের দ্বারা পূজিত ও পবিত্র এই অমাংস-ভক্ষণ (মাংসত্যাগ) বিধান পাঠ করে, অথবা বারংবার তা শ্রবণ করে, সে সর্বপাপ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 73
विमुक्त: सर्वपापेभ्य: सर्वकामैर्महीयते । विशिष्टतां ज्ञातिषु च लभते नात्र संशय:
সে সর্বপাপ থেকে মুক্ত হয়ে সকল কাম্য ভোগে সম্মানিত হয় এবং নিজ জ্ঞাতি-স্বজনদের মধ্যে বিশেষ মর্যাদা লাভ করে—এ বিষয়ে সন্দেহ নেই।
Verse 74
आपन्नश्चापदो मुच्येद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् | मुच्येत्तथा55तुरो रोगाद् दुःखान्मुच्येत दु:खित:
বিপদে পতিত ব্যক্তি বিপদ থেকে মুক্ত হয়, বন্ধনে আবদ্ধ ব্যক্তি বন্ধন থেকে মুক্তি পায়; তদ্রূপ রোগী রোগ থেকে মুক্ত হয় এবং দুঃখিত ব্যক্তি দুঃখ থেকে পরিত্রাণ পায়।
Verse 75
तिर्यग्योनिं न गच्छेत रूपवांश्ष भवेन्नर: । ऋद्धिमान् वै कुरुश्रेष्ठ प्राप्तुयाच्च महद् यश:
হে কুরুশ্রেষ্ঠ! এর প্রভাবে মানুষ তির্যক্যোনিতে পতিত হয় না; সে সুন্দর রূপ লাভ করে, সমৃদ্ধি অর্জন করে এবং মহৎ যশ পায়।
Verse 76
एतत्ते कथितं राजन् मांसस्य परिवर्जने । प्रवृत्ती च निवृत्ती च विधानमृषिनिर्मितम्
হে রাজন! মাংস-পরিত্যাগ সম্বন্ধে আমি তোমাকে এ কথা বললাম; আর প্রবৃত্তি ও নিবৃত্তি—উভয়েরই যে বিধান ঋষিগণ নির্মাণ করেছেন, তাও ব্যাখ্যা করলাম।
Verse 114
इस प्रकार श्रीमह्ा भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मांसके परित्यागका उपदेशविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে মাংস-পরিত্যাগের উপদেশবিষয়ক একশ চৌদ্দতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 115
राजन! यह मैंने तुम्हें ऋषियोंद्वारा निर्मित मांस-त्यागका विधान तथा प्रवृत्तिविषयक धर्म भी बताया है ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मांसभक्षणनिषेधे पजञ्चदशाधिकशततमो<ध्याय:
হে রাজন! ঋষিদের নির্মিত মাংস-ত্যাগের বিধান এবং প্রবৃত্তিবিষয়ক ধর্মও আমি তোমাকে বলেছি। এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে মাংসভক্ষণ-নিষেধবিষয়ক একশ পনেরোতম অধ্যায় সমাপ্ত।
The tension between karmic determinism and ethical agency: the being’s low birth is attributed to prior wrongdoing, yet the chapter asks how one should act—without delusion or despair—when past pāpa persists but reform remains possible.
Karma is continuous and morally structured, but disciplined alignment with dharma—supported here by the paradigm of tapas and guidance—enables reorientation across lives; human faculties are portrayed as a privileged platform for generating merit through worship, speech, and deliberate action.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter embeds a consequentialist meta-claim: reverence toward the sage and dharmic conduct yield upward movement and eventual heavenly well-being, while pāpa remains operative until exhausted by its results and countered by sustained merit.