Jarītā–Śārṅgā-saṃvāda: Ākhu-haraṇa and the Approach of Agni (आखुहरणं अग्न्यागमनश्च)
मा गमस्त्वं यथा वहने प्रकृतिस्थो भविष्यसि । अरूुचिं नाशयिष्ये5हं समयं प्रतिपद्य ते,अग्निदेवकी यह बात सुनकर सम्पूर्ण जगतके स्रष्टा भगवान् ब्रह्माजी हव्यवाहन अग्निसे हँसते हुए-से इस प्रकार बोले--“महाभाग! तुमने बारह वर्षोतक वसुधाराकी आहुतिके रूपमें प्राप्त हुई घृतधाराका उपभोग किया है। इसीलिये तुम्हें ग्लानि प्राप्त हुई है। हव्यवाहन! तेजसे हीन होनेके कारण तुम्हें सहसा अपने मनमें ग्लानि नहीं आने देनी चाहिये। वहने! तुम फिर पूर्ववत् स्वस्थ हो जाओगे। मैं समय पाकर तुम्हारी अरुचि नष्ट कर दूँगा
mā gamas tvaṁ yathā vahane prakṛtistho bhaviṣyasi | aruciṁ nāśayiṣye'haṁ samayaṁ pratipadyate ||
“হে বহ্নি! নিরাশ হয়ো না। তুমি আবার স্বাভাবিক অবস্থায় ফিরে যাবে। যথাসময়ে আমি তোমার অরুচি নাশ করব।”
वैशम्पायन उवाच