समन्तपञ्चक-आख्यानम् तथा अक्षौहिणी-प्रमाणनिर्णयः
Samantapañcaka Narrative and the Measure of an Akṣauhiṇī
तदेतद् भारतं नाम कविभिस्तूपजीव्यते । उदयप्रेप्सुभिर्भुत्यैरैभिजात इवेश्वर:,जैसे अपनी उन्नति चाहनेवाले महत्त्वाकांक्षी सेवक अपने कुलीन और सद्धावसम्पन्न स्वामीकी सेवा करते हैं, इसी प्रकार संसारके श्रेष्ठ कवि इस महाभारतकी सेवा करके ही अपने काव्यकी रचना करते हैं
যেমন উন্নতি-প্রার্থী উচ্চাকাঙ্ক্ষী ভৃত্যরা কুলীন ও সদ্ভাবসম্পন্ন প্রভুর সেবা করে, তেমনি জগতের শ্রেষ্ঠ কবিরা এই ‘মহাভারত’-কেই অবলম্বন করে নিজেদের কাব্য রচনা করেন।
राम उवाच