ददाह तां पुरीं चक्रं सकलाम् एव सत्वरम् अक्षीणामर्षम् अत्यल्पसाध्यसाधननिस्पृहम् तच् चक्रं प्रस्फुरद्दीप्ति विष्णोर् अभ्याययौ करम् //
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