Bala KandaPrakarana 2620 Verses

Prakarana 26

The first sopāna (step) where bhakti is born through śravaṇa–darśana: the seeker’s heart is trained to recognize divinity hidden in apparent childhood, humility, and ‘play’ (kautuka). In this passage, the Pināka-bow episode becomes an inner rite: egoic strength fails, and only grace-aligned strength (guru-ājñā + vinaya) can ‘lift’ the burden of saṃsāra.

ইয়াত ৰস এক সু-গাঁথনি: বীৰ, অদ্ভুত আৰু কৰুণাৰ সুতাৰে বোনা, আৰু শেষত আত্মাৰ দিৱ্য-মিলনৰ যোগ্যতা ৰূপে শৃংগাৰৰ দিশে গতি কৰে। শিৱধনু উঠাবলৈ ৰজাসকলৰ পুনঃপুন ব্যৰ্থতা ‘অহংকাৰ-বল’ৰ পতন মঞ্চস্থ কৰে—সাংসাৰিক শক্তি টানি-হেঁচি, ঘামি, আৰু অৱশেষত লাজেৰে বহি পৰে। জনকৰ তীক্ষ্ণ বাক্য কৰুণাক তীব্ৰ কৰে আৰু হাস্য-ছাঁয়াযুক্ত উপহাস জাগায়; কিন্তু তাৰ গভীৰ ধৰ্ম-তাত্ত্বিক কাৰ্য হ’ল অৱতাৰ-লীলাক জনসমক্ষে প্ৰকাশলৈ আহ্বান কৰা। লক্ষ্মণৰ সংযত ক্ৰোধ ৰক্ষাকাৰী ধৰ্মৰ প্ৰতিমূর্তি, আৰু ৰামৰ মৌনতা তথা নতশিৰ ভঙ্গী ‘বিনয়’—ভক্তিৰ প্ৰথম ব্যাকৰণ। বিশ্বামিত্ৰৰ আজ্ঞাত ৰাম ‘সহজ শুভায়’ উঠি দাঁড়ায়—ই সংকেত দিয়ে যে মুক্তি বলপ্ৰয়োগে অৰ্জিত নহয়; গুৰু-বচন যেতিয়া জীৱক প্ৰভুৰ ইচ্ছাৰ সৈতে সুৰ মিলায়, তেতিয়াই মুক্তি স্বতঃ প্ৰকাশ পায়। সীতাৰ অন্তঃপ্ৰাৰ্থনা ভৱানী আৰু গণেশলৈ মানসৰ ইচ্ছাকৃত শৈৱ–বৈষ্ণৱ-সমন্বয় দেখুৱায়: পথ একেই, বহু দেৱতা-দ্বাৰেদি আগবঢ়ি, শেষত অন্তৰ্বাসী প্ৰভু ৰূপে ৰামত সমাপ্ত হয়।

Verses

Verse 521 (चौपाई)

नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।। रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे।। सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा।। त्रिभुवन जय समेत बैदेही।।बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही।। सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे।। परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।। तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं।। जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं।।

Verse 522 (दोहा/सोरठा)

तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ। मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ।।250।।

Verse 523 (चौपाई)

भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा।। डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें।। सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी।। कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी।। श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा।। नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने।। दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना।। देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा।।

Verse 524 (दोहा/सोरठा)

कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय। पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय।।251।।

Verse 525 (चौपाई)

कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा।। रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई।। अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी।। तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू।। सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ।। जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई।। जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी।। माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें।।

Verse 526 (दोहा/सोरठा)

कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान। नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान।।252।।

Verse 527 (चौपाई)

रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई।। कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी।। सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू।। जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं।। काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी।। तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना।। नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ।। कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं।।

Verse 528 (दोहा/सोरठा)

तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ। जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ।।253।।

Verse 529 (चौपाई)

लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले।। सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने।। गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं।। सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे।। बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी।। उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा।। सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा।। ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ।।

Verse 530 (दोहा/सोरठा)

उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग। बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग।।254।।

Verse 531 (चौपाई)

नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी।। मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने।। भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा।। गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा।। सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी।। चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी।। बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे।। तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस गोसाईं।।

Verse 532 (दोहा/सोरठा)

रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ। सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ।।255।।

Verse 533 (चौपाई)

सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेठ कहावत हितू हमारे।। कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं।। रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा।। सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं।। भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।। बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी।। कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा।। रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा।।

Verse 534 (दोहा/सोरठा)

मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब। महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब।।256।।

Verse 535 (चौपाई)

काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे।। देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुष रामु सुनु रानी।। सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती।। तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही।। मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।। करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई।। गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा।। बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी।।

Verse 536 (दोहा/सोरठा)

देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।। भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर।।257।।

Verse 537 (चौपाई)

नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।। अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।। सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई।। कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा।। बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा।। सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी।। निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।। अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब सय जाहीं।।

Verse 538 (दोहा/सोरठा)

प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल। खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल।।258।।

Verse 539 (चौपाई)

गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी।। लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना।। सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी।। तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा।। तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहिं मोहि रघुबर कै दासी।। जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू।। प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना।। सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे।।

Verse 540 (दोहा/सोरठा)

लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु। पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु।।259।।

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