Dharma-śaṅkā-nivāraṇa: Yudhiṣṭhira’s Response on Karma-Phala and Trust in Dharma
सिद्धिर्वाप्पथवासिद्धिरप्रवृत्तिरतोडन्यथा । बहूनां समवाये हि भावानां कर्म सिद्धाति,महाराज! कार्यमें सिद्धि प्राप्त होगी या असिद्धि, ऐसा संदेह मनमें लेकर आप कर्ममें प्रवृत्त ही न हों, यह उचित नहीं है; क्योंकि बहुत-से कारण एकत्र होनेपर ही कर्ममें सफलता मिलती है
কাৰ্য সিদ্ধি হ’ব নে অসিদ্ধি—এই সন্দেহ মনত ৰাখি কৰ্মত প্ৰবৃত্ত নহোৱাটো উচিত নহয়। কিয়নো বহু কাৰণ একেলগে মিলিলেহে কৰ্মসিদ্ধি হয়।
युधिछिर उवाच