Brāhmaṇa-māhātmya: Tārkṣya’s instruction on tapas, satya, and svadharma
Chapter 182
सर्प उवाच सुप्रज्ञममपि चेच्छूरमृद्धिमोहयते नरम् | वर्तमान: सुखे सर्वो मुह्मतीति मतिर्मम,सर्पने कहा--राजन्! यह धन-सम्पत्ति बड़े-बड़े बुद्धिमान् और शूरवीर मनुष्यको भी मोहमें डाल देती है। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि सुख-विलासमें डूबे हुए सभी लोग मोहित हो जाते हैं
সাপে ক’লে—ৰাজন! এই ধন-সম্পদ মহাবুদ্ধিমান আৰু শূৰ মানুহকো মোহিত কৰে। মোৰ বিশ্বাস—সুখভোগত নিমগ্ন সকলো লোক মোহগ্ৰস্ত হয়।
सर्प उवाच