उद्योगपर्व — अध्याय २५: संजयदूतवाक्यम्
Sañjaya’s Envoy-Speech on Peace
तदर्थलुब्धस्य निबोध मेडद्य ये मन्त्रिणो धार्तराष्ट्रस्य सूत । दुःशासन: शकुनि:ः सूतपुत्रो गावल्गणे पश्य सम्मोहमस्य,गवल्गणपुत्र संजय! धनके लोभी दुर्योधनके जो-जो मन्त्री हैं, उनके नाम आज तुम मुझसे सुन लो। दुःशासन, शकुनि तथा सूतपुत्र कर्ण--ये ही उसके मन्त्री हैं। उसका मोह तो देखो
tadarthalubdhasya nibodha medad ye mantriṇo dhārtarāṣṭrasya sūta | duḥśāsanaḥ śakuniḥ sūtaputro gāvalgaṇe paśya sammohaṁ asya ||
সঞ্জয়ে ক’লে—হে সূত! বুজি লোৱা: ধনলোভত অন্ধ ধৃতৰাষ্ট্ৰপুত্ৰৰ মন্ত্রীসকল এইসকল—দুঃশাসন, শকুনি আৰু সূতপুত্ৰ কৰ্ণ। হে গাবল্গণ! চোৱা, তাক কেনেকৈ মোহে আচ্ছন্ন কৰি পেলাইছে।
संजय उवाच