Yudhiṣṭhira’s Lament for Karṇa and Renunciation-Oriented Self-Assessment (शोक-प्रलापः / त्याग-प्रवृत्तिः)
उपवासैस्तथेज्याभिव्रतकौतुकमड़लै: । लभन्ते मातरो गर्भान् मासान् दश च बिशभ्रति,इह चामुत्र चैवेति कृपणा: फलहेतव: । इसी प्रकार सभी माताएँ उपवास, यज्ञ, व्रत, कौतुक और मंगलमय कृत्योंद्वारा उत्तम पुत्रकी इच्छा रखकर दस महीनोंतक अपने गर्भोका भरण-पोषण करती हैं। उन सबका यही उद्देश्य होता है कि यदि कुशलपूर्वक बच्चे पैदा होंगे, पैदा होनेपर यदि जीवित रहेंगे तथा बलवान होकर यदि अच्छे गुणोंसे सम्पन्न होंगे तो हमें इहलोक और परलोकमें सुख देंगे। इस प्रकार वे दीन माताएँ फलकी आकांक्षा रखती हैं
yudhiṣṭhira uvāca | upavāsais tathejābhir vratakautukamaṅgalaiḥ | labhante mātaro garbhān māsān daśa ca bibhrati | iha cāmutra caiveti kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ |
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—উপবাস, যজ্ঞ, ব্ৰত, কৌতুক আৰু মঙ্গলকৰ্মৰ দ্বাৰা মাতৃসকলে গৰ্ভলাভ কামনা কৰে; দহ মাহ গৰ্ভ ধৰি পোষণ কৰে। ‘ইহলোকে আৰু পৰলোকে’ বুলি ভাবি সেই দীন নাৰীসকলে ফলৰ আশাতেই সকলো কৰে।
युधिछिर उवाच