एकान्तिधर्म-प्रश्नः (Inquiry into Ekāntin Dharma) / The Origin and Practice of Single-Pointed Nārāyaṇa-Centered Discipline
तैरेकमतिभिर्भूत्वा यत् प्रोक्तं शास्त्रमुत्तमम् । वेदैश्नतुर्भि: समितं कृतं॑ मेरो महागिरी,(अब मैं जिस प्रकार तन्त्र, स्मृति और आगमकी उत्पत्ति हुई है, उसे बताता हूँ, सुनो --) मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महातेजस्वी वसिष्ठ--ये सात प्रसिद्ध ऋषि चित्रशिखण्डी कहलाते हैं। ये जो चित्रशिखण्डी नामसे विख्यात सात ऋषि हैं, इन्होंने महागिरि मेरुपर एकमत होकर जिस उत्तम शास्त्रका प्रवचन एवं निर्माण किया, वह चारों वेदोंके समान आदरणीय एवं प्रमाणभूत है। उसमें सात मुखोंसे प्रकट हुए उत्तम लोकधर्मकी व्याख्या हुई है
bhīṣma uvāca | tair ekamatibhir bhūtvā yat proktaṃ śāstram uttamam | vedaiś caturbhiḥ samitaṃ kṛtaṃ merau mahāgiri ||
তেওঁলোকে সকলেই একমত হৈ মহাগিৰি মেৰুত যি উত্তম শাস্ত্ৰ প্ৰচাৰ আৰু ৰচনা কৰিছিল, সেয়া চাৰিও বেদৰ সৈতে সমন্বিত—আদৰণীয় আৰু প্ৰমাণভূত।
भीष्म उवाच