Akṣara–Kṣara Viveka: Vasiṣṭha–Karāla-Janaka Saṃvāda (अक्षर-क्षर विवेकः)
आयुर्न सुलभं लब्ध्वा नावकर्षेद् विशाम्पते । उत्कर्षार्थ प्रयतेत नर: पुण्येन कर्मणा,प्रजानाथ! मनुष्य-शरीरकी आयु सुलभ नहीं है--वह दुर्लभ वस्तु है, उसे पाकर आत्माको नीचे नहीं गिराना चाहिये। मनुष्यको चाहिये कि वह पुण्यकर्मके अनुष्ठानद्वारा आत्माके उत्थानके लिये सदा प्रयत्न करता रहे
āyur na sulabhaṃ labdhvā nāvakārṣed viśāṃpate | utkarṣārthaṃ prayateta naraḥ puṇyena karmaṇā prajānātha ||
পৰাশৰে ক’লে—হে প্ৰজানাথ! মানৱজীৱনৰ আয়ু সহজে লাভ নহয়; ই দুঃলভ। ই লাভ কৰি আত্মাক অধোগতিলৈ টানি নমাব নালাগে। পুণ্যকৰ্মৰ দ্বাৰা আত্মোন্নতিৰ বাবে মানুহে সদায় প্ৰচেষ্টা কৰি থাকিব লাগে।
पराशर उवाच