Adhyāya 222 — ब्रह्मस्थानप्राप्ति: मोक्षधर्मे समत्वव्रतम्
Attaining the Brahman-Station: The Vow of Equanimity in Mokṣadharma
असक्तं धूतपाप्मानं कुले जातं बहुश्रुतम् । अस्तब्धमनहड्कारं सत्त्वस्थं समये रतम्,प्रह्नादजीके मनमें किसी विषयके प्रति आसक्ति नहीं थी। उनके सारे पाप धुल गये थे। वे कुलीन और बहुश्रुत विद्वान् थे। वे गर्व और अहंकारसे रहित थे। वे धर्मकी मर्यादाके पालनमें तत्पर और शुद्ध सत्त्वगुणमें स्थित रहते थे। निन्दा और स्तुतिको समान समझते, मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखते और एकान्त स्थानमें निवास करते थे। उन्हें चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाशका ज्ञान था। अप्रियकी प्राप्तिमें क्रोधयुक्त तथा प्रियकी प्राप्ति होनेपर हर्षयुक्त नहीं होते थे। मिट्टीके ढेले और सुवर्ण दोनोंमें उनकी समानदृष्टि थी। वे ज्ञानस्वरूप कल्याणमय परमात्माके ध्यानमें स्थित और धीर थे। उन्हें परमात्मतत्त्वका पूर्ण निश्चय हो गया था। उन्हें परावरस्वरूप ब्रह्मका पूर्ण ज्ञान था। वे सर्वज्ञ, सम्पूर्णभूत- प्राणियोंमें समदर्शी एवं जितेन्द्रिय थे। वे भगवान् नारायणके प्रिय भक्त और सदा उन्हींके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले थे। हिरण्यकशिपुनन्दन प्रह्नादजीको एकान्तमें बैठकर परमात्मा श्रीहरिका ध्यान करते देख इन्द्र उनकी बुद्धि और विचारको जाननेकी इच्छासे उनके निकट जाकर इस प्रकार बोले--
bhīṣma uvāca | asaktaṃ dhūtapāpmānaṃ kule jātaṃ bahuśrutam | astabdham anahaṅkāraṃ sattvasthaṃ samaye ratam ||
প্ৰহ্লাদ আছিল আসক্তিহীন; তেওঁৰ পাপ ধুই গৈছিল। তেওঁ আছিল কুলীন আৰু বহুশ্ৰুত। দৰ্প আৰু অহংকাৰৰ পৰা মুক্ত। শুদ্ধ সত্ত্বত স্থিত হৈ তেওঁ ধৰ্ম-মৰ্যাদা আৰু সদাচাৰত সদা ৰত আছিল।
भीष्म उवाच
True excellence is defined by inner qualities: detachment from sense-objects and results, purification of conduct, humility without ego, and steady commitment to dharmic discipline. Learning and noble birth are praised only when joined to self-restraint and purity (sattva).
Bhishma is describing Prahlada’s character as an exemplar of virtue—unattached, purified, learned, humble, and devoted to righteous conduct—setting the ethical tone for the surrounding instruction in Shanti Parva.