त्रिवर्गविचारः
Tri-varga Deliberation: Dharma, Artha, Kāma
अनिन्दितो हाुकामात्मा नाल्पेष्वर्थ्यनसूयक: । समुद्रकल्प: स नरो न कथंचन पूर्यते,इन्द्रिय और मनको वशमें रखनेवाले पुरुषकी कभी निन्दा नहीं होती। उसके मनमें कोई कामना नहीं होती। वह छोटी-छोटी वस्तुओंके लिये किसीके सामने हाथ नहीं फैलाता अथवा तुच्छ विषय-सुखोंकी अभिलाषा नहीं रखता, दूसरोंके दोष नहीं देखता। वह मनुष्य समुद्रके समान अगाध गाम्भीर्य धारण करता है। जैसे समुद्र अनन्त जलराशि पाकर भी भरता नहीं है, उसी प्रकार वह भी निरन्तर धर्मसंचयसे कभी तृप्त नहीं होता
anindito hi akāmatmā nālpeṣv arthy anasūyakaḥ | samudrakalpaḥ sa naro na kathaṃcana pūryate ||
ভীষ্মে ক’লে— যিয়ে ইন্দ্ৰিয় আৰু মনক বশত ৰাখে, সি নিন্দিত নহয়; তাৰ অন্তৰ কামনাৰহিত। সি তুচ্ছ লাভৰ বাবে হাত নাপাতে, ক্ষুদ্ৰ বিষয়-সুখ কামনা নকৰে, আৰু পৰৰ দোষ নেদেখে। সি সমুদ্ৰসম গম্ভীৰ; যেনেকৈ সমুদ্ৰ অপাৰ জল পাইও পূৰ্ণ নহয়, তেনেকৈ সিও ধৰ্মসঞ্চয় কৰি কেতিয়াও তৃপ্ত নহয়।
भीष्म उवाच