Vṛddha-kanyā-carita and Balarāma’s Kurukṣetra Inquiry (वृद्धकन्या-चरितम् / कुरुक्षेत्रफल-प्रश्नः)
स्वाध्यायममरप्रख्यं कुर्वाणं विजने वने । फिर वहाँसे जाकर उन्होंने सब महर्षियोंको बताया कि “देवताओंके समान अत्यन्त कान्तिमान् एक सारस्वत मुनि हैं, जो निर्जन वनमें रहकर सदा स्वाध्याय करते हैं” ।। ततः सर्वे समाजम्मुस्तत्र राजन् महर्षय:
svādhyāyam amaraprakhyaṃ kurvāṇaṃ vijane vane | tataḥ sarve samājamus tatra rājan maharṣayaḥ ||
বৈশম্পায়নে ক’লে—তেওঁ জনালে—“নির্জন বনত দেৱসম অতি দীপ্তিমান এজন সাৰস্বত মুনি আছে; তেওঁ সদায় স্বাধ্যায়ত ৰত।” এই কথা শুনি, হে ৰাজন, সকলো মহর্ষি তাত সমবেত হ’ল।
वैशम्पायन उवाच